सोमवार, 28 दिसंबर 2020

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   •मुहम्मद⚡•इमरान रज़वी

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 ❐ सवाल ❐  ➻  मेरे दोस्त की 4 औलादें हैं मगर चारों लडकियां ही हैं अगर लड़का के लिए कोई वज़ीफा हो तो बरा ए महरबानी ज़रुर बताऐं!


 ❐ जवाब ❐  ➻  लड़कियां होना बाइसे रह़मत व बरकत है अल्लाह उनके सदक़े में बहुत सी मुसीबत,बलायें परेशानी माँ बाप के उपर से टाल देता है बल्के उनका रिज़्क़ भी बहुत कुशादा कर देता है, खैर आपका जवाब हाज़िर है, इमामुल अइम्मा सैय्यदिना इमामे आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं के जो ये चाहता है के उसके यहाँ लड़का हो तो औरत के पेट पर  उंगली रख कर ये कहे के अगर लड़का है तो मैंने उसका नाम मुहम्मद रखा इंशाअल्लाह लड़का ही होगा फिर अगर लड़का ही हो तो उसका वही नाम रखें! (जो आपने बोला था यानी मुहम्मद)


*📓 अहकामें शरीअत हिस्सा 1 सफह 83*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर मरते वक़्त किसी के मुंह से कलमा ए कुफ्र निकल गया तो क्या हुक्म लगेगा!


 ❐ जवाब ❐  ➻  उल्मा बिलकुल नज़ां की ह़ालात में कलम ए कुफ्र को कुफ्र नहीं मानते कियोंकि हो सकता है के उसकी ह़ालत बेहोशी की हो या अक़्ल काम ना कर रही हो इस लिए नज़ां के वक़्त मरने वाले को कलमा पढ़ने को कहने से भी माना किया गया है के माज़ अल्लाह अगर ह़ालते नज़ां में इन्कार कर दिया तो वल्लाहु आलम के उसका हश़्र किया होगा बस यूँ करे के कुछ लोग खुद बा आवाज़े बुलन्द कलिमा पढ़ते रहें के सुनकर वह खुद भी पढ़ ले!..✍🏻


*📓 बहारे शरीअत हिस्सा,4 सफह 131*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या नमाज़ में हर सूरह से पहले بسم اللہ पढ़ना चाहिए!


 ❐ जवाब ❐  ➻  हर रकाअत में सूरह फातिहा से पहले بسم اللہ शरीफ पढ़ना सुन्नत है और उसके बाद सूरह पढ़ने के लिए मुस्तहब यानि पढ़े तो अच्छा और ना पढ़े तो कोई हरज नहीं!..✍🏻


*📓 फतावा रज़वियह जिल्द 3 सफह 67*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर कोई काफिर कलिमा पढ़े तो क्या उसको उसका मतलब बताना ज़रूरी है या सिर्फ कलिमा पढ़ते ही मुसलमान हो जायेगा!


 ❐ जवाब ❐  ➻  हमारे आला हज़रत फरमाते हैं के किसी काफिर का इतना कह लेना ही मुसलमान होने के लिए काफी है के में मुसलमान होता हुं या अपना मज़हब छोड़ कर दीने मोहम्मदी क़ुबूल करता हूँ अगरचे कलिमा भी ना पढ़े फिर भी मुसलमान होगा!..✍🏻


*📓 फतावा अफरीक़ा सफह 143*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  ये जो आस्तानों पर क़व्वाली होती है किया ये जाइज़ है!


 ❐ जवाब ❐  ➻  अगर मज़ामीर यानि,Music,का इस्तेमाल होता है तो यक़ीनन ह़राम,है और ऐसा करने वाला सुनने वाला और हाज़रीन सब फासिक़ हैं अगर किसी पीर की इजाज़त,से ऐसा होता है तो वह भी फासिक़ है,ना वो पीर कहलाने के लायक़ है और ना उससे बैयत होना जाइज़ है, हाँ यूंही अगर लोग बग़ैर मज़ामीर Music के कोई ऐसा शेर पढ़े जिस में कराहत ना हो तो बिलकुल जाइज़ है!..✍🏻


*📓 अलमलफूज़, हिस्सा 2 सफह 106*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  शौहर नें ये कहा के अगर तूने ये काम क्या तो तू मुझ पर ह़राम है तो क्या हुक्म है और अगर ये कहा के तूने ये काम क्या तो तुझे तलाक़ है तब क्या हुक्म होगा!


 ❐ जवाब ❐  ➻  ह़राम होने को कहा तो अगर तलाक़ की नियत से कहा तो एक तलाक़े बाइन हो गई उसकी बीवी फौरन उसके निकाह से निकल गयी चाहे वह काम करे या ना करे अब दुबारा निकाह करना होगा और अगर ये कहा के अगर तू ये काम करेगी तो तुझे तलाक़ है तब इस सूरत में औरत का वह काम करने पर एक तलाक़े रजई होगी इद्दत के अन्दर निकाह के इयादे की ज़रुरत नहीं उस से मिल लें उसकी बीवी हो जायगी हां इद्दत गुज़र गयी तो अब दुबारा निकाह की जरूरत पडेगी।..✍🏻 


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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर क़ाज़ी के सामने काफिर नें कलिमां पढा मगर अपने मुसलमान होने का नहीं तो क्या वह मुसलमान होगा!


 ❐ जवाब ❐  ➻  अगर दो मुसलमानों के सामने कलिमा पढा तो वह मुसलमान है अगरचे किसी पर ज़ाहिर ना करे हां मगर अपने कुफ्रिया अक़ाइदो आमाल से बेज़ार रहे वरना इस्लाम से फिरा तो माज़ अल्लाह मुरतद के हुक्म में होगा।..✍🏻 


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 ❐ सवाल ❐  ➻  शादी की पहली रात को बीवी हैज़ से थी तो शोहबत नहीं हो पायी मगर दावत वलीमा तो पहले से ही फिक्स होता है वह करना ही पड़ेगा तो क्या ऐसे में शोहबत के बाद फिर से वलीमा करना होगा और क्या लोगों को भी बताना पडेगा की ये वलीमा है या यूंही बगैर बताये दोस्तों की दावत की जाये!


 ❐ जवाब ❐  ➻  शबे ज़ुफाफ में औरत से मुलाक़ात कर लेना ही वलीमा की सुन्नत के लिए काफी है अगरचे सोहबत करे या न करे।..✍🏻 


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 ❐ सवाल ❐  ➻  मुस्तफा जाने रह़मत पे लाखों सलाम के टोटल कितने शेर हैं!


 ❐ जवाब ❐  ➻  एख्तिलाफ है लेकिन 168 कहीं 171 और मेरे पास जो हदाइक़े बख्शिश है उसमें 172 शेर हैं!...✍🏻


*📗हदाइक़े बख्शिश हिस्सा 2 सफह 36*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  बहुत सारे लोग बालों में डाई लगाते हैं बालों को काला करने के लिए तो डाई लगाना कैसा है और अगर वह इमाम है तो क्या हुक्म है!


 ❐ जवाब ❐  ➻  काला खिज़ाब (डाई) लगाना ह़राम है और मेंहदी लगाना सुन्नत है और बाकी रंगों में अगर कोई नाजाइज़ चीज़ की मिलावट नहीं है तो जाइज़ है तो इमाम अगर काली डाई स्तेमाल करता है तो उसके पीछे नमाज़ मकरुहे तहरीमी वाजिबुल इयादा होगी (यानी दोबारा अदा करना पड़ेगी) बाकी में हरज नहीं!..✍🏻


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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर रास्ते में तावीज़ पडी़ मिले तो क्या करें!


 ❐ जवाब ❐  ➻  अगर यक़ीन है के ये तावीज़ ही है तो उठा कर ऐसी जगह रख दें जहाँ बे अदबी का खतरा ना हो!..✍🏻


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 ❐ सवाल ❐  ➻  जब चारों इमाम में इख्तिलाफ है तो चारों हक़ पर कैसे हैं!


 ❐ जवाब ❐  ➻  पहले आप समझ लें कि  मसायल के 4 इमाम हैं,हज़रते इमामे आज़म हज़रते इमाम शाफयी,हज़रते इमाम मालिक और हज़रते इमाम अहमद बिन ह़म्बल,ये चारों ही अक़ायद पर मुत्तफिक़ हैं इख्तिलाफ है तो फुरु में,इस ज़माने में हक़ इन्हीं चारों में से किसी एक की पैरवी में है और जो इन से अलग हुआ वो गुमराह बे दीन है!


आपके सवाल का जवाब ये है कि चारों ही इख्तिलाफ के बावजूद हक़ पर कैसे हैं,इसके लिए ये ह़दीसे पाक पढ़ीये बनी क़ुरैज़ा पर जल्द पहुंचने की गर्ज़ से हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने सहाबियों में ये ऐलान करवाया कि हम असर की नमाज़ बनी क़ुरैज़ा पहुँच कर पढ़ेंगे,सभी ह़ज़रात जुहर पढ़कर निकले और सफर करते रहे यहाँ तक कि असर का वक्त बहुत थोड़ा रह गया,तो कुछ सहाबा ऐ इकराम ने नमाज़ पढ़नी चाही तो कुछ नें मना किया कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का कहना है कि नमाज़ वहीं पहुँच कर पढ़ेंगे इसपर वो सहाबा कहने लगे कि हुज़ूर का कहना बिलकुल हक़ है मगर उनहोंने ये नहीं कहा कि अगर नमाज़ का वक्त निकल जाये तब भी मत पढ़ना तो वो सहाबा नमाज़ पढ़े और कुछ नहीं पढ़े जब हुज़ूर बनी क़ुरैज़ा पहुँच गए तो नमाज़े क़ज़ा पढ़ी गयी फिर हुज़ूर के सामने उन सहाबियों का तज़किरा हुआ तो आपने फरमाया की जिनहोंने पहले पढ़ ली उनको सवाब और जिनहोंने अब मेरे साथ पढ़ी उनको दो गुना सवाब,देखिये यहाँ नमाज़ अदा करने पर भी सवाब मिल रहा है और क़ज़ा करने पर भी सवाब मिल रहा है तो बस इसी तरह चारों इमाम मुजतहिद थे जिसने सही मस्अला अपने हिसाब से निकाला तो उसे दो गुना सवाब और जिसने मस्अला समझने में गलती की तो उस गलती पर भी एक गुना सवाब,कियोंकि मुजतहिद की खता माफ है!


और ये इख्तिलाफ उम्मत के लिए रह़मत इस तरह है कि किसी को दीन की किसी बात पर अमल करने का मौक़ा मिल रहा है किसी को किसी दूसरी बात पर कियोंकि शरीयत एक चमन है और चमन हर तरह के फूलों से बनता है कहीं गुलाब तो कहीं चमेली कहीं कहीं जूही तो कहीं नरगिस,और अवाम को इख्तिलाफ में पडने को इसलिए मना किया जाता है कि वो इल्म तो रखते नहीं हैं तो वो किसी बात का इंकार कर बैठेंगे जो उनकी आखिरत खराब कर देगा,लिहाज़ा यही कहा जाता है कि अपने इमाम की पैरवी करो और इख्तिलाफ में ना पड़ो..✍🏻


*📗 बुखारी शरीफ जिल्द 1 किताबुल जिहाद*

*📕 मुस्लिम शरीफ जिल्द 2 सफह 95*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  शौहर ने अपनी बीवी को मां या बहन या बेटी कहा तो क्या हुक्म है!


 ❐ जवाब ❐  ➻  उससे पूछा जाऐ के ऐसा कहने में उसकी नियत क्या थी अगर अज़मत के लिए कहा तो हरज नहीं अगर तलाक़ की नियत से कहा तो एक तलाक़ बाइन हुई और अगर ज़ेहार की नियत से कहा तो ज़ेहार हुआ और कोई नियत नहीं तो कुछ नहीं मगर ऐसा कहना मकरूह है, लेकिन अगर औरत को महरम के उन वुज़ूह, से तशबीह दी जिनका देखना जाइज़ नहीं तो ज़ेहार है इसमें नियत का कोई दखल नहीं ज़ेहार का कफ्फारा ये है के, 3 रोज़ा रखें या दस मिस्कीन को दोनों वक़्त खिलाऐं या उनको कपड़ा पहनावे, बगैर कफ्फारा अदा करे बीवी से सोहबत जाइज़ नहीं,ना ही उसको शोहवत के साथ चूमना!..✍🏻


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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या मस्जिद में मोबाईल चार्ज कर सकते हैं!


 ❐ जवाब ❐  ➻  जाइज़ नहीं!..✍🏻


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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक बद अक़ीदा 73 फिरक़ों वाली ह़दीस को ज़ईफ कहता है किया ये सही है!


 ❐ जवाब ❐  ➻  जिसने कहा वह जाहिल है ये हदीस हरगिज़ हरगिज़ ज़ईफ नहीं!..✍🏻


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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर  सूखा कुत्ता जिस्म या कपड़ा से छू जाये तो क्या कपड़ा नापाक हो जायेगा!


 ❐ जवाब ❐  ➻  सूखे कुत्ते की किया बात बल्कि अगर भीगा भी होगा तब भी ना तो कपड़ा नापाक होगा और ना ही आदमी हां उस पर नजासत लगी हो या नजिस पानी से निकलता हुआ दिखाई दे तो अलग बात है इस सूरत में जहाँ लग जाऐ उतना हिस्सा धो दें या कपड़ा बदल दें पाक हो जायेगा गुस्ल की ह़ाजत नहीं!..✍🏻 


*📚 बहारे शरीअत हिस्सा 2 सफह 83*





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 ❐ सवाल ❐  ➻  चोरी की बिजली से हीटर पर खाना पकाना और उसका खाना कैसा है!


 ❐ जवाब ❐  ➻  चोरी करना ह़राम है अल्लाह तआला कुरआन के सूरह माइदा आयत 38 में इरशाद फरमाता है के : चोरी करने वाले मर्द व औरतों के हाथ काट दो-,जवाब इस मसले से समझें हमारे आला हज़रत रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं के धोबी को कपड़ा दिया मगर वह बदल कर दूसरे का कपड़ा ले आया तो उस कपड़े का पहनना मर्द व औरत दोनों को ह़राम है और उस पर नमाज़ भी मकरूह तह़रीमी यानि वाजिबुल इयादा होगी, सोचिये के जिस कपड़े को हमने चुराया नहीं बल्कि गल्ती से हमारे पास आ गया और मुम्किन है के जिस का कपड़ा बदलकर हमारे पास आया है तो हमारा कपड़ा भी शायद उसी के पास हो मगर फिर भी उस कपड़े का पहनना ह़राम है और यहाँ तो ज़ाहिरन बिजली की चोरी की जा रही है, ये ह़राम ह़राम ह़राम है उस पर पका हुआ खाना भी ह़राम है!..✍🏻


*📚 फतावा रज़वियह जिल्द 3 सफह 417*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  जिस का पेशा पैन्टिंग का हो और वह नमाज़ी भी हो तो कोशिश करने के बावजूद भी रंगों का असर हाथ पर बाकी रह जाता है तो क्या इस सूरत में गुस्ल या वुज़ू होगा और नमाज़ हो जायेगी!


 ❐ जवाब ❐  ➻  साहिबे बहारे शरीअत फरमाते हैं के जिन चीजों की आदमी को उमूमन या खुसूसन ज़रुरत पड़ती रहती हो जैसे नानबाई के लिए आटा, रंग रेज़ के लिए रंग, औरतों के लिए मेंहदी, लिखने वालों के लिए सियाही, मज़दूर के लिए मिट्टी गारा या पलक में सुरमा या गरदो गुबार तो ये सब माफ है, अगर चे सख्त हो गया हो अगर चे उसके नीचे पानी भी ना पहूंचे, फिर भी पानी एहतियात भर खूब क़ायदे से हाथ वगैरह धो लिया जाए, बाकी कुछ रह गया तो गुस्ल और वुज़ू दोनों हो जायेगा और नमाज़ भी!..✍🏻


*📚 बहारे शरीअत हिस्सा 2,सफह 16*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  बाज़ लोग इशा में फर्ज़ की 4 रकअत, 2 सुन्नतें मुअक्क़िदा ,और, 3 वित्र, ही पढ़ते हैं ,ऐसा क्यों?


 ❐ जवाब ❐  ➻  नमाज़ पूरी पढ़नी चाहिए मगर सुन्नते गैर मुअक्किदा मिस्ल नफ्ल है, और नफ्ल की पकड़ नहीं यानि करे तो सवाब और ना करे तो कोई गुनाह नहीं!..लेकिन इसकी आदत ही बना ली तब गुनाह है उसकी पकड़ होगी✍🏻


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 ❐ सवाल ❐  ➻  औरत अगर ह़ालते हैज़ में हो तो उसके साथ कैसा बरताओ रखा जाये, और क्या शौहर अपनी बीवी से कुछ महीने या कुछ साल दूर रहे तो निकाह टूट जाता है, दोनों का जवाब दें बड़ी महरबानी होगी!


 ❐ जवाब ❐  ➻  ह़ालते हैज़ में औरत से सिर्फ सोहबत ह़राम है बाकी सारे मुआमलात वैसे ही रखें यहाँ तक की अगर शहवत का अन्देशा ना हो तो हैज़ की ह़ालत में बीवी के साथ सोने में भी हरज नहीं हां शोहवत भड़कने का खतरा हो तो अलग सोऐं मगर वह अछूत भी नहीं हो जाती, यहाँ तक के अगर फातिहा वगैरह का खाना बनाना चाहे तो बिलकुल बना सकती है कोई हरज नहीं, और रही बात दूर रहने से निकाह टूटने की तो साल महीने 6 महीने क्या अगर दोनों एक दूसरे को मियां बीवी मानते हैं तो निकाह के बाद दुबारा सारी ज़िन्दगी ना मिले फिर भी वह उसी के निकाह में रहेगी!..✍🏻


📕 बहारे शरीअत हिस्सा 2 सफह 79

📗 फतावा मुस्तफवीया जिल्द 3 सफह


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 ❐ सवाल ❐  ➻  हमारे यहाँ एक इमाम साहब हैं, उनका घर मस्जिद के बगल में ही है, इमाम साहब सिर्फ जुमें की नमाज़ पढ़ाते हैं, जुमां के अलावा दूसरी नमाज़ें इमाम साहब का साहबज़ादा जो हाफिज है वह पढ़ाता है, इमाम साहब जुमां के अलावा दीगर नमाज़ें बा जमाअत पढ़ने का एहतिमाम नहीं करते कई दफा देखा गया है के मस्जिद में आज़ान हो रही होती है और इमाम साहब घर में मौजूद होते हुए भी मस्जिद में नहीं आते, कभी कभी घर के बाहर बैठे सीगरेट पी रहे होते और मस्जिद नहीं जाते और वह काला खिज़ाब डाई भी लगवाते है अब इमाम साहब के पीछे जुमां की नमाज़ या दीगर नमाज़ें पढ़ना कैसा!?


 ❐ जवाब ❐  ➻  जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ना वाजिब है और बिला उज़्रे शरई जमाअत का छोड़ना फिस्क़ है इसी तरह काला खिज़ाब लागाना भी मकरूहे तह़रीमी और गुनाह है और इस गुनाह को तकरार से करना फिस्क़ है, और फिक़्ह की हर किताब में है के फासिक़ की इमामत मकरूहे तह़रीमी है, अगर लोगों ने अपने इख़्तियार से फासिक़ को इमाम बनाया तो वह भी गुनहगार होंगे, लिहाज़ा ऐसे आदमी को इमाम बनाना और इसके पीछे जुमां या दीगर नमाज़ें पढ़ना जायज़ नहीं, हाँ अगर ऐलानियां तौबा कर ले और दूबारा वह गुनाह ना करे तो इमाम बना सकते हैं और उसके पीछे नामाज़ भी पढ़ सकते हैं कोई हरज नहीं!...✍🏻


*📕 फतावा भक्खी शरीफ जिल्द 1 सफह 170*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  खुत्बे की आज़ान मस्जिद से बाहर होनी चाहिए या अन्दर!?


 ❐ जवाब ❐  ➻   हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और तमाम खुलफाऐ राशिदीन के ज़माने में आज़ाने सानि मस्जिद के दरवाज़े पर थी हां ईमाम का सामना होना चाहिए लेकिन अगर सामना नहीं होता हो यानि खम्भा वगैरह लगा हो तो ईमाम के सामने होना ज़रुरी नहीं,मगर मस्जिद के बाहर होना ज़यादा बेहतर है!..✍🏻


*📗 अहकामें शरीअत हिस्सा 2, सफह 207*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  खिलाफते राशिदा किसकी खिलाफत को कहते हैं!?


 ❐ जवाब ❐  ➻  हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु, ह़ज़रते उमर फारूक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु, ह़ज़रते उसमाने गनी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु, ह़ज़रते मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु, व इमामे हसन मुजतबा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु, की खिलाफत को खिलाफते राशिदा कहा जाता है और उसके बाद बादशाहत शुरू हुई, मगर ह़ज़रते अमीरे मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु, और पहली सदी हिज्री के मुजद्दिद ह़ज़रते उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु, व आखिर ज़माने में ह़ज़रते इमाम मेंहदी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की खिलाफत खिलाफते राशिदा में शामिल है।..✍🏻


*📗 अलमलफूज़ हिस्सा 3 सफह 65*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  वह कौन सी सूरत है कि औरत मैहर माफ़ कर दे लेकिन उसके बावुजूद मैहर माफ़ ना होगा!


 ❐ जवाब ❐  ➻  शौहर ने औरत को धमकी दी के मेहर माफ़ कर दे वरना तुझे मारूंगा और शौहर मारने पर क़ादिर है तो इस सूरत में औरत के मेहर माफ़ करने से माफ़ ना होगा!..✍🏻


*📕 बहारे शरिअत हिस्सा 15, सफ़ह 11*

*📘 दुर्रे मुख़्तार मअ् रद्दुल मोहतार जिल्द 5, सफ़ह 88*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  हमारे गाँव में एक इमाम साहब हैं जब तक यहाँ रहते हैं पांचो टाइम नमाज़ पढ़ते पढ़ाते हैं पर जब अपने घर जाते एक वक़्त भी नमाज़ नहीं पढ़ते, ना घर पर और ना ही मस्जिद जाते हैं, अब ऐसे इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ना कैसा है!


 ❐ जवाब ❐  ➻  जैद अगर वाक़ई में एसा है जैसा सवाल में ज़िक्र किया गया है, ज़ैद अगर बे अमल है तो हक़ीक़त में वह आलिम नहीं जाहिल के मिस्ल है, बल्के जाहिल है और जब वह मस्जिद में नमाज़ पढ़ने नहीं जाता है तो तर्के जमाअत का आदी है, तो फासिक़ है और अपने घर में भी नमाज़ नहीं पढ़ता तो शदीद तरीन फासिक़ है उसके पीछे नमाज़ पढ़ना भी जाइज़ नहीं है, बहरहाल ऐसा शख्स नाइबे रसूल और वारिसे अम्बिया हरगिज़ नहीं हो सकता जो नाइबे रसूल और वारिसे अम्बिया होगा वह बे अमल नही होगा!..✍🏻


*📕 फतावा फक़ीहे मिल्लत,जिल्द 1 सफह 132-133*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक साहब की बीवी सउदी अरब में, है और उनका शौहर गाँव में अब अगर फोन पर तलाक़ दें तो हो जायेगी।


 ❐ जवाब ❐  ➻  मोबाइल फोन, खत, e-mail, के ज़रिए तलाक़ देने से भी तलाक़ पड़ जाती है,जबके शौहर खुद कहे के मैंने तलाक़ दी!..✍🏻


*📗 फतावा रज़ा दारुल यतामा, सफह 245/251*

*📕 मोबाईल फोन के ज़रुरी मसाइल सफह,130*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  औरत ह़मल से है और उसके शौहर ने उसको तलाक़ दे दिया अब हमारे यहाँ कुछ लोग कहते हैं के हमल में तलाक़ नहीं माना जाता है और कुछ लोग कहते हैं हो जायेगा, अब आप बतायें तलाक़ होगा या नहींं, और अगर हवाला मिल जाए तो ज्यादा बेहतर होगा!


 ❐ जवाब ❐  ➻  ह़ालते ह़मल में तलाक ना दी जाए पर अगर किसी ने दे दिया तो तलाक़ हो जायेगी!..✍🏻


*📗 अहकामे शरीअत हिस्सा,2 सफह 166*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  औरत को अपने शौहर का नाम या बेटा अपने बाप का नाम लेकर पुकारे तो कैसा है!


 ❐ जवाब ❐  ➻  बेटा अपने बाप का नाम लेकर या बीवी अपने शौहर को नाम लेकर पुकारे मकरूह है!..✍🏻


*📗 बहारे शरीअत, हिस्सा - 16*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  औरतों को कौन कौन सी चूडियाँ पहनना जाइज़ है और कौन कौन सी चूडियाँ पहनना नाजाइज़ है, हज़रत हवाले के साथ बताना मुझे किसी को बताना है!


 ❐ जवाब ❐  ➻  फतावा फक़ीहे मिल्लत में है के कांच यानि शीशा और प्लास्टिक की चूडियाँ पहनना और पहन कर नमाज़ पढ़ना सह़ी व दुरुस्त है,,, फतावा रज़वियह में है, आला हज़रत से सवाल किया गया, के औरतों को कांच की चूडियाँ पहनना जाइज़ है या नहीं, आपने जवाब फरमाया, जाइज़ है बल्के शौहर के लिए सिंगार की नियत से मुस्तहब है, और शौहर या माँ बाप का हुक्म हो तो वाजिब,, सोना चांदी और कांच यानि शीशा और पिलास्टिक की जाइज़ है, और लोहा तांबा पीतल रांगा वगैरह औरतों के लिए नाजाइज़ व हराम है, रद्दुल मोहतार में है!..✍🏻


📕 फतावा फक़ीहे मिल्लत जिल्द 1 सफह 177

📗 फतावा रजविया जिल्द 9 सफह 235

📘 रद्दुल मुख्तार जिल्द 5 सफह 253


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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या फरमाते है उलमा-ए-किराम के जैद मन्दिर में जाकर भजन गाता और गवाता है सूद ब्याज़ खुलेआम लेता है शराब खुलेआम पीता है जुआ खुलेआम खेलता है, इसके बारे में क़ुरआन हदीस की रौशनी में जवाब इनायत करें महरबानी होगी!


 ❐ जवाब ❐  ➻  ज़ैद अगर वाक़ई ऐसा करता है जैसा सवाल में ज़िक्र किया गया तो जैद इस्लाम से खारिज़ हो गया, यानि काफिर हो गया, तौबा व तजदीदे ईमान व तजदीदे निकाह लाज़िम है, मुफ्ती शरीफुल हक़ अमजदी फतावा शारेह बुखारी में इसी तरह के एक सवाल के जवाब में फरमाते हैं, जो शख्स हिन्दुओं के पूजा के गीत और भजन में शरीक़ होता है वह मुसलमान नहीं वह इस्लाम से निकल गया उसकी बीवी उसके निकाह से निकल गयी!..✍🏻


📕 फतावा शारेह बुखारी,जिल्द,2 सफह 617


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 ❐ सवाल ❐  ➻  कुछ लोग सिर्फ हाथ के इशारे से सलाम करते हैं और ज़बान से कुछ नहीं कहते इस तरह़ सलाम करना कैसा है जवाब इनायत करें!


 ❐ जवाब ❐  ➻  बाज़ लोग उंगली के इशारे से या गरदन  के इशारे से सलाम करते हैं या जवाब देते हैं यह सुन्नत के ख़िलाफ़ है, हुज़ूर सदरुश्शरिअह अलैहिर्रह़मा तह़रीर फरमाते हैं के उंगली या हथेली से सलाम करना मम्नू है, ह़दीस में फ़रमाया के उंगलियों से सलाम करना यहूदियों का तरीक़ा है और हथेली से इशारा करना नसारा का, फिर आगे इरशाद फरमाते हैं के बाज़ लोग सलाम के जवाब में हाथ या सर से इशारा कर देते हैं, बल्कि बाज़ सिर्फ आंखों के इशारे से जवाब देते हैं यूँ जवाब नहीं हुआ, उनको मुंह से जवाब देना वाजिब है!


📕 बहारे शरीयत जिल्द 3 हिस्सा 16, सफह 107, सलाम का ब्यान

📗 सु'नने तिर्मिज़ी शरीफ़, जिल्द 4 सफह 319 ह़दीस नं. 2704


हां अगर कोई दूर हो और ज़बान से भी सलाम किया या जवाब दिया और साथ ही इशारा भी कर दिया तो कोई हरज नहीं!


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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर पहली रकअत का रुकू मिल जाए तो क्या तकबीरे तह़रीमा की फ़जीलत मिल जायेगी या नहीं इसका जवाब हवाले के साथ इनायत फरमायें!


 ❐ जवाब ❐  ➻  ह़ज़रत अल्लामा अब्दुस्सत्तार ह़म्दानी मद्दज़िल्लुहुल आली साहब क़िब्ला अपनी किताब मोमिन की नमाज़ में तह़रीर फरमाते हैं के पहली रकअत का रूकू मिल गया तो तकबीरे ऊला यानि तकबीरे तह़रीमा की फ़जीलत मिल गई!


📕 मोमिन की नमाज़ सफह 51

📗 आलमगीरी


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 ❐ सवाल ❐  ➻  ह़ज़रत उलटा कपड़ा पहन कर नमाज़ पढ़ना कैसा है जवाब इनायत करें!


 ❐ जवाब ❐  ➻  उलटा कपड़ा- ( विपरीत- Reverse,) कपड़ा पहन कर या ओढ़ कर नमाज़ पढ़ना मकरुहे तह़रीमी है, उलटा कपड़ा पहनना या ओढ़ना खिलाफे मो'ताद, (असभ्यता- Discourteous,) में दाखिल है ख़िलाफ़े मो'ताद यानि इस तरह़ कपड़ा पहनना या ओढ़ना कि उस तरह़ कपड़ा पहन कर या ओढ़कर कोई शख़्स बाज़ार में या अक़ाबिर (सम्मानीय व्यक्ति) के पास न जा सके तो अल्लाह तआ़ला के दरबार का अदब और ताज़ीम ज़ियादा लाज़िम और ज़रुरी है, लिहाज़ा उलटा कपड़ा पहन कर या ओढ़कर नमाज़ पढ़ने से नमाज़ मकरुहे तह़रीमी होगी!


📓 मोमिन की नमाज़ 266

📗 बहारे शरीअ़त जिल्द 3 सफह 170

📕 फ़तावा रज़वियह शरीफ़ जिल्द 3 सफह 438


लिहाज़ा ऐसी नमाज़ को लौटाने का हुक्म होगा


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 ❐ सवाल ❐  ➻  कुछ बुजुर्ग हज़रात मस्जिद में कुर्सी पर बैठकर नमाज़ पढ़ते हैं जबके वो चल सकते हैं मगर ज्यादा देर खड़े नहीं रह सकते तो क्या वो बैठकर नमाज पढ़ सकते हैं!


 ❐ जवाब ❐  ➻  हुज़ूर ताजुश्शरिअह अलैहिर्रहमा फ़रमाते हैं चलकर अगर खड़े होने पर कादिर है तो उस पर फ़र्ज़ है के खड़े होकर वो तकबीरे तहरीमा कहे और जब तक खड़ा रह सकता है वो खड़ा रहे फिर उसको बैठने की इजाज़त है जिस तौर पर आसानी से वो ज़मीन पर बैठ सकता है बैठकर वो नमाज़ पढ़े कुर्सी पर बैठना ये सख्त महले नज़र है कुर्सी का इस्तेमाल इस ग़रज़ के लिए नाजाइज़ है और ये चंद वजूह से, एक तो ये जमाअत की जगह घेरना है और जमाअत की जगह इस तौर पर घेरना उससे तक़रीज़े जमाअत है ये नाजाइज़ है और फिर इसमें क़तअ सफ़ भी है यानी एक तो कुर्सी है जो सफ़ को मुनक़ते करती है फिर उस पर साहिब नमाज़ पढ़ रहे हैं वो अगरचे बज़ाहिर नमाज़ी हैं लेकिन दरअसल वो हक़ीक़तन नमाज़ी नहीं हैं उनकी नमाज़, नमाज़ नहीं है इसलिए के जब वो चल सकते हैं अब कुर्सी पर बैठकर नमाज़ पढ़ रहे हैं तो एक तो क़याम छोड़ा यूं नमाज़ गई और अगर क़याम कर भी लिया और कुर्सी पर बैठकर अब सजदा किया इशारे से तो जो ज़मीन पर पेशानी रखकर सजदा कर सकता है उसका इशारे से सजदा करना सही नहीं इन दोनों सूरतों मैं कुर्सी पर बैठने वालों की नमाज़ सही नहीं होती कुर्सी का इस्तेमाल सख्त महले नज़र है अल्लाह तबारक व तआला लोगों को तौफ़ीक़ दे के वो अपनी इबादतों को रायग़ां न करें और इबादतों के अहकाम जानें और सही तौर पर अल्लाह तबारक व तआला की इबादत करें!


📗 फ़िक़्ही मजालिस हिस्सा 1 सफ़ह 109


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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर नमाज़ के दौरान मोबाइल बज उठता है तो पाकेट में या जहां मोबाइल रखा हो उसे बंद कर सकते हैं, जैसा के आजकल रिंग टोन उमूमन मोसिक़ी ( Music) की शक्ल में होते हैं तो नमाज़ के दौरान बजने पर नमाज़ का क्या हुक्म है!


 ❐ जवाब ❐  ➻  इस मसअले में हुज़ूर ताजुश्शरिअह अलैहिर्रहमा फ़रमाते हैं नमाज़ पर इसका कोई असर नहीं होगा अलबत्ता खुशूअ् व खुज़ूअ् में ये ख़लल अंदाज है लिहाज़ा नमाज़ के दौरान पॉकेट में या जहां नमाज पढ़ रहे हैं मोबाइल को ऑन करके ना रखें बल्के मोबाइल को साइलेंट करदें या उसको ऑफ करदें और अगर इत्तेफ़ाक़िया तौर पर जेब में मोबाइल बज गया तो इशारा ए ख़फ़ीफ़ा से इशारे के ज़रिए से अमले ख़फ़ीफ़ के ज़रिए से अगर उसको ऑफ कर सकता है तो उसको ऑफ कर ले वरना रहने दे अगर अमले कसीर का ये मुतक़ाज़ी  है तो रहने दे और अगर उसको बंद करने के पीछे चलेगा तो इस सूरत में अमले कसीर की वजह से उसकी नमाज़ भी फ़ासिद होगी!


📗 फ़िक़्ही मजालिस, हिस्सा 1 सफ़ह 116-117


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 ❐ सवाल ❐  ➻  हमारे शहर में सिर्फ़ एक ही हाफ़िज़े क़ुरान है और वो दाढ़ी नहीं रखता क्या हम ऐसे इमाम के पीछे नमाज़े तरावीह अदा कर सकते हैं!


 ❐ जवाब ❐  ➻  हुज़ूर ताजुश्शरिअह अलैहिर्रहमा फ़रमाते हैं : इसकी इजाज़त नहीं!


📗 फ़िक़्ही मजालिस हिस्सा 1 सफ़ह 120


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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक सवाल ये है के क्या कोई अपनी बीवी से खड़े हो कर सोहबत कर सकता है या नहीं और अगर नहीं तो फिर क्यों इस से क्या क्या नुकसान है जवाब इनायत करें!


 ❐ जवाब ❐  ➻  हुक्मा (हकीमों)  के मुताबिक़ खड़े खड़े मुबाशिरत करने से अगर औरत को ह़मल क़रार पा जाए तो औलाद बद दिमाग़ और बेवकूफ़ या पैदाइशी तौर पर नीम पागल होगी, और खड़े खड़े मुबाशिरत करने से हुक्मा (हकीमों) के क़ौल के मुताबिक़ कपकपी की बीमारी हो जाती है और बाज़ मरतबा कमर के सख़्त दर्द में मुब्तिला हो जाता है!


📕 इरफ़ानुल ह़िकमत सफह 235

📗 क़रीना ए ज़िन्दगी, सफ़ह 113


ख़ुलासा ये है कि जानवरों का तरीक़ा एख़्तियार करने के बजाए शरई तरीक़ा एख़्तियार करें, और दर्द व मर्ज़ और बद दिमाग़ी औलाद से निजात पायें, पल दो पल की लज़्ज़त के लिए बीमारियों में मुब्तिला होने और बद दिमाग़ी और नीम पाग़ल औलाद का हुसूल अक़्ल मंदी नहीं बल्के अपने जिस्म व जान और औलाद को दाइमी (हमेशा) मुसीबत में मुब्तिला करना है और उसकी मुसीबत कोई और नहीं बल्के खुद भुगतना पड़ेगा लिहाज़ा इस्लामी तरीके से सोहबत करें जानवरों की तरह़ खड़े खड़े न करें!


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 ❐ सवाल ❐  ➻  औरत को लिपस्टिक लगाना कैसा है जायज़ है या नहीं और इसको लगा कर गुस्ल व वुज़ू हो जायेगा या नहीं ख़ुलासा फ़रमायें?


 ❐ जवाब ❐  ➻  लिपिस्टिक लगाने के तअल्लुक़ से हज़रत मुफ्ती साहब फ़रमाते हैं के जाइज़ है आगे तह़रीर फरमाते हैं के सुना है के इस में अलकोहल की मिलावट होती है इसलिए बचना बेहतर है और तहक़ीक़ से ये मिलावट साबित हो जाए तो इसका इस्तेमाल ह़राम व गुनाह है, होंटों पर लिपिस्टिक लगने की सूरत में ये फर्ज़ है कि वुज़ू गुस्ल के वक़्त उसे अच्छी तरह छुड़ा कर होंठ साफ़ कर ले वरना वुज़ू गुस्ल न होगा कियोंके लिपिस्टिक होंठ पर जम जाती है जिसके वजह से वहाँ पानी नहीं पहुंचेगा तो वो पाक भी न होगा!


📕 सिराजुल फुक़्हा की दीनी मजालिस सफह 144


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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक सवाल है के क्या शबे बराअत में  मरने वालों की रुह़े घरों में आती हैं हवाले के साथ जवाब इनायत करें!


 ❐ जवाब ❐  ➻  बेशक मोमिनीन की रुह़ें हर शबे जुमां, यानी जुमेरात के दिन, ईद के दिन, आशूरा के दिन, और शबे बराअत को अपने घर आकर बाहर खड़ी रहती हैं और हर रुह़ बलंद आवाज़ से निदा करती है के ऐ मेरे घर वालों ऐ मेरी औलाद ऐ मेरे क़ुरबत दारो सदक़ा कर के हम पर महरबानी करो!


📗 सुन्नी बहिश्ती ज़ेवर

📕 फतावा रज़वियह शरीफ़ जिल्द 9 सफह 651


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 ❐ सवाल ❐  ➻  ह़ज़रत एक सवाल है के नमाज़ की ह़ालत में पैंट या पाजामा की मोरी मोड़ना कैसा है, कुछ लोग कहते हैं के टख़ना बंद होना चाहिए, इसके बारे में कुछ तफ़सील से बतायें!


 ❐ जवाब ❐  ➻  कुछ लोग टख़नों से नीचा लटका हुआ पाजामा और पैंट पहनते हैं अगर उन्होंने इसकी आदत डाल रखी है और तकब्बुर व घमंड के तौर पर वो ऐसा करते हैं तो ये नाजाइज़ व गुनाह है, और इस तरह़ नमाज़ मकरुह है, लेकिन अगर इत्तिफ़ाक़ से हो या बे ख़्याली और बे तवज्जोही से हो तो हर्ज नहीं, और जो लोग इस से बचने के लिए और टख़नें खोलने के लिए मोरी पायेंचे को चढ़ाते हैं वो गुनाह को घटाते नहीं बल्के बढ़ाते हैं और नमाज़ में ख़राबी को कम नहीं करते बल्के ज़्यादा करते हैं, ये पैंट और पाजामे की मोरी पायेंचे को लपेट कर चढ़ाना नमाज़ में मकरुहे तह़रीमी है!


ह़दीस में है के रसूलल्लाह ﷺ सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया के मुझे हुक्म दिया गया के मैं सात हड्डियों पर सजदा करूँ, पेशानी दोनों हाथ, दोनों घुटने, और दोनों पंजे और ये हुक्म दिया गया के मैं नमाज़ में कपड़े और बाल न समेंटूं!


📕 मिशकात शरीफ़ सफ़ह 83

📒 बुख़ारी शरीफ़

📗 मुस्लिम शरीफ़


इस ह़दीस की रू से कपड़ा समेटना और चढ़ाना नमाज़ में मना है, लिहाज़ा पैंट और पाजामे की मोरी लपेटने और चढ़ाने वालों को इस ह़दीस से इबरत हासिल करना चाहिए!


लेकिन इस्लाह करने वालों से भी गुज़ारिश है के नमाज़ में इस किस्म की कोताहियां बरतने वालों को नरमी और प्यार व मुहब्बत से समझायें, मान जायें तो ठीक है वरना उन्हें उनके हाल पर रहने दें और मुनासिब तरीक़े से इस्लाह करें, उनको डांटना झिड़कना और उनसे लड़ाई झगड़ा करना बहुत बुरा है, जिसका नतीजा ये भी हो सकता है के वो मस्जिद में आना और नमाज़ पढ़ना छोड़ दें जिसका वबाल उन झिड़कने डांटने वालों पर है, क्यूंके इस में भी कोई शक नहीं के बाज़ इस किस्म की खामियों के साथ नमाज़ पढ़ने वाले बेनमाज़ियों से हज़ारों दर्जा बेहतर हैं, और नमाज़ में कोताहियां करने वालों को भी चाहिए अगर कोई उनकी इस्लाह करे तो बुरा मानने के बजाए उसकी बात पर अमल करें, उस पर गुस्सा न करें, कियोंके वो जो कुछ कह रहा है आप की भलाई के लिए कह रहा है अगर वो तुर्शी और सख़्ती से भी कह रहा है तो उसका फ़ेएल है आपका काम तो हक़ को सुनकर अमल करना है झगड़ा करना नहीं!


📒 ग़लत फ़हमियां और उनकी इस्लाह़ सफह 46-48


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 ❐ सवाल ❐  ➻  बहुत सारे लोग क़ुरआने पाक पढ़ते हैं तो दिल में पढ़ते हैं उनके होंट देखें जायें तो होंट भी नहीं हिलते इस तरह़ नमाज़ में क़ुरआन पढ़ना कैसा, नमाज़ हो जायेगी या नहीं!


 ❐ जवाब ❐  ➻  कुछ लोग क़ुरआन पाक की तिलावत और नमाज़ में या नमाज़ के बाहर कुछ पढ़ते हैं तो सिर्फ होंट हिलाते हैं और आवाज़ बिलकुल नहीं निकालते, उनका ये पढ़ना, पढ़ना नहीं है और इस तरह़ पढ़ने से नमाज़ नहीं होगी और इस तरह़ क़ुरआने पाक की तिलावत की तो तिलावत का सवाब भी नहीं पायेंगे, आहिस्ता पढ़ने का मतलब ये है के कम अज़ कम इतनी आवाज़ ज़रूर निकले के अगर कोई रुकावट यानि (बेहरा या शोर वगैरह) न हो तो खुद सुन ले, सिर्फ होंट हिलना और आवाज़ का बिलकुल न निकलना पढ़ना नहीं है और इस मस्अले का ख़ास ध्यान रखना चाहिए, वरना नमाज़ नहीं होगी!


📕 फतावा आलमगीरी मिस्री जिल्द 1 सफह 65

📒 बहारे शरीअत जिल्द 3 सफह 69

📘 ग़लत फ़हमियां और उनकी इस्लाह़ सफह 48


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 ❐ सवाल ❐  ➻  ह़ज़रत मैं नमाज़ पढ़ रहा था ग़लती से दो के बजाए तीन सजदे कर लिए बाद में याद आया अब मैं क्या करूँ, मेरी नमाज़ होगी या नहीं और मुझे क्या करना चाहिए हवाले के साथ जवाब इनायत करें!


 ❐ जवाब ❐  ➻  अगर किसी ने दो के बजाए तीन सजदे कर लिए तो अगर सलाम फेरने से पहले याद आजाये तो सजदा सहू करे कियोंके वाजिब तर्क हुआ, सजदा सहू लाज़िम है, और अगर सलाम फ़ेरने के बाद याद आया तो फ़िर से दोबारा नमाज़ पढ़ ले!


📕 फ़तावा रज़वियह शरीफ़ जिल्द 3 सफह 646

📒 मोमिन की नमाज़ सफह 73


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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक सवाल है के सजदे में जाते वक़्त किस जानिब ज़्यादा ज़ोर देना चाहिए, और देना चाहिए या नहीं, इसका ख़ुलासा करें, आपकी महरबानी होगी!


 ❐ जवाब ❐  ➻  सजदे में जाते वक़्त दाहिनी जानिब, ज़ोर देना और सजदा से उठते वक़्त बायें बाज़ू पर ज़ोर देना मुस्तहब है!


📕 बहारे शरीअत जिल्द 3 सफह 173

📒 मोमिन की नमाज़ सफह 73


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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या जमाअत से नमाज़ पढ़ने वाले को इमाम के साथ दुआ मांगना ज़रुरी है, अगर कोई इमाम के सलाम फेरने के बाद दुआ न मांगे तो उसकी नमाज़ होगी या नहीं जवाब इनायत करें!


 ❐ जवाब ❐  ➻  हर नमाज़ सलाम फेरने पर मुकम्मल हो जाती है उसके बाद जो दुआ मांगी जाती है ये नमाज़ में दाख़िल नहीं, अगर कोई शख्स नमाज़ पढ़ने के बाद बिलकुल दुआ न मांगे तब भी उसकी नमाज़ अदा हो जाएगी, अलबत्ता एक फ़ज़ीलत से महरूमी और सुन्नत की ख़िलाफ़ वर्ज़ी है, कुछ जगह देखा गया के इमाम लोग बहुत लम्बी लम्बी दुआयें पढ़ते हैं और मुक़तदी कुछ ख़ुशी के साथ और कुछ बे रग़बती से मजबूरन उनका साथ निभाते हैं, और कोई बग़ैर दुआ मांगे या थोड़ी दुआ मांग कर इमाम साहब का पूरा साथ दिये बग़ैर चला जाए तो उस पर एतराज़ करते हैं और बुरा जानते हैं, ये सब उनकी ग़लतफ़हमियाँ हैं, इमाम के साथ दुआ मांगना मुक़तदी पर हरगिज़ लाज़िम व ज़रुरी नहीं वो नमाज़ पूरी होने के बाद फ़ौरन मुख़्तसर दुआ मांग कर भी जा सकता है, और कभी किसी मजबूरी की बिना पर बग़ैर दुआ मांगे चला जाए तब भी नमाज़ सही और पूरी हो जाती है!


📕 फ़तावा रज़वियह शरीफ़ जिल्द 3 सफह 278

📗 ग़लत फ़हमियां और उनकी इस्लाह 48


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 ❐ सवाल ❐  ➻  बहुत सारे लोग बालों को काला करने के लिए काला ख़िज़ाब लगाते हैं- तो क्या बालों को काला करना सही है और अगर काला खिज़ाब लगाने वाला कोई इमाम हो तो उसके लिए क्या हुक्म है जवाब इनायत करें!


 ❐ जवाब ❐  ➻  काला खिज़ाब या ऐसी मेंहदी जिस से बाल काले हों लगाना नाजाइज़ व ह़राम है इस लिए के जो चीज़ बालों को काला करे ख़्वाह नील हो या मेंहदी का मैल या कोई तेल सब नाजाइज़ व हराम है, ऐसी दवा पीना जिससे बाल काले निकलें जाइज़ है, मेंहदी या कतम लगाया जाए के ये जाइज़ है और हदीस शरीफ़ से साबित है, और अगर इमाम काली (डाई) मेंहदी इस्तेमाल करता है तो उसके पीछे नमाज़ मकरुहे तह़रीमी वाजिबुल इयादा यानि दोहरानी होगी!


📕 फ़तावा बरेली शरीफ़ सफह 68

📒 अलमलफ़ूज़ शरीफ़, हिस्सा 2 सफ़ह 103

📗 अनवारुल हदीस, सफ़ह 327


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 ❐ सवाल ❐  ➻  हज़रत ये बतायें के खड़े हो कर पेशाब करना कैसा,और अगर किसी को कोई तकलीफ हो पैर वगैरह में जो बैठ न सके तो क्या वो खड़े हो कर पेशाब कर सकता है या नहीं जवाब इनायत करे!


 ❐ जवाब ❐  ➻  खड़े हो कर पेशाब करना बद तहज़ीबी व बेअदबी व नसरानियों का तरीक़ा है, खड़े हो कर पेशाब करना मकरुह व मना है, हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मना फ़रमाया है, थोड़ी सी मजबूरीयों की बिना पर खड़े हो कर पेशाब नहीं करना चाहिए हां अगर बहुत ज़्यादा तकलीफ हो और हर मुम्किन कोशिश करने के बाद भी अगर वो बैठ नहीं सकता तो खड़े हो कर पेशाब कर सकता हैं!


📗 फ़तावा रज़वियह शरीफ़ जिल्द 24 सफह 548


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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या जमाअत से नमाज़ पढ़ने वाले को इमाम के साथ दुआ मांगना ज़रुरी है, अगर कोई इमाम के सलाम फेरने के बाद दुआ न मांगे तो उसकी नमाज़ होगी या नहीं जवाब इनायत करें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  हर नमाज़ सलाम फेरने पर मुकम्मल हो जाती है उसके बाद जो दुआ मांगी जाती है ये नमाज़ में दाख़िल नहीं, अगर कोई शख्स नमाज़ पढ़ने के बाद बिलकुल दुआ न मांगे तब भी उसकी नमाज़ अदा हो जाएगी, अलबत्ता एक फ़ज़ीलत से महरूमी और सुन्नत की ख़िलाफ़ वर्ज़ी है, कुछ जगह देखा गया के इमाम लोग बहुत लम्बी लम्बी दुआयें पढ़ते हैं और मुक़तदी कुछ ख़ुशी के साथ और कुछ बे रग़बती से मजबूरन उनका साथ निभाते हैं, और कोई बग़ैर दुआ मांगे या थोड़ी दुआ मांग कर इमाम साहब का पूरा साथ दिये बग़ैर चला जाए तो उस पर एतराज़ करते हैं और बुरा जानते हैं, ये सब उनकी ग़लतफ़हमियाँ हैं, इमाम के साथ दुआ मांगना मुक़तदी पर हरगिज़ लाज़िम व ज़रुरी नहीं वो नमाज़ पूरी होने के बाद फ़ौरन मुख़्तसर दुआ मांग कर भी जा सकता है, और कभी किसी मजबूरी की बिना पर बग़ैर दुआ मांगे चला जाए तब भी नमाज़ सही और पूरी हो जाती है!

📗 फ़तावा रज़वियह शरीफ़ जिल्द 3 सफह 278
📓 ग़लत फ़हमियां और उनकी इस्लाह 48

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 ❐ सवाल ❐  ➻  ह़ज़रत मैं नमाज़ पढ़ रहा था ग़लती से दो के बजाए तीन सजदे कर लिए बाद में याद आया अब मैं क्या करूँ, मेरी नमाज़ होगी या नहीं और मुझे क्या करना चाहिए हवाले के साथ जवाब इनायत करें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  अगर किसी ने दो के बजाए तीन सजदे कर लिए तो अगर सलाम फेरने से पहले याद आजाये तो सजदा सहू करे कियोंके वाजिब तर्क हुआ, सजदा सहू लाज़िम है, और अगर सलाम फ़ेरने के बाद याद आया तो फ़िर से दोबारा नमाज़ पढ़ ले!

📗 फ़तावा रज़वियह शरीफ़ जिल्द 3 सफह 646
📓 मोमिन की नमाज़ सफह 73

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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक सवाल है के क्या रात में नाखून काट सकते हैं या नहीं कुछ लोग कहते हैं के रात में नाखून नहीं काटना चाहिए क्या ये बात सही है जवाब इनायत करें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  हां बिलकुल काट सकते हैं इस में तो कोई ह़रज नहीं- ह़ज़रत अल्लामा मुफ्ती मुनीबुर्रह़मान साहब क़िब्ला तह़रीर फरमाते है के रात के वक़्त नाखून काटने की शरअन कोई मुमानियत नहीं है!

📗 तफ़हीमुल मसाइल सफह 399

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 ❐ सवाल ❐  ➻  कुछ लोग कहते हैं के जरसी गाय खिन्ज़ीर की नसल से है इसको नहीं पालना चाहिए और इसका गोश्त व दूध वगैरह भी नहीं खाना चाहिए क्या ये बात सही है जवाब इनायत करें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  जरसी गाय का पालना उसका दूध इस्तेमाल करना उसका गोश्त खाना जायज़ व दुरुस्त है ह़ज़रत मौलाना तत़हीर अह़मद साहब क़िब्ला अपनी किताब ग़लत फहमियां और उनकी इस्लाह में तह़रीर फरमाते है के : अमेरीकन गाय के बारे में काफी लोग शुकूक व शुबहात में मुबतिला हैं जबके इस में कोई शक नहीं के अमरीकन गाय भी बिला शुबा गाय है उसका गोश्त खाना ह़लाल और उसका दूध और घी भी खाना पीना जाइज़ है!

📔 फतावा बह़रुल उलूम जिल्द 4 सफह 524
📗 ग़लत फहमियां और उनकी इस्लाह सफह 134

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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक सवाल है के शौहर अपनी बीवी की मय्यत को गुसल दे सकता है या नहीं और मरने के बाद शौहर अपनी बीवी के जनाज़ा को हाथ लगा सकता है या नहीं जवाब इनायत करें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  मर्द अपनी बीवी के जनाज़ा को हाथ लगा सकता है कब्र में उतार भी सकता है, हां उसके बदन को हाथ नहीं लगा सकता इसी वास्ते गुस्ल नहीं दे सकता!

📗 इरफ़ाने शरीयत सफह 1

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या नापाकी की ह़ालत में भी तावीज़ पहन सकते हैं के नहीं और तावीज़ पहन कर अपनी बीवी से सोहबत करना कैसा है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  आजकल उमूमन तावीज़ मोम जामा क्या हुआ और कपड़े में सिला होता है इसलिए तावीज़ के हुरुफ़ नहीं दिखते हैं लिहाज़ा नापाकी की ह़ालत में भी तावीज़ पहन सकते हैं और बीवी से सोहबत करने में भी कोई ह़रज नहीं- हां अगर तावीज़ पर अल्लाह और उसके रसूल का नाम लिखा हो या कोई क़ुरआन शरीफ की आयत लिखी हो और उसके हुरुफ़ दिख रहें हों तो इन मौकों पर ज़रुर तावीज़ उतार दें इसी में अदब है!

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 ❐ सवाल ❐  ➻  किसी के मरने के बाद जो 3 दिन के बाद या जुमां वगैरह में जो चना पढ़े जाते हैं वो कितना वज़न होना चाहिए!

 ❐ जवाब ❐  ➻  कोई वज़न शरअन मुक़र्रर नहीं, इतने हों के जिस में सत्तर हज़ार अदद पूरा हो जाये!

📗 इरफाने शरीयत सफह 1

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 ❐ सवाल ❐  ➻  जो लोग दीन की बातों की जानकारी ना होने की वजह से अमल नहीं करते क्या क़ियामत के दिन उनकी पकड़ ना होगी!

 ❐ जवाब ❐  ➻  आज-कल काफ़ी लोग ऐसे हैं दीनी बातों, इस्लामी अक़ीदों पाकी ना पाकी, नमाज़ व रोज़ा और ज़कात वग़ैरहा मसाइल नहीं जानते और सीखने की कोशिश भी नहीं करते, और ख़ुदा व रसूल ने किस बात को हराम फ़रमाया और किसे हलाल, किसे जाइज़ और किसे नाजाइज़ उन्हें इसका इल्म नहीं और ना इल्म सीखने की परवाह, और ख़िलाफ़े शराअ हरकात करते हैं गलत सलत नमाज़ अदा करते हैं, लैन दैन ख़रीद फ़रोख़्त और रहन सहन में मज़हबे इस्लाम के ख़िलाफ़ चलते हैं, और उनसे कोई कुछ कहे या उन्हें गलत बात से रोके, ख़िलाफ़े शराअ पर टोके तो वो कहते हैं हम जानते ही नहीं हैं लिहाज़ा हमसे कोई मुआख़िज़ा और सुवाल ना होगा और हम बरोज़े क़ियामत छोड़ दिए जाएंगे!

ये उन लोगों की सख़्त ग़लत फ़हमी है, सही बात ये है के अंजान ग़लत कारों की डबल सज़ा होगी!

एक इल्म हासिल ना करने की और उल्मा से ना पूछने की और दूसरे ग़लत काम करने की, और जो जानते हैं लेकिन अमल नहीं करते उन्हें एक ही अज़ाब होगा यानी अमल ना करने का, इल्म ना सीखने का गुनाह उनपर ना होगा,  (क्योंके उन्होंने इल्म ए दीन सीख लिया था)

आजकल आदमी अगर कोई सामान गाड़ियां, कपड़े, ज़ेवरात खाने पीने की चीज़ ख़रीदे और उसको इस चीज़ के ग़लत व ख़राब या उसमें धोके बाज़ी का शक व शुबा हो जाए तो जांच परख कराएगा लोगों से मशवरा करेगा जानकारों को लाके दिखाएगा, खूब छान फटक करेगा, लेकिन इस्लाम के मआमले में मनमानी करता रहेगा उल्टी सीधी नमाज़ पढ़ता रहेगा, वुज़ू व ग़ुसल नहाने धोने में इस्लामी तरीक़े का ख़याल नहीं रखेगा, लेकिन लैन दैन और मुआमलात में हराम को हलाल और हलाल को हराम समझता रहेगा लेकिन आलिमों मौलवियों से मालूम नहीं करेगा के में जो करता हूं ये ग़लत है या सही!

ये इसलिए हुआ के अब इंसान को दुनियां के नुक़सान की तो फ़िक्र है लेकिन आख़िरत के घाटे की कोई फ़िक्र नहीं हालांके वो मौत से किसी सूरत बच ना सकेगा और क़ब्र व हश्र व जहन्नम के अज़ाब से भाग निकलना उसके बस की बात ना होगी!

दुनियावी हुकूमतों और सल्तनतों की ही मिसाल ले लीजिए अगर कोई शख़्स किसी हुकूमत के  किसी क़ानून की ख़िलाफ़ वर्ज़ी करे और फिर कहदे के में जानता ही नहीं हूं तो हुकाम(औफ़िसर) और पुलिस उसकी बात नहीं सुनेंगे और उसे सज़ा दी जाएगी मिसाल के तौर पर कोई शख़्स बग़ैर लाइसेंस के ड्राइवरी करे या बग़ैर रोड टैक्स जमा किए गाड़ियां और मोटरसाइकिल चलाए और जब पकड़ा जाए तो कहे मुझको पता नहीं था के गाड़ी चलाने के लिए ये काम करना पड़ते हैं तो हरगिज़ उसकी बात नहीं सुनी जाएगी!

ऐसे ही कोई शख़्स बग़ैर टिकट के रेल में सफ़र करने लगे या पैसेंजर का टिकट ले और एक्सप्रेस में सफ़र करने लगे सैकेंड क्लास का  टिकट ले और फ़स्ट क्लास में बैठ जाए और जब पकड़ा जाए तो कहदे के में जानता ही नहीं रेल में सफ़र के लिए टिकट लेना पड़ता है या ये एक्सप्रेस है मैं नहीं पहचान सका और ये फ़स्ट क्लास है मुझको नहीं मालूम तो क्या चैक करने वाले औफ़िसर उसको छोड़ दैंगे!

हरगिज़ नहीं, ऐसे ही दीन के मुआमले में जो लोग ग़लत सलत करते हैं वो भी ये कहने से नहीं छूटैंगे के हम जानते ही ना थे और क़ियामत के दिन उन्हें दोहरी सज़ा होगी!

एक इल्म ए दीन ना जानने की और दूसरी अच्छे अमल ना करने और गुनाह करने की : इस सब की तफ़्सील व तहक़ीक़ के लिए देखिए मुजद्दिद ए आज़म सरकार आलाहज़रत के फ़रमूदात👇

📕 अलमलफ़ूज़ हिस्सा 1 सफ़ह 27 पर
📗 आवामी ग़लत फ़हमियां और उनकी इस्लाह, सफ़ह 159-160

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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक सवाल है के अगर इमाम के सर पर साफ़ा न हो और मुक़तदी के सर पर साफ़ा है तो क्या मुक़तदी की नमाज़ दुरुस्त होगी या नहीं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  अगर मुक़तदी सर पर इमामा जिसे साफ़ा और पगड़ी भी कहते हैं, बांध कर नमाज़ पढ़े और इमाम के सर पर पगड़ी न हो तो इसको कुछ लोग बुरा जानते हैं बल्के कुछ यह समझते हैं के इस सूरत में मुक़तदी की नमाज़ दुरुस्त नहीं हुई, यह ग़लत बात है, अगर इमाम के सर पर पगड़ी न हो और मुक़तदी के सर पर हो तो मुक़तदी की नमाज़ दुरुस्त और सही हो जायेगी आला ह़ज़रत से ये मस्अला मालूम किया गया तो फरमाया बिला तकल्लुफ़ दुरुस्त है!

📔 फतावा रज़वियह जिल्द 3 सफह 273
📕 इरफ़ाने शरीयत सफह 4
📗 ग़लत फहमियां और उनकी इस्लाह सफह 41

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या किसी मरहूम जो इंतिक़ाल कर गए हों उनके नाम से अक़ीक़ा हो सकता है के नहीं जवाब इनायत करें?

 ❐ जवाब ❐  ➻  मुर्दे की त़रफ़ से अक़ीक़ा नहीं हो सकता, कियोंके अक़ीक़ा बच्चे की पैदाइश की खुशी में शुकराने के तौर पर किया जाता है मुजद्दिदे आज़म सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान बरेलवी अलैहिर्रहमतू वर्रिज़वान तह़रीर फरमाते हैं के मुर्दे का अक़ीक़ा नहीं, के वो शुक्रे विलादत है अगर सात दिन से पहले मर गया तो अभी अक़ीक़ा का वक़्त ही न आया था और अगर बाद को मरा तो अक़ीक़ा गया, उसी में दूसरे सफह पर है के जो मर जाये किसी उम्र का हो उसका अक़ीक़ा नहीं हो सकता!

📓 फतावा रज़वियह शरीफ़ जिल्द 8 सफह 547/546
📕 फतावा अम्जदिया जिल्द 3 सफह 336

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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर किसी औरत को तलाक़ दी जाए तो वो औरत तलाक़ देने के कितने दिन के बाद दूसरा निकाह़ कर सकती है रहनुमाई फरमायें?

 ❐ जवाब ❐  ➻  तलाक़ के बाद तीन हैज़ M.c,(माहवारी-) शुरू हो कर ख़तम हो जाये और अगर हैज़ m.c वाली न हो तो तीन महीने और अगर ह़ामिला हो तो जब बच्चा पैदा हो जाये, चाहे बच्चा साल भर बाद पैदा हो या तलाक़ से एक ही मिनट बाद, इद्दत पूरी हो जायेगी!

📗 इरफ़ाने शरीअत सफह 01

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 ❐ सवाल ❐  ➻  कुछ लोग को मार कर फेंक देते हैं तो उनसे कैसे सवाल जवाब कैसे होगा, और उन लोगों से सवाल जवाब होगा या नहीं जवाब इनायत करें?

 ❐ जवाब ❐  ➻  अगर किसी को क़ब्र में दफ़न न किया गया तो जहाँ पड़ा रह गया वहीं उससे सवाल जवाब होगा, और वहीं सवाब या अज़ाब पहूंचेगा हुज़ूर सदरुश्शरिअह बहारे शरीयत में तह़रीर फरमाते हैं के मुर्दा अगर क़ब्र में दफ़न न किया जाये तो जहाँ पड़ा रह गया या फेंक दिया गया गर्ज़ कहीं हो उस से वहीं सवालात होंगे और वहीं सवाब या अज़ाब पहूंचेगा यहाँ तक के जिसे शेर खा गया तो शेर के पेट में सवाल व सवाब व अज़ाब जो कुछ हो पहूंचेगा!

📒 बहारे शरीअत जिल्द 1 हिस्सा 1 सफह 113--- ,عالم برزخ کا بیان

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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक सवाल है के अगर लुंगी (तहबंद) के नीचे लंगोट बंधा हो तो नमाज़ हो जायेगी या नहीं जवाब इनायत करें?

 ❐ जवाब ❐  ➻  नमाज़ हो जायेगी- आला ह़ज़रत से जब ये मस्अला मालूम किया गया तो आप ने इरशाद फरमाया के नमाज़ दुरुस्त होगी!

📗 इरफ़ाने शरीयत सफह 1

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 ❐ सवाल ❐  ➻  मेरा एक सवाल है के फिरिश्तों को जासूस कहना कैसा है, और अगर कोई आलिम ऐसा कहे तो उसके लिए क्या हुक्म है?

 ❐ जवाब ❐  ➻  फिरिश्तों को जासूस कहना तौहीन है, फतावा शारेह़ बुख़ारी में है के अम्बिया ए किराम को जासूस कहना कुफ्र है इसी तरह फिरिश्तों को गार्ड या टीटी कहना भी तौहीन है लिहाज़ा आलिम हो या गैरे आलिम फिरिश्तों की शान में ऐसा कहने की वजह से तौबा व अस्तग़फ़ार करे,और अगर कोई मुक़द्दस फरिश्तों की तौहीन की नियत से जासूस कहे तो कुफ्र है तजदीदे इमान व तजदीदे निकाह़ लाज़िम है!

📕 फ़तावा शारेह़ बुखारी जिल्द 1 सफह 575

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 ❐ सवाल ❐  ➻  आजकल जलसों दीनी मेह़फिलों में नात ख़्वां शायरों पर पैसा लुटाने का रिवाज है ये पैसा लुटाना कैसा है?

 ❐ जवाब ❐  ➻  जलसों दीनी मह़फिलों वगैरह में नात ख्वानों और शायरों पर पैसा या नोटों को लुटाना या फेंकना जाइज़ नहीं बल्के उनके हाथ या गोद में रख़ दें जैसा के इमामे अहले सुन्नत सय्यदी सरकार आलाह़ज़रत इमाम अह़मद रज़ा खान बरेलवी अलैहिर्रहमा तह़रीर फरमाते है के पैसे फेंकना या हवा में उड़ाना मना है क्योंके पैसा रिज़्क़ है और रिज़्क़ की बे ह़ुरमती जाइज़ नहीं है, इससे साबित हुआ के नात ख्वानों या शायरों या आलिमे दीन के सर या गोद में पैसे डालना जिसमें बे अदबी का पहलू न हो तो जाइज़ है!

📒 फतावा रज़वियह शरीफ़ जिल्द 24 सफह 520

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 ❐ सवाल ❐  ➻  हमारे यहाँ एक बच्ची का इंतिक़ाल हो गया बगैर नमाज़े जनाज़ा पढ़े उसको दफ़न कर दिए तो क्या दफन के बाद नमाज़े जनाज़ा पढ़ सकते हैं जवाब इनायत करें?

 ❐ जवाब ❐  ➻  जबतक लाश फट जाने का गुमान गालिब न हो उस वक़्त तक उसकी क़ब्र पर नमाज़ अदा करने का हुक्म है जैसा के हुज़ूर सदरुश्शरिअह तह़रीर फरमाते हैं के उमूमन अमवात की लाशें तीन दिन या दस दिन या कमो बेश में फट जाती हैं इसी वजह से अगर मय्यत बगैर नमाज़े जनाज़ा पढ़े दफन कर दी गई हो तो जबतक उसके फट जाने का गालिब गुमान न हो कब्र पर नमाज़ पढ़ने का फुक़्हा हुक्म देते हैं!

📕 फतावा अम्जदिया जिल्द 1 सफह 326

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 ❐ सवाल ❐  ➻  हज़रत ये बतायें के शरअन लड़का लड़की कितनी उम्र में बालिग़ हो जाते हैं?

 ❐ जवाब ❐  ➻  लड़का कम से कम 12 बरस में और लड़की 9 बरस और ज़्यादा से ज़्यादा दोनों 15 बरस में बालिग़ हो जाते हैं!

📓 इरफ़ाने शरीयत सफह 10

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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक सवाल है के जैसे कोई औरत  नापाकी की ह़ालत में मर गई तो क्या उसको डबल गुस्ल दिया जायेगा, एक नापाकी का फिर दूसरा मरने के बाद वाला?

 ❐ जवाब ❐  ➻  एक ही गुस्ल काफी है, चाहे जितनी नापाकी जमां हो जाए, मसलन औरत को हैज़ आया अभी न नहाई थी के सोहबत किया, अभी गुस्ल करने न पाई थी के मर गई एक ही गुस्ल दिया हो तो गुसल हो जायेगा- खुलासा ये के हर नापाकी का गुस्ल अलग अलग देने की कोई ज़रुरत नहीं, बस एक ही गुस्ल काफी है!

📕 इरफ़ाने शरीयत सफह 10

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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक सवाल ये है के एक शख्स ने अपनी बीवी को ह़मल में तलाक़ दे दी और वो कहता है के ह़मल में तलाक़ नहीं होती है क्या ये सही है,और तलाक़ पड़ गई या नहीं जवाब इनायत करें महरबानी होगी!

 ❐ जवाब ❐  ➻  ह़मल के दौरान में अगर किसी ने तलाक़ दी तो भी तलाक़ हो जायेगी, जैसा के हुज़ूर आला हज़रत इमाम अह़मद रज़ा ख़ान फाज़िले बरेलवी अलैहिर्रह़मतु वर्रिज़वान तह़रीर फरमाते हैं के ह़मल में तलाक़ न दी जाए अगर देगा हो जायेगी इद्दत बच्चा पैदा होना होगा!

📕 अह़कामे शरीयत जिल्द 2 सफह 185

ख़ुलासा ये है के उस शख्स का कहना के ह़मल में तलाक़ नहीं होती सरासर जिहालत है उसको मस्अला मालूम नहीं तलाक़ देने वाले को चाहिए के फौरन बीवी से अलग हो जाए!

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या तहज्जुद की नमाज़ बगैर सोये पढ़ सकते हैं जवाब इनायत करें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  तहज्जुद के लिए रात में सोना शर्त़ है सो कर उठने के बाद इंसान जो नमाज़ पढ़ता है उसे ही तहज्जुद कहते हैं, इसी तरह फ़क़ीहे आज़म हुज़ूर सदरुश्शरिअह मुफ्ती अमजद अली साहब आज़मी अलैहिर्रह़मा तह़रीर फरमाते हैं के
सलातुल लैल की एक क़िस्म तहज्जुद है इशा के बाद रात में सो कर उठें और नवाफ़िल पढ़ें सोने से पहले जो कुछ पढ़ें वह तहज्जुद नहीं!

📔 बहारे शरीयत जिल्द 1 सफह 677

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 ❐ सवाल ❐  ➻  तहज्जुद की नमाज़ में कितनी रकअत है और उसका वक़्त कब से कब तक है जवाब इनायत करें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  तहज्जुद की नमाज़ का वक़्त इशा की नमाज़ के बाद सो कर उठें उस वक़्त से तुलू ए सुबह सादिक़ तक है- यानि ख़त्मे सहरी के वक़्त तक तहज्जुद का वक़्त है, तहज्जुद की नमाज़ कम से कम 2 रकअत है और हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से 8 तक साबित है- (यानि आप 2 रकअत से 8 रकात तक पढ़ सकते हैं जो सही हदीस से साबित है) हदीस शरीफ में इस नमाज़ की बड़ी फज़ीलत आई है निसाई और इब्ने माजा ने अपने सुनन में रिवायत की के रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो शख्स रात में बेदार हो और अपने अहल को जगाये और फिर दोनों दो दो रकात पढ़ें तो कसरत से याद करने वालों में लिखे जायेंगे!

📕 अनवारे शरीयत सफह 70

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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक सवाल अर्ज़ है के औरत को जिसे माहवारी M.c, का खून आता है कपड़े धोने के बाद भी दाग़ कपड़ों पर रह जाए तो क्या हुक्म है जवाब इनायत करें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  क़दीम फ़तावा रज़विया शरीफ़ में है नजास़त तीन बार ख़ूब धो ली और कपड़ा हर बार पूरा निचोड़ लिया मगर नजास़त का धब्बा या बू या नजिस शुदा तेल की चिकनाई नहीं जाती तो ये माफ़ है कपड़ा पाक हो गया लिहाज़ा आपका कपड़ा पाक है!

📒 फ़तावा रज़विया शरीफ़ जिल्द 1 सफह 632

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 ❐ सवाल ❐  ➻  मोज़ा पहनने में जो टख़ना बंद हो जाता है उस से नमाज़ में कोई कमी तो नहीं होती!

 ❐ जवाब ❐  ➻  नमाज़ में इस से असलन कोई ह़रज या कराहत नहीं!

📒 इरफ़ाने शरीयत सफह 10

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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक सवाल है के अगर ह़ज़रते फातिमा रज़िअल्लाहु तआला अन्हा के नाम से फातिहा नज़रो नियाज़ की जाये, तो क्या उस खाने को मर्द हज़रात नहीं खा सकते हैं क्योंकि हमारे यहाँ मर्द को नहीं दी जाती ये बात कहाँ तक दुरुस्त है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  हज़रते फातिमा रज़िअल्लाहु तआला अन्हा के नाम से की हुई फातिहा नज़रो नियाज़ मर्द व औरत सब खा सकते हैं इस में कोई हरज नहीं जो कहता है नहीं खाना चाहिए या जहाँ पर नहीं खाते ये उनकी जिहालत है, आला हज़रत इमाम अह़मद रज़ा ख़ान क़ादरी बरकाती बरेलवी अलैहिर्रह़मा इरफ़ाने शरीयत में इसी तरह के एक सवाल के जवाब में आप इरशाद फरमाते हैं के मर्द  को भी खाना चाहिए कोई मुमानियत नहीं!

📗इरफ़ाने शरीयत सफह 10

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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर कोई फांसी लगा कर मर जाए तो क्या उसकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ी जायेगी या नहीं, कुछ लोग कहते हैं के जो फांसी लगाकर या ज़हर खा कर या अपने हाथों से अपना गला काट कर मर जाए तो उसकी नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ी जायेगी क्या ये सही है जवाब इनायत करें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  जो फांसी लगाकर या ज़हर खा कर या अपना गला काट कर मर गया उसकी भी नमाज़े जनाज़ा पढ़ी जायेगी, और मुसलमान के ही क़ब्रिस्तान में दफ़न किया जायेगा, जो कहता है के इनकी नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ी जायेगी उसको मस्अला मालूम नहीं है, उसको चाहिए के बगैर इल्म के कोई मस्अला न बताये, और आइंदा ख़याल रखे तौबा करे!

📕 फतावा अफ़्रीका सफह 40

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 ❐ सवाल ❐  ➻  फ़ातिहा में खाने के साथ साथ पानी भी रख सकते हैं फ़ातिहा के लिए या नहीं?

 ❐ जवाब ❐  ➻  बिलकुल रख़ सकते हैं इसी तरह के एक सवाल के जवाब में आला हज़रत इमाम अह़मद रज़ा ख़ान क़ादरी बरकाती बरेलवी अलैहिर्रह़मा इरफ़ाने शरीयत  में इरशाद फरमाते हैं के ख़ाने के साथ पानी फ़ातिहा के लिए रख़ना दुरुस्त है!

📗 इरफ़ाने शरीयत सफह 10

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 ❐ सवाल ❐  ➻  इमाम का मेहराब में या दो सुतूनों के दरमियान खड़ा होना कैसा है?

 ❐ जवाब ❐  ➻  कहीं कहीं देखने में आता है के इमाम साहब मेहराब में अन्दर हैं और मुक़तदी बाहर ये ख़िलाफ़े सुन्नत है- हुज़ूर सदरुश्शरीआ फ़क़ीहे आज़म ह़ज़रत अल्लामा मौलाना अमजद अली साहब तह़रीर फरमाते हैं के : इमाम का तन्हा मेहराब में खड़ा होना मकरुह है और अगर बाहर खड़ा हो सिर्फ सज्दा मेहराब में किया या वो तन्हा न हो बल्के उसके साथ कुछ मुक़तदी भी मेहराब में हों तो कुछ ह़रज नहीं,यूँ ही अगर मुक़तदियों पर मस्जिद तंग हो तो भी मेहराब में खड़ा होना मकरुह नहीं है इमाम को दरों में खड़ा होना भी मकरुह है!

📒 बहारे शरीअत जिल्द 1 हिस्सा 3 सफह 635--मकरुहात का बया
📕 दुर्रे मुख़्तार जिल्द 2 सफह 499
📓 फतावा हिन्दिया जिल्द 1 सफह 108
📘 फ़तावा आलमगीरी

इसका तरीक़ा यह है के इमाम का मुसल्ला थोड़ा पीछे हटा दिया जाये और वो थोड़ा पीछे हट कर इस तरह खड़ा हो के देखने में मह़सूस हो के वो मेहराब या दरों में अन्दर नहीं है बल्के बाहर खड़ा है फिर चाहे सज्दा अन्दर हो नमाज़ दुरुस्त हो जायेगी!

📗 ग़लत फहमियां और उनकी इस्लाह सफह 39

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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक सवाल ये है के अगर कोई इमाम नसबंदी करा ले और फिर बाद में ऐलानिया तौबा कर ले तो उसके पीछे नमाज़ पढ़ना कैसा है जवाब इनायत करें महरबानी होगी?

 ❐ जवाब ❐  ➻  नसबंदी कराना इस्लाम में ह़राम है- लेकिन कुछ लोग ख़्याल करते हैं के जिसने नसबंदी करा ली अब वो ज़िन्दगी भर नमाज़ नहीं पढ़ा सकता, हालांके ऐसा नहीं है बल्के इस्लाम में जिस तरह और गुनाहों की तौबा है उसी तरह इस गुनाह की भी तौबा है- यानि जिस की नसबंदी हो चुकी है अगर वो सच्चे दिल से एलानिया तौबा करे और ह़राम कारियों से रुके तो उसके पीछे नमाज़ पढ़ी जा सकती है!

📕 फतावा फैज़ुर्रसूल जिल्द 1 सफह 277
📗 ग़लत फहमियां और उनकी इस्लाह सफह 40

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 ❐ सवाल ❐  ➻  नमाज़ में आसतीन अगर उलटी हो तो नमाज़ हुई या नहीं अगर हुई तो कैसी जवाब इनायत करें?

 ❐ जवाब ❐  ➻  अगर आसतीन को आधी कलाई से ज़्यादा मोड़ा था तो ऐसे में नमाज़ मकरुहे तह़रीमी हुई इस का दुबारा अदा करना वाजिब है- जैसा के हुज़ूर सदरुश्शरीह ह़ज़रत मौलाना अमजद अली आज़मी साहब रहमतुल्लाहि तआला अलैह फरमाते हैं के कोई आसतीन आधी कलाई से ज़्यादा चढ़ी हुई या दामन समेटे नमाज़ पढ़ना मकरुहे तह़रीमी है ख़्वाह पेशतर से चढ़ी हो या नमाज़ में चढ़ाई इन सूरतों में नमाज़ मकरुहे तह़रीमी होगी!

📕 बहारे शरीयत जिल्द 1 हिस्सा 3 मकरुहात का बयान सफह 624
📓 फतावा रज़वियह शरीफ किताबुस्सलात जिल्द 7 सफह 380

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 ❐ सवाल ❐  ➻  हज़रत क्या क़ब्रिस्तान में जूता-चप्पल पहनकर जा सकते हैं? या नहीं इस पर क्या हुक्म है?

 ❐ जवाब ❐  ➻  क़ब्रिस्तान में जूता-चप्पल पहनकर जाना मना है क़ब्रिस्तान में दाख़िल होने से पहले जूता-चप्पल उतार दें, एक आदमी को हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने जूते पहने देखा तो फ़रमाया जूते उतार दे ना क़ब्र वाले को तू तकलीफ़ दे ना वो तुझे!

📕 बहारे शरिअत
📗 क़ानूने शरिअत हिस्सा 1 सफ़ह 130

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क़ब्रिस्तान में जंगल यानी घास वग़ैरह ज़्यादा हैं, क्या उसको छील काट कर जला सकते हैं इस पर क्या हुक्म है?

 ❐ जवाब ❐  ➻  क़ब्र पर से तर (हरी) घास नोचना, छीलना, काटना या जलाना ना चाहिए इसलिये के घास तर होती है और तर चीज़ अल्लाह तआला की तस्बीह करती है और तस्बीह से रहमत उतरती है और मय्यत को उन्स होता है, और घास को नोचने में मय्यत का हक़ ज़ाया करना है!

📒 रद्दुल मोहतार
📗 क़ानूने शरिअत
📕 बहारे शरीअत हिस्सा 4 सफ़ह 167-168

*नोट:* अगर क़ब्र पर सूखी घास या झाँकड़ वग़ैरह हों तो उनको क़ब्र पर से  साफ़ कर देना मुस्तहब है, और साफ़ की गयी घास वग़ैरह क़ब्रिस्तान से बाहर ले जाकर फैंकें या अपने काम में लाएं!

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 ❐ सवाल ❐  ➻  हज़रत घर से फ़ातिहा पढ़़कर ईसाल करने में ज़्यादा सवाब है या क़ब्रिस्तान जाकर ?

 ❐ जवाब ❐  ➻  क़ब्रिस्तान में जाकर पढ़ने में ज़्यादा सवाब है, के ज़्यारते क़ुबूर भी सुन्नत है और वहाँ पढ़ने में मुर्दों का दिल भी बहलता है और जहाँ क़ुरआन मजीद पढ़ा जाये वहाँ रहमते इलाही उतरती है!

📗 फ़तावा रज़वियह जिल्द 9 सफ़ह 609

लेकिन अगर किसी ज़ालिम का डर हो या आंधी तूफान या पानी या ओले या सख़्त सर्दी है और उनसे नुकसान पहुंचने का अंदेशा है तो आप जहां भी हैं वहीं से इसाले सवाब करें!

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 ❐ सवाल ❐  ➻  ह़ज़रत एक सवाल है के नमाज़ की ह़ालत में पैंट या पाजामा की मोरी मोड़ना कैसा है कुछ लोग कहते हैं के टख़ना बंद होना चाहिए इसके बारे में कुछ तफ़सील से बतायें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  कुछ लोग टख़नों से नीचा लटका हुआ पाजामा और पैंट पहनते हैं अगर उन्होंने इसकी आदत डाल रखी है और तकब्बुर व घमंड के तौर पर वो ऐसा करते हैं तो ये नाजाइज़ व गुनाह है, और इस तरह़ नमाज़ मकरुह है, लेकिन अगर इत्तिफ़ाक़ से हो या बे ख़्याली और बे तवज्जोही से हो तो हर्ज नहीं, और जो लोग इस से बचने के लिए और टख़नें खोलने के लिए मोरी पायेंचे को चढ़ाते हैं वो गुनाह को घटाते नहीं बल्के बढ़ाते हैं और नमाज़ में ख़राबी को कम नहीं करते बल्के ज़्यादा करते हैं, ये पैंट और पाजामे की मोरी पायेंचे को लपेट कर चढ़ाना नमाज़ में मकरुहे तह़रीमी है!

ह़दीस में है के : रसूलल्लाह ﷺ सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया के मुझे हुक्म दिया गया के मैं सात हड्डियों पर सजदा करूँ, पेशानी दोनों हाथ, दोनों घुटने, और दोनों पंजे और ये हुक्म दिया गया के मैं नमाज़ में कपड़े और बाल न समेंटूं!

📕 मिशकात शरीफ़ सफ़ह 83
📗 बुख़ारी शरीफ़
📘 मुस्लिम शरीफ़

इस ह़दीस की रू से कपड़ा समेटना और चढ़ाना नमाज़ में मना है, लिहाज़ा पैंट और पाजामे की मोरी लपेटने और चढ़ाने वालों को इस ह़दीस से इबरत हासिल करना चाहिए!

लेकिन इस्लाह करने वालों से भी गुज़ारिश है के नमाज़ में इस किस्म की कोताहियां बरतने वालों को नरमी और प्यार व मुहब्बत से समझायें, मान जायें तो ठीक है वरना उन्हें उनके हाल पर रहने दें और मुनासिब तरीक़े से इस्लाह करें, उनको डांटना झिड़कना और उनसे लड़ाई झगड़ा करना बहुत बुरा है, जिसका नतीजा ये भी हो सकता है के वो मस्जिद में आना और नमाज़ पढ़ना छोड़ दें जिसका वबाल उन झिड़कने डांटने वालों पर है, क्यूंके इस में भी कोई शक नहीं के बाज़ इस किस्म की खामियों के साथ नमाज़ पढ़ने वाले बेनमाज़ियों से हज़ारों दर्जा बेहतर हैं, और नमाज़ में कोताहियां करने वालों को भी चाहिए अगर कोई उनकी इस्लाह करे तो बुरा मानने के बजाए उसकी बात पर अमल करें, उस पर गुस्सा न करें, कियोंके वो जो कुछ कह रहा है आप की भलाई के लिए कह रहा है अगर वो तुर्शी और सख़्ती से भी कह रहा है तो उसका फ़ेएल है आपका काम तो हक़ को सुनकर अमल करना है झगड़ा करना नहीं!

📔 ग़लत फ़हमियां और उनकी इस्लाह़ सफह 46-48

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 ❐ सवाल ❐  ➻  एक शख्स मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहा था और उनके बराबर में एक बद मज़हब,( वहाबी,शिया,अहले हदीस वग़ैरह) आ गया, तो ऐसी नमाज़ का किया हुक्म है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  सफ क़ता करना यानि काटना, तोड़ना, हराम है हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला  अलैहि वसल्लम फरमाते हैं के जो सफ क़ता करे अल्लाह उसे क़ता कर देगा तो बद मज़हब अगर सफ के बीच खड़े हो जायें तो यक़ीनन सफ क़ता होगी, ऐसा ना चाहिए, उनको मस्जिद में आने ही ना दिया जाए, लेकिन बगल में खड़े हो ही गया तो नमाज़ हो जायेगी लेकिन बेहतर यही है कि ऐसो को मस्जिद में आने ही न दिया जाए!

📓 फतावा रज़वियह जिल्द 3,सफह,374-26

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 ❐ सवाल ❐  ➻  आज कल बद मज़हबों के पीछे नमाज़ पढ़ने को बहुत ज़ोर दिया जाता है के ये मक्का के ईमाम साहब हैं ये मदीना के हैं, और कहते हैं के मस्जिदे नब्वी में एक नमाज़ पर 50000 नमाज़ का सवाब है, इसके बारे में क्या हुक्म है!


 ❐ जवाब ❐  ➻  तमाम बद मज़हब के पीछे नमाज़ पढ़ना ह़राम उन्हें इमाम बनाना ह़राम और अगर माज़अल्लाह उन्हें मुसलमान समझा जब तो खुद ही काफिर है, और मस्जिदे नब्वी में एक नमाज़ के बदले,50000 नमाज़ का सवाब, ये इनाम सुन्नियों के पीछे पढ़ने पर है, वरना बद मज़हब के पीछे नमाज़ पढ़ना तो दूर की बात बल्के जो सुन्नी बद मज़हबों से मेल जोल रखता हो उसके पीछे भी नमाज़ मकरुहे तहरीमी यानि नाजायज़ है, वाजिबुल इयादा है!


📔 फतावा रज़वियह जिल्द,3 सफह 269


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 ❐ सवाल ❐  ➻  अरब में जुमां नमाज़ पढ़ना कैसा!


 ❐ जवाब ❐  ➻  अरब में सुन्नी मुसलमानों पर जुमां नहीं क्योंके जुमा नमाज़ क़ायम होने की कुछ शर्तें हैं जिनमें से एक ये भी है के सुल्ताने इस्लाम हो या उसका नायब हो, या फिर उनके ना होने पर मुसलमान अपने लिए जिसे इमाम बना लें, अब अगर वह इमाम बद अक़ीदा बद मज़हब है तो वह शराएते जुमां को पूरा नहीं करता, लिहाज़ा सुन्नियों पर वहाँ जुमां फर्ज़ ही नहीं ज़ुहर ही पढेंगे, हाँ अलल ऐलान कोई सुन्नी जुमां क़ायम कर ले तो उसके पीछे पढ़ लें, मगर ये याद रहे के उसकी शर्तों में एक शर्त आम इजाज़त भी है, यानि हर किसी को आने की इजाज़त है तो अगर किसी ने घर में जुमां क़ायम किया और घर का दरवाज़ा बन्द कर लिया तो किसी की नमाज़ नहीं होगी, इसी तरह अगर किसी सुन्नी मस्जिद में आदमी फुल हो गये हों तो भी उसका दरवाज़ा नहीं बन्द कर सकते, अगर एक ही दरवाज़ा था और वह बन्द कर लिया तो किसी की नमाज़ ना हुई इसी लिए जेल में भी जुमां पढ़ने का हुक्म नहीं है कियोंके वहाँ भी इज़ने आम मुमकिन नहीं और यही हुक्म हर जगह का है, मस्लन हिन्दुस्तान में भी अगर आप किसी सुन्नी मस्जिद तक आ जा नहीं सकते तो घर पर ज़ुहर ही पढेंगे!


📔 फतावा रज़वियह जिल्द,3 सफह 682/724


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 ❐ सवाल ❐  ➻  क़ारी साहब आपसे एक सवाल है के बद मज़हबों की अज़ान का जवाब देना कैसा है बराऐ करम क़ुरआन व हदीस की रौशनी में जवाब इनायत फरमायें!


 ❐ जवाब ❐  ➻  ना उनकी अज़ान, अज़ान है ना उनकी नमाज़, नमाज़ है,और ना ही उनकी मस्जिद मस्जिद है, बल्कि वह मिस्ले घर के है और उनका कोई दीन भी नहीं है, मगर अल्लाह तआला के नाम के साथ जल्ला जलालहु और हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के नाम के साथ, सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पढ़ा जाऐ कोई भी उनका नाम पुकारे!


📕 अलमलफूज़ हिस्सा,1 सफह 95


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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर कोई बद मज़हब बद अक़ीदा 5 टाइम का नमाज़ी हो रोज़ेदार हो हज भी किया हो ज़कात देता हो बा शरह दाढ़ी रखा हो और एक जाहिल सुन्नी जो के दाढ़ी मुन्डा बे नमाज़ी बे रोज़ेदार हो तो दोनों में कौन बेहतर है!


 ❐ जवाब ❐  ➻  सुन्नी बेहतर है, कियोंके फिस्क़ अक़ीदा फिस्क़ अमल से हज़ार गुना ज़्यादा बदतर है के सुन्नी कितना भी बड़ा बदकार हो मगर खुदा व रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शान में हरगिज़ हरगिज़ गुस्ताखी नहीं कर सकता, मगर बद मज़हबों, के यहाँ खुदा व रसूल की गुस्ताखी करना ही दीन है, ये काफिरो मुरतद हैं अगरचे कितनी भी नमाजें पढ़ लें आखिर कार जहन्नमी है और वहीं हमेशा रहेगा और सुन्नी कितना भी जुर्म की सज़ा पाने के लिए जहन्नम में जाऐ मगर बिल आखिर अपने ईमान की बदौलत जन्नत में पहुंचेगा और हमेशा वहीं रहेगा!


📓 अलमलफूज़ हिस्सा,1 सफह 45


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 ❐ सवाल ❐  ➻  बद मज़हबों से सलाम कलाम मेल जोल उनके घर आना जाना दावत लेना देना कैसा है!


 ❐ जवाब ❐  ➻  बद- अक़ीदा,बद मज़हबों से सलाम कलाम मेल जोल उनके घर आना जाना उनसे दोस्ती करना उनको दावत देना उनके यहाँ दावत में जाना गरज़ के उनसे किसी तरह का क़लबी (दिली) रिश्ता रखना ह़राम ह़राम ह़राम, और वह भी तब जबके उन्हें काफिर जानता हो वरना अगर उनहें मुसलमान जाना जब तो खुद ही काफिर हुआ!


📗 मिशक़ात बाबुल ईमान सफह,22


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 ❐ सवाल ❐  ➻  बच्चों को बद मज़हबों के पास पढ़ने के लिए भेज सकते हैं या नहीं!


 ❐ जवाब ❐  ➻  बद अक़ीदा वहाबी देवबंदी तबलीगी वगैरा से अपने बच्चों को पढ़वाना हराम है!


📕 फतावा रज़वियह जिल्द 23 सफा  682

📗अहकामे शरीअत हिस्सा,3 सफह 237


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 ❐ सवाल ❐  ➻  हुज़ूर के चारों खलीफाओं में से किन किन के बाप ईमान लाये!

 ❐ जवाब ❐  ➻  सिर्फ हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के वालिद अबू क़हाफा ही ईमान लाए, बाकी तीनों खलीफा यानि हज़रते उमर फारूक़े आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के वालिद खत्ताब व हज़रते उसमाने ग़नी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के वालिद अफ्फान और मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के वालिद अबू तालिब ऐ तीनों ही ईमान नहीं लाए।

📒 फतावा अफरीक़ा सफह 54

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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर माँ या बाप का इंतिक़ाल हो जाये तो उनकी लाश की क़दम बोसी कर सकते हैं या नहीं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  बिलकुल कर सकते हैं खुद हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते उसमान बिन मातून रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की लाश मुबारक को बोसा दिया इस लिहाज़ से अगर औलाद अपने वालिदैन की क़बर की भी क़दम बोसी करेगा तो जाइज़ होगा!

📘 जाअल हक़ जिल्द,1 सफह 351

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या मस्जिदों में ज़ोर ज़ोर से नारा लगाना या आवाज़ बुलंद करना जाइज़ है!

 ❐ जवाब ❐  ➻ हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम खुद मस्जिदे नबवी शरीफ में मिम्बर लगवाते थे और उस पर खड़े होकर हज़रते ह़स्सान इब्ने साबित रज़ियल्लाहु तआला अन्हु हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शान में नात पढ़ा करते थे, अब जब सहाबी नात पढ़ रहे हैं तो आवाज़ तो बुलंद हो ही रही है फिर सुनने वाले सहाबा भी खामोश तो बैठे नहीं रहते होंगे वह भी दादो तहसीन पेश करते होंगे और ये सब हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के सामने उनकी मरज़ी से हो रहा है तो मस्जिदों में ज़िक्रो अज़कार सलातो सलाम तक़रीर वगैरह में आवाज़ बुलंद करना बिला शुबह जाइज़ है, हाँ मनां है तो ज़ाती तौर पर जैसे किसी को आवाज़ देकर बुलाना या दीगर दुनियावी कामों के लिए मस्जिद में शोर शराबा करना ये हराम है और दोनों बातों में बहुत फर्क है!

📕 मिशकात शरीफ जिल्द 2 सफह 422

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 ❐ सवाल ❐  ➻  निकाह के वक़्त अशआर सेहरा पढ़ना कैसा!

 ❐ जवाब ❐  ➻  ऐसा अशआर पढ़ना जिनमें कोई खिलाफे शरह बात ना हो तो वो मुबाह यानि जाइज़ होता है यूंही हर वो काम जो शरह में मना नही है वो भी जाइज़ है सेहरा पढ़ने की दलील के लिए इतना ही काफी है मगर फिर भी सुन लीजिये के हुज़ूर मुफ्तिये आज़म हिन्द के निकाह के वक़्त सरकारे आला ह़ज़रत रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के सामने हज़रत अल्लामा शाह मुफ्ती  मुहम्मद हिदायत रसूल साहब रज़वी अलैहिर्रहमा ने अपना लिखा हुआ वो सेहरा पढ़ा था जिसको सुनकर सरकारे आला ह़ज़रत रज़ियल्लाहु तआला अन्हु इस क़दर खुश हुए थे के उनहोंने अपना अमामा मुबारक उतारकर उनके सर पर सजा दिया था!

📗 तजल्लियाते शैखे मुस्तफा रज़ा सफह 102

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 ❐ सवाल ❐  ➻  हज़रत आप से पूछना है के मेरे घर में चीटियाँ बहुत आती है कुछ बतायें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  *الحمداللہ با ھیا شراھا ساریکم باھیا شراھا* 
एक साफ सुथरा बरतन लेकर उसमें ये दुआ लिखिऐ और पानी से धोकर उसे घर में छिड़क दीजिये या फिर जहाँ पर चीटियाँ ज़्यादा रहती हों वहाँ पर हींग रख दीजिये चीटियाँ भाग जायेंगी! इन्शा अल्लाह


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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर कोई ह़राम काम करता हो और वो कुछ खाने पीने को दे तो किया खा सकते हैं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  ह़राम पैसा कहीं भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता ना दीनी काम में और ना दुनियावी काम में उसका सिर्फ एक ही तरीक़ा है के उसको बगैर सवाब की नियत से फ़क़ीरों को देदें, अगर उसपर सवाब की नियत रखेगा तो ह़राम बल्के बाज़ उल्मा ने कुफ्र तक लिखा है हां अगर यूं किया के सामान वगैरह उधार लिया  ओर बाद में हराम पैसा उस से फातिहा वगैरह करायीं तो ये फातिहा का खाना जाइज़ नही है अगरचे उधार लेके फातिहा दिलवाई ओर लोगो को ये अंदेशा हो कि हराम पैसा ही देगा तो ऐसा के फातिहा खाने से बचना चाहिए|

📗अहकामे शरीयत हिस्सा 1 सफह 109

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 ❐ सवाल ❐  ➻  औरत अगर बगैर किसी उज्र के बैठकर नमाज़ पढ़े तो क्या नमाज़ हो जायेगी!

 ❐ जवाब ❐  ➻  फर्ज़ वाजिब और सुन्नते मुअक़्क़िदा में क़याम यानि खड़े होना फर्ज़ है और ये फर्ज़ दोनों पर यानि मर्द व औरत दोनों पर है तो अगर बगैर उज्र के औरत बैठकर नमाज़ पढ़ेगी तो फर्ज़ का तर्क हुआ नमाज़ हरगिज़ नहीं होगी जितनी नमाज़ें पढ़ी वो सब फिर से पढ़े और आइंदा के लिए तौबा करे और खड़े होकर नमाज़ पढ़ें हां नफ्ल बगैर उज्र के भी बैठकर हो जाती है!

📘 मोमिन की नमाज़ सफह 450

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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर मदर्से से फारिग तलबा ने मुफ्ती का कोर्स किया सनद लेली मगर उनको इल्म इतना नहीं है तो क्या उन्हें मुफ्ती समझा जाये!

 ❐ जवाब ❐  ➻  आलिम होने के लिए सनद यानि डिग्री की ज़रूरत नहीं होती बल्के इल्म की ज़रूरत होती है डिग्री तो फर्ज़ी भी मिल जाती है लिहाज़ा ऐसे शख्स को चाहिए के जिस मसअले पर उनकी पकड़ मज़बूत हो उसी को अपनी तकरीर व बयान का उनवान बनाए और जिस में कमज़ोर हो उसे हाथ भी ना लगाए के मेरे आला ह़ज़रत ऐसे मुफ्ती को फतवा देना और ऐसे आलिम को वअज़ कहना हराम फरमाते है।

📗 अहकामे शरीयत हिस्सा 2 सफह 231

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 ❐ सवाल ❐  ➻  नमाज़ के लिए सोते हुए आदमी को जगा सकते हैं या नहीं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  बिलकुल जगा सकते हैं बल्के जगाना ज़रुरी है!

📗 अहकामे शरीयत हिस्सा 2 सफह 169

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 ❐ सवाल ❐  ➻ सुबह सादिक़ के तुलू ए आफताब से कितनी देर बाद नमाज़ कज़ा पढ़ने का हुक्म है जवाब इनायत करें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  सुबह सादिक़ के तुलू ए आफ़ताब के बाद कम से कम 20 मिनिट का इंतिज़ार वाजिब है यानि के 20 मिनट बाद पढ़ें!
ओर ग़ुरूब ए आफताब से पहले 20 मिनट का टाइम मकरूह टाइम होता है

📗 अहकामे शरीयत हिस्सा 2 सफह 170

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 ❐ सवाल ❐  ➻  हज़रत आप से एक बात मालूम करनी है के क्या परियां भी होती हैं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  बिलकुल होती हैं बल्के उसमें भी काफिर और मुसलमान दोनों हैं!

📗 अलमलफूज़ हिस्सा 1 सफह 10

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या शौहर अपनी बीवी के मरने के बाद उसको कन्धा दे सकता है या नहीं, हवाले के साथ जवाब इनायत करें महरबानी होगी!

 ❐ जवाब ❐  ➻  ये आवाम में फैली हुई जहालत के सिवा और कुछ नहीं है शौहर कन्धा भी दे सकता है और उसे देख भी सकता है क़बर में उतार भी सकता है हां मना है तो बस इतना के बगैर कपडों के हायल हुए उस के जिसम को छू नहीं सकता ओर नही ग़ुस्ल दे सकता है।

📕 फतावा रज़वियह जिल्द 4 सफह 61

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 ❐ सवाल ❐  ➻  खेल की कितनी किस्में जाइज़ है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  शरीयत ने सिर्फ 3 किस्म के खेल को जाइज़ रखा है पहला घुड़सवारी जिसमें बाइक और फोर विलर वगैरह शामिल है, लेकिन आवारागर्दी बेवजह किसकी को परेशान या फैशन दिखावे के लिए नाहो। दुसरा तीर अन्दाज़ी इसमें बन्दूक चलाना तलवार चलाना शामिल है और तीसरा शौहर का अपनी बीवी से हर तरह का हंसी मज़ाक करना जाइज़ है बस शरीयत के दायरे में हो, इसके अलावा जितने भी खेल हैं सब बेकार है वक़्त की बरबादी है हरगिज़ जाइज़ नहीं।

📕 बहारे शरीअत हिस्सा 16 सफह 131

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 ❐ सवाल ❐  ➻  मेरे शौहर खुद भी किसी से मुरीद नहीं हैं और मुझे भी मुरीद होने की इजाज़त नहीं देते, मैं क्या करुं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  समझाइये अगर समझ में आजाए तो ठीक वरना शरीयत का हुक्म मानने के लिए किसी की इजाज़त की ज़रूरत नहीं होती, आप बगैर इजाज़त के भी मुरीद हो सकती हैं बस पीर बा शरअ होना चाहिए!

📗 अहकामे शरीयत हिस्सा 2 सफह 164

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 ❐ सवाल ❐  ➻  दुआ तावीज़ के ज़रिए औरत का अपने शौहर को अपने काबू में रखना कैसा है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  नाजाइज़ो हराम है, मर्द अफसर है ना के औरत, ऐसी औरत लानती है जहन्नम की हक़दार है, फौरन तौबा करे और अपने शौहर की इताअत करे!

📒 सूरह निसा

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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर नमाज़ में सजदे का ख्याल नहीं रहा के एक किया है या दो तो क्या करें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  अगर एक याद है तो फिर से दूसरा कर लें अब अगर 2 कर चुका था और ये तीसरा था तो आखिर में सजदा सहव कर लें, 3 सजदा करने की वजह से वाजिब तर्क हुआ सजदा सहव से नमाज़ हो जायेगी, लेकिन अगर 1 ही सजदा किया था और 2 खयाल करके सजदा नहीं किया तो चूंकि हर रकअत में 2 सजदे फर्ज़ हैं लिहाज़ा नमाज़ ही नहीं हुई, दोबारा पढ़नी होगी यूंही अगर 3 सजदे किए मगर सजदा सहव नहीं किया तब भी नमाज़ को दोहराना होगा!

📘 फतावा रज़वियह जिल्द 3 सफह 646 

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या जानवरों में भी फा़सिक होते हैं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  बिलकुल होते हैं, कव्वा, चील, चूहा, बिच्छू, कटखना कुत्ता, छिपकली, और भी कुछ जानवर हैं जिनको फा़सिक़ कहा गया है!

📓 मुस्लिम शरीफ जिल्द 1 सफह 318

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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर किसी के यहाँ ह़राम काम होता हो और कोई ज़रिया रोज़ी का हलाल का ना हो तो क्या उनके यहाँ ग्यारहवीं या फातिहा या किसी दावत में जा सकते हैं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  ऐसों के यहाँ जाना ही जाइज़ नहीं है खाना तो दूर की बात है!

📗 अहकामे शरीयत हिस्सा 2, सफह 145

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 ❐ सवाल ❐  ➻  मैं जब भी अपने मुरशिद की बारगाह में जाता हुं तो कोई भी बैयत होता रहता है तो मैं फिर से बैयत कर लेता हूँ, मेरे कुछ दोस्त इसे गलत बता रहे हैं क्या ऐसा नहीं करना चाहिए!

 ❐ जवाब ❐  ➻  वो गलत बता रहे हैं बेशक तजदीदे बैयत करना जाइज़ है खुद हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक ही जल्से में हज़रते सल्मा बिन उकू से 3 बार बैयत ली!

📒 अलमलफूज़ हिस्सा 2,सफह 42

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 ❐ सवाल ❐  ➻  मेरे एक पहचान वाले हैं जिनहोंनें अपनी सगी खाला से निकाह कर लिया है और उनका कहना है के उन्होंने उलमा से फतवा लिया है के खाला से निकाह हो सकता है क्या ये सही है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरआन में इरशाद फरमाता है के, हराम हुई तुम पर तुम्हारी मांऐं तुम्हारी बेटियां तुम्हारी बहनें और फूफियां और खालायें और भतीजियां और भांजियां और तुम्हारी वो माँऐं जिनहोंनें तुम्हें दूध पिलाया और दूध के रिशतों की बहनें और तुम्हारी औरतों की माँऐं, इन सबका हासिल ये है के सगी खाला से निकाह करना माज़अल्लाह ऐसा ही है जैसे अपनी माँ से निकाह करना, ज़िना खालिस हराम हराम हराम है जिसने किया जिसने कराया जो गवाह बनें वो सब अगर जानते थे के लड़के का अपनी सगी खाला से निकाह हो रहा है तो सब काफिर हुए जिसने फतवा दिया वो हराम खोर भी काफिर हुआ, सब पर तौबा फर्ज़ है सबकी बीवियां उनके निकाह से बाहर हो गई सारी नमाज़ें बरबाद हो गई रोज़े हज ज़कात सब खत्म, फिर से पूरी ज़िन्दगी भर के अमल करने होंगे।

📒 सूरह निसा आयत,23,
📘 बहारे शरीअत हिस्सा 7 सफह 19

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या बगैर खतना कराये बच्चे का अक़ीक़ा नहीं कर सकते और उसके गोश्त का क्या हुक्म हैं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  अक़ीक़ा और खतना दोनों अलग अलग चीज़ें हैं और उनका एक दूसरे से कोई तअल्लुक़ नहीं, खतना करने की मुद्दत उलमा नें 7 साल से 12 साल तक लिखा है मगर इस से पहले ही किसी ने करा लिया तो अच्छा किया मगर 12 साल से देर ना किया जाऐ, और अक़ीक़ा के लिए 7वें  दिन को ही मुस्तहब लिखा गया मगर इसमें भी अगर ताखीर ( देरी )हुई तो कभी भी करा सकते हैं अक़ीक़ा हो जायेगा, यूंही बगैर खतना के भी अक़ीक़ा हो जायेगा और अवाम में जो ये मशहूर है के उसका गोश्त उसके माँ बाप दादा दादी नाना नानी नहीं खा सकते ये महज़ गलत है इसकी कोई अस्ल नहीं, यानि अक़ीक़ा का गोश्त माँ बाप दादा दादी नाना नानी सब खा सकते हैं।

📘 बहारे शरीअत हिस्सा 15 सफह 151

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क़ब्र में क्या सवाल होंगे और क़ब्र और जहन्नम के अज़ाब में क्या फर्क़ है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  क़ब्र में तीन सवाल होंगे!

1 मन रब्बुका _ तेरा रब कौन है,
2 मा दीनुका- तेरा दीन किया है,
3 मा तक़ुलू फि हाजर्रजुल - इस मर्दे मोमिन के बारे में तेरा क्या अक़ीदा है,
इनका जवाब होगा,
1 रब्बियल्लाह- मेरा रब अल्लाह है,
2 दीनियल इस्लाम- दीन मेरा इस्लाम है,
3 हाज़ा नबिय्यू सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम- ये हमारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हैं,
क़ब्र का अज़ाब एक मुसलमान पर सिर्फ जुमां आने तक ही रहता है अगर चे वो कितना भी गुनहगार रहा हो उसके बाद अज़ाब उठा लिया जाता है बाकी अज़ाब के लिए जहन्नम में हाज़री होगी, मगर इतना समझ लीजिये के एक मुसलमान कितना भी गुनहगार हो अगर ईमान पर खातिमा हुआ तो हमेशा जहन्नम में नहीं रहेगा बल्के अपनी सज़ा पूरी होने से पहले ही हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शफाअत से और खुदा की रहमत से वो जन्नतुल फिरदौस में दाखिल होगा, इन्शा अल्लाहुर्रहमान!

📕 अनवारुल हदीस सफह 123
📗 शरहुस्सुदूर सफह 164

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 ❐ सवाल ❐  ➻  अक़ीक़ा किस उम्र में करना चाहिए और उसके गोश्त से ग्यारहवीं शरीफ वगैरह कर सकते हैं और क्या वो गोश्त माँ बाप नहीं खा सकते है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  अक़ीक़ा सातवें दिन करना सुन्नत है बाद में भी हो सकता है, और उसका गोश्त माँ बाप दादा दादी नाना नानी सब खा सकते हैं और ग्यारहवीं भी हो सकती है!

📙 बहारे शरीअत हिस्सा 15 सफह 154

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 ❐ सवाल ❐  ➻  मज़ार को गुस्ल देना कहाँ से साबित है जब्के आला ह़ज़रत ने मज़ार को छूने से भी मना फरमाया है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  सरकार आलाहज़रत ने फरमाया के बेहतर है के ना छूऐं लेकिन अगर कोई छू लेता है या मज़ार को चूम भी लेता है तो इसमें कोई हरज नही इसे हराम नहीं फरमां दिया, और गुस्ले मज़ार बुज़ूर्गाने दीन के मामूल से रहा है और चूंके इस पानी को एक वली से निस्बत हो गई तो वो तबर्रूक की हैसियत रखता है, अब जिसको नाजाइज़ लगता है वो नाजाइज़ होने की दलील पेश करे!

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या बर्थ डे में केक काटना सही है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  जिस तरीक़े से ईसाई अपने बर्थ डे मनाते हैं उस तरीक़े से मनाना यक़ीनन नाजाइज़ो हराम है, रिज़्क़ की बेहुर्मति नही होनी चाहिए  हाँ यूंही महमानों को खिलाने के वास्ते केक आया हो तो दुरूद फातिहा ज़िक्रो अज़कार करके केक काट कर मेहमानों को दिया जाए ये जाइज़ है!

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या माँ बाप से पहले औलाद हज या उमराम नहीं कर सकता!

 ❐ जवाब ❐  ➻  ये अवाम की गलत फहमी है जो बालिग हुआ और साहिबे हैसियत को पहुँच गया उसपर हज फर्ज़ हो गया अगरचे उसके बाप ने हज किया हो या न किया हो! माँ बाप को भी  करवाए।

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या जुमुआ की मुबारक बाद दे सकते हैं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  जुमुआ सय्यदुल अय्याम (दिनों का सरदार) है मोमिन के लिए हफ्ते की ईद है उसकी मुबारक बाद देना जाइज़ है!

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 ❐ सवाल ❐  ➻  इमाम खुले आम कोई गुनाह करता है तो क्या उसके पीछे उसका तज़किरा करना गीबत होगी!

 ❐ जवाब ❐  ➻  जो गुनाह छिपकर किये जाते हैं उनका किसी के सामने ज़ाहिर करना यक़ीनन गीबत है मगर जिसको खुद ही अपनी इज़्ज़त वो वक़ार की परवाह ना हो तो ऐसे की बुराई बयान करना हरगिज़ गीबत नहीं, ऐसी हालत में पहले इमाम को तम्बीह की जाऐ अगर वो मान जाऐ तो ठीक वरना बिला शुबा मुक़तदियों को उसके पीछे नमाज़ पढ़ने से रोका जाए!

 📕 बहारे शरीअत हिस्सा 16 सफह 151

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 ❐ सवाल ❐  ➻  किसी मुसलमान की लाश को अगर हिन्दुओं नें लावारिस समझ कर शमशान घाट में दफना दिया बाद को पता चला तो क्या किया जाऐ!

 ❐ जवाब ❐  ➻  अगर 3 दिन नहीं गुज़रे हैं तो नमाज़े जनाज़ा जाकर पढ़ दिया जाए, लाश निकालने की इजाज़त नहीं हां अगर खुद हिन्दू अब वहां ना रखना चाहें तो निकालकर मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ्न करें!

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 ❐ सवाल ❐  ➻  दरगाह पर हाज़िरी देने का सबसे बेहतरीन तरीक़ा क्या है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  आला हज़रत अज़ीमुल बरकत फरमाते हैं के किसी भी वली के आस्ताने पर पांव (पैर ) की जानिब से दाखिल हों और 4 हाथ पीछे खड़े हों ना तो मज़ार को छूऐं और ना ही चूमें के इसी में ज़्यादा अदब है, फिर हाथ बांधकर जो कुछ सही से पढ़ सकता हो पढ़ें और उनकी बारगाह में नज़र करें और वहाँ दुआ मांगने के 3 तरीके हैं पहले तो ये के रब की बारगाह में अर्ज़ किया जाऐ के इस वली के सदक़े में मेरी दुआ क़ुबूल फरमां, दूसरा ये के वली से इस्तिमदाद किया जाऐ के ऐ वली अल्लाह रब की बारगाह में मेरी सिफारिश फरमायें, और तीसरा ये है के उन्हीं की बारगाह में  इस्तिगासा किया जाऐ के मेरी वो आरज़ू पूरी फरमाई जाऐ और यही ज़्यादा बेहतर है के बेशक अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने अपने वलियों को वो इख्तियार दे रखा है के जिसको जो चाहें अता करें!

📗 अनवारुल हदीस

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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर नमाज़ में सूरह फतिहा (अल्हम्दुलिल्लाह) के बाद सूरह मिलाना भूल गया रुकू में याद आया तो क्या करें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  रुकू से वापस क़याम में लौटे सूरह पढ़ कर फिर से रुकू करे और आखिर में सजदा सहू कर ले!

📕 फतावा रज़वियह जिल्द 3 सफह 639


*📬 पोस्ट जारी रहेगी इन्शा अल्लाह...✍🏻*

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या घर के दरवाज़े के ऊपर तोगरा में क़ुरआन की आयत लिखी हो तो लगा सकते हैं, हमारे इमाम साहब मना करते हैं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  बिलकुल लगा सकते हैं ये लगाना महज़ तबर्रुक के लिए होता है, मना करने की वजह अगर ये है के क़ुरआन की आयत से पानी होकर नाली में बहेगा तो ये फिज़ूल है क्योंके घर के अन्दर लगाते हैं दूसरी बात  हदीसे पाक से साबित है के फिरऔन ने अपने महल के सबसे ऊपरी हिस्से पर बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम लिखवाया हुआ था जिसकी बरकत से उसका महल हलाक़त से बचता रहा, क्या बिस्मिल्लाह शरीफ क़ुरआन की आयत नहीं है, और अगर इस वजह से मना करते हैं के क़ुरआन पर किसी गैर मुस्लिम की नज़र ना पड़े तो ये भी कोई  माएने नहीं रखता के अकसरो बेशतर हमारे घरों में कभी ना कभी कोई गैर मुस्लिम आ ही जाता है अगरचे किसी भी काम से आया हो, तो अगर घर के अन्दर आया तो मुसलमानों के घरों में अक्सर तोगरे टंगे होते हैं जिनमें क़ुरआन की आयात लिखी होती हैं तो इसपर नज़र तो पड़ेगी ही और घर के अन्दर तोगरा लगाना जिस पर क़ुरआन की आयत लिखी हो आला हज़रत नें जाइज़ व मुस्तहसन फरमाया है!

📔 तफसीरे कबीर जिल्द 1 सफह 152
📕 फतावा रज़वियह जिल्द 9 सफह 522

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या नमाज़ में आंखें बंद कर सकते हैं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  मकरूह है लेकिन अगर आंखें बंद करने से नमाज़ में ज़्यादा दिल लगता है तो बेहतर है के बंद कर के पढ़े!

📕 बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफह 145

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 ❐ सवाल ❐  ➻  औरत का जमाअत से नमाज़ पढ़ना कैसा है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  औरत का जमाअत से नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं है एक सूरत है के अगर मस्जिद पसछिम की जानिब है और इसका मकान मस्जिद के ऐन पीछे है और इमाम की आवाज़ घर में आती है तो वहाँ से इक़तिदा कर सकती है!

📕 दुर्रे मुख्तार जिल्द 1 सफह 380

 ❐ सवाल ❐  ➻  किसी के इंतिक़ाल के बाद उसके कपड़ों का क्या किया जाऐ!

 ❐ जवाब ❐  ➻  घर वाले अगर पहनना चाहें पहन सकते हैं वरना किसी गरीब को दे दें मय्यत की तरफ से सदक़ऐ जारिया होगा सवाब पहुंचता रहेगा!

📓 अबू दाऊद जिल्द 1 सफह 166

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 ❐ सवाल ❐  ➻  मुसाफा करने के बाद कुछ लोग हाथ को सीने से लगाते हैं इसका क्या हुक्म है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  दोनों हाथों से मुसाफा करना सुन्नत है हाथों को सीने से लगाने का तो ज़िक्र नहीं है लेकिन कोई ऐसा करता है तो ये कोई नजाइज़ो हराम भी नहीं!

📔 बुखारी शरीफ जिल्द 2 सफह 926

 ❐ सवाल ❐  ➻  इमाम अगर मुक़तदियों से आगे कुछ ऊपर खड़ा हो तो क्या हुक्म है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  इमाम अगर मुक़तदियों से 6 इंच ऊंची जगह पर खड़ा होता है तो ऐसा करना मकरूहे तह़रीमी है नमाज़ वाजिबुल इयादा होगी!

📘 फतावा रज़वियह जिल्द 3 सफह 415

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 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर किसी को दुरुदे इब्राहीम या उसके बाद की दुआ याद ना हो तो क्या करें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  याद करें सुन्नत है जबतक याद नहीं होता कोई सा दुरुद पढ़ लें नमाज़ हो जायेगी!

📕 बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफह 76

 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या काला कपड़ा पहनना जाइज़ है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  बिला शुबा जाइज़ है मगर सिर्फ कमीज़ यानी कुर्ता वगैरह लेकिन पाजामा नहीं पहनना चाहिए, और 1 मुहर्रम से 10 रोज़ तक कोई काला कपड़ा ना पहना जाये मुहर्रम में काले कपड़े पहनना शियाओ का तारिका है!

📗 अलमलफूज़ हिस्सा 4 सफह 40

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 ❐ सवाल ❐  ➻  मुस्तफा जाने रह़मत पे लाखों सलाम,जब एक बार पढ़ा तो लाखों सलाम कैसे पहुंचेगा!

 ❐ जवाब ❐  ➻  अगर ये एतराज़ है तो दर अस्ल ये एतराज़ खुदा पर है, इसको यूं समझये के मैंने आप से सलाम किया अस्सलामु अलैकुम यानि के सलामती हो तुम पर, अब ये बतायें मैंने कह तो दिया मगर ये सलामती आप पर नाज़िल कैसे होगी और कौन नाज़िल फरमायेगा,ज़ाहिर सी बात है अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ही सलामती फरमाने वाला है उसी के फज़्ल से आप सलामत रहेंगे, तो हमारा नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में लाखों सलाम भेजना या करोड़ों दुरुद भेजना दर अस्ल रब की बारगाह में दुआ है के मौला मेरे नबी की बारगाह में मेरा लाखों सलाम पहुंचा, तो अब बताइये रब पहुंचा सकता है या नहीं, अगर हाँ तो एतराज़ दफा यानि के एतराज़ खत्म हो गया और अगर नहीं तो फिर आपको अल्लाह की क़ुदरत पर भरोसा ही नहीं है आपका ईमान खतरे में है जनाब, क्योंके एक नहीं हज़ारों ऐसी रिवायतें पाई जाती है के एक बार पढ़ो तो हज़ारों लाखों का सवाब मिलता है! ....आगे पढ़ें!

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 ❐ सवाल ❐  ➻  मुस्तफा जाने रह़मत पे लाखों सलाम,जब एक बार पढ़ा तो लाखों सलाम कैसे पहुंचेगा!

 ❐ जवाब ❐  ➻  अगर ये एतराज़ है तो दर अस्ल ये एतराज़ खुदा पर है, इसको यूं समझये के मैंने आप से सलाम किया अस्सलामु अलैकुम यानि के सलामती हो तुम पर, अब ये बतायें मैंने कह तो दिया मगर ये सलामती आप पर नाज़िल कैसे होगी और कौन नाज़िल फरमायेगा,ज़ाहिर सी बात है अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ही सलामती फरमाने वाला है उसी के फज़्ल से आप सलामत रहेंगे, तो हमारा नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में लाखों सलाम भेजना या करोड़ों दुरुद भेजना दर अस्ल रब की बारगाह में दुआ है के मौला मेरे नबी की बारगाह में मेरा लाखों सलाम पहुंचा, तो अब बताइये रब पहुंचा सकता है या नहीं, अगर हाँ तो एतराज़ दफा यानि के एतराज़ खत्म हो गया और अगर नहीं तो फिर आपको अल्लाह की क़ुदरत पर भरोसा ही नहीं है आपका ईमान खतरे में है जनाब, क्योंके एक नहीं हज़ारों ऐसी रिवायतें पाई जाती है के एक बार पढ़ो तो हज़ारों लाखों का सवाब मिलता है! ....आगे पढ़ें!

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 ❐ सवाल ❐  ➻  मुस्तफा जाने रह़मत पे लाखों सलाम,जब एक बार पढ़ा तो लाखों सलाम कैसे पहुंचेगा!

 ❐ जवाब ❐  ➻  मसलन *पहली मिसाल* अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त फरमाता है के  शबे क़द्र 1000 महीनों से बेहतर है!

📔 पारा 30 सूरह क़द्र 

रात तो एक ही है लेकिन हज़ार महीनों से बेहतर कैसे हो गई, है कोई जवाब!

*दूसरी मिसाल* हदीस शरीफ़ में है रजब के एक रोज़े पर एक साल के रोज़े का सवाब

📗 मा सबत मिन सुन्नाह सफह 126

एक रोज़े पर एक साल के रोजों का सवाब ये है रब का फ़ज़ल अपने बंदों पर तो फिर एक सलाम पर लाखों सलाम का सवाब क्यों नहीं हो सकता! ....आगे पढ़ें!

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 ❐ सवाल ❐  ➻  मुस्तफा जाने रह़मत पे लाखों सलाम,जब एक बार पढ़ा तो लाखों सलाम कैसे पहुंचेगा!

 ❐ जवाब ❐  ➻  मसलन *तीसरी मिसाल* हदीस शरीफ़ में है शबे बरात में 2 रकअत नफ्ल पढ़ने में 400 साल की इबादत का सवाब!

📗 नुज़हतुल मजालिस जिल्द 1 सफह 132

*चौथी मिसाल* हदीस शरीफ़ में है जो मक्का शरीफ में 1 रमज़ान पाये तो 1 लाख रमज़ान का सवाब!

📓 बहारे शरीअत हिस्सा 5 सफह 96

कुछ दुरुदे पाक हैं किसी को 1 बार पढ़ने पर 1 लाख दुरुद पढ़ने का सवाब तो किसी पर 6 लाख दुरुद का सवाब अब इन सबको क्या कहेंगे के नहीं ऐसा नहीं हो सकता एक बार पढ़ने पर इतना इतना सवाब नहीं मिल सकता, अब किसी को अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की क़ुदरत पर भरोसा हो या ना हो मगर हमें पूरा यक़ीन है कि जब हम 1 मरतबा मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम पढ़ते हैं तो बेशक हमारा परवर दिगार हमारा लाखों सलाम हमारे नबी की बारगाह में पहुंचा देता है!

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 ❐ सवाल ❐  ➻  बुज़ुर्गाने दीन के नाम से फातिहा कर के खुद ही खा लेना कैसा है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  सदक़ऐ नाफिला खुद खा सकते हैं जाइज़ है और वैसे भी बुज़ुर्गाने दीन की बारगाह में किया गया नज़र तबर्रुक है उसका खाना फैज़ है, अमीर हो या ग़रीब सब लोग खा सकते हैं!

📗 सुन्नी बहिश्ती ज़ेवर,
📕 फतावा रज़वियह जिल्द 1 सफह 78

 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या दाढ़ी मुंडा अज़ान दे सकता है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  कोई मौजूद नहीं है तो दे सकता है मगर दाढ़ी वाला आगया तो बेहतर है के इयादा किया जाऐ, यानी दोबारा पढ़ी जाए!

📓 बहारे शरीअत हिस्सा 3 सफह 33

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या घर के दरवाज़े के ऊपर तोगरा में क़ुरआन की आयत लिखी हो तो लगा सकते हैं, हमारे इमाम साहब मना करते हैं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  बिलकुल लगा सकते हैं ये लगाना महज़ तबर्रुक के लिए होता है, मना करने की वजह अगर ये है के क़ुरआन की आयत से पानी होकर नाली में बहेगा तो ये फिज़ूल है क्योंके घर के अन्दर लगाते हैं दूसरी बात  हदीसे पाक से साबित है के फिरऔन ने अपने महल के सबसे ऊपरी हिस्से पर बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम लिखवाया हुआ था जिसकी बरकत से उसका महल हलाक़त से बचता रहा, क्या बिस्मिल्लाह शरीफ क़ुरआन की आयत नहीं है, और अगर इस वजह से मना करते हैं के क़ुरआन पर किसी गैर मुस्लिम की नज़र ना पड़े तो ये भी कोई  माएने नहीं रखता के अकसरो बेशतर हमारे घरों में कभी ना कभी कोई गैर मुस्लिम आ ही जाता है अगरचे किसी भी काम से आया हो, तो अगर घर के अन्दर आया तो मुसलमानों के घरों में अक्सर तोगरे टंगे होते हैं जिनमें क़ुरआन की आयात लिखी होती हैं तो इसपर नज़र तो पड़ेगी ही और घर के अन्दर तोगरा लगाना जिस पर क़ुरआन की आयत लिखी हो आला हज़रत नें जाइज़ व मुस्तहसन फरमाया है!

📕 तफसीरे कबीर जिल्द 1 सफह 152
📔 फतावा रज़वियह जिल्द 9 सफह 522


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 ❐ सवाल ❐  ➻  लड़का और लड़की के बीच अगर नाजाइज़ तअल्लूक़ात हो जाए तो उसको खत्म करने के लिए कोई वज़ीफा बतायें!

 ❐ जवाब ❐  ➻  हर नमाज़ के बाद 125 बार *या सलामु* *या हादी* पढ़कर दुआ करें अव्वल आखिर 9/9 बार दुरुद शरीफ ज़रुर पढ़ें किसी भी नाजाइज़ तअल्लुक़ात को खत्म करने के लिए पढ़ा जा सकता है!

📗 रुहानी ईलाज सफह 204

 ❐ सवाल ❐  ➻  इमाम के सूरह फातिहा खत्म करने पर कुछ लोग बड़ी ज़ोर से आमीन कहते हैं इसका क्या हुक्म है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  खिलाफे सुन्नत है 26 हदीसे पाक इस मस्अले पर मौजूद हैं के इमाम हो या मुक़तदी अकेले पढ़ता हो या जमाअत से ज़हरी नमाज़ हो या सिर्री मगर आमीन आहिस्ता ही कही जायेगी!

📗 अनवारुल हदीस!
📕 जाअल हक़ जिल्द 2 सफह 42


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 ❐ सवाल ❐  ➻  कुछ लोग कहते है आयते सजदा अगर मोबाईल में किसी ने भेज दी और उसे देखा मगर पढ़ा नहीं तो क्या तब भी सजदा करना पड़ेगा,

 ❐ जवाब ❐  ➻  सिर्फ देखने से अगर चे क़ुरआन में ही हो सजदा वाजिब नहीं अगर वो आयते रुकु पढ़ा तो करना बेहतर हैं!

📒 बहारे शरीअत हिस्सा 4 सफह 67

 ❐ सवाल ❐  ➻  अगर मुक़तदी की कुछ रकअत नमाज़ छूट चुकी हो और भूले से वो इमाम के साथ सलाम फेर दे तो क्या फौरन वहीं से नमाज़ शुरू कर सकता है या दोबारा पढ़नी पड़ेगी!

 ❐ जवाब ❐  ➻   ऐसी सूरत में 3 बातें होती है पहली ये के अगर ये सोचकर सलाम फेरा के मुझे भी फेरना चाहिए जब तो फौरन ही नमाज़ फासिद हो गई सिरे से पढ़े और अगर भूल से सलाम फेर दिया तो अगर इमाम के साथ फौरन ही फेरा और याद आते ही वापस लौट आया तो कोई हरज नहीं और अगर इमाम के सलाम फेरने के कुछ सिकेन्ड बाद सलाम फेरा और याद आया तो वापस लौट आये मगर अब आखिर में सजदा सहू करें!

📕 बहारे शरीअत हिस्सा 1 सफह 138

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   *​🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*

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          *पैगाम  ए  उम्मते  मुहम्मदी  ﷺ*


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 ❐ सवाल ❐  ➻  मैं एक स्टूडेंट हूं और मैंने अभी हाल ही में दाढ़ी रखी है मगर कुछ लोग हैं जो मेरा मज़ाक उड़ाते हैं और वो मुसलमान हैं तो मैं क्या करुं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  माशाअल्लाह आपने तारीफ के लायक़ काम किया है इस दौर में सुन्नत पर अमल करना किसी जिहाद से कम नहीं है, हदीसे पाक में आता है के हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं के जिसने मेरी सुन्नत को ज़िन्दा किया तो उसको 100 शहीदों का सवाब मिलेगा और एक शहीद को कितना सवाब मिलता है ये अल्लाह और उसका रसूल ही जाने, आप इस पर क़ायम रहें और लोगों की फिक्र ना करें वैसे भी उल्मा ए किराम फरमाते हैं के जिसने सन्नतों की फ़ज़ीलत जानते हुए भी अगर किसी सुन्नत का मज़ाक उड़ाया तो वो काफिर है, तो एक काफिर कब चाहेगा की आप इस्लाम पर अमल करें लिहाज़ा वसवसों को अपने दिल में आने ही ना दें!

📒 इब्ने माजा शरीफ जिल्द 3 सफह 360
📕 किताबुल कबाइर सफह 260

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या क़ब्र पर पानी भी छिड़का जाता है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  बिलकुल छिड़का जाता है और रिवायत में आता है के हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साहबज़ादे हज़रते इब्राहिम की क़ब्र पर पानी छिड़का गया!

📒 मदारिजुन नुबूवत जिल्द 2 सफह 775

 ❐ सवाल ❐  ➻   औरतों का किसी भी मज़ार पर जाना नाजाइज़ कहा जाता है तो हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की कब्रे अनवर पर जाना कैसा है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  रौज़ा ए अनवर की ह़ाज़िरी के बारे में उल्मा ए किराम सिर्फ सुन्नत ही नहीं बल्के वाजिब तक फरमाते हैं कियोंके क़ुरआन का हुक्म है के : ऐ ईमान वालो जब तुम अपनी जानों पर ज़ुल्म कर लो तो नबी अलैहिस्सलाम की बारगाह में हाज़िर हो जाओ!

ये हुक्म ईमान वालों को हुआ ज़ाहिर सी बात है ईमान वाले मर्द हों या औरत दोनों का हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रौज़े की ज़्यारत करना उस मनाई में शामिल नहीं, इसलिए हुज़ूर अलैहिस्सलाम के रोज़ा ए अनवर की ज़्यारत औरतों के लिए जाइज़ है उनके अलावा बाकी किसी का भी मज़ार हो उसपर औरतों को इजाज़त नहीं!

📕 अलमलफूज़ हिस्सा 2, सफह 107

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क़ुरआने पाक सबक़ के दौरान अगर तालिबे इल्म भूल जाये तो क़लम से निशान या तारीख डाल सकते हैं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  क़ुरआने पाक में कुछ भी लिखना चाहे तारीख हो या निशान हो क़ुरआने पाक के अदब के खिलाफ है बेहतर है के क़लम से कुछ भी ना लिखें हां एक कागज़ आता है उसे छोटा करके पानी से हल्का सा गिला के इससे चिपक जायेगा निशान लगा दें और बाद में उसे छुड़ा दे इसमें कोई हरज नहीं और ऐसा कर सकते हैं!
वैसे आजकल सभी क़ुरआन में धागा जैसा आता है वो ना हो तब कोई साफ जिसपे कुछ भी लिखा ना हो वो पेपर रखले सबसे बेहतर है।

 ❐ सवाल ❐  ➻  कुछ मर्द व औरतें नाखून पालिश लगाती हैं इसका क्या हुक्म है!

 ❐ जवाब ❐  ➻  अक्सर औरतें अपने हाथ या पैरों में नाखून पर पालिश लगाती हैं नाखून पालिश में अलकोहल होता है जो के शरीयत में हराम है मर्दों के लिए तो बहुत ही ज़्यादा सख्त हराम व गुनाह है के औरतों से मुशाबहत पैदा करना है नाखून पालिश की वजह से गुस्ल व वज़ू करते वक़्त पानी नाखून पर नहीं लगता पालिश पर लगकर फिसल जाता है जिसकी वजह से गुस्ल या वज़ू नहीं होता जब गुस्ल ही नहीं हुआ तो नापाक ही रहा और नापाकी की ह़ालत में नमाज़ पढ़ी तो नमाज़ ना होगी और जानबूझकर नापाक रहना सख्त गुनाह है अल्लाह ना करे अगर इस ह़ालत में मौत आगायी तो इसका वबाल अलग और नापाकी में अक्सर शरीर जिन्नात का भी असर हो जाता है इसलिए औरतों को चाहिए के नाखून पालिश ना लगायें!

📗 क़रीना ए ज़िन्दगी सफह 137

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 ❐ सवाल ❐  ➻  आजकल ज़्यादा तर लोगों की दुआ क़ुबूल नहीं होती इसकी वजह क्या!

 ❐ जवाब ❐  ➻  ह़दीसे पाक में आता है के जिसके पेट में ह़राम का एक लुक़मा चला गया उसकी 40 दिन की दुआ की मक़बूलियत खत्म हो गई, ये है पहली वजह फिर दूसरी वजह ये के मुसलमान अमल से तो कोसो दूर रहता है रमज़ान में रोज़ा रखना भारी नमाज़ पढ़ना भारी सुन्नतों की पाबंदी बहुत भारी, मगर चाहता है के जैसे ही हाथ उठाऊं फौरन सब मिल जाए, सच्चे पक्के मुसलमान बन जायें इंशाअल्लाह जो ज़रुरत होगी बिन मांगे मिलता रहेगा, ये तो हुई क़ुबूलियत की बात फिर क़ुबूलियत भी 3 तरह की होती है, पहला ये के जो मांगा वही मिल जाए ये क़ुबूलियत का सबसे अदना दरजा है और जो मांगे वो ना मिला मगर उसके बदले कोई और नेमत मिल गई, या किसी मुसीबत से छुटकारा मिल गया, ये क़ुबूलियत का बीच का दरजा है और सबसे आला दरजा ये है के जो मांगे वो मिले ही नहीं बल्के क़यामत के लिए महफूज़ हो जाये, ह़दीसे पाक में है के एक बन्दे के नामा ए आमाल में कुछ ऐसी नेकियाँ लिखी होगी जो उसने की ही नहीं थी तो अर्ज़ करेगा के मौला मैंने ये नेकियाँ तो की ही नहीं फिर ये आई कहाँ से तो मौला फरमाएगा के ये तेरी उन दुआओं का बदला है जो तूने दुनिया में की थी तो बन्दा अर्ज़ करेगा काश के दुनिया में मेरी एक भी दुआ क़ुबूल ना होती।

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 ❐ सवाल ❐  ➻  क्या काफिर भी हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के उम्मती हैं!

 ❐ जवाब ❐  ➻  उम्मत की 2 क़िस्में हैं एक है उम्मते दावत जिसमें तमाम काफिरो मुरतद सब ही दाखिल हैं और दूसरी है उम्मते इजाबत जिसमें सिर्फ मुसलमान दाखिल हैं कियोंके सिर्फ इसी नें हुज़ूर की यानी इस्लाम की दावत को क़ुबूल किया!

📗 73 में 1 सफह 12

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