जहा गेरुल्लाह से मदद मांगने से मना है वो बुतो मूर्तिया बातिल खुदा यानी झूठे ख़ुदा से मना है
*गैरुल्लाह से मदद मांगना*
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*ⓩ बेशक ग़ैरुल्लाह से मदद मांगना जायज़ है और अल्लाह के मुक़द्दस बन्दे दूर से सुनते हैं देखते हैं और मदद भी करते हैं,नीचे मैं क़ुर्आनो हदीस व खुद वहाबियों की किताबों से 23 हवाले दे रहा हूं मुलाहज़ा करें*
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*दूर से सुनना*
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*.1. कंज़ुल ईमान* – एक चींटी बोली ऐ चींटियों अपने बिलों में चली जाओ तुम्हे कुचल ना डाले सुलेमान और उसका लश्कर बेखबरी में तो उसकी बात सुनकर सुलेमान मुस्कुरा कर हंसा
📕 पारा 19,सूरह नमल,आयत 18
👇👇कंजुल ईमान👇👇
*हिन्दी/hinglish* *गैरुल्लाह से मदद मांगना*
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*ⓩ बेशक ग़ैरुल्लाह से मदद मांगना जायज़ है और अल्लाह के मुक़द्दस बन्दे दूर से सुनते हैं देखते हैं और मदद भी करते हैं,नीचे मैं क़ुर्आनो हदीस व खुद वहाबियों की किताबों से 23 हवाले दे रहा हूं मुलाहज़ा करें*
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*दूर से सुनना*
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*.1. कंज़ुल ईमान* – एक चींटी बोली ऐ चींटियों अपने बिलों में चली जाओ तुम्हे कुचल ना डाले सुलेमान और उसका लश्कर बेखबरी में तो उसकी बात सुनकर सुलेमान मुस्कुरा कर हंसा
📕 पारा 19,सूरह नमल,आयत 18
*तफसीर* – हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम एक अज़ीम लश्कर लेकर जो कि 300 मील लम्बाई व चौड़ाई पर मुश्तमिल था,जिसमे जिन्नों इन्सो चरिंदो परिन्द सब शामिल थे,जब ये लश्कर मुल्के शाम के जंगलों से गुज़रा तो एक चींटी जो कि मादा थी और लंगड़ी थी,उसका नाम ताखिया जर्मी या मनज़रा था,ये खुद मलिका थी इसके लश्कर में करोड़ों चींटियां थीं,ये उन सबको मुखातब करके बोली कि अपने अपने घरों में चली जाओ कहीं ऐसा न हो कि सुलेमान का लश्कर तुम्हें कुचल दे और उन्हें खबर तक न हो,जब उस चींटी ने ये बात कही उस वक़्त हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम उस चींटी से 3 मील दूर थे,1 मील = 1.60934 किलोमीटर तो 3 मील = 4.82802 किलोमीटर,यानि तक़रीबन आपने 5 किलोमीटर दूर से चींटी की आवाज़ सुनी और चींटी की इसी दानाई पर आप मुस्कुरा दिए,तो जब चींटी की न सुनाई देने वाली आवाज़ भी एक नबी सुन सकते हैं तो फिर हमारे आक़ा व मौला जो कि नबियों के सरदार हैं उनकी समाअत का क्या आलम होगा
📕 रूहुल बयान,पारा 19,सफह 745
*ⓩ उस चींटी की दानाई पर आप मुस्कुरा दिए अब ज़रा इसका मतलब भी समझ लीजिए कि एक छोटी और मामूली से चींटी ने हमको कितना बड़ा अक़ीदा सिखा दिया,ज़रा क़ुर्आन की उस आयत को दोबारा पढ़िए,पढ़िए और समझिए रब फरमाता है कि चींटी बोली,क्या बोली “कि कहीं ऐसा न हो कि सुलेमान का लश्कर तुम्हे कुचल दे और उन्हें खबर तक न हो” अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर यानि उस चींटी को भी ये पता था कि अल्लाह के नबी मअसूम होते हैं और जानबूझकर हरगिज़ ऐसा नहीं कर सकते कि हमारे ऊपर से गुज़र जायें यानि हमें मार डालें,हां अनजाने में ऐसा हो सकता है इसीलिए वो सबको तम्बीह करते हुए बोली कि अपने बिलों में चली जाओ उसकी इसी दानाई को जब हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने सुना तो आप बिना मुस्कुराये नहीं रह सके,सुबहान अल्लाह,ये एक चींटी का अक़ीदा था और यही हम सुन्नियों का अक़ीदा है मगर वहीं इन वहाबियों का अक़ीदा देखिये जो मआज़ अल्लाह अम्बिया तो दूर की बात हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को भी मअसूम नहीं जानते और उनको भी गुनाहगार समझते हैं मआज़ अल्लाहि रब्बिल आलमीन,और मैं कोई ढकी छिपी बात नहीं करता खुद इनके नाम निहाद हकीमुल उम्मत यानि अशरफ अली थानवी क़ुर्आन का तर्जुमा करते हुए लिखते हैं*
*थानवी तर्जुमा* – बेशक हमने आपको एक खुल्लम खुल्ला फतह दी.ताकि अल्लाह तआला आपकी सब अगली पिछली खतायें माफ फरमा दे (मआज़ अल्लाह)
*कंज़ुल ईमान* – बेशक हमने तुम्हारे लिए रौशन फतह दी.ताकि अल्लाह तुम्हारे सबब से गुनाह बख्शे तुम्हारे अगलों के और तुम्हारे पिछलों के
📕 पारा 26,सूरह फतह,आयत 1-2
👇👇कंजुल ईमान👇👇
*ⓩ दोनों तर्जुमों का स्क्रीन शॉट इमेज में मौजूद है,अल्लाह तआला फरमाता है कि ऐ महबूब हमने तुम्हारी वजह से तुमसे पहले वालों के और तुम्हारे बाद वालों के गुनाह माफ किये मगर इन जाहिलों ने अल्लाह के महबूब को ही गुनाहगार ठहरा दिया जबकि हक़ यही है कि अल्लाह के महबूब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और तमाम अंबिया-ए किराम मअसूम और बे-ऐब पैदा किये गए मगर इन ज़ालिमों ने उन पाक मुक़द्दस हस्तियों तक को न छोड़ा,अब आप खुद फैसला कीजिये कि एक चींटी अम्बिया को मअसूम जान रही है जिसका खुद अल्लाह गवाह है और ये वहाबी उनको गुनहगार जानता है तो क्या इनकी अक़्ल उस चींटी से भी कम नहीं रह गयी,तो क्या ऐसी कम अक्ल वालों की कोई बात मानी और सुनी जानी चाहिए,नहीं और हरगिज़ नहीं,तो याद रखिये अब जब कोई भी वहाबी कभी भी किसी भी मसअले पर ऐतराज़ करे तो उसका वहीं रद्द कर दीजिये क्योंकि उसका कोई भी ऐतराज़ काबिले कुबूल नहीं,खैर आगे बढ़ते हैं*
*.2. कंज़ुल ईमान* – और लोगो में हज की निदा आम कर दे
📕 पारा 17,सूरह हज,आयत 27
*तफसीर* – जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम व हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने क़ाबा शरीफ तामीर कर दिया तो अल्लाह ने कहा कि एै नबी अब लोगों को इस घर के हज के लिए बुलाओ,तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि एै मौला किसको बुलाऊं यहां तो दूर दूर तक कोई नहीं,तब अल्लाह ने कहा तुम एलान करो सबको सुनाना मेरा काम है,तब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अबु कबीस पहाड़ पर चढ़कर लोगों से मुखातिब हुए,तो वो आवाज़ क़यामत तक जितने पैदा होने वाले थे सबने सुनी,हत्ता कि जो बाप की पुश्त में थे और जो मां के शिकम में थे या जो आलमे अरवाह में थे सबने वो आवाज़ सुनी और वहीं से लब्बैक कहा,तो जिसने उनकी आवाज़ पर लब्बैक कहा है उसी को हज नसीब होगा और जिसने सुकूत इख़्तियार किया उसे हरगिज़ वहां की हाज़िरी नसीब न होगी.
📕 खज़ाईनुल इरफान,ज़ेरे आयत
*ⓩ सोचिये कि जब आम मुसलमानों की रूहें मां-बाप की पुश्त से और आलमे अरवाह से आवाज़ें सुन सकती हैं तो हुज़ूर व हुज़ूर के महबूबीन अपनी क़ब्रे अनवर से हमारी फरियाद क्यों नहीं सुन सकते*
*.3. कंज़ुल ईमान* – तो सालेह ने उनसे मुंह फेरा और कहा एै मेरी क़ौम बेशक मैंने तुम्हें अपने रब की रिसालत पहुंचा दी
📕 पारा 8,सूरह एराफ,आयात 79
*तफसीर* – हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम क़ौमे समूद की तरफ नबी बनाकर भेजे गए,क़ौमे समूद के कहने पर आपने अपना मोजज़ा दिखाया कि एक पहाड़ी से ऊंटनी ज़ाहिर हुई जिसने बाद में बच्चा भी जना,ये ऊंटनी तालाब का सारा पानी एक दिन खुद पीती और दूसरे दिन पूरी क़ौम,जब क़ौमे समूद को ये मुसीबत बर्दाश्त न हुई तो उन्होंने इस ऊंटनी को क़त्ल कर दिया,तो हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम ने उनके लिए अज़ाब की बद्दुआ की जो कि क़ुबूल हुई और वो पूरी बस्ती ज़लज़ले से तहस नहस हो गयी,जब सारी क़ौम मर गई तो आप उस मुर्दा क़ौम से मुखातिब होकर अर्ज़ करने लगे,जो कि ऊपर आयत में गुज़रा
📕 तफसीरे सावी,जिल्द 2,पेज 73-75
*.4. हदीस* – जंगे बद्र के दिन हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बद्र के मुर्दा कुफ्फारों का नाम लेकर उनसे खिताब किया,तो हज़रत उमर फारूक़े आज़म ने हैरत से अर्ज़ किया कि क्या हुज़ूर मुर्दा बेजान जिस्मों से मुखातिब हैं तो सरकार सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ‘एै उमर ख़ुदा की कसम ज़िंदा लोग इनसे ज़्यादा मेरी बात को नहीं समझ सकते’
📕 बुखारी शरीफ,जिल्द 1,सफह 183
*ⓩ सोचिये कि जब काफिरों के मुर्दो में अल्लाह ने सुनने की सलाहियत दे रखी है तो फिर अल्लाह के मुक़द्दस बन्दे क्यों हमारी आवाज़ों को नहीं सुन सकते*
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*दूर से देखना*
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*.5. कंज़ुल ईमान* – और इसी तरह हम इब्राहीम को दिखाते हैं सारी बादशाही आसमानों की और ज़मीन की,इसलिए कि वो ऐनुल यक़ीन वालों में से हो जाये
📕 पारा 7,सूरह इन’आम,आयत 75
*तफसीर* – हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने पहाड़ पर खड़े खड़े सारे आसमान व ज़मीन को देखा,सबकी आवाजों को सुना,जन्नत दोज़ख को देखा,और तमाम मखलूक़ के आमालों को भी मुलाहज़ा फरमा लिया
📕 तफसीर रुहुल बयान,ज़ेरे आयत
*.6. हदीस* – हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम अंधेरी रात में 10 फरसख के फासले से चींटी को देख लिया करते थे,1 फरसख = 3 मील तो 10 फरसख x 30 मील = यानि तक़रीबन 48 किलोमीटर दूर से आप चींटी को देख लिया करते थे
📕 तिबरानी बहवाला शिफा शरीफ,पेज 33
*.7. हदीस* – हज़रत उमर फारूक़े आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने एक लश्कर निहावंद ईरान भेजा,जिसका सिपाह सालार सारिया नाम के शख्स को बनाया,एक दिन आपने जुमे का खुत्बा छोड़कर 3 मर्तबा ‘या सारियल जबल’ फरमाया,बाद नमाज़ के अब्दुर रहमान बिन औफ़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने माजरा पूछा तो आपने फरमाया कि मैंने मुसलमानों को देखा कि वो लड़ रहे हैं अचानक काफिर एक तरफ से आगे बढ़े तो मुझसे रहा न गया और मैंने सारिया को पहाड़ का सहारा लेने को कहा,चन्द रोज़ के बाद एक क़ासिद जंग का हाल लेकर वापस आया तो उसने बताया कि किसी आवाज़ देने वाले ने हमको पहाड़ की तरफ जाने को कहा तो हमने ऐसा ही किया और अल्लाह ने दुश्मनों को शिकस्त दी
📕 मिश्कात शरीफ,सफह 546
*ⓩ हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम 5 किलोमीटर दूर से चींटी की आवाज़ सुनें,हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम 48 किलोमीटर दूर से चींटी को देख लिया करें और हज़रत उमर फारूक़े आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु सैकड़ों मील दूर से न तो सिर्फ देख ही रहे थे बल्कि मुश्किल में देखकर मदद भी फरमा रहे हैं हालांकि आप कोई नबी भी नहीं हैं कि कोई कह दे कि ये आपका मोजज़ा था,नहीं बल्कि ये खुली हुई करामत है कि अल्लाह वाले एक जगह रहते हुए भी पूरी दुनिया का मुशाहदा करते हैं*
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*गैरुल्लाह से मदद मांगना*
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*.8. कंज़ुल ईमान* – ऐ ईमान वालो सब्र और नमाज़ से मदद चाहो
📕 पारा 2,सूरह बक़र,आयत 153
*ⓩ ज़ाहिर सी बात है कि सब्र और नमाज़ खुदा नहीं,फिर फरमाता है*
*.9. कंज़ुल ईमान* – और नेकी और परहेज़गारी पर एक दूसरे की मदद करो
📕 पारा 6,सूरह माइदह,आयत 2
*ⓩ यहां एक दूसरे की मदद को कहा जा रहा है,और फरमाता है*
*.10. कंज़ुल ईमान* – ऐ ईमान वालो दीने खुदा के मददगार हो
📕 पारा 28,सूरह सफ,आयत 14
*ⓩ यहां खुद मौला तआला मुसलमानों से अपने दीन की मदद करने को कह रहा है,और फरमाता है*
*.11. कंज़ुल ईमान* – बोले कौन मेरे मददगार होते हैं अल्लाह की तरफ तो हवारियों ने कहा हम दीने खुदा के मददगार हैं
📕 पारा 3,सूरह आले इमरान,आयत 52
*ⓩ यहां हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपनी कौम से मदद मांगी,अगर ये शिर्क होता तो एक नबी हरगिज़ ऐसा न करते*
*.12. कंज़ुल ईमान* – तो मेरी मदद ताक़त से करो मैं तुममें और उनमें एक मज़बूत आड़ बना दूं
📕 पारा 16,सुरह कहफ,आयत 95
*तफसीर* – हज़रत सिकंदर ज़ुलक़रनैन ने आबे हयात की चाह में शिमाल की सिम्त सफर किया,वहां हज़रत खिज़्र ने तो आबे हयात पी लिया लेकिन आपके मुक़द्दर में न था,रास्ते में जब आप दो पहाड़ों के दरमियान में पहुंचे,तो वहां के लोगों ने याजूज माजूज की शिकायत की,तो आपने उन लोगों से कहा कि ताक़त से मेरी मदद करो,इस तरह आपने उन लोगो की मदद से सिद्दे सिकंदरी तामीर करवाई,जो क़यामत के करीब ही टूटेगी
📕 तफसीरे सावी,जिल्द 3,सफह 22
*ⓩ हज़रत सिकन्दर ज़ुलक़रनैन व आबे हयात और याजूज माजूज के बारे में तफसील से जानने के लिए आसारे क़यामत की 7वीं और 8वीं पोस्ट पढ़ें*
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*क्या गैरुल्लाह मदद भी करते हैं*
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*.13. कंज़ुल ईमान* – ऐ ग़ैब की खबर देने वाले अल्लाह तुम्हें काफी है और ये जितने मुसलमान तुम्हारे पैरु हैं (ये भी तुम्हें काफी हैं)
📕 पारा 10,सूरह इंफाल,आयात 64
*ⓩ यानि मुसलमान मदद करता है*
*.14. कंज़ुल ईमान* – तो बेशक अल्लाह उनका मददगार है और जिब्रील और नेक ईमान वाले और उसके बाद फरिश्ते मदद को हैं
📕 पारा 28,सूरह तहरीम,आयत 4
*ⓩ यहां मौला तआला मुसलमानो को फरिश्तों को जिब्रीले अमीन को मददगार बता रहा है,और फरमाता है*
*.15. कंज़ुल ईमान* – सुलेमान ने कहा ए दरबारियों तुममे कौन है जो उसका (बिल्क़ीस) का तख्त मेरे पास ले आए क़ब़्ल इसके कि वह मेरे हुज़ूर मुतीअ होकर हाज़िर हो
📕 पारा 19,सूरह नमल,आयत 38
*ⓩ हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने अपने दरबारियों से मदद तलब की अगर ये शिर्क होता तो नबी हरगिज़ कभी ऐसा न करते और उसपर कमाल ये कि कि आपकी ही उम्मत के वली हज़रत आसिफ बिन बर्खिया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने आपकी मदद भी फरमाई,इसकी पूरी तफसीर मैंने करामात फोल्डर के अन्दर हज़रत आसिफ बिन बर्खिया के नाम से अपलोड की है वहीं से पढ़ा जाए,बेशक दूर से देखना सुनना और मदद करना ये खुदा की ही सिफत है,पर अल्लाह के ये मुक़द्दस बन्दे कैसे ये सब कर रहे हैं आईये रब से ही पूछते हैं*
*.16. हदीस* – हदीसे क़ुदसी है रब फरमाता है कि बन्दा नवाफिल के ज़रिये मेरा क़ुर्ब चाहता है पस मैं बन्दे को अपना क़ुर्ब अता करता हूं,जब मैं बन्दे को अपना दोस्त बना लेता हूं तो उसके कान हो जाता हूं जिससे वो सुनता है,उसकी आंख हो जाता हूं जिससे वो देखता है,उसके हाथ हो जाता हूं जिससे वो चीज़ों को पकड़ता है,और उसके पैर हो जाता हूं जिससे वो चलता है
📕 बुखारी शरीफ,जिल्द 2,पेज 963
*ⓩ इस हदीस को समझना हो तो ये आयतें मुलाहज़ा करें*
*.17. कंज़ुल ईमान* – ऐ महबूब वो खाक जो तुमने फेंकी तुमने न फेंकी बल्कि अल्लाह ने फेंकी
📕 पारा 9,सूरह इंफाल,आयात 17
*ⓩ हिजरत की रात हुज़ूर ने काफिरों पर 1 मुठ्ठी ख़ाक उठाकर फेंक दी और सबके सामने से आप चले गए और किसी ने ना देखा,उसी फेंकने को रब कह रहा है कि तुमने न फेंकी बल्कि मैंने फेंकी,अल्लाहु अकबर*
*.18. कंज़ुल ईमान* – वो जो तुम्हारी बैयत करते हैं वो तो अल्लाह ही से बैयत करते हैं उसके हाथों पर
📕 पारा 26,सूरह फतह,आयात 10
*ⓩ बैयते रिज़वान में जो सहाबाये किराम हुज़ूर के हाथ पर बैयत हुए,रब फरमा रहा है कि वो तो अल्लाह ही के हाथ पर बैयत हुए,बात खत्म हुई ये अल्लाह वाले अल्लाह की अता से ऐसा करते हैं,जो इंकार करता है वो क़ुर्आन का इंकार करता है,और जो क़ुर्आन की किसी 1 आयत का इंकार करदे वो काफिर है,पर चलते चलते ज़रा इन वहाबी मुनाफिक़ों की किताबों से भी कुछ हवाले देख लीजिये*
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*वहाबी और गैरुल्लाह*
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*ⓩ एक सवाल के जवाब पर मौलवी रशीद अहमद गंगोही लिखते हैं कि*
*.19. वहाबी – कुबूरे औलिया पर जाना और उनसे फैज़ हासिल करना इसमें कुछ हर्ज़ नहीं
📕 फतावा रशीदिया,जिल्द 1,पेज 223
*ⓩ हर्ज़ नहीं,क्यों शिर्क नहीं है क्या*
*.20. वहाबी – मौलाना रफीउद्दीन के साथ हज़रत (थानवी) ने सरे हिन्द पहुंचकर शेख मुजद्दिद उल्फ सानी के मज़ार पर हाज़िरी दी
📕 हयाते अशरफ,सफह 25
*ⓩ फिर जब हम किसी वली के दरबार में हाज़िरी देते हैं तो तुम वहाबियों का कलेजा क्यों फटता है,और देखिये मौलवी अशरफ अली थानवी ने लिखा*
*.21. वहाबी – दस्तगिरी कीजिये मेरे नबी
कशमकश में तुम ही हो मेरे वली
📕 नशरुत्तबीब फि ज़िक्रे नबीईल हबीब,सफह 164
*हम या रसूल अल्लाह कहें तो शिर्क*
*हम या ग़ौस अल मदद कहें तो शिर्क*
*हम या ख्वाजा मदद कहें तो शिर्क*
*और तुम नबी से मदद मांगो तो शिर्क नहीं*
*ⓩ मौलवी आरिफ सम्भली उस्ताज़ नदवतुल उलूम ने लिखा है कि*
*.22. वहाबी – पस बुज़ुर्गो की अरवाह से मदद लेने के हम मुंकिर नहीं
📕 बरैली फितने का नया रूप,सफह 139
*ⓩ तो क्या मआज़ अल्लाह सुन्नी इंकार करता है,और दो रुखी पालिसी पढ़ते जाईये,मौलवी हुसैन अहमद टांडवी लिखता है कि*
*.23. वहाबी – हमें जो कुछ मिला इसी सिलसिलाए चिश्तिया से मिला,जिसका खाये उसी का गाये
📕 शेखुल इस्लाम नम्बर,सफह 13
*ⓩ फिर जब हम कहते हैं कि ग़रीब नवाज़ से मिला है तो वहाबी शिर्क शिर्क क्यों भौंकने लगते हैं,जवाब दो,मगर दोगे कहां से क्योंकि वहाबियों के पास जवाब है ही नहीं,तुम्हारे पास तो सुन्नियों को गुमराह करने के लिए सिर्फ फर्ज़ी और मनघडंत बातें हैं जिनसे तुम भोले भाले मुसलमानों को बहकाते हो,मौला तआला हम सुन्नियों का ईमान सलामत रखे-आमीन*
*तफसीर* – हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम एक अज़ीम लश्कर लेकर जो कि 300 मील लम्बाई व चौड़ाई पर मुश्तमिल था,जिसमे जिन्नों इन्सो चरिंदो परिन्द सब शामिल थे,जब ये लश्कर मुल्के शाम के जंगलों से गुज़रा तो एक चींटी जो कि मादा थी और लंगड़ी थी,उसका नाम ताखिया जर्मी या मनज़रा था,ये खुद मलिका थी इसके लश्कर में करोड़ों चींटियां थीं,ये उन सबको मुखातब करके बोली कि अपने अपने घरों में चली जाओ कहीं ऐसा न हो कि सुलेमान का लश्कर तुम्हें कुचल दे और उन्हें खबर तक न हो,जब उस चींटी ने ये बात कही उस वक़्त हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम उस चींटी से 3 मील दूर थे,1 मील = 1.60934 किलोमीटर तो 3 मील = 4.82802 किलोमीटर,यानि तक़रीबन आपने 5 किलोमीटर दूर से चींटी की आवाज़ सुनी और चींटी की इसी दानाई पर आप मुस्कुरा दिए,तो जब चींटी की न सुनाई देने वाली आवाज़ भी एक नबी सुन सकते हैं तो फिर हमारे आक़ा व मौला जो कि नबियों के सरदार हैं उनकी समाअत का क्या आलम होगा
📕 रूहुल बयान,पारा 19,सफह 745
*ⓩ उस चींटी की दानाई पर आप मुस्कुरा दिए अब ज़रा इसका मतलब भी समझ लीजिए कि एक छोटी और मामूली से चींटी ने हमको कितना बड़ा अक़ीदा सिखा दिया,ज़रा क़ुर्आन की उस आयत को दोबारा पढ़िए,पढ़िए और समझिए रब फरमाता है कि चींटी बोली,क्या बोली “कि कहीं ऐसा न हो कि सुलेमान का लश्कर तुम्हे कुचल दे और उन्हें खबर तक न हो” अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर यानि उस चींटी को भी ये पता था कि अल्लाह के नबी मअसूम होते हैं और जानबूझकर हरगिज़ ऐसा नहीं कर सकते कि हमारे ऊपर से गुज़र जायें यानि हमें मार डालें,हां अनजाने में ऐसा हो सकता है इसीलिए वो सबको तम्बीह करते हुए बोली कि अपने बिलों में चली जाओ उसकी इसी दानाई को जब हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने सुना तो आप बिना मुस्कुराये नहीं रह सके,सुबहान अल्लाह,ये एक चींटी का अक़ीदा था और यही हम सुन्नियों का अक़ीदा है मगर वहीं इन वहाबियों का अक़ीदा देखिये जो मआज़ अल्लाह अम्बिया तो दूर की बात हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को भी मअसूम नहीं जानते और उनको भी गुनाहगार समझते हैं मआज़ अल्लाहि रब्बिल आलमीन,और मैं कोई ढकी छिपी बात नहीं करता खुद इनके नाम निहाद हकीमुल उम्मत यानि अशरफ अली थानवी क़ुर्आन का तर्जुमा करते हुए लिखते हैं*
*थानवी तर्जुमा* – बेशक हमने आपको एक खुल्लम खुल्ला फतह दी.ताकि अल्लाह तआला आपकी सब अगली पिछली खतायें माफ फरमा दे (मआज़ अल्लाह)
*कंज़ुल ईमान* – बेशक हमने तुम्हारे लिए रौशन फतह दी.ताकि अल्लाह तुम्हारे सबब से गुनाह बख्शे तुम्हारे अगलों के और तुम्हारे पिछलों के
📕 पारा 26,सूरह फतह,आयत 1-2
*ⓩ दोनों तर्जुमों का स्क्रीन शॉट इमेज में मौजूद है,अल्लाह तआला फरमाता है कि ऐ महबूब हमने तुम्हारी वजह से तुमसे पहले वालों के और तुम्हारे बाद वालों के गुनाह माफ किये मगर इन जाहिलों ने अल्लाह के महबूब को ही गुनाहगार ठहरा दिया जबकि हक़ यही है कि अल्लाह के महबूब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और तमाम अंबिया-ए किराम मअसूम और बे-ऐब पैदा किये गए मगर इन ज़ालिमों ने उन पाक मुक़द्दस हस्तियों तक को न छोड़ा,अब आप खुद फैसला कीजिये कि एक चींटी अम्बिया को मअसूम जान रही है जिसका खुद अल्लाह गवाह है और ये वहाबी उनको गुनहगार जानता है तो क्या इनकी अक़्ल उस चींटी से भी कम नहीं रह गयी,तो क्या ऐसी कम अक्ल वालों की कोई बात मानी और सुनी जानी चाहिए,नहीं और हरगिज़ नहीं,तो याद रखिये अब जब कोई भी वहाबी कभी भी किसी भी मसअले पर ऐतराज़ करे तो उसका वहीं रद्द कर दीजिये क्योंकि उसका कोई भी ऐतराज़ काबिले कुबूल नहीं,खैर आगे बढ़ते हैं*
*.2. कंज़ुल ईमान* – और लोगो में हज की निदा आम कर दे
📕 पारा 17,सूरह हज,आयत 27
*तफसीर* – जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम व हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने क़ाबा शरीफ तामीर कर दिया तो अल्लाह ने कहा कि एै नबी अब लोगों को इस घर के हज के लिए बुलाओ,तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि एै मौला किसको बुलाऊं यहां तो दूर दूर तक कोई नहीं,तब अल्लाह ने कहा तुम एलान करो सबको सुनाना मेरा काम है,तब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अबु कबीस पहाड़ पर चढ़कर लोगों से मुखातिब हुए,तो वो आवाज़ क़यामत तक जितने पैदा होने वाले थे सबने सुनी,हत्ता कि जो बाप की पुश्त में थे और जो मां के शिकम में थे या जो आलमे अरवाह में थे सबने वो आवाज़ सुनी और वहीं से लब्बैक कहा,तो जिसने उनकी आवाज़ पर लब्बैक कहा है उसी को हज नसीब होगा और जिसने सुकूत इख़्तियार किया उसे हरगिज़ वहां की हाज़िरी नसीब न होगी.
📕 खज़ाईनुल इरफान,ज़ेरे आयत
*ⓩ सोचिये कि जब आम मुसलमानों की रूहें मां-बाप की पुश्त से और आलमे अरवाह से आवाज़ें सुन सकती हैं तो हुज़ूर व हुज़ूर के महबूबीन अपनी क़ब्रे अनवर से हमारी फरियाद क्यों नहीं सुन सकते*
*.3. कंज़ुल ईमान* – तो सालेह ने उनसे मुंह फेरा और कहा एै मेरी क़ौम बेशक मैंने तुम्हें अपने रब की रिसालत पहुंचा दी
📕 पारा 8,सूरह एराफ,आयात 79
*तफसीर* – हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम क़ौमे समूद की तरफ नबी बनाकर भेजे गए,क़ौमे समूद के कहने पर आपने अपना मोजज़ा दिखाया कि एक पहाड़ी से ऊंटनी ज़ाहिर हुई जिसने बाद में बच्चा भी जना,ये ऊंटनी तालाब का सारा पानी एक दिन खुद पीती और दूसरे दिन पूरी क़ौम,जब क़ौमे समूद को ये मुसीबत बर्दाश्त न हुई तो उन्होंने इस ऊंटनी को क़त्ल कर दिया,तो हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम ने उनके लिए अज़ाब की बद्दुआ की जो कि क़ुबूल हुई और वो पूरी बस्ती ज़लज़ले से तहस नहस हो गयी,जब सारी क़ौम मर गई तो आप उस मुर्दा क़ौम से मुखातिब होकर अर्ज़ करने लगे,जो कि ऊपर आयत में गुज़रा
📕 तफसीरे सावी,जिल्द 2,पेज 73-75
*.4. हदीस* – जंगे बद्र के दिन हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बद्र के मुर्दा कुफ्फारों का नाम लेकर उनसे खिताब किया,तो हज़रत उमर फारूक़े आज़म ने हैरत से अर्ज़ किया कि क्या हुज़ूर मुर्दा बेजान जिस्मों से मुखातिब हैं तो सरकार सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ‘एै उमर ख़ुदा की कसम ज़िंदा लोग इनसे ज़्यादा मेरी बात को नहीं समझ सकते’
📕 बुखारी शरीफ,जिल्द 1,सफह 183
*ⓩ सोचिये कि जब काफिरों के मुर्दो में अल्लाह ने सुनने की सलाहियत दे रखी है तो फिर अल्लाह के मुक़द्दस बन्दे क्यों हमारी आवाज़ों को नहीं सुन सकते*
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*दूर से देखना*
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*.5. कंज़ुल ईमान* – और इसी तरह हम इब्राहीम को दिखाते हैं सारी बादशाही आसमानों की और ज़मीन की,इसलिए कि वो ऐनुल यक़ीन वालों में से हो जाये
📕 पारा 7,सूरह इन’आम,आयत 75
*तफसीर* – हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने पहाड़ पर खड़े खड़े सारे आसमान व ज़मीन को देखा,सबकी आवाजों को सुना,जन्नत दोज़ख को देखा,और तमाम मखलूक़ के आमालों को भी मुलाहज़ा फरमा लिया
📕 तफसीर रुहुल बयान,ज़ेरे आयत
*.6. हदीस* – हज़रत अबु हुरैरा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम अंधेरी रात में 10 फरसख के फासले से चींटी को देख लिया करते थे,1 फरसख = 3 मील तो 10 फरसख x 30 मील = यानि तक़रीबन 48 किलोमीटर दूर से आप चींटी को देख लिया करते थे
📕 तिबरानी बहवाला शिफा शरीफ,पेज 33
*.7. हदीस* – हज़रत उमर फारूक़े आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने एक लश्कर निहावंद ईरान भेजा,जिसका सिपाह सालार सारिया नाम के शख्स को बनाया,एक दिन आपने जुमे का खुत्बा छोड़कर 3 मर्तबा ‘या सारियल जबल’ फरमाया,बाद नमाज़ के अब्दुर रहमान बिन औफ़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने माजरा पूछा तो आपने फरमाया कि मैंने मुसलमानों को देखा कि वो लड़ रहे हैं अचानक काफिर एक तरफ से आगे बढ़े तो मुझसे रहा न गया और मैंने सारिया को पहाड़ का सहारा लेने को कहा,चन्द रोज़ के बाद एक क़ासिद जंग का हाल लेकर वापस आया तो उसने बताया कि किसी आवाज़ देने वाले ने हमको पहाड़ की तरफ जाने को कहा तो हमने ऐसा ही किया और अल्लाह ने दुश्मनों को शिकस्त दी
📕 मिश्कात शरीफ,सफह 546
*ⓩ हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम 5 किलोमीटर दूर से चींटी की आवाज़ सुनें,हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम 48 किलोमीटर दूर से चींटी को देख लिया करें और हज़रत उमर फारूक़े आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु सैकड़ों मील दूर से न तो सिर्फ देख ही रहे थे बल्कि मुश्किल में देखकर मदद भी फरमा रहे हैं हालांकि आप कोई नबी भी नहीं हैं कि कोई कह दे कि ये आपका मोजज़ा था,नहीं बल्कि ये खुली हुई करामत है कि अल्लाह वाले एक जगह रहते हुए भी पूरी दुनिया का मुशाहदा करते हैं*
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*गैरुल्लाह से मदद मांगना*
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*.8. कंज़ुल ईमान* – ऐ ईमान वालो सब्र और नमाज़ से मदद चाहो
📕 पारा 2,सूरह बक़र,आयत 153
*ⓩ ज़ाहिर सी बात है कि सब्र और नमाज़ खुदा नहीं,फिर फरमाता है*
*.9. कंज़ुल ईमान* – और नेकी और परहेज़गारी पर एक दूसरे की मदद करो
📕 पारा 6,सूरह माइदह,आयत 2
*ⓩ यहां एक दूसरे की मदद को कहा जा रहा है,और फरमाता है*
*.10. कंज़ुल ईमान* – ऐ ईमान वालो दीने खुदा के मददगार हो
📕 पारा 28,सूरह सफ,आयत 14
*ⓩ यहां खुद मौला तआला मुसलमानों से अपने दीन की मदद करने को कह रहा है,और फरमाता है*
*.11. कंज़ुल ईमान* – बोले कौन मेरे मददगार होते हैं अल्लाह की तरफ तो हवारियों ने कहा हम दीने खुदा के मददगार हैं
📕 पारा 3,सूरह आले इमरान,आयत 52
*ⓩ यहां हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपनी कौम से मदद मांगी,अगर ये शिर्क होता तो एक नबी हरगिज़ ऐसा न करते*
*.12. कंज़ुल ईमान* – तो मेरी मदद ताक़त से करो मैं तुममें और उनमें एक मज़बूत आड़ बना दूं
📕 पारा 16,सुरह कहफ,आयत 95
*तफसीर* – हज़रत सिकंदर ज़ुलक़रनैन ने आबे हयात की चाह में शिमाल की सिम्त सफर किया,वहां हज़रत खिज़्र ने तो आबे हयात पी लिया लेकिन आपके मुक़द्दर में न था,रास्ते में जब आप दो पहाड़ों के दरमियान में पहुंचे,तो वहां के लोगों ने याजूज माजूज की शिकायत की,तो आपने उन लोगों से कहा कि ताक़त से मेरी मदद करो,इस तरह आपने उन लोगो की मदद से सिद्दे सिकंदरी तामीर करवाई,जो क़यामत के करीब ही टूटेगी
📕 तफसीरे सावी,जिल्द 3,सफह 22
*ⓩ हज़रत सिकन्दर ज़ुलक़रनैन व आबे हयात और याजूज माजूज के बारे में तफसील से जानने के लिए आसारे क़यामत की 7वीं और 8वीं पोस्ट पढ़ें*
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*क्या गैरुल्लाह मदद भी करते हैं*
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*.13. कंज़ुल ईमान* – ऐ ग़ैब की खबर देने वाले अल्लाह तुम्हें काफी है और ये जितने मुसलमान तुम्हारे पैरु हैं (ये भी तुम्हें काफी हैं)
📕 पारा 10,सूरह इंफाल,आयात 64
*ⓩ यानि मुसलमान मदद करता है*
*.14. कंज़ुल ईमान* – तो बेशक अल्लाह उनका मददगार है और जिब्रील और नेक ईमान वाले और उसके बाद फरिश्ते मदद को हैं
📕 पारा 28,सूरह तहरीम,आयत 4
*ⓩ यहां मौला तआला मुसलमानो को फरिश्तों को जिब्रीले अमीन को मददगार बता रहा है,और फरमाता है*
*.15. कंज़ुल ईमान* – सुलेमान ने कहा ए दरबारियों तुममे कौन है जो उसका (बिल्क़ीस) का तख्त मेरे पास ले आए क़ब़्ल इसके कि वह मेरे हुज़ूर मुतीअ होकर हाज़िर हो
📕 पारा 19,सूरह नमल,आयत 38
*ⓩ हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने अपने दरबारियों से मदद तलब की अगर ये शिर्क होता तो नबी हरगिज़ कभी ऐसा न करते और उसपर कमाल ये कि कि आपकी ही उम्मत के वली हज़रत आसिफ बिन बर्खिया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने आपकी मदद भी फरमाई,इसकी पूरी तफसीर मैंने करामात फोल्डर के अन्दर हज़रत आसिफ बिन बर्खिया के नाम से अपलोड की है वहीं से पढ़ा जाए,बेशक दूर से देखना सुनना और मदद करना ये खुदा की ही सिफत है,पर अल्लाह के ये मुक़द्दस बन्दे कैसे ये सब कर रहे हैं आईये रब से ही पूछते हैं*
*.16. हदीस* – हदीसे क़ुदसी है रब फरमाता है कि बन्दा नवाफिल के ज़रिये मेरा क़ुर्ब चाहता है पस मैं बन्दे को अपना क़ुर्ब अता करता हूं,जब मैं बन्दे को अपना दोस्त बना लेता हूं तो उसके कान हो जाता हूं जिससे वो सुनता है,उसकी आंख हो जाता हूं जिससे वो देखता है,उसके हाथ हो जाता हूं जिससे वो चीज़ों को पकड़ता है,और उसके पैर हो जाता हूं जिससे वो चलता है
📕 बुखारी शरीफ,जिल्द 2,पेज 963
*ⓩ इस हदीस को समझना हो तो ये आयतें मुलाहज़ा करें*
*.17. कंज़ुल ईमान* – ऐ महबूब वो खाक जो तुमने फेंकी तुमने न फेंकी बल्कि अल्लाह ने फेंकी
📕 पारा 9,सूरह इंफाल,आयात 17
*ⓩ हिजरत की रात हुज़ूर ने काफिरों पर 1 मुठ्ठी ख़ाक उठाकर फेंक दी और सबके सामने से आप चले गए और किसी ने ना देखा,उसी फेंकने को रब कह रहा है कि तुमने न फेंकी बल्कि मैंने फेंकी,अल्लाहु अकबर*
*.18. कंज़ुल ईमान* – वो जो तुम्हारी बैयत करते हैं वो तो अल्लाह ही से बैयत करते हैं उसके हाथों पर
📕 पारा 26,सूरह फतह,आयात 10
*ⓩ बैयते रिज़वान में जो सहाबाये किराम हुज़ूर के हाथ पर बैयत हुए,रब फरमा रहा है कि वो तो अल्लाह ही के हाथ पर बैयत हुए,बात खत्म हुई ये अल्लाह वाले अल्लाह की अता से ऐसा करते हैं,जो इंकार करता है वो क़ुर्आन का इंकार करता है,और जो क़ुर्आन की किसी 1 आयत का इंकार करदे वो काफिर है,पर चलते चलते ज़रा इन वहाबी मुनाफिक़ों की किताबों से भी कुछ हवाले देख लीजिये*
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*वहाबी और गैरुल्लाह*
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*ⓩ एक सवाल के जवाब पर मौलवी रशीद अहमद गंगोही लिखते हैं कि*
*.19. वहाबी – कुबूरे औलिया पर जाना और उनसे फैज़ हासिल करना इसमें कुछ हर्ज़ नहीं
📕 फतावा रशीदिया,जिल्द 1,पेज 223
*ⓩ हर्ज़ नहीं,क्यों शिर्क नहीं है क्या*
*.20. वहाबी – मौलाना रफीउद्दीन के साथ हज़रत (थानवी) ने सरे हिन्द पहुंचकर शेख मुजद्दिद उल्फ सानी के मज़ार पर हाज़िरी दी
📕 हयाते अशरफ,सफह 25
*ⓩ फिर जब हम किसी वली के दरबार में हाज़िरी देते हैं तो तुम वहाबियों का कलेजा क्यों फटता है,और देखिये मौलवी अशरफ अली थानवी ने लिखा*
*.21. वहाबी – दस्तगिरी कीजिये मेरे नबी
कशमकश में तुम ही हो मेरे वली
📕 नशरुत्तबीब फि ज़िक्रे नबीईल हबीब,सफह 164
*हम या रसूल अल्लाह कहें तो शिर्क*
*हम या ग़ौस अल मदद कहें तो शिर्क*
*हम या ख्वाजा मदद कहें तो शिर्क*
*और तुम नबी से मदद मांगो तो शिर्क नहीं*
*ⓩ मौलवी आरिफ सम्भली उस्ताज़ नदवतुल उलूम ने लिखा है कि*
*.22. वहाबी – पस बुज़ुर्गो की अरवाह से मदद लेने के हम मुंकिर नहीं
📕
*ⓩ तो क्या मआज़ अल्लाह सुन्नी इंकार करता है,और दो रुखी पालिसी पढ़ते जाईये,मौलवी हुसैन अहमद टांडवी लिखता है कि*
*.23. वहाबी – हमें जो कुछ मिला इसी सिलसिलाए चिश्तिया से मिला,जिसका खाये उसी का गाये
📕 शेखुल इस्लाम नम्बर,सफह 13
*ⓩ फिर जब हम कहते हैं कि ग़रीब नवाज़ से मिला है तो वहाबी शिर्क शिर्क क्यों भौंकने लगते हैं,जवाब दो,मगर दोगे कहां से क्योंकि वहाबियों के पास जवाब है ही नहीं,तुम्हारे पास तो सुन्नियों को गुमराह करने के लिए सिर्फ फर्ज़ी और मनघडंत बातें हैं जिनसे तुम भोले भाले मुसलमानों को बहकाते हो,मौला तआला हम सुन्नियों का ईमान सलामत रखे-आमीन*


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