✊یــــــــــــــــــــــــــــا رسول الــــلّٰــــه ﷺ ⚘
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ खुदा का करोड़ हा एहसान कि उसने हमे माहे रमज़ान जेसी अज़ीमुश्शान नेअमत से सरफ़राज़ फ़रमाया। माहे रमज़ान के फैजान के क्या कहने ! इस की हर घड़ी रहमत भरी है। इस महीने में अज़्रो षवाब बहुत ही बढ़ जाता है। नफ्ल का षवाब फ़र्ज़ के बराबर और फ़र्ज़ का षवाब 70 गुना कर दिया जाता है। बल्कि इस माह में तो रोज़ादार का सोना भी इबादत में शुमार किया जाता है। अर्श उठाने वाले फ़रिश्ते रोज़ादरो की दुआ पर आमीन कहते है और एक हदिष के मुताबिक़ "रमज़ान के रोज़ादार के लिये दरया की मछलिया इफ्तार तक दुआए मगफिरत करती रहती है।
*🔰अत्तरगिब् वत्तरहिब, 2/55, हदिष:6📕*
■➞ *इबादत का दरवाज़ा* रोज़ा बातिनी इबादत है, क्यू की हमारे बताए बगैर किसी को ये इल्म नही हो सकता है की हमारा रोज़ा है और अल्लाह बातिनी इबादत को ज़्यादा पसन्द फ़रमाता है। एक हदिष के मुताबिक़ "रोज़ा इबादत का दरवाज़ा है।" *अल जमीउस्सागिर, 146, हदिष:2415*
■➞ *नुज़ूले क़ुरआन* इस माह की एक खुसुसिय्यत ये भी है की अल्लाह ने इस में क़ुरआन नाज़िल फ़रमाया है। चुनान्चे मुक़द्दस क़ुरआन में अल्लाह का नुज़ूले क़ुरआन और माहे रमज़ान के बारे में फरमान है : रमज़ान का महीना, जिस में क़ुरआन उतरा, लोगो के लिये हिदायत और रहनुमाई और फैसले की रोशन बाते, तो तुम में जो कोई ये महीना पाए ज़रूर इसके रोज़े रखे और जो बीमार या सफर में हो, तो उतने रोज़े और दिनों में। अल्लाह तुम पर आसानी चाहता है और तुम पर दुश्वारी नही चाहता और इसलिये की तुम गिनती पूरी करो और अल्लाह की बड़ाई बोलो इस पर की उस ने तुम्हे हिदायत की और कही तुम हक़ गुज़ार हो.✍️
*🔰परह 2, अल बक़रह:185 फैजाने रमज़ान शरीफ, 3📕*
*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *सोने के दरवाज़े वाला महल* अबू सईद खुदरी رضي الله عنه से रिवायत है, हुज़ूर صلى الله عليه وسلم का फरमान है : जब माहे रमज़ान की पहली रात आती है तो आसमानों और जन्नत के दरवाज़े खोल दिये जाते है और आखिर रात तक बन्द नही होते। जो कोई बन्दा इस माहे मुबारक की किसी भी रत में नमाज़ पढ़ता है तो अल्लाह उस के हर सजदे के इवज़ उस के लिये 1500 नेकियां लिखता है और उसके लिये जन्नत में *सुर्ख याकूत का घर* बनाता है। जिस में 60,000 दरवाज़े होंगे। और हर दरवाज़े के पट सोने के बने होंगे जिन में याकुते सुर्ख जड़े होंगे।
■➞ पस जो कोई माहे रमज़ान का पहला रोज़ा रखता है तो अल्लाह महीने के आखिर दिन तक के गुनाह मुआफ़ फरमा देता है, और उस के लिये सुबह से शाम तक 70,000 फ़रिश्ते दुआए मगफिरत करते रहते है। रात और दिन में जब भी वो सजदा करता है उस के हर सजदे के इवज़ उसे जन्नत में एक एक दरख्त अता किया जाता है कि उस के साए में घोड़े सुवार 500 बरस तक चलता रहे।श.✍️
*🔰शुएबुल ईमान, 3/314, हदिष:3635📘*
*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ मीठे मीठे इस्लामी भाइयो ! खुदाए हन्नानो - मन्नान ता'अला का किस क़-दर अज़ीम एहसान है कि उस ने हमें अपने जो हबीबे जी शान , रहूमते आ-लमियान ﷺ के तुफैल ऐसा । माहे र-मज़ान अता फरमाया कि इस माहे मुकर्रम में जन्नत के तमाम | - दरवाजे खुल जाते हैं । और नेकियों का अज्र खूब खूब बढ़ जाता है ।
■➞ बयान कर्दा हदीस के मुताबिक़ र-मज़ानुल मुबारक की रातों में नमाज़ अदा करने वाले को हर एक सज्दे के बदले में | -पन्दरह सौ नेकियां अता की जाती हैं नीज़ जन्नत का । अज़ीमुश्शान महल मजीद बर आं । इस हदीसे मुबारक में - रोज़ादारों के लिये येह बिशारते उज्मा भी मौजूद है कि सुब्ह ता। - शाम सत्तर हज़ार फ़िरिश्ते उन के लिये दुआए मरिफ़रत करते । रहते हैं.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 6, 7,📕*
*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *पांच खुसूसी करम :* हज़रते सय्यदुना जाबिर बिन ) | अब्दुल्लाह رضي الله عنه से रिवायत है कि रहूमते आ -लमियान , | सुल्ताने दो जहान , शहन्शाहे कौनो मकान , हबीब रहमान ﷺ का फ़रमाने ज़ी शान है : “ मेरी उम्मत को | माहे र-मज़ान में पांच चीजें ऐसी अता की गई जो मुझ से पहले | किसी नबी को न मिली :
■➞ ( 1 ) जब र-मज़ानुल मुबारक की पहली रात होती है तो अल्लाह पाक उन की तरफ़ रहमत की नज़र , - फ़रमाता है और जिस की तरफ़ अल्लाह पाक नज़रे रहमत फ़रमाए उसे । ' कभी भी अज़ाब न देगा
■➞ ( 2 ) शाम के वक्त उन के मुंह की बू ( जो भूक , की वजह से होती है ) अल्लाह तआला के नज़दीक मुश्क की खुश्बू से भी बेहतर है।
■➞ ( 3 ) फ़िरिश्ते हर रात और दिन उन के लिये मग्फ़िरत की दुआएं करते रहते हैं
■➞ ( 4 ) अल्लाह तआला जन्नत को हुक्म फ़रमाता है , " मेरे ( नेक ) बन्दों के लिये मुजय्यन ( या'नी -आरास्ता ) हो जा अन क़रीब वोह दुन्या की मशक्क़त से मेरे घर | और करम में राहत पाएंगे
■➞ ( 5 ) जब माहे र-मज़ान की आखिरी | रात आती है तो अल्लाह पाक सब की मग्फ़िरत फ़रमा देता है ।
■➞ क़ौम में से एक शख्स ने खड़े हो कर अर्ज की , या रसूलल्लाह ﷺ क्या येह लैलतुल क़द है ? इर्शाद फ़रमायाः " नहीं क्या तुम नहीं देखते कि मज्दूर जब अपने कामों । से फ़ारिग हो जाते हैं तो उन्हें उजरत दी जाती है.✍️
*🔰( अत्तरगीब वत्तरहीब , जिल्द : 2 , स-फ़हा : 56 , हदीस : 7 )📘*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 12,📕*
*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *सगीरा गुनाहो का कफ़्फ़ारा* हज़रते अबू हुरैरा رضي الله عنه से मरवी है, हुज़ूर صلى الله عليه وسلم का फरमाने पुर सुरूर है : पंचो नमाज़े, जुमुआ अगले जुमुआ तक और रमज़ान अगले रमज़ान तक गुनाहो का कफ़्फ़ारा है जब तक की कबीरा गुनाहो से बचा जाए। *सहीह मुस्लिम, 144, हदिष:233*
■➞ *तौबा का तरीक़ा* रमज़ानुल मुबारक में रहमतो की छमाछम बारिशें और गुनाहे सगीरा के कफ्फारे का सामान हो जाता है। गुनाहे कबीरा तौबा से मुआफ़ होते है।
■➞ तौबा का तरीक़ा ये है की जो गुनाह हुवा ख़ास उस गुनाह का ज़िक्र कर के दिल की बेज़ारी और आइन्दा उस से बचने का अहद कर के तौबा करे। मसलन झूट बोला, तो बारगाहे खुदावन्दी में अर्ज़ करे, या अल्लाह ! मेने जो ये झूट बोला इससे तौबा करता हु और आइन्दा नही बोलूंगा।
■➞ तौबा के दौरान दिल में झूट से नफरत हो और "आइन्दा नही बोलूंगा" कहते वक़्त दिल में ये इरादा भी हो की जो कुछ कह रहा हु ऐसा ही करूँगा जभी तौबा है। अगर बन्दे की हक़ तलफी की है तो तौबा के साथ साथ उस बन्दे से मुआफ़ करवाना भी ज़रूरी है.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 12,📕*
*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *आक़ा का बयाने जन्नत निशान* हज़रते सलमान फ़ारसी رضي الله عنه फ़रमाते है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने माहे शाबान के आखरी दिन बयान फ़रमाया : ऐ लोगो ! तुम्हारे पास अज़मत वाला बरकत वाला महीना आया, वो महीना जिस में एक रात ऐसी भी है जो हज़ार महीनो से बेहतर है, इस के रोज़े अल्लाह ने फ़र्ज़ किये और इसकी रात में क़याम सुन्नत है, जो इसमें नेकी का काम करे तो ऐसा है जेसे और किसी महीने में फ़र्ज़ अदा किया और इसमें और इसमें जिसने फ़र्ज़ अदा किया तो ऐसा है जेसे और दिनों में 70 फ़र्ज़ अदा किये।
■➞ ये महीना सब्र का है और *सब्र का षवाब जन्नत है* और ये महीना गम ख्वारी और भलाई का है और इस महीने में मोमिन का रिज़्क़ बढ़ाया जाता है। जो इसमें रोज़ादार को *इफ्तार कराए* उसके गुनाहो के लये मगफिरत है और उसकी गर्दन *आग से आज़ाद* कर दी जाएगी। और इस इफ्तार करने वाले को ऐसा ही षवाब मिलेगा जैसा रोज़ा रखने वाले को मिलेगा। बगैर उसके अज्र में कुछ कमी हो।
■➞ हमने अर्ज़ की या रसूलल्लाह صلى الله عليه وسلم ! हम में से हर शख्स वो चीज़ नही पाता जिस से रोज़ा इफ्तार करवाए। आप ने इर्शाद फ़रमाया : अल्लाह ये षवाब उस शख्स को देगा जो एक घूंट दूध या एक खजूर या एक घूंट पानी से रोज़ा इफ्तार करवाए और जिस ने रोज़ादार को पेट भर कर खिलाया, उस को अल्लाह मेरे हौज़ से पिलाएगा की कभी प्यासा न होगा। यहां तक की *जन्नत में दाखिल हो जाए।*
■➞ ये वो महीना है की इसका *अव्वल आसरा रहमत* है, इसका *दूसरा असरा मगफिरत* है और *तीसरा असरा जहन्नम से आज़ादी* है।
■➞ इस महीने में 4 बातो की कसरत करो। इनमे से 2 बाते ऐसी है जिन के ज़रिए तुम अपने रब को राज़ी करोगे (1) لا اله الا الله की गवाही देना (2) इस्तिग़फ़ार करना। और दूसरी 2 बातो जिन से अपने रब से बे नियाज़ी नही (1) अल्लाह से जन्नत तलब करना (2) जहन्नम से अल्लाह की पनाह तलब करना.✍️
*🔰सहीह इब्ने खुज़ैम, 3/1887📕*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 14,📕*
*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ मीठे मीठे इस्लामी भाइयो ! अभी जो हदीसे पाक - बयान की गई इस में माहे र-मज़ानुल मुबारक की रहमतों , बरकतों और अजमतों का खूब तज्किरा है । इस माहे मुबारक में कलिमा शरीफ़ ज़ियादा तादाद में पढ़ कर और बार बार | इस्तिरफार या ' नी खूब तौबा के जरीए अल्लाह तआला को ' राजी करने की सअ्य करनी है । और इन दो बातों से तो किसी सूरत में भी ला परवाही नहीं होनी चाहिये या ' नी अल्लाह तआला से जन्नत में दाखिला और जहन्नम से पनाह की बहुत ज़ियादा ' इल्तिजाएं करनी हैं ।
■➞ *रमज़ानुल मुबारक के चार नाम :* अल्लाहु अक्बर ! माहे रमजान का भी क्या खूब फैजान है ! मुफस्सिरे शहीर - हकीमुल उम्मत हज़रते मुफ़्ती अहमद यार ख़ान रहमतुल्लाह तआला अलैह तफ्सीरे नईमी में फ़रमाते हैं : " इस माहे मुबारक के कुल चार नाम हैं
■➞ *( 1 ) - माहे रमजान ( 2 ) माहे सब्र ( 3 ) माहे मआसात और ( 4 ) माहे - वुस्अते रिज्क*
■➞ मजीद फ़रमाते हैं , रोज़ा सब्र है जिस की जज़ा रब ताअला है और वोह इसी महीने में रखा जाता है । इस लिये इसे माहे सब्र केहते हैं । मुआसात के मा'ना हैं भलाई करना । चूंकि इस ' महीने में सारे मुसल्मानों से ख़ास कर अहले कराबत से भलाई करना ज़ियादा सवाब है इस लिये इसे माहे मुआसात केहते हैं इस में रिककी फ़राखी भी होती है कि गरीब भी नेमतेखा लेते हैं इसी लिये इस का , नाम माहे वुस्मते रिज्क भी है.✍️
*🔰( तफ्सीरे नईमी , जिल्द : 2 , सफ़हा : 208 )📕*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 14,📕*
*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *माहे रमज़ान में मदनी फूल* काबाए मुअज़्ज़मा मुसलमानो को बुलाकर देता है और रमज़ान आ कर रहमते बाटता है। गोया काबा कुवा है और रमज़ान दरया, या काबा दरया है और रमज़ान बारिश।
■➞ हर महीने में ख़ास तारीखे और तारीखों में भी ख़ास वक़्त में इबादत होती है। मसलन बकरी ईद की चन्द मख़्सूस तारीखे में हज, मुहर्रम की 10वी तारीख अफज़ल, मगर माहे रमज़ान में हर दिन और हर वक़्त इबादत होती है। रोज़ा इबादत, इफ्तार इबादत, इफ्तार के बाद तरावीह का इन्तिज़ार करना इबादत, तरावीह पढ़ कर सहरी के इंतज़ार में सोना इबादत, फिर सहरी खाना भी इबादत अल गरज हर आन में खुदा की शान नज़र आती है।
■➞ रमज़ान एक भट्टी है जेसे की भट्टी गन्दे लोहे को साफ़ और साफ़ लोहे को मशीन का पुर्ज़ा बना कर क़ीमती कर देती है और सोने को ज़ेवर बना कर इस्तेमाल के लायक कर देती है। ऐसे ही माहे रमज़ान गुनाहगारो को पाक करता और नेक लोगो के दर्जे बढ़ाता है। *तफ़सीरे नईमी, 2/208*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 17,📕*
*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *माहे रमज़ान में मदनी फूल* रमज़ान में नफ्ल का षवाब फ़र्ज़ के बराबर और फ़र्ज़ का षवाब 70 गुना मिलता है।
■➞ बाज़ उलमा फ़रमाते है की जो रमज़ान में मर जाए उस से सुवालाते क़ब्र भी नही होते।
■➞ इस महीने में शबे क़द्र है। गुज़श्ता आयत से मालुम हुवा की क़ुरआन रमज़ान में आया और दूसरी जगह फ़रमाया : बेशक़ हम ने शबे क़द्र में उतारा। (पारह 30, अल क़द्र:1)
■➞ दोनों आयतो के मिलाने से मालुम हुवा की शबे क़द्र रमज़ान में ही है और वो गालिबन 27वी शब् है। क्यू की लैलतुल क़द्र में 9 हरुफ़ है और ये लफ्ज़ सूरए क़द्र में 3 बार आया। जिस से 27 हासिल हुए मालुम हुवा की वो 27वी शब् है। *तफ़सीरे नईमी, 2/208*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 17,📕*
*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *माहे रमज़ान में मदनी फूल* रमज़ान में इब्लीस क़ैद कर लिया जाता है और दोज़ख के दरवाज़े बन्द हो जाते है जन्नत आरास्ता की जाती है इस के दरवाज़े खोल दिये जाते है। इस लिये इन दिनों में नेकियों की ज़ियादती और गुनाहो की कमी होती है, जो लोग गुनाह करते भी है वो नफ्से अम्मारा या अपने साथी शैतान (क़रीन) के बहकावे से करते है।
■➞ रमज़ान के खाने पिने का हिसाब नही। क़यामत में रमज़ान व क़ुरआन रोज़ादार की शफ़ाअत करेंगे की रमज़ान तो कहेगा, मौला ! में ने इसे दिन में खाने पीने से रोका था और क़ुरआन अर्ज़ करेगा की या रब ! में ने इसे रात में तिलावत व तरावीह के ज़रिए सोने से रोका।
■➞ हुज़ूर صلى الله عليه وسلم रमज़ानुल मुबारक में हर कैदी को छोड़ देते थे और हर साइल को अता फ़रमाते थे। रब भी रमज़ान में जहन्नमियो को छोड़ता है। लिहाज़ा चाहिये की रमज़ान में नेक काम किया जाए और गुनाहो से बचा जाए। *तफ़सीरे नईमी, 2/208*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 18,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *माहे रमज़ान में मदनी फूल* क़ुरआन में सिर्फ रमज़ान ही का नाम लिया गया और इसी के फ़ज़ाइल बयान हुए। किसी दूसरे महीने का न सराहतन नाम है न ऐसे फ़ज़ाइल। औरतो में सिर्फ बीबी मरयम رضي الله عنها का नाम क़ुरआन में आया। सहाबा में सिर्फ हज़रते ज़ैद इब्ने हारिसा رضي الله عنه का नाम क़ुरआन में लिया गया जिस से इन तीनो की अज़मत मालुम हुई।
■➞ रमज़ान में इफ्तार और सहरी के वक़्त दुआ क़बूल होती है। यानि इफ्तार करते वक़्त और सहरी खा कर। ये मर्तबा किसी और महीने को हासिल नहीं।
■➞ रमज़ान में 5 हरुफ़ है رمضان. इन में ر से मुराद "रहमते इलाही" م से मुराद "महब्बते इलाही" ض से मुराद "ज़माने इलाही" ا से मुराद "अमाने इलाही" ن से मुराद "नुरे इलाही"।
■➞ और रमज़ान में 5 इबादत खुसूसी होती है। रोज़ा, तरावीह, तिलावते क़ुरआन, एतिकाफ, शबे क़द्र में इबादत। तो जो कोई सिद्के दिल से ये 5 इबादत करे वो उन 5 इनामो का मुस्तहक़ है *तफ़सीरे नईमी, 2/208*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 18,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *जन्नत सजाई जाती है* रमज़ान के इस्तिक़बाल के लिये सारा साल जन्नत को सजाया जाता है। चुनान्चे हज़रते अब्दुल्लाह इब्ने उमर رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم का फरमान है : बेशक जन्नत इब्तिदाई साल से आइन्दा साल तक रमज़ान के लिये सजाई जाती है और फ़रमाया रमज़ान के पहले दिन जन्नत के दरख्तो के निचे से बड़ी आँखों वाली हूरो पर हवा चलती है और वो अर्ज़ करती है, ऐ पवरदगार ! अपने बन्दों में से ऐसे बन्दों को हमारा शौहर बना जिन को देख कर हमारी आँखे ठंडी हो और जब वो हमे देखे तो उन की आँखे भी ठंडी हो। *शुअबुल ईमान, 3/312, हदिष:3633*
■➞ जन्नत की अज़मत की तो क्या ही बात है ! काश ! हमे बे हिसाब बख्श दिया जाए और जन्नतुल फ़िरदौस में मदीने वाले आक़ा صلى الله عليه وسلم का पड़ोस नसीब हो जाए.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 20,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *हर शब 60,000 की बख्शिश* हज़रते अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद رضي الله عنه से रिवायत है कि हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : रमज़ान की हर शब आसमानों में सुब्हे सादिक़ तक एक मुनादी ये निदा करता है : ऐ अच्छाई मांगने वाले ! मुकम्मल कर (यानी अल्लाह की इताअत की तरफ आगे बढ़) और खुश हो जा। और ऐ शरीर ! शर से बाज़ आ जा और इब्रत हासिल कर। है कोई मग्फिरत का तालीब ! कि उसकी तलब पूरी की जाए। है कोई तौबा करने वाला ! कि उस की तौबा क़बूल की जाए। है कोई तौबा करने वाला ! कि उसकी तौबा क़बूल की जाए। है कोई दुआ मांगने वाला ! कि उसकी दुआ क़बूल की जाए। है कोई साइल ! कि उसका सुवाल पूरा किया जाए।
■➞ अल्लाह रमज़ानुल मुबारक की हर शब में इफ्तार के वक़्त 60,000 गुनाहगारो को दोज़ख से आज़ाद फ़रमा देता है। और ईद के दिन सारे महीने के बराबर गुनाहगारो की बख्शिश की जाती है। *अद्दुररुल मन्सूर,1/146*
■➞ मीठे और प्यारे इस्लामी भाइयो ! माहे रमज़ान की साअते कितनी बा बरकत है कि हर लम्हा बन्दों में रहमत व मग्फिरते इलाही तक़्सीम हो रही है। ये वो माह है जिस के दिन रोज़ो में और राते तिलावते कलाम पाक में सर्फ होती है और येही दोनों चीज़े रोज़े महशर मुसलमान के लिये शफ़ाअत का सामान भी फ़राहम करेंगे.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 25,📕*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *रोज़ाना दस लाख गुनाहगारो की दोज़ख से रिहाई* अल्लाह की इनायतो, रहमतो और बख्शिशो का तज़किरा करते हुए एक मौके पर हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमाया : जब रमज़ान की पहली रात होती है तो अल्लाह अपनी मख्लूक़ की तरफ नज़र फ़रमाता है और जब अल्लाह किसी बन्दे की तरफ नज़र फ़रमाता है और जब अल्लाह किसी बन्दे की तरफ नज़र फरमाए तो उसे कभी अज़ाब न देगा।
■➞ और हर रोज़ दस लाख गुनाहगारो को जहन्नम से आज़ाद फ़रमाता है और जब 29वी रात होती है तो महीने भर में जितने आज़ाद किये उन गिनती के बराबर उस एक रात में आज़ाद फ़रमाता है।
■➞ फिर जब ईदुल फ़ित्र की रात आती है। मलाइका ख़ुशी करते है और अल्लाह अपने नूर की ख़ास तजल्ली फ़रमाता है और फ़रिश्तो से फ़रमाता है "ऐ गुरोहे मलाइका ! उस मज़दूर का क्या बदला है जिस ने काम पूरा कर लिया ? फ़रिश्ते अर्ज़ करते है उस को पूरा पूरा अज्र दिया जाए अल्लाह फ़रमाता है : में तुम्हे गवाह करता हु की में ने उन सब को बख्श दिया। *कन्जुल उम्माल, 8/219, हदिष:23702*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 25,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *जुमुआ की हर घड़ी में दस लाख की मगफिरत* हज़रते अब्दुलाह इब्ने अब्बास رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم का फरमान है "अल्लाह माहे रमज़ान में रोज़ाना इफ्तार के वक़्त दस लाख ऐसे गुनाहगारो को जहन्नम से आज़ाद फ़रमाता है जिन पर गुनाहो की वजह से जहन्नम वाजिब हो चुकी थी, नीज़ शबे जुमुआ और रोज़े जुमुआ की हर हर घड़ी में ऐसे दस लाख गुनाहगारो को जहन्नम से आज़ाद किया जाता है जो अज़ाब के हक़दार क़रार दिये चुके होते है *कन्जुल उम्माल, 8/223, हदिष:23716*
■➞ *भलाई ही भलाई* हज़रते उमर फारुके आज़म رضي الله عنه फ़रमाते है : उस महीने को खुश आमदीद है जो हमें पाक करने वाला है। पूरा रमज़ान खैर ही खैर है दिन का रोज़ा हो या रात का क़याम। इस महीने में खर्च करना जिहाद में खर्च करने का दर्जा रखता है *तम्बीहुल गाफिलिन, 176*
■➞ *खर्च में कुशादगी करो* हज़रते ज़ुमुरह رضي الله عنه से मरवी हे की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم फ़रमाते है : माहे रमज़ान में घर वालो के खर्च में कुशादगी करो क्यू की माहे रमज़ान में खर्च करना अल्लाह की राह में खर्च करने की तरह है। *अल जामिउस्सागिर, 162, हदिष:2716*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 27,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
✊یــــــــــــــــــــــــــــا رسول الــــلّٰــــه ﷺ ⚘
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *दो अँधेरे दूर* मन्कुल है की अल्लाह ने हज़रते मूसा कलीमुल्लाह से फ़रमाया की में ने उम्मते मुहम्मदिय्या को दो नूर अता किये है ताकि वो दो अंधेरो के नुक़्सान से महफूज़ रहे। मूसा कलीमुल्लाह ने अर्ज़ की या अल्लाह ! वो दो नूर कौन से है ? इर्शाद हुवा "नुरे रमज़ान" और "नुरे क़ुरआन"। मूसा कलीमुल्लाह ने अर्ज़ की : दो अँधेरे कौन से है ? फ़रमाया : "एक क़ब्र" और "दूसरा क़यामत" का *दुर्रतुन्नासीहीन, 9*
■➞ *बख्शीश का बहाना* हज़रते अलियुल मुर्तज़ा كرم الله وجهه الكريم फ़रमाते है : अगर अल्लाह को उम्मते मुहम्मदी पर अज़ाब करना मक़सूद होता तो उन को रमज़ान और सूरए कुल्हु वल्लाह शरीफ हरगिज़ इनायत न फ़रमाता। *नुज़हतुल मजालिस, 1/216*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 28,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *आक़ा इबादत पर कमर बस्ता हो जाते* बिल खुसुस माहे रमज़ान में हमे अल्लाह की खूब खूब इबादत करनी चाहिये और हर वो काम करना चाहिये कि जिस में अल्लाह और उसके हबीब की रिज़ा हो। अगर इस पाकीज़ा महीने में भी कोई अपनी बख्शिश न करवा सका तो फिर कब करवाएगा ?
■➞ हमारे प्यारे आक़ा ﷺ इस मुबारक महीने की आमद के साथ ही इबादतें इलाही में बहुत ज़्यादा मगन हो जाया करते थे। चुनान्चे उम्मुल मोअमिनीन हज़रते आइशा सिद्दीक़ा रदिअल्लाहु अन्हा फरमाती है : जब माहे रमज़ान आता तो मेरे सरताज ﷺ अल्लाह की इबादत के लिये कमर बस्ता जो जाते और सारा महीना अपने बिस्तरे मुनव्वर पर तशरीफ़ न लाते। *अद्दुरु मन्सूर, 1/449*
■➞ *आक़ा रमज़ान में खूब दुआए मांगते थे* जब माहे रमज़ान तशरीफ़ लाता तो हुज़ूर صلى الله عليه وسلم का रंग मुबारक मुतगय्यर हो जाता और आप नमाज़ की कसरत फ़रमाते और खूब गिड़ गीडा कर दुआए मांगते और अल्लाह का खौफ आप पर तारी रहता। *शुएबुल ईमान, 3/310, हदिष:3635*
■➞ *आक़ा रमज़ान में खूब खैरात करते* इस माह में खूब सदक़ा व खैरात करना भी सुन्नत है। जब माहे रमज़ान आता तो हुज़ूर صلى الله عليه وسلم हर कैदी को रिहा कर देते और हर साइल को अता फ़रमाते *अद्दुररुल मन्सूर, 1/449*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 35,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *हज़ार गुना षवाब* रमज़ान में नेकियों का अज्र बहुत बढ़ जाता है लिहाज़ा कोशिश करके ज़्यादा से ज़्यादा नेकियां इस माह में जमा करलेनि चाहिये। चुनान्चे हज़रत इब्राहिम नखई رحمة الله عليه फ़रमाते है : रमज़ान में एक दिन का रोज़ा रखना एक हज़ार दिन के रोज़े से अफज़ल है और रमज़ान में एक तस्बीह यानि سبحان الله कहना इस माह के इलावा हज़ार मर्तबा कहने से अफ़्ज़ल है और रमज़ान में एक रकअत पढ़ना गैर माह की एक हज़ार रकअतो से अफ़्ज़ल है। *अद्दुररुल मन्सूर, 1/454*
■➞ *रमज़ान में ज़िक्र की फ़ज़ीलत* हज़रत उमर फारुके आज़म رضي الله عنه से रिवायत है की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : रमज़ान में ज़िकरुल्लाह करने वाले को बख्श दिया जाता है और इस महीने में अल्लाह से मांगने वाला महरूम नही रहता। *शोएबुल ईमान, 3/311, हदिष:3627*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 35,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *र-मज़ान का दीवाना :* मुहम्मद नामी एक आदमी सारा साल नमाज़ न पढ़ता था । जब र-मज़ान शरीफ़ का , मु - तबर्रिक महीना आता तो वोह पाक साफ़ कपड़े पहनता और पांचों वक्त पाबन्दी के साथ नमाज़ पढ़ता और साले गुज़श्ता की कज़ा , नमाजें भी अदा करता । लोगों ने उस से पूछा , तू ऐसा क्यूं करता है ? ) उस ने जवाब दिया येह महीना रहमत , ब-र -कत , तौबा और मरिफ़रत का है , शायद अल्लाह तआला मुझे मेरे इसी अमल के सबब बख्श दे । जब उस का इन्तिकाल हो गया तो किसी ने । उसे ख़्वाब में देखा तो पूछा , या ' नी अल्लाह तआला ने तेरे साथ क्या मुआमला किया ? उसने जवाब दिया मेरे। अल्लाह ने मुझे एहतिरामे र-मज़ान शरीफ़ बजा लाने के सबब बख्श दिया। *( दुर्रतुन्नासिहीन , सफ़ह : 8 )*
_🤲🏻अल्लाह की उन पर रहमत हो और उन के सदके हमारी मरिफरत हो ।_
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 40,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *अल्लाह बे नियाज़ है :* मीठे मीठे इस्लामी भाइयो ! देखा आपने ? खुदाए रहमान माहे र-मज़ान के कद्रदान पर किस द-रजा मेहरबान है कि साल के बाकी महीने छोड़ करसिर्फ़ माहे र-मज़ान में इबादत करने वाले की मरिफ़रत फ़रमा दी । इस हिकायत से कहीं कोई येह न समझ बैठे कि अब तो सारा साल नमाज़ों की छुट्टी हो गई ! सिर्फ र-मज़ानुल मुबारक में रोज़ा नमाज कर लिया करेंगे और सीधे जन्नत में चले जाएंगे । प्यारे इस्लामी भाइयो ! दर अस्ल बख़्शना या अज़ाब करना येह सब कुछ अल्लाह तआला की मशिय्यत पर मौकूफ़ है । वोह बे नियाज़ है । अगर चाहे तो किसी मुसल्मान को ब ज़ाहिर छोटे से नेक अमल पर ही अपने फ़ज़्ल से को बख़्श दे और अगर चाहे तो बड़ी बड़ी नेकियों के बा वुजूद किसी को एक महज़ एक छोटे से गुनाह पर अपने अद्ल से पकड़ ले ।
■➞ *पारह 3 सू-रतुल 8 ब - करह की आयत नम्बर 284 में इर्शादे रब्बे बे नियाज़ है : तर्जमए कन्जुल ईमानः* तो जिसे चाहेगा ( अपने फज्ल से अहले ईमान को ) बख़्शेगा और जिसे चाहेगा ( अपने अद्ल से ) सज़ा देगा । *( पारह : 3 , अल ब-करह : 284 )*
■➞ *तू बे हिसाब बख़्श कि हैं बे शुमार जुर्म देता हूं वासिता तुझे शाहे हिजाज़ ﷺ का*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 40,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *तिन के अंदर तिन पोशीदा* मीठे और प्यारे इस्लामी भाइयो ! कोई नेकी छोड़नी नही चाहिए न जाने अल्लाह को कौन सी नेकी पसन्द आ जाए और कोई छोटे से छोटा गुनाह भी नही करना चाहिए नजाने किस गुनाह पर अल्लाह नाराज़ हो जाए और उस का दर्दनाक अज़ाब आ कर घेर ले। खलीफए आला हज़रत, अबू युसूफ मुहम्मद शरीफ मुहद्दिस कोटल्वी عليه رحما नकल फ़रमाते है : अल्लाह ने तीन चीज़ों को तीन चीज़ों में पोशीदा रखा है (1) अपनी रिज़ा को अपनी इताअत में (2) अपनी नाराज़गी को अपनी फ़रमानी में और (3) अपने औलिया को अपने बन्दों में। ये क़ौल नकल करने के बाद फ़रमाते है : लिहाज़ा हर ताअत और हर नेकी को अमल में लाना चाहिये की मालुम नहीं किस नेकी पर वो राज़ी हो जाए और हर बदी से बचना चहिए क्यू की मालुम नही किस बदी पर वो नाराज़ हो जाए। ख्वाह वो केसी ही छोटी हो। मसलन बिला इजाज़त किसी के तिनके का खिलाल करना बी ज़ाहिर एक ममुलिसि बात है। मगर मुमकिन है की इस बुराई में ही हक़ तआला की नाराज़गी छुपी हुई हो। तो ऐसी छोटी छोटी बातो से भी बचना चाहिए। *अख्लाकुस्सालिहीन, 56*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 42,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *कुत्ते को पानी पिलाने वाली बख़्शी गई :* रहमत के तलबगारो ! जब अल्लाह बख्शने पर आता है तो ब ज़ाहिर नेकी कितनी ही छोटी हो वोह उसी के सबब करम फ़रमा देता है चुनान्चे इस जिम्न में कसीर अहादीस वारिद हैं। मसलन एक औरत को सिर्फ इस लिये बख्रा दिया गया कि उस ने एक प्यासे कुत्ते | को पानी पिलाया था । *( सहीह बुख़ारी , जिल्द : 2 , सफ़ह : 409 हदीस : 3321*
■➞ एक हदीस में सरकारे मदीना , सुल्ताने बा करीना , / करारे कल्बो सीना , फैज गन्जीना - ﷺ का येह फ़रमाने आलीशान भी मिलता है कि एक शख्स ने रास्ते में से - एक दरख्त को इस लिये हटा दिया ताकि लोगों को इस से ईज़ा न पहुंचे । अल्लाह तआला - ने खुश हो कर उस की मरिफ़रत फ़रमा दी। *( सहीह मुस्लिम , सफ़ह 1410 , हदीस : 1914 )*
■➞ एक सहीह हदीस में तकाज़े में नरमी ( या ' नी कर्ज की वुसूली में आसानी ) को करने वाले एक शख्स की नजात हो जाने का वाकेआ भी आया है *( सहीह बुख़ारी , जिल्द : 2 , सफ़ह : 12 , हदीस : 2078 )*
■➞ अल्लाह पाक की रहमत के वाकेआत जम्अ करने जाएं तो इतने हैं कि हम जम्अ ही न कर सकें..✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 43,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *अज़ाब से छुटकारे के अस्बाब :* मीठे मीठे इस्लामी भाइयो जब अल्लाह रहमत करने पर आता है तो यूं भी सबब बनाता है कि किसी एक अमल को अपनी बारगाह में शरफ़े कबूलिय्यत अता फ़रमा देता है और फिर इसी के बाइस उस पर रह़मतों की बारिश कर देता है । लिहाजा अब एक हृदीसे - मुबारक पेश की जाती है जिस में मुतअद्दद ऐसे लोगों का बयान - किया गया है कि वोह किसी न किसी नेकी के सबब अल्लाह तआला की गरिफ्त से बच गए और रहूमते खुदावन्दी ने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया।
■➞ चुनान्चे हज़रते सय्यिदुना अब्दुर्रहमान बिन समूरा رضی اللہ تعالی عنہ से रिवायत है , एक बार हुजूरे अकरम , नूरे मुजस्सम , शाहे बनी आदम , नबिय्ये मोहतरम , रसूले मोहूतशम ﷺ तशरीफ़ लाए और इर्शाद फ़रमाया आज रात मैं ने एक अजीब ख्वाब देखा कि
■➞ *मदीना 1 :* एक शख्स की रूह क़ब्ज़ करने के लिये मलकुल मौत तशरीफ़ लाए लेकिन उस का मां बाप की इताअत करना सामने आ गया और वोह बच गया ।
■➞ *मदीना 2 :* एक शख्स पर अज़ाबे क़ब्र छा गया लेकिन उस के वुजू ( की नेकी ) ने उसे बचा लिया..✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 44,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*अज़ाब से छुटकारे के अस्बाब :*
■➞ *मदीना 3 :* एक शख्स को शयातीन ने घेर लिया लेकिन जिक्रुल्लाह ( करने की नेकी ने ) उसे बचा लिया।
■➞ *मदीना 4 :* एक शख्स को अज़ाब के फ़िरिश्तों ने घेर लिया लेकिन उसे ( उस की ) नमाज़ ने बचा लिया ।
■➞ *मदीना 5 :* एक शख्स को देखा कि प्यास की शिद्दत से ज़बान निकाले हुए था और एक हौज़ पर पानी पीने जाता था । मगर लौटा दिया जाता था कि इतने में उस के रोजे आ । गए ( और इस नेकी ने ) उस को सैराब कर दिया ।
■➞ *मदीना 6 :* एक शख्स को देखा कि जहां अम्बियाए किराम , عَلَيْهِمُ السَّلاَم हल्के बनाए हुए तशरीफ़ फ़रमा थे , वहां उन के पास जाना चाहता था लेकिन धुत्कार दिया जाता था कि इतने में उस का गुस्ले जनाबत ) आया और ( उस नेकी ने ) उस को मेरे पास बिठा दिया ।
■➞ *मदीना 7 :* एक शख्स को देखा कि उस के आगे पीछे , दाएं बाएं , । ऊपर नीचे अंधेरा ही अंधेरा है और वोह उस अंधेरे में हैरान व परेशान है तो उस के हज व उम्मह आ गए और ( इन नेकियों ने ) उस को अंधेरे से निकाल कर रौशनी में पहुंचा दिया .✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 45,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*अज़ाब से छुटकारे के अस्बाब :*
■➞ *मदीना 8 :* एक शख्स को देखा कि वोह मुसल्मानों से गुफ़्तुगू करना चाहता है लेकिन कोई उस को मुंह नहीं लगाता तो सि-लए रेहमी ( या ' नी रिश्तेदारों से हुस्ने सुलूक करने की नेकी ) ने मुमिनीन से कहा कि तुम इस से बातचीत करो । तो मुसल्मानों ने उस से बात करना शुरूअ की ।
■➞ *मदीना 9 :* एक शख्स के जिस्म और चेहरे की तरफ़ आग बढ़ रही है और वोह अपने हाथ से बचा रहा है तो उस का स-दका आ गया और उस के आगे ढाल बन गया और उस के सर पर साया फ़िगन हो गया।
■➞ *मदीना 10 :* एक शख्स को ज़बानिया ( या ' नी अज़ाब के मख्सूस फ़िरिश्तों ) ने चारों तरफ से घेर लिया लेकिन उस का नेकी का हुक्म करने और बुराई से मन्अ करने की नेकी आई ) और उस ने उसे बचा लिया और रहमत के फ़िरिश्तों के हवाले कर दिया।
■➞ *मदीना 11 :* एक शख्स को देखा जो घुटनों के बल बैठा है लेकिन उस के और अल्लाह तआला के दरमियान हिजाब ( या ' नी पर्दा ) है मगर उस का हुस्ने अख़्लाक़ आया इस ( नेकी ) ने उस को बचा लिया और अल्लाह तआला से मिला | दिया।
■➞ *मदीना 12 :* एक शख्स को उस का आ'माल नामा उल्टे हाथ में दिया जाने लगा तो उस का खौफेखुदा आ गया और ( इस अज़ीम नेकी की बरकत से ) उस का नामए । आ'माल सीधे हाथ में दे दिया गया..✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 46,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*अज़ाब से छुटकारे के अस्बाब :*
■➞ *मदीना 13 :* एक शख्स की नेकियों का वज़्न हल्का रहा मगर उस की सखावत आ गई और नेकियों का वज़न बढ़ गया ।
■➞ *मदीना 14 :* एक शख्स जहन्नम के कनारे पर खड़ा था मगर उस का खौफेखुदा आ गया और वोह बच गया ।
■➞ *मदीना 15 :* एक शख्स जहन्नम में गिर गया लेकिन उस के खौफे खुदा में बहाए हुए आंसू आ गए और ( इन आंसूओं की बरकत से ) वोह बच गया।
■➞ *मदीना 16 :* एक शख्स पुल सिरात पर खड़ा था और टेहनी की तरह लरज़ रहा था लेकिन उस का अल्लाह के साथ हुस्ने जन ( या ' नी अल्लाह पाक से अच्छा गुमान कि वोह रहमत ही करेगा ) आया और ( इस नेकी ने ) उसे बचा लिया और वोह पुल सिरात से गुज़र गया।
■➞ *मदीना 17 :* एक शख्स पुल सिरात पर घिसट घिसट कर चल रहा था कि उस का मुझ पर दुरदे पाक पढ़ना आ गया और ( इस नेकी ने ) उस को खड़ा कर के पुल सिरात पार करवा दिया.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 46,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
✊یــــــــــــــــــــــــــــا رسول الــــلّٰــــه ﷺ ⚘
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*अज़ाब से छुटकारे के अस्बाब :*
■➞ *मदीना 18 :* मेरी उम्मत का एक शख्स जन्नत के दरवाजों के पास पहुंचा तो वोह सब इस पर बन्द थे कि इस की गवाही देना आया और उस के लिया जन्नती दरवाजे खुल गए और वोह जन्नत में दाखिल हो गया ।
*चुग्ली का दर्दनाक अज़ाब*
*मदीना 19 :* कुछ लोगों के होंट काटे जा रहे थे मैं ने जिब्रईल عَلَيْهِمُ السَّلاَم से दरयाफ़्त किया , येह कौन हैं ? तो उन्हों ने बताया कि येह लोगों के दरमियान चुगुल खोरी करने वाले हैं।
*इल्ज़ामे गुनाह की ख़ौफ़नाक सज़ा*
*मदीना 20 :* कुछ लोगों को ज़बानों से लटका दिया गया था । मैं ने । जिब्रईल عَلَيْهِمُ السَّلاَم से उन के बारे में पूछा तो उन्हों । ने बताया कि येह लोगों पर बिला वजह इल्ज़ामे गुनाह लगाने वाले हैं । *( शरहुस्सुदूर , सफ़ह: 182 )*
*कोई भी नेकी नहीं छोड़नी चाहिये :* मीठे मीठे - इस्लामी भाइयो ! आप ने मुला - हज़ा फ़रमाया , इताअते वालिदैन , वुजू , नमाज़ , रोज़ा , ज़िक्रुल्लाह , हज व उमरह , सिलए रेहमी सदका , हुस्ने अख़्लाक़ , सखावत , खौफ़ खुदा I में रोना , नीज़ अल्लाह के - साथ हुस्ने जन वगैरा वगैरा नेकियों के सबब अल्लाह ने मुअज्जबीन ( या ' नी जो लोग अज़ाब में मुब्तला थे उन ) पर करम फ़रमा दिया और उन्हें इताब व अज़ाब से रिहाई मिल गई.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 48,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*अज़ाब से छुटकारे के अस्बाब :*
■➞ बहर हाल येह उस के फ़ज़्लो करम के मुआ मलात हैं । वोह मालिको मुख़्तार है । जिसे चाहे बख़्श दे , जिसे चाहे अज़ाब करे , येह सब उस का अद्ल ही अद्ल है । जहां वोह किसी एक नेकी से खुश हो कर अपनी रहमत से बख्श देता है वहीं किसी एक गुनाह पर जब वोह नाराज़ हो जाता है तो उस का क़हरो गज़ब जोश पर आ जाता है और फिर उस की ने गरिफ्त निहायत ही सख़्त होती है । जैसा कि अभी गुज़श्ता तवील हदीस के आखिर में चुगुल खोरों और दूसरों पर गुनाह की तोहमत बांधने । ) वालों का अन्जाम भी हमारे प्यारे आका ﷺ ने मुला - हज़ा फ़रमा कर हमें बता कर ख़बरदार किया लिहाज़ा अक्लमन्द वोही है कि ब ज़ाहिर कोई छोटी सी भी नेकी । हो उसे तर्क न करे कि हो सकता है येही नेकी नजात का ज़रीआ बन जाए और ब ज़ाहिर गुनाह कितना ही मामूली नज़र आता हो हरगिज़ । हरगिज़ न करे.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 49,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*अज़ाब से छुटकारे के अस्बाब :*
■➞ *माहे रमज़ान में मरने की फ़ज़ीलत* जो खुश नसीब मुसलमान रमज़ान में इन्तिक़ाल करता है उस को सुवालाते क़ब्र से अमान मिल जाता है, अज़ाबे क़ब्र से बच जाता और जन्नत का हक़दार क़रार पाता है। चुनान्चे हज़राते मुहद्दिसिने किराम का क़ौल है "जो मोमिन इस महीने में मरता है वो सीधा जन्नत में जाता है, गोया उस के लिये दोज़ख का दरवाज़ा बन्द है।" *अनिसुल वाइज़िन, 25*
■➞ *तीन अफ़राद के लिये जन्नत की बशारत* हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास رضي الله عنه से रिवायत है, हुज़ूर صلى الله عليه وسلم का फरमान है : जिसको रमज़ान के इख्तिताम के वक़्त मौत आई वो जन्नत में दाखिल होगा और जिस की मौत अरफा के दिन (यानि 9 जुल हिज्जतुल हराम) के खत्म होते वक़्त मौत आई वो भी जन्नत में दाखिल होगा और जिस की मौत सदक़ा देने की हालत में आई वो भी दाखिले जन्नत होगा। *हिल्यतुल औलिया, 5/26, हदिष:6187*
■➞ *क़यामत तक रोज़ो का षवाब* आइशा सिद्दिक़ा رضي الله عنها से रिवायत है, हुज़ूर صلى الله عليه وسلم का इर्शाद है : जिसका रोज़े की हालत में इन्तिक़ाल हुवा, अल्लाह उस को क़यामत तक रोज़ो का षवाब अता फ़रमाता है।
■➞ फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : ये रमज़ान तुम्हारे पास आ गया है, इस में जन्नत के दरवाज़े खोल दिये जाते है और जहन्नम के दरवाज़े बंद कर दिये जाते है और शयातीन को क़ैद कर दिया जाता है, महरूम है वो शख्स जिस ने रमज़ान को पाया और उस की मगफिरत न हुई की जब इस की जब इसकी रमज़ान में मगफिरत न हुई तो फिर कब होगी.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 61,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*अज़ाब से छुटकारे के अस्बाब :*
■➞ *शयातीन जंजीरो में जकड़ दिये जाते है* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जब रमज़ान आता है तो आसमान के दरवाज़े खोल दिये जाते है। *सहीहुल बुखारी, 1/626, हदिष:1899*
■➞ और एक रीवायत में है की जन्नत के दरवाज़े खोल दिये जाते है और दोज़ख के दरवाज़े बन्द कर दिये जाते है शयातीन जंजीरो में जकड़ दिये जाते है। रहमत के दरवाज़े खोले जाते है। *सहीह मुस्लिम, 543, हदिष:1079*
■➞ *शैतान क़ैद में होने के बा वुजूद गुनाह क्यू होते है ?* हक़ ये है की माहे रमज़ान में आसमानों के दरवाज़े भी खुलते है जिन से अल्लाह की खास रहमते ज़मीन पर उतरती है और जन्नतो के दरवाज़े भी जिस की वजह से जन्नत वाले हूरो गिलमान को खबर हो जाती है की दुन्या में रमज़ान आ गया और वो रोज़ादारो के लिये दुआओ में मश्गुल हो जाते है। रमज़ान में वाक़ई दोज़ख के दरवाज़े ही बन्द हो जाते है जिस की वजह से इस महीने में गुनाहगारो बल्कि काफिरो की क़ब्रो पर भी दोज़ख की गर्मी नही पहुचती। वो जो मुसलमानो में मश्हूर है की रमज़ान में अज़ाबे क़ब्र नही होता इस का यही मतलब है और हक़ीक़त में इब्लीस को क़ैद कर दिया जाता है। _इस महीने में जो कोई भी गुनाह करता है वो अपने नफ़्से अम्मारा की शरारत से करता है न शैतान के बहकाने से *मीरआतुल मनाजिह्, 3/133*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 63,📕*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *साल भर की नेकियां बर्बाद* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم "बेशक जन्नत रमज़ान के लिये एक साल से दूसरे साल तक सजाई जाती है, पस जब रमज़ान आता है तो जन्नत कहती है, ऐ अल्लाह ! मुझे इस महीने में अपने बन्दों में से मेरे अन्दर रहने वाले अता फरमा दे। और हूरे कहती है, ऐ अल्लाह ! इस महीने में हमे अपने बन्दों में से शौहर अता फरमा।
■➞ फिर आक़ा صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया जिस ने इस माह में अपने नफ़्स की हिफाज़त की और न तो कोई नशा आवर शय पी और न ही किसी मोमिन पर बोहतान लगाया और न ही इस माह में कोई गुनाह किया तो अल्लाह हर रात के बदले इस का 100 हूरे से निकाह फ़रमाएगा और उस के लिये जन्नत में सोने, चांदी और याकूत का ऐसा महल बनाएगा की अगर सारी दुन्या जमा हो जाए और इस महल में आ जाए तो इस महल की उतनी ही जगह घेरेगी जितना बकरियो का एक बाडा दुन्या की जगह घेरता है।
■➞ और जिसने इस माह में कोई नशा आवर शय पी या किसी मोमिन पर बोहतान बांधा या इस माह में कोई गुनाह किया तो अल्लाह उस के एक साल के आमाल बर्बाद फरमा देगा। पस तुम माहे रमज़ान के हक़ में कोताही करने से डरो क्यू की ये अल्लाह का महीना है। अल्लाह ने तुम्हारे लिये 11 महीने कर दिये की इन में नेअमतों से लुत्फ़ अन्दोज़ हो और लज़्ज़त हासिल करो और अपने लिये एक महीना खास कर लिया है। पस तुम रमज़ान के मुआमले में डरो। *अल मुजमुल अवसत, 2/141, हदिष:3688*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 67,📕*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *रमज़ान में गुनाह करने वाला* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : मेरी उम्मत ज़लील व रुस्वा न होगी जब तक वो रमज़ान का हक़ अदा करती रहेगी। अर्ज़ किया या रसूलल्लाह ! रमज़ान के हक़ को ज़ाए करने में उन का ज़लील व रुस्वा होना क्या है ? फ़रमाया : इस माह में उन का हराम कामो का करना।
■➞ जिस ने इस माह में ज़ीना किया या शराब पी तो अगले रमज़ान तक अल्लाह और जितने आसमानी फ़रिश्ते है सब उस पत लानत करते है। पस अगर ये शख्स अगले रमज़ान को पाने से पहले ही मर गया तो उस के पास कोई ऐसी नेकी न होगी जो उसे जहन्नम की आग से बचा सके। पस तुम रमज़ान के मुआमले में डरो क्यू की जिस तरह इस माह में और महीनो के मुकाबले में नेकियां बढ़ा दी जाती है इसी तरह गुनाहो का भी मुआमला है। *अल मुजमुस्सगिर लीत्तबरानी, 9/60, हदिष:1488*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 75,📕*
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■➞ *रमज़ान की रातों में खेलकूद :* मीठे मीठे इस्लामी भाइयो गुज़श्ता दोनों हिकायात में हमारे लिये इब्रत के बे शुमार मदनी फूल हैं । जिन्दा इन्सान खूब फुदकता है मगर जब मौत का शिकार हो कर क़ब्र में उतार दिया जाता है , उस वक्त आंखें बन्द होने के बजाए हक़ीक़त में खुल चुकी होती हैं। अच्छे आमाल और राहे ' खुदाए जुल जलाल तआला में दिया हुवा माल तो काम आता है मगर जो कुछ धन दौलत पीछे छोड़ आता है उस में भलाई का इम्कान न होने के बराबर होता है । वु-रसा से येह उम्मीद कम ही होती है कि वोह अपने महूम अज़ीज़ की आख़िरत की बेहतरी के लिये माले कसीर खर्च करें । बल्कि मरने वाला अगर हराम व नाजाइज़ माल मसलन गुनाहों के अस्बाब जैसा कि आलाते मूसीकी , विडियो गेम्ज़ की दुकान , म्यूजिक सेन्टर , सिनेमा घर , शराब खाना , जुआ का अड्डा मिलावट वाले माल का कारोबार वगैरा पीछे छोड़े तो उस के लिये मरने के बाद सख़्त तरीन और ना काबिले तसव्वुर नुक्सान है.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 82,📕*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *रमज़ान की रातों में खेलकूद :* क़ब्र का भयानक मन्ज़र नामी हिकायत में रमजानुल " मुबारक की बे हुर्मती करने वाले का ख़ौफ़नाक अन्जाम पेश किया गया है । इस से दर्से इब्रत हासिल कीजिये । आह ! सद आह ! रमज़ानुल मुबारक की पाकीज़ा रातों में कई नौ जवान महल्ले में क्रिकेट , फुटबॉल वगैरा खेल खेलते , खूब शोर मचाते हैं और । इस तरह येह बद नसीब खुद तो इबादत से महरूम रहते ही हैं , दूसरों के लिये भी बेहद परेशानी का बाइस बनते हैं न तो खुद इबादत करते हैं न दूसरों को करने देते हैं । इस किस्म के , खेल अल्लाह पाक की याद से गाफ़िल करने वाले हैं । नेक - लोग तो इन खेलों से सदा दूर ही रहते हैं । खुद खेलना तो दर कनार ऐसे खेल तमाशे देखते भी नहीं बल्कि इस किस्म के | . खेलों का आंखों देखा हाल ( COMMENTARY ) भी नहीं सुनते । लिहाज़ा इन हरकात से हमेशा बचना चाहिये और खुसूसन रमज़ानुल मुबारक के बा बरकत लम्हात तो मे हरगिज़ हरगिज़ - इस तरह बरबाद नहीं करने चाहिये.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 83,📕*
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■➞ *रोज़े में वक़्त पास करने के लिये* काफी नादान ऐसे भी देखे जाते है जो अगरचे रोज़ा तो रख लेते है मगर फिर उन बेचारो का वक़्त पास नही होता। लिहाज़ा वो भी ऐहतिरामे रमज़ान को एक तरफ रख कर हराम व ना जाइज़ कामो का सहारा ले कर वक़्त पास करते है और यु रमज़ान में शतरंज, ताश, लुड्डू, गाने बाजे, वगेरा में मश्गुल हो जाते है।
■➞ याद रखिये ! शतरंज और ताश वगैरा पर शर्त न भी लगाई जाए तब भी ये खेल ना जाइज़ है। बल्कि ताश में चुकी जानदारों की तस्वीरें भी होती है इस लिये मेरे आक़ा आला हज़रत رحمة الله عليه ने ताश को मुतलकन हराम लिखा है। चुनांचे फ़रमाते है ताश हरामे मुतलक़ है की इन में इलावा लहवो लइब के तस्वीरों की ताज़ीम है। *फतवा रज़विय्या, 24/141*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 75,📕*
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③⑥
*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *अफ़्ज़ल इबादत कौन सी ?* ऐ जन्नत के तलबगार रोज़ादार इस्लामी भाइयो ! रमज़ान के मुक़द्दस लम्हात को फुज़ूलियात व खुराफात में बर्बाद होने से बचाइये ! ज़िन्दगी बेहद मुख़्तसर है इस को गनीमत जानिये, ताश की गड्डियों और फ़िल्मी गानो के ज़रिए वक़्त पास (बल्कि बर्बाद) करने के बजाए तिलावते क़ुरआन और ज़िक्रो दुरुद में वक़्त गुज़ारने की कोशिश फरमाये। भूक प्यास की शिद्दत जिस क़दर ज़्यादा महसूस होगी सब्र करने पर أن شاء الله षवाब भी उसी क़दर ज़ाइद मिलेगा। जैसा की मन्कुल है, अफ़्ज़ल इबादत वो है जिस में ज़हमत (तकलीफ) ज़्यादा है।
■➞ इमाम शरफुद्दीन नववी عليه رحمة फ़रमाते है, इबादत में मशक़्क़त और खर्च ज़्यादा होने से षवाब और फ़ज़ीलत ज़्यादा हो जाती है। *शरेह सहीह मुस्लिम लिन्न-ववी, 1/390*
■➞ हज़रते इब्राहिम बिन अदहम رحمة الله عليه का फरमान है : दुन्या में जो नेक अमल जितना दुश्वार होगा क़यामत के रोज़ नेकियो के पलड़े में उतना ही ज़्यादा वज़नदार होगा। *तज़किरतुल औलिया, 95*
■➞ इन रिवायत से साफ़ ज़ाहिर हुवा की हमारे लिये रोज़ा रखना जितना दुश्वार और नफ्से बदकार के लिये जिस क़दर ना गवार होगा, أن شاء الله बरोज़े शुमार मिज़ाने अमल में उतना ही ज़्यादा वज़नदार होगा.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 85,📕*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ _*रोज़े में ज़्यादा सोना*_ हज़रते इमाम मुहम्मद ग़ज़ाली عليه رحمة फ़रमाते है : रोज़ादार के लिये सुन्नत ये है की दिन के वक़्त ज़्यादा देर न सोए बल्कि जागता रहे ताकि भूक और कमज़ोरी का असर महसूस हो *किमियाए सआदत, 185*
■➞ (अगरचे अफ़्ज़ल कम सोना ही है फिर भी अगर ज़रूरी इबादत के इलावा कोई शख्स सोया रहे तो गुनाहगार न होगा)
■➞ मीठे और प्यारे इस्लामी भाइयो ! साफ़ ज़ाहिर है की जो दिन भर रोज़े में सो कर वक़्त गुज़ार दे उस को रोज़े का पता ही क्या चलेगा ? हज़रते इमाम ग़ज़ाली عليه رحما तो ज़्यादा सोने से भी मना फ़रमाते है की इस तरह भी वक़्त फ़ालतू पास हो जाएगा। तो जो लोग खेल तमाशो में और हराम कामो में वक़्त बर्बाद करते है वो किस क़दर महरूम व बद नसीब है। इस मुबारक महीने की क़द्र कीजिये, इस का ऐहतिराम बजा लाइये, इस में खुशदिली के साथ रोज़े रखिये और अल्लाह की रिज़ा हासिल कीजिये। ऐ हमारे प्यारे अल्लाह फैजाने रमज़ान से हर मुसलमान को मालामाल फरमा। इस माहे मुबारक की क़द्र व मन्ज़िलत नसीब कर और इस की बे अदबी से बचा.✍️
*امين بجاه النبي الامين*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 86,📕*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *अहकामे रोज़ा* अल्लाह का कितना बड़ा करम है की उसने हम पर माहे रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ करके हमारे लिये तक़वा और अपनी रिज़ा जुइ का सामान फरामह किया। अल्लाह पारहा 2 सूरतुल बक़रह की आयत 183 ता 184 में इर्शाद फ़रमाता है :
■➞ ऐ ईमान वालो ! तुम पर रोज़े फ़र्ज़ किये गए जैसे अगलों पर फ़र्ज़ हुए थे की कहि तुम्हे परहेज़गारी मिले, गिनती के दिन है तो तुम में जो कोई बीमार या सफर में हो तो इतने रोज़े और दिनों में और जिन्हें इस की ताक़त न हो वो बदले में एक मिसकीन का खाना फिर जो अपनी तरफ से नेकी ज़्यादा करे तो वो उस के लिये बेहतर है और रोज़ा रखना तुम्हारे लिये ज़्यादा भला है अगर तुम जानो.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 90,📕*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*🌷अहकामे रोज़ा🌷*
■➞ *रोज़ा किस पर फ़र्ज़ है ?* तौहीद व रिसालत का इक़रार करने और तमाम ज़रुरियाते दीन पर ईमान लाने के बाद जिस तरह हर मुसलमान पर नमाज़ फ़र्ज़ क़रार दी गई है इसी तरह रमज़ान के रोज़े भी हर मुसलमान अक़ील व बालिग़ पर फ़र्ज़ है। दुर्रे मुख्तार में है रोज़े 10 शाबानुल मुअज़्ज़म सिने 2 हिजरी को फ़र्ज़ हुए। *दुर्रे मुख्तार मअ रद्दुल मुहतार, 3/330*
■➞ _*रोज़ा फ़र्ज़ होने की वजह*_ इस्लाम में अक्सर आमाल किसी न किसी रूह परवर वाक़ीए की याद ताज़ा करने के लिये मुक़र्रर किये गए है। मसलन सफा और मर्वाह के दरमियान हाजियो की सअय हज़रते हाजिरा رضي الله عنها की यादगार है। इसी तरह माहे रमज़ान में से कुछ दिन हमारे प्यारे सरकार صلى الله عليه وسلم ने गारे हिरा में गुज़ारे थे। इस दौरान आप दिन को खाने से परहेज़ करते और रात को ज़िकरुलाह में मश्गुल रहते थे। तो अल्लाह ने उन दिनों की याद ताज़ा करने के लिये रोज़े फ़र्ज़ किये ताकि उस के महबूब صلى الله عليه وسلم की सुन्नत क़ाइम रहे।
■➞ _*अम्बियाए किराम के रोज़े*_ रोज़ा गुज़श्ता उम्मतों में भी फ़र्ज़ था मगर उस की सूरत हमारे रोज़े से मुख़्तलिफ़ थी। रिवायत से पता चलता है की "हज़रते आदम सफिय्युल्लाह عليه السلام ने 13, 14, 15 तारीख को रोजा रखा। *कन्जुल उम्माल, 8/258, हदिष:24188*
■➞ हज़रते नूह नजिय्युल्लाह عليه السلام हमेशा रोज़ादार रहते। *इब्ने माजह, 2/333, हदिष:1714*
■➞ हज़रते ईशा रूहल्लाह عليه السلام हमेशा रोजा रखते थे कभी न छोड़ते थे। *कन्जुल उम्माल, 8/304, हदिष:24624*
■➞ हज़रते दाऊद عليه السلام एक दिन छोड़ कर एक दिन रोज़ा रखते थे। *सहीह मुस्लिम, 584, हदिष:1189*
■➞ हज़रते सुलेमान عليه السلام तीन दिन महीने के शुरू में तीन दिन दरमियान और तीन दिन आखिर में (यानि महीने में 9 दिन) रोज़ा रखा करते। *कन्जुल उम्माल, 8/304, हदिष:24624*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 93,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*🌷अहकामे रोज़ा🌷*
■➞ *रोज़ादार का ईमान कितना पुख्ता है !* सख्त गर्मी है, प्यास से हल्क़ सुख रहा है, हॉट खुश्क हो रहे है, पानी मौजूद है मगर रोज़ादार उस की तरफ देखता तक नही, खाना मौजूद है भूक की शिद्दत से हालत दीगर गू है मगर वो खाने की तरफ हाथ तक नही बढ़ाता। आप अन्दाज़ फरमाइये इस शख्स का खुदाए रहमान पर कितना पुख्ता ईमान है क्यू की वो जानता है की इस की हरकत सारी दुन्या से तो छुप सकती है मगर अल्लाह से पोशीदा नही रह सकती। अल्लाह पर इस का ये यक़ीने कामिल रोज़े का अमली नतीजा है। क्यू की दूसरी इबादतें किसी न किसी ज़ाहिरी हरकत से अदा की जाती है मगर रोज़े का तअल्लुक़ बातिन से है। इस का हाल अल्लाह के सिवा कोई नही जानता अगर वो छुप कर खा पी ले तब भी लोग तो येही समझते रहेंगे की ये रोज़ादार है। मगर वो महज़ खौफे खुदा के बाइस खाने पीने से अपने आप को बचा रहा है।
■➞ हो सके तो अपने बच्चों को भी जल्दी जल्दी रोज़ा रखने की आदत डलवाये ताकि जब वो बालिग़ हो जाए तो उन्हें रोज़ा रखने में दुश्वारी न हो। चुनान्चे फ़ुक़हाए किराम फ़रमाते है, बच्चे की उम्र 10 साल की हो जाए और उस में रोज़ा रखने की ताक़त हो तो उस से रमज़ान में रोज़ा रखवाया जाए। अगर पूरी ताक़त होने के बा वजूद न रखे तो मार कर रखवाये अगर रख कर तोड़ दिया तो क़ज़ा का हुक्म न देंगे। और नमाज़ तोड़ दे तो फिर पढ़वाइये। *रद्दुल मुहतार, 3/385*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 93,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*🌷अहकामे रोज़ा🌷*
■➞ *रोज़े से सिह्हत मिलती है* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : बेशक अल्लाह ने बनी इस्राइल के एक नबी की तरफ वही फ़रमाई की आप अपनी क़ौम को खबर दीजिये की जो भी बन्दा मेरी रिज़ा के लिये एक दिन का रोज़ा रखता है तो उस के जिस्म को सिह्हत भी अता फ़रमाता हु और उस को अज़ीम अज्र भी दूंगा। *शुएबुल ईमान, 3/412, हदिष:3923*
■➞ *साबिक़ा गुनाहो का कफ़्फ़ारा* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जिसने रमज़ान का रोज़ा रखा और उस की हुदूद को पहचाना और जिस चीज़ से बचना चाहिये उस से बचा तो जो (कुछ गुनाह) पहले कर चूका है उस का कफ़्फ़ारा हो गया। *अल एहसान बि-तरतीब सहीह इब्ने अब्बास, 5/183, हदिष:3424*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 101,📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*🌷अहकामे रोज़ा🌷*
■➞ *रोज़े की जज़ा* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : आदमी के हर नेक काम का बदला दस से सात सौ गुना तक दिया जाता है। अल्लाह ने फ़रमाया : सिवाए रोज़े के की रोज़ा मेरे लिये है और इस की जज़ा में खुद दूंगा। अल्लाह का मज़ीद इर्शाद है, बन्दा अपनी ख्वाहिश और खाने को सिर्फ मेरी वजह से तर्क करता है। रोज़ादार के लिये दो खुशियां है। एक इफ्तार के वक़्त और एक अपने रब से मुलाक़ात के वक़्त। रोज़ादार में मुह की बू अल्लाह के नज़दीक मुश्क से ज़्यादा पाकीज़ा है। *सहीह मुस्लिम, 580, हदिष:1151*
■➞ *रोज़े का खुसूसी इनआम* बयान करदा हदिष में रोज़े की कई खुसुसिय्यात इर्शाद फ़रमाई गई है। कितनी प्यारी बशारत है उस रोज़ादार के लिये जिस ने इस तरह रोजा रखा जिस तरह रोज़ा रखने का हक़ है। यानी खाने पीने और जीमाअ से बचने के साथ साथ अपने तमाम आज़ा को भी गुनाहो से बाज़ रखा तो वो रोज़ा अल्लाह के फज़्लो करम से उस के लिये तमाम पिछले गुनाह का कफ़्फ़ारा हो गया। और हदिष का ये फरमान रोज़ा मेरे लिये है और इस की जज़ा में खुद ही दूंगा। इस इर्शाद को मुहद्दिसिने किराम ने भी पढ़ा है जैसा की तफ़सीरे नईमी वगैरा में है "रोज़े की जज़ा में खुद ही हु।" यानी रोज़ा रख कर रोज़ादार बी ज़ाते खुद अल्लाह तआला ही को पा लेता है।
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 103,📕*
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*🌷अहकामे रोज़ा🌷*
■➞ *हम रसूलुल्लाह ﷺ के जन्नत रसूलुल्लाह ﷺ की* हज़रते रबीआ बिन काब अस्लमी رضي الله عنه फ़रमाते है, एक मर्तबा में ने हुज़ूर صلى الله عليه وسلم को वुज़ू करवाया तो खुद रहमतुल्लिल आलमीन صلى الله عليه وسلم ने खुश हो कर इर्शाद फ़रमाया : रबीआ ! मांग क्या मांगता है ? हज़रते रबीआ ने अर्ज़ की, जन्नत में आप की रफाकत (यानी पड़ौस) चाहिये।
■➞ दरियाए रहमत मज़ीद जोश में आया और फ़रमाया कुछ और मांगना है ? मेने ऐज़ की, बस सिर्फ येही। जब हज़रत रबीआ رضي الله عنه जन्नत की रफ़ाक़त तलब कर चुके और मज़ीद किसी हाजत के तलब करने से इनकार कर दिया तो इस पर हुज़ूर صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : अपने नफ़्स पर कसरते सुजूद (यानि ज़्यादा नवाफ़िल) से मेरी मदद कर। *सहीह मुस्लिम, 253, हदिष:489*
■➞ (यानि हमने तुम्हे जन्नत तो अता कर ही दी अब तुम भी बतौरे शुक्राना नवाफ़िल की कसरत करते रहो।)
■➞ *जो चाहो मंगलो* इस हदिष ने तो ईमान ही ताज़ा कर दिया। हज़रते शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी عليه رحما फ़रमाते है, सरकार صلى الله عليه وسلم का बिला किसी तक़्यिद व रख़्सिस मुतलक़न फरमाना, मांग क्या मांगता है ? इस बात को ज़ाहिर करता है कि सारे ही मुआमलात सरवरे कायनात صلى الله عليه وسلم के मुबारक हाथ में है, जो चाहे जिस को चाहे अपने रब के हुक्म से अता कर दे.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 108,📕*
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■➞ *जन्नती दरवाज़ा* हज़रते सहल बिन अब्दुल्लाह رضي الله تعالي عنه से रिवायत है, नबी ﷺ ने फ़रमाया : बेशक जन्नत में एक दरवाज़ा है जिस को रय्यान कहा जाता है, इससे क़यामत के दिन रोज़ादार दाखिल होंगे इनके इलावा कोई और दाखिल न होगा। कहा जाएगा : रोज़ेदार कहा है ? पस ये लोग खड़े होंगे, इनके इलावा कोई और इस दरवाज़े से दाखिल न होगा। जब ये दाखिल हो जाएंगे तो दरवाज़ा बंद कर दिया जाएगा। *सहीह बुखारी, 1/625, हदिष:1896*
■➞ *जिस्म की ज़कात* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : हर शय के लिये ज़कात है और जिस्म की ज़कात रोज़ा है और रोज़ा आधा सब्र है *सुनन इब्ने माजह, 2/347, हदिष:1745*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 108,📕*
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■➞ *सोना भी इबादत है* हज़रते अब्दुल्लाह बिन अबी ऑफ رضي الله تعالي عنه से रिवायत है, मदीने के ताजदार ﷺ का फरमान है : रोज़ादार का सोना इबादत और उस की खामोशी तस्बीह करना और उसकी दुआ क़बूल और उसका अमल मक़बूल होता है। *शोएबुल ईमान,3/415 हदीस 3938*
■➞ सुब्हान अल्लाह रोज़ादार किस क़दर बख्तवर है कि उसका सोना बन्दगी, ख़ामोशी तस्बिहे खुदावन्दि दुआए और आमाल हसना मक़्बुले बारगाहे इलाही है।
■➞ *आज़ा का तस्बीह करना* उम्मुल मोअमिनीन हज़रते आइशा सिद्दीक़ा रदिअल्लाहु अन्हा फरमाती है : मेरे सरताज ﷺ का फरमान है : जो बन्दा रोज़े की हालत में सुबह करता है, उसके लिये आसमान के दरवाज़े खोल दिये जाते है और उसके आज़ा तस्बीह करते है और अस्माने दुन्या पर रहने वाले फ़रिश्ते उसके लिये सूरज डूबने तक मग्फिरत की दुआ करते रहते है। अगर वो एक या दो रकअते पढता है तो ये आस्मानो में उसके लिये नूर बन जाती है और हुरे ऐन में से उसकी बिविया कहती है : ऐ अल्लाह तू इस को हमारे पास भेज दे, हम इस के दीदार की बहुत ज़्यादा मुश्ताक़ है और अगर वो लाइलाहा इल्लल्ला या सुब्हान अल्लाह या अल्हम्दु लिल्लाह पढ़ता है तो 70000 फ़रिश्ते उसका षवाब सूरज डूबने तक लिखते रहते है।
■➞ मीठे मीठे इस्लामी भाइयो ! दुन्या में तो रोज़ादारो पर रहमते इलाही की छमा छम बारिश होंगी ही, आख़िरत में भी इनको अज़ीमुश्शान मक़ामो मर्तबा हासिल होगा।.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान, सफह 108,📕*
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■➞ *सोने का दस्तर ख्वान* हज़रते अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास رضي الله تعالي عنه से मरवी है, हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया : क़यामत वाले दिन रिज़ादारो के लिये एक सोने का दस्तर ख्वान रखा जाएगा, हालांकि लोग (हिसाब किताब के) मुंतज़िर होंगे। *कंजुल उम्माल, 8/214 हदीस 23640*
■➞ *जन्नती फल* अमीरुल मोअमिनीन हज़रते अलिय्युल मुर्तज़ा رضي الله تعالي عنه से मरवी है : नबी ने फ़रमाया : जिसको रोज़े ने खाने या पिने से रोक दिया कि जिस की उसे ख्वाहिश थी, तो अल्लाह उसे जन्नती फ्लो में से खिलाएगा और जन्नती शराब से सैराब करेगा।.✍️
*🔰शोएबुल ईमान, 3/410 हदीस 3917📕*
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■➞ *बे हिसाब अज्र* हज़रते काबुल अहबार رضي الله عنه से मरवी है, फ़रमाते है, बरोज़े क़यामत एक मुनादी इस तरह निदा करेगा, अमल करने वाले को उसके अमल के बराबर अज्र दिया जाएगा सिवाए क़ुरआन वालो (यानी आलिमे क़ुरआन) और रोज़ादारो के की उन्हें बेहद व बेहिसाब अज्र दिया जाएगा। *शुएबुल ईमान, 3/413, हदिष:3928*
■➞ *जहन्नम से दुरी* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जिस ने अल्लाह की राह में एक दिन का रोज़ा रखा अल्लाह उस के चेहरे को जहन्नम से 70 साल की मसाफत दूर कर देगा.✍️
*🔰सहीह बुखारी, 2/265, हदिष:2840📗*
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■➞ *एक रोज़ा छोड़ने का नुक़्सान* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जिसने रमज़ान के एक दिन का रोज़ा बगैर रुखसत व बगैर मरज़ रोज़ा न रखा तो ज़माना भर तक रोज़ा भी उस की क़ज़ा नही हो सकता अगर्चे बाद में रख भी ले। *सहीह बुखारी, 1/638, हदिष:1934*
■➞ *उलटे लटके हुए लोग* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : में सोया हुआ था तो ख्वाब में दो शख्स मेरे पास आए और मुझे एक दुश्वार गुज़ार पहाड़ पर ले गए। जब में पहाड़ के दरमियानी हिस्से पर पहुचा तो वहा बड़ी सख्त आवाज़ें आ रही थी, में ने कहा, ये केसी आवाज़ें है ? मुझे बताया गया की ये जहन्नमियो की आवाज़ें है। फिर मुझे और आगे ले जाया गया तो मे ऐसे लोगो के पास से गुज़रा की उन को उन के टखनों की रगो में बांध कर उल्टा लटकाया गया था और उन लोगो के जबड़े फाड़ दिए गए थे जिन से खून बेह रहा था। मेने पूछा, ये कौन लोग है ? मुझे बताया गया की ये लोग रोज़ा इफ्तार करते थे क़ब्ल इस के की रोज़ा इफ्तार करना हलाल हो। (यानि रोज़ा नही रखते थे.✍️
*🔰सहीह इब्ने हब्बान, 9/286, हदिष:7448📕*
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■➞ *तीन बदबख्त* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जिसने माहे रमज़ान को पाया और उस के रोज़े न रखे वो शख्स शक़ी (बदबख्त) है। जिसने अपने वालिदैन या किसी एक को पाया और उन के साथ अच्छा सुलूक न किया वो भी शक़ी (बदबख्त) है। और जिस के पास मेरा ज़िक्र हुवा और उस ने मुझ पर दुरुद न पढ़ा वो भी शक़ी (बदबख्त) है। *मज्मउ ज़्ज़वाइद, 3/340, हदिष:4773*
■➞ *नाक मिटटी में मिल जाए* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : उस शख्स की नाक मिट्टी मेबमिल जाए की जिस के पास मेरा ज़िक्र किया गया तो उस ने मुझ पर दुरुद नही पढ़ा और उस शख्स की नाक मिट्टी में मिल जाए जिस पर रमज़ान का मिहना दाखिल हुवा फिर उस की मगफिरत होने से क़ब्ल गुज़र गया। और उस आदमी की नाक मिट्टी में मिल जाए की जिस के पास उस के वालिदैन ने बुढ़ापे को पा लिया और उस के वालिदैन ने उस को जन्नत में दाखिल नही किया। (यानि बूढ़े माँ बाप की खिदमत कर के जन्नत हासिल न कर सका.✍️
*🔰मुस्नदे अहमद, 3/61, हदिष:7455📘*
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■➞ *रोज़े के तीन दरजे* रोज़े की अगर्चे ज़ाहिरी शर्त ये है की रोज़ादार क़सदन खाने पिने और जीमाअ से बाज़ रहे। ता हम रोज़े के कुछ बातिनी आदाब भी है जिन का जानना जरूरी है ताकि हक़ीक़ी मानो में हम रोज़े की बरकतें हासिल कर सके।
■➞ *(1) अवाम का रोज़ा* रोज़ा के लुग्वी माना है "रुकना" लिहाज़ा शरीअत की इस्तिलाह में सुब्हे सादिक़ से ले कर गुरुबे आफताब तक क़सदन खाने पिने और जिमाअ से "रुके रहने" को रोज़ा कहते है और येही अवाम यानी आम लोगो का रोज़ा है।
■➞ *(2) खवास का रोज़ा* खाने पीने और जिमाअ से रुके रहने के साथ साथ जिस्म के तमाम आज़ा को बुराइयो से "रोकना" खवास यानी ख़ास लोगो का रोज़ा है।
■➞ *(3) अखस्सुल खवास का रोज़ा* अपने आप को तर उमूर से "रोक" कर सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की तरफ मुतवज्जेह होना, ये अखस्सुल खवास यानी खासुल ख़ास लोगो का रोज़ा है। ज़रूरत इस अम्र की है की खाने पीने वगैरा से "रुके रहने" के साथ साथ अपने तमाम तर आज़ाए बदन को भी रोज़े का पाबन्द बनाया जाए.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान,सफह 121📕*
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■➞ *रोज़ा रख कर भी गुनाह तौबा ! तौबा !* मीठे और प्यारे इस्लामी भाइयो ! खुदारा ! अपने हाले ज़ार पर तरस खाइये और गौर फरमाइये ! की रोज़ादार माहे रमज़ान में दिन के वक़्त खाना पीना छोड़ देता है हलाकि ये खाना पीना इस से पहले दिन में भी बिलकुल जाइज़ था। फिर खुद ही सोच लीजिये की जो चीज़े रमज़ान से पहले हलाल थी वो भी जब इस मुबारक महीने के मुक़द्दस दिनों में मना कर दी गई। तो जो चीज़े रमज़ान से पहले भी हराम थी, मसलन झूट, गीबत, चुगली, बाद गुमानी, गालम गलोच, फिल्में ड्रामे, गाने बाजे, बद निगाही, दाढ़ी मुंडाना या एक मुठ से घटाना, वालिदैन को सताना, बिला इजाज़ते शरई लोगो का दिल दुखाना वगैरा, वो रमज़ान में क्यू न और भी ज़्यादा हराम हो जाएगी ?
■➞ रोज़ादार जब रमज़ान में हलाल व तय्यिब खाना पीना छोड़ देता है, हराम काम क्यू न छोड़ दे ? अब फरमाइये ! जो शख्स पाक और हलाल खाना पीना तो छोड़ दे लेकिन हराम और जहन्नम में ले जाने वाले काम ब दस्तूर जारी रखे वो किस किस्म का रोज़ादार है ?
■➞ *अल्लाह को कुछ हाजत नही* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जो बुरी बात कहना और उस पर अमल करना न छोड़े तो उस के भूका प्यासा रहने की अल्लाह को कुछ हाजत नही।
*✍🏼सहीह बुखारी, 1/628, हदिष:1903*
■➞ एक और मक़ाम पर फ़रमाया : सिर्फ खाने और पीने से बाज़ रहने का नाम रोज़ा नही बल्कि रोज़ा तो ये है की लग्व और बे हुदा बातो से बचा जाए। *मुस्तदरक लील हाकिम, 2/67, हदिष:1611*
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान,सफह 123📕*
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■➞ *आज़ा के रोज़ो की तारीफ़* आज़ा का रोज़ा यानी जिस्म के तमाम हिस्सों को गुनाहो से बचाना, ये सिर्फ रोज़ा ही के लिये मख़्सूस नही बल्कि पूरी ज़िन्दगी इन आज़ा को गुनाहो से बचाना ज़रूरी है और ये जभी मुमकिन है की हमारे दिलो में ख़ौफ़ेखुदा रासिख हो जाए। आह ! क़यामत के उस होशरुबा मन्ज़र को याद कीजिये जब हर तरफ "नफ्सी नफ्सी" का आलम होगा। सूरज आग बरसा रहा होगा। ज़बाने शिद्दते प्यास के सबब मुह से बाहर निकल पड़ी होगी। बीवी शौहर से, माँ अपने लख्ते जिगर से और बाप अपने नुरे नज़र से नज़र बचा रहा होगा। मुजरिमो को पकड़ पकड़ कर लाया जा रहा होगा। उन के मुह पर मोहर मार दी जाएगी और उन के आज़ा उन के गुनाहो की दास्तान सुना रहा होंगे जिस का क़ुरआन की सूरए यासीन की आयत 65 में यु तज़किरा किया गया है :
■➞ "आज हम इन के मुहो पर मोहर कर देंगे और उन के हाथ हम से बात करेंगे और उन के पाँव उन के किये की गवाही देंगे।" आह ! क़यामत के उस कड़े वक़्त से अपने दिल को दराइये और हर वक़्त अपने तमाम आज़ाए बदन को मासिय्यत की मुसीबत से बाज़ रखने की कोशिश फरमाइये।.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान,सफह 125📕*
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■➞ *आँख का रोज़ा* आँख का रोज़ा इस तरह रखना चाहिये की आँख जब भी उठे तो सिर्फ और सिर्फ जाइज़ उमूर ही की तरत उठे। आँख से मस्जिद देखिये, क़ुरआन देखिये, मज़ाराते औलिया की ज़ियारत कीजिये। अल गरज़ कोई भी नाजाइज़ व हराम चीज़ देखने से बचे। और आँख का रोज़ तो 24 गंटे 30सो दिन और बारह महीने होना चाहिए।
■➞ *कान का रोज़ा* कान का रोज़ा ये है की सिर्फ और सिर्फ जाइज़ बाते सुने। मसलन कानो से तिलावत व नात सुनिये, सुन्नतो भरे बयानात सुनिये।
■➞ *ज़बान का रोज़ा* ज़बान का रोज़ा ये है की ज़बान सिर्फ और सिर्फ नेक व जाइज़ बातो के लिये ही हरकत में आए। मसलन ज़बान से तिलावते क़ुरआन कीजिये, ज़िक्रो दुरिद का विर्द कीजिये। दर्स दीजिये सुन्नतो भरा बयान कीजिये, नेकी की दावत दीजिये। फ़ुज़ूल बकबक से बचते रहिये।
■➞ *हाथ का रोज़ा* हाथो का रोज़ा ये है की जब भी उठे सिर्फ नेक कम के लिये उठे। मसलन क़ुरआन को हाथ लगाइये, नेक लोगो से मुसाफहा कीजिये, हो सके तो किसी यतीम के सर पर शफ़क़त से हाथ फेरिये की हाथ के निचे जितने बाल आएगे हर बाल के इवज़ एक नेकी मिलेगी।
■➞ *_पाँव का रोज़ा_* पाँव का रोज़ा ये है की पाँव उठे तो सिर्फ नेक कामो के लिये उठे। मसलन पाँव चले तो मसाजिद की तरफ, मज़ारते औरलिया की तरफ, सुन्नतो भरे इज्तेमअ की तरफ, नेकी की दावत के लिये, किसी की मदद के लिये चले। वाक़ई हक़ीक़ी मानो में रोज़े की बरकत तो उसी वक़्त नसीब होगी जब हम तमाम आज़ा का भी रोज़ा रखेंगे। वरना भूक और प्यास के सिवा कुछ भी हासिल न होगा.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान,सफह 125📕*
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■➞ *सोने के बाद सहरी की इजाज़त न थी* रात को उठ कर सहरी करने की इजाज़त नही थी. रोज़ा रखने वाले को गुरुबे आफ़ताब के बाद सिर्फ उस वक़्त तक खाने पिने की इजाज़त थी जब तक वो सो न जाए. अगर सो गया तो अब बेदार हो कर खाना पीना ममनुअ था। मगर अल्लाह ने अपने प्यारे बन्दों पर एहसान अज़ीम फ़रमाते हुए सहरी की इजाज़त दी और इस का सबब यु हुवा....
■➞ *सहरी की इजाज़त की हिकायत* हज़रते सरमा बिन क़ैस رضي الله عنه मेहनती शख्स थे। एक दिन बी हालते रोज़ा अपनी ज़मीन में दिन भर काम कर के शाम को घर आए। अपनी ज़ौजा से खाना तलब किया, वो पकाने में मसरूफ़ हुई। आप थके हुए थे, आँख लग गई। खाना तैयार कर के जब आप को जगाया गया तो आप ने खाने से इनकार कर दिया। क्यू की उन दिनों (गुरुबे आफ़ताब के बाद) सो जाने वाले के लिये खाना पीना ममनुअ हो जाता था। चुनान्चे खाए पाई बगैर आप ने दूसरे दिन भी रोज़ा रख लिया। आप कमज़ोरी के सबब बेहोश हो गए। *तफ्सिरल ख़ाज़िन, 1/126*
■➞ तो इन के हक़ में ये आयते मुक़द्दसा नाज़िल हुई : और खाओ और पियो यहा तक की तुम्हारे लिये ज़ाहिर हो जाए सपेदी का डोरा सियाही के डोरे से पो फट कर। फिर रात आने तक रोज़े पुरे करो। *पारहा, 2 अल बक़रह, 187* इससे ये मालुम हुवा की रोज़े का अज़ान फज्र से कोई तअल्लुक़ नही यानी फज्र की अज़ान के दौरान खाने पिने का कोई जवाज़ ही नही। अज़ान हो या न हो आप तक आवाज़ पहुचे या न पहुचे सुब्हे सादिक़ होते ही आप को खाना पीना बिल्कुल ही बन्द करना होगा।
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान,सफह 155📕*
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■➞ *सहरी करना सुन्नत है* अल्लाह का करोड़ हा एहसान की उस ने हमे रोज़े जेसी अज़ीमुश्शान नेअमत अता फ़रमाई और साथ ही कुव्वत के लिये सहरी की न सिर्फ इजाज़त फ़रमाई बल्कि इस में हमारे लिये ढेरो षवाब भी रख दिया।
■➞ हमारे प्यारे आक़ा صلى الله عليه وسلم अगर्चे खाने, पीने के हमारी तरह मोहताज नही। ता हम हमारे प्यारे आक़ा صلى الله عليه وسلم हम गुलामो की खातिर सहरी फ़रमाया करते ताकि महब्बत वाले गुलाम अपने आक़ा की सुन्नत समज कर सहरी कर लिया करे। यु उन्हें दिन के वक़्त रोज़े में कुव्वत के साथ साथ सुन्नत पर अमल करने का षवाब भी हाथ आए।
■➞ बाज़ इस्लामी भाइयो को देखा गया है की कभी सहरी करने से रह जाते है तो फिख्रिया बाते बनाते है और कहते है, हमने तो सहरी के बगैर ही रोज़ा रख लिया। सहरी के बगैर रोज़ा रखना कोई कमाल तो नही जिस पर फख्र किया जा रहा है। बल्कि सहरी की सुन्नत छूटने पर नदामत होनी चाहिये, अफ़सोस करना चाहिये की हुज़ूर صلى الله عليه وسلم की एक अज़ीम सुन्नत छूट गई।
■➞ *हज़ार साल की इबादत से बेहतर* हज़रते शैख़ शरफुद्दीन अल मारूफ़ बाबा बुलबुल शाह رحمة الله عليه फ़रमाते है, अल्लाह ने मुझे अपनी रहमत से इतनी ताक़त बख्शी है की में बगैर खाए, पिये और बगैर साज़ो सामान के अपनी ज़िन्दगी गुज़ार सकता हु। मगर चुकी ये उमूर हुज़ूर صلى الله عليه وسلم की सुन्नत नही है इस लिये में इन से बचत हु, _मेरे नज़दीक सुन्नत की पैरवी हज़ार साल की इबादत से बेहतर है।.✍️_
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान,सफह 155📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
✊یــــــــــــــــــــــــــــا رسول الــــلّٰــــه ﷺ ⚘
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*🌷अहकामे रोज़ा🌷*
■➞ *क़र्ज़ से नजात का अमल* हर नमाज़ के बाद 7 बार सूरए कुरैश (अव्वल आखिर दुरुद शरीफ) पढ़ कर दुआ मांगिये। पहाड़ जितना क़र्ज़ होगा तब भी أن شاء الله अदा हो जाएगा।
अमल ता हुसुले मुराद जारी रखिये।
■➞ *कर्ज़ा उतारने का वज़ीफ़ा*
*🤲🏻اٙللّٰهُمّٙ اكْفِـنِىْ بِـحٙـلٙالِكٙ عٙنْ حٙرٙامِكٙ وٙاٙغْـنِـنِىْ بِـفٙـضْـلِكٙ عٙـمّٙـنْ سِوٙاكٙ*
■➞ *तर्जमा* : या अल्लाह मुझे हलाल रिज़्क़ अता फरमा कर हराम से बचा और अपने फज़्लो करम से अपने सिवा गैरो से बे नियाज़ कर दे।
■➞ हर नमाज़ के बाद 11 बार और सुबहो, शाम 100, 100 बार रोज़ाना (अव्वल आखिर दुरुद शरीफ) पढ़िये।
■➞ *मदनी इल्तिज़ा* अमल शुरू करने से क़ब्ल हुजुरे गौषे आज़म رضي الله عنه के ईसाले षवाब के लिये कम अज़ कम 11 रूपये की नियाज़ और काम हो जाने की सूरत में कम अज़ कम 25 रुपये की नियाज़ इमाम अहमद रज़ा खान رحمة الله عليه के ईसाले षवाब के लिये तक़सीम कीजिये.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान,सफह 165📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
✊یــــــــــــــــــــــــــــا رسول الــــلّٰــــه ﷺ ⚘
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*🌷अहकामे रोज़ा🌷*
■➞ *_इफ्तार के वक़्त दुआ क़बूल होती है_* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : बेशक रोज़ादार के लिये इफ्तार के वक़्त एक ऐसी दुआ होती है जो रद नही की जाती। *अत्तरगिब् वत्तरहिब, 2/53, हदिष:29*
■➞ फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : तीन शख्स की दुआ रद नही की जाती...
1. रोज़ादार की बी वक़्ते इफ्तार
2. बादशाहे आदिल
3. मज़लूम
इन तीनो की दुआ अल्लाह बादलो से भी ऊपर उठा लेता है और आसमानों के दरवाज़े उस के लिये खुल जाते है और अल्लाह फ़रमाता है, मुझे मेरी इज़्ज़त की क़सम ! में तेरी ज़रूर मदद फरमाउंगा अगर्चे कुछ देर बाद हो। *सुनने इब्ने माजह, 2/349, हदिष:1752*
■➞ *_दुआ के तीन फ़वाइद_* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : दुआ बन्दे की तिन बातो से खाली नही होती (1) या उसका गुनाह बख्शा जाता है। यव(2) उसे फायदा हासिल होता है। या (3) उसके लिये आख़िरत में बलाई जमा की जाती है की जब बन्दा आख़िरत में अपनी दुआओ का षवाब देखेगा जो दुन्या में मक़बूल न हुई थी, तो तमन्ना करेगा, काश ! दुन्या में मेरी कोई दुआ क़बूल न होती और सब यही (यानी आख़िरत) के वासिते जमा हो जाती *अत्तरगिब् वत्तरहिब, 2/315*
■➞ देखा आप ने, दुआ राएगा तो जाती ही नही। इस का दुन्या में अगर असर ज़ाहिर न भी हो तो आख़िरत में अज्र व षवाब मिल ही जाएगा। लिहाज़ा दुआ में सुस्ती करना मुनासिब नही.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान,सफह 186📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*🌷अहकामे रोज़ा🌷*
■➞ *रोज़ा तोड़ने वाली बाते* खाने, पीने या हम बिस्तरी करने से रोज़ा जाता रहता है जब की रोज़ादार होना याद हो। *रद्दुल मुहतार, 3/365*
■➞ शकर वगैरा ऐसी चीज़े जो मुह में रखने से घुल जाती है मुह में रखी और थूक निगल गए रोज़ा जाता रहा। *बहारे शरीअत, 5/117*
■➞ दातो के दरमियान कोई चीज़ चने के बराबर या ज़्यादा थी उसे खा गए या कम ही थी मगर मुह से निकाल कर फिर खा ली तो रोज़ा टूट गया। *दुर्रे मुख्तार, 3/394*
■➞ दातो से खून निकल कर हल्क़ से निचे उतरा और खून थूक से ज़्यादा या बराबर या कम था मगर इस का मज़ा (टेस्ट) हल्क़ में महसूस हुवा तो रोज़ा जाता रहा और अगर कम था और मज़ा हल्क़ में महसूस न हुवा तो रोज़ा न गया। *दुर्रे मुख्तार, रद्दुल मुहतार, 3/368*
■➞ रोज़ा याद रहने के बा वुजूद हुक़्ना (यानि किसी दवा की बत्ती या पिचकारी पीछे के मक़ाम में चढ़ाना जिस से इजाबत हो जाए) लिया। या नाक के नथनों से दवाई चढ़ाई रोज़ा टूट गया। *आलमगिरी, 1/204*
■➞ कुल्ली कर रहे थे बिला क़स्द पानी हल्क़ से उतर गया या नाक में पानी चढ़ाया और दिमाग को चढ़ गया रोज़ा जाता रहा। यु ही रोज़ादार की तरफ किसी ने कोई चीज़ फेकी वो उस के हल्क़ में चली गई तो रोज़ा टूट गया.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान,सफह 201📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*🌷अहकामे रोज़ा🌷*
■➞ *रोज़ा तोड़ने वाली बाते* सोते में (या नींद की हालत में) पानी पी लिया या कुछ खा लिया, या मुह खुला था, पानी का क़तरा या बारिश का ओला हल्क़ में चला गया तो रोज़ा टूट गया।
■➞ दूसरे का थूक निगल लिया या अपना ही थूक हाथ में ले कर निगल लिया तो रोज़ा टूट गया ।जब तक थूक बलगम मुह के अंदर मौजूद हो उसे निगल जाने से रोज़ा नही टूटता, बार बार थूकते रहना ज़रूरी नही।
■➞ मुह में रंगीन डोरा वगैरा रखा जिस से थूक रंगीन हो गया फिर वो रंगीन थूक निगल गए तो रोज़ा टूट गया।
■➞ आसु मुह में चला गया और आप उसे निगल गए। अगर क़तरा दो क़तरा है तो रोज़ा न गया और ज़्यादा था की उस की नमकिनी पुरे मुह में महसूस हुई तो रोज़ा टूट गया। पसीने का भी यही हुक्म है।
■➞ फुज़ले का मक़ाम बाहर निकल आया तो हुक्म ये है की खूब अच्छी तरह किसी कपड़े वगैरा से पूछ कर उठे ताकि तरी बाक़ी न रहे। अगर कुछ पानी उस पर बाक़ी था और खड़े हो गए जिस की वजह से पानी अन्दर चला गया तो रोज़ा फासिद हो गया। इसी वजह से फुकहाऐ किराम फ़रमाते है की रोज़ादार इस्तिन्ज़ा करने में सास न ले.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान,सफह 203📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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■➞ *रोज़े में क़ै होना* बाज़ अवक़ात जब रोज़े में क़ै हो जाती है तो लोग परेशान हो जाते है बल्कि बाज़ तो समझते है की रोज़े में खुद ब खुद क़ै हो जाने से भी रोज़ा टूट जाता है। हालांकि ऐसा नही।
■➞ फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जिस को माहे रमज़ान में खुद बखुद क़ै आई उसका रोज़ा न टुटा और जिस ने जान बुझ कर क़ै की उस का रोज़ा टूट गया। *कन्जुल उम्माल, 8/230, हदिष:23814*
■➞ एक और मक़ाम पर इर्शाद फ़रमाया : जिस को खुद बखुद क़ै आई उस पर क़ज़ा नही और जिस ने जानबूझ कर क़ै की वो रोज़े की क़ज़ा करे। *तिर्मिज़ी, 2/173, हदिष:720*
■➞ अगर रोज़ा याद होने के बा वुजूद क़सदन (यानि जानबूझ कर) क़ै की और अगर वो मुह भर है तो अब रोज़ा टूट गया। क़सदन मुह भर होने वाली क़ै से भी इस सूरत में रोज़ा टूटेगा जब की क़ै में खाना या (पानी) या कड़वा पानी या खून आए।
■➞ अगर क़ै में सिर्फ बलगम निकला तो रोज़ा नही टूटेगा। मुह भर क़ै बिला इख़्तियार हो गई तो रोज़ा न टूटा अलबत्ता अगर इस में से एक चने के बराबर भी वापस लौटा दी तो रोज़ा टूट जाएगा। और एक चने से कम हो तो रोज़ा न टुटा।
■➞ *मुह भर क़ै की तारीफ़* मुह भर क़ै के माना ये है, "इसे बिला तकल्लुफ न रोका जा सके।
■➞ *ज़रूरी हिदायत* मुह भर क़ै (बलगम के इलावा) नापाक है। इस का कोई छीटा कपड़े या जिस्म पर न गिरने पाए इस की एहतियात फरमाइये। आजकल लोग इस में बड़ी बे एहतियाती करते है, कपड़ो पर छीटे पड़ने की कोई परवाह नही करते और मुह वगैरा पर जो नापाक क़ै लग जाती है उस को भी बिला झिजक अपने कपड़ो से पूछ लेते है। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हमे नफासत से बचने का ज़हन इनायत फरमाए.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान,सफह 205📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*
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*🌹 माहे र-मज़ान शरीफ 🌹*
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*🌷अहकामे रोज़ा🌷*
■➞ *भूल कर खाने पिने से रोज़ा नही जाता* फरमाने मुस्तफा صلى الله عليه وسلم : जिस रोज़ादार ने भूल कर खाया पिया वो अपने रोज़े को पूरा करे की उसे अल्लाह ने खिलाया और पिलाया। *सहीह बुखारी, 1/636, हदिष:1933*
■➞ *रोज़ा न तोड़नेवाली बाते* रोज़ा याद होने के बा वुजूद भी मख्खी या गुबार या धुवा हल्क़ में चले जाने से रोज़ा नही टूटता। ख्वाह गुबार आटे का हो जो चक्की पीसने या आटा छानने में उड़ता है या गल्ले का गुबार हो या हवा से ख़ाक उडी या जानवरो के खुर या टाप से।
■➞ अगरबत्ती सुलग रही है और उस का धुवा नाक में गया तो रोज़ा नही टूटेगा। हा अगर लुबान या अगरबत्ती सुलग रही हो और रोज़ा याद होने के बा वुजूद मुह क़रीब ले जा कर उस का धुवा नाक से खीचा तो रोज़ा फासिद् हो जाएगा।
■➞ गुस्ल किया और पानी की खुनकी (यानि ठन्डक) अंदर महसूस हुई जब भी रोज़ा नही टुटा।
■➞ कुल्ली की और पानी बिलकुल फेक दिया सिर्फ कुछ तरी मुह में बाक़ी रह गई थी थूक के साथ इसे निगल लिया, रोज़ा नही टुटा।
■➞ कान में पानी चला गया जब भी रोज़ा नही टुटा। बल्कि खुद पानी डाला जब भी न टुटा.✍️
*🔰फ़ज़ाइले रमज़ान,सफह 210📕*
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*🤲🏻 अपनी नेक दुआओं में याद रखें..✍🏻*

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