परेशन मुस्लमान मुकम्मल पोस्ट ओर पीडीएफ फ़ाइल बुक
*✍🏻 GROUP Admin muhammad Imran Razvi
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*पोस्ट का नाम- परेशान मुसलमान*
*✍🏻 नई पोस्ट शुरू होने वाली हैं*
✍🏻 इस पोस्ट में "अब्दुल्लाह" को एक करैक्टर बना कर मुफ्ती साहब से उन सवाल जवाब का सिलसिला शुरू किया जो अब्दुल्लाह जैसे करोड़ों कम इल्म लोगों को तकरीबन रोज़ परेशान कर रहा है और हज़ारों लोग अपने ईमान को गंवा रहे हैं। अब इस पोस्ट में हिन्दीदाँ तबके को सैकड़ों उन सवालों के जवाब आसान ज़बान में मिल गए जो उसको बहुत परेशान करते हैं और वह बहुत से सवालों के जवाब जानते हुए भी दे नहीं पाता।
*✨ मैं जानता हूँ इस पोस्ट से कुछ लोगों को बड़ी तकलीफ होगी उनसे यह कहना है कि अभी भी वक़्त है आराम से बात को समझ लें तौबा का दरवाज़ा अभी बन्द नहीं हुआ अगर तअस्सुब की आग में जलते जलते दुनिया से बेईमान गए तो हमेशा के लिए जहन्नम है. बेईमान के अमल किसी काम न आयेंगे।*
*✨ और जिनको इस पोस्ट से फायदा पहुँचे मेरे लिए और एडमिन टीम के लिए दुआ करें।*
*✍🏻 किताब का नाम - परेशान मुसलमान*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 01 🔰*
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*🔰 अब्दुल्लाह आज बहुत परेशान है और वह परेशानी यह है कि* मुसलमानों में बहुत से फिरके हो गए हैं और हर फ़िरका अपने आपको हक पर बताता है और एक दूसरे को बुरा भला कहता है। आखिर यह माजरा क्या है। अब्दुल्लाह सोच रहा है कि क्या सब हक पर हैं, क्या यह मौलवियों के आपस के झगड़े हैं क्या हमें इसमें नहीं पड़ना चाहिए या सब खाने चाटने के धंधे हैं, आखिर जायें तो कहाँ जायें। यही सब सोचते सोचते उसे ख्याल आया कि क्यूँ न मुफ्ती साहब से इस बारे में दरयाफ्त किया जाए और यही सोचते हुए वह मुफ़्ती साहब के घर की तरफ चल दिया। मुफ्ती साहब बहुत नेक आदमी हैं। लोगों को मसाइल बताना फ़तवे देना उनका शौक है, बड़ी दूर दूर से लोग उनके पास फतवा लेने आते हैं, लोग उनसे दुआयें कराने भी आते हैं और उनकी दुआओं में असर भी देखा गया है। जब अब्दुल्लाह मुफ्ती साहब के घर पहुँचा तो कई लोग अपने अपने काम से आए बैठे थे। मुफ्ती साहब उनसे दीनी गुफ़्तगू कर रहे थे। अब्दुल्लाह भी सलाम व मुसाफ़ा करके बैठ गया।
*✍🏻 मुफ्ती साहब ने बड़े प्यार से पूछा कि कैसे आना हुआ।* तो उसने कहा आप फ़ारिग हो जायें तो बातचीत करें। लोग आते रहे जाते रहे।
🔰 कुछ देर बात मुफ्ती साहब अब्दुल्लाह की तरफ़ मुखातिब हुए और कहा साहबजादे फ़रमाइये। उसने कहा मैंने सोचा कि कुछ फुरसत हो जाए तो पूछू तो ज़्यादा बेहतर है मगर उन्होंने जोर दिया कि नहीं सबके सामने ही पूछूँ और साथ ही एक ख़ादिम को चाय वगैरह लाने को कहा।
*🤔 अब्दुल्लाह जो सोच रहा था.* वही बात मुफ्ती साहब के सामने दोहराना शुरू किया।
*✍🏻 मुफ्ती साहब जैसे सब समझ गए फरमाने लगे* आज इल्म की कमी ने हमें यहाँ लाकर खड़ा कर दिया है कि हमें हक को पहचानना मुश्किल हो गया है। आज हम दुनियावी तालीम पर तो हज़ारों रूपये खर्च करते है मगर दीनी तालीम जो ज़रूरी है और मुफ्त मिलती है उसे हासिल नहीं करना चाहते।
*🔰 अब्दुल्लाह :* जी हाँ आप बिल्कुल ठीक फरमा रहे हैं, हज़ारों नहीं बल्कि लाखों रूपये तो कुछ लोग सिर्फ दाखिले के लिए रिशवत देते हैं और दीनी तालीम मुफ्त मिले तो दूर भाग रहे हैं।
*📬 पोस्ट जारी रहेगी इन्शा अल्लाह...✍🏻*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 02 🔰*
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✍🏻 *मुफ्ती साहब :* अल्लाह व रसूल ने दुनियावी तालीम को मना नहीं फरमाया मगर वह इल्मे दीन जो तुम पर फ़र्ज़ है उसे छोड़ कर सालों मेहनत करके ज़रूरत से ज्यादा डिग्री इकट्ठीं करना जो कि सब डिग्रीयाँ हमारे काम भी न आयें, कुछ दिनों बाद भूल जायें कि क्या पढ़ा उन्हें इकट्ठा करना अक्लमन्दी नहीं।
🌟 *अब्दुल्लाह :* नहीं साहब पढ़ाई बहुत ज़रूरी है आजकल बेपढ़े की कहीं गुज़र नहीं। हम देखते हैं कि अंगूठाटेक बेचारे कितना परेशान रहते हैं।
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* आप गलत समझ रहे हैं मैं दुनियावी तालीम का मुखालिफ (विरोधी) नहीं बल्कि मैं तो कहता हूँ कि मौलवीयों को भी इलाकाई ज़बान और इन्टरनेशनल जुबान शायद इंगलिश ज़रूर सीखना चाहिए लेकिन पहले वह सीखें जो हम पर फर्ज है।
*🌟 अब्दुल्लाह :* क्या मौलवी बनना फर्ज है।
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* मेरा मतलब यह नहीं है बल्कि मैं यह कहना चाहता हूँ कि ज़रूरत के मुताबिक इल्मे दीन सीखना हम पर फर्ज है।
*🌟 अब्दुल्लाह :* मैं समझ नहीं पा रहा ज़रा वजाहत करें।
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* बहुत तफ़सील में न जाकर मेरा कहने का मतलब यह है कि हम पर अल्लाह व रसूल के बारे में बुनियादी अकाइद जानना, कब्र का अज़ाब सवाब, जन्नत दोज़ख कियामत के बारे में जानना, वुजू, गुस्ल, पाकी नापाकी, नमाज़, रोजा के मसाइल सीखना फर्ज है। जब हम पर हज व ज़कात फर्ज हो तो उसके मसाइल सीखना हम पर फर्ज है। मुख़्तसर यूँ समझें कि शरीअत पर चलने के लिए जिन जिन मसाइल की ज़रूरत पड़ती जाए उन मसाइल का सीखना हम पर फर्ज़ वगैरह।
*🌟 अब्दुल्लाह :* जैसे।
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* जैसे सलाम करना, खाने पीने लिबास के मसाइल। कारोबार करने चलें तो कारोबार के मसाइल! निकाह करने के चलें तो निकाह व तलाक के ज़रूरी मसाइल वगैरह।
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 03 🔰*
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🔳 *अब्दुल्लाह :* फिरकों के बारे में जानना क्या फर्ज है।
🔲 *मुफ्ती साहब :* इस दौर में यह बहुत ज़रूरी है, हाँ बल्कि फर्ज़ ही कहिए वह इस लिए कि अगर इस बारे में न जानेगा और अपनी कमइल्मी की वजह से किसी बदमजहब फिरके को मानने लगा तो एक वक्त ऐसा आएगा कि ईमान से हाथ धो बैठेगा और अगर ईमान चला गया तो सब अमल बेकार हैं। यह जानना फर्ज है कि अहले सुन्नत के अलावा बाकी सभी फ़िरके झूटे बातिल गुमराह जहन्नमी हैं।
🔳 *अब्दुल्लाह :* हज़रत वो सब कलिमा “लाइलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह" के पढ़ने वाले हैं मेरी समझ में नहीं आ रहा कि सब जहन्नमी कैसे हैं।
🔳 *मुफ्ती साहब :* हिन्दुस्तान पाकिस्तान के आस पास तीन बदमज़हब फिरकें ज़्यादा पाए जाते हैं।
1.राफ़ज़ी 2. कादयानी 3. वहाबी (देवबन्दी और तबलीगी जमाअत वाले, अहले हदीस, जमाते इसलामी यानी मौदूदी जमात सब वहाबियों की शाखें हैं।
राफ़ज़ी तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के सहाबा की तौहीन करके काफ़िर हुए मिर्जा गुलाम अहमद कादयानी को नबी मानकर कादयानी काफ़िर व मुरतद हुए वहाबी अल्लाह व रसूल की तौहीन करके और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बारे में बुनियादी जैसे इल्मे व हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शफाअत और हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इख़्तेयारात को न मान कर काफ़िर व मुरतद हो गए।
🔳 *अब्दुल्लाह :* मुरतद किसे कहते हैं ?
🔲 *मुफ्ती साहब :* जो सब कुछ जान कर कुफ्र करे और दावा मुसलमान होने का करे मुरतद कहलाता है।
*🔳 अब्दुल्लाह :* कुछ लोग कहते हैं कि किसी को काफिर नहीं कहना चाहिए कि क्या मालूम वह कब ईमान ले आए।
*🔲 मुफ्ती साहब :* कुर्आन ने काफ़िर को काफ़िर बुरे को बुरा कहा है। चोर को चोर, डाकू को डाकू और शैतान को शैतान ही कहा जाता है। यूँ तो मुसलामान को मुसलमान भी न कहो कि क्या पता कब काफ़िर हो जाए। मुसलमान को मुसलमान काफ़िर को काफिर जानना जरूरयाते दीन में से है। यानी किसी मुसलमान को काफ़िर या काफ़िर को मुसलमान जानना खुद कुफ्र है। किसी मुसलमान को काफ़िर कहा और वह वाकई मुसलमान है तो कहने वाले पर कुफ्र का हुक्म लगाया जाएगा। इसी तरह किसी काफ़िर को मुसलमान कहा और वह काफ़िर है तो कहने वाले पर कुफ्र का हुक्म लगेगा। इसलिए किसी खास शख्स का नाम लेकर काफ़िर कहने से बचना चाहिए चूंकि अगर वह काफिर नहीं तो. यह फतवा कहने वाले पर उल्टा पड़ता है अगर किसी खास शख्स को काफिर कहे तो सुबूत पेश करना पड़ेगा। हाँ अगर किसी के बारे में शक है तो ख़ामोश रहना बेहतर है। गर्ज़ यह कि इस मसअले में बहुत एहतियात की ज़रूरत है मगर वो सारे फ़िरके जो अल्लाह व रसूल की शान में तौहीन करते हैं वो सारे के सारे मुरतद व काफिर हैं. साथ ही सब कुछ जानने के बाद भी जो उन्हें मुसलमान समझे काफिर ना समझे वह भी काफिर है।
*🔳 अब्दुल्लाह :* कहीं यह गीबत तो नहीं ?
*🔲 मुफ़्ती साहब :* हरगिज़ नहीं यह गीबत नहीं बल्कि ऐसी ग़ीबत भी जाइज़ बल्कि सवाब है। उसकी गीबत करना सही है जिससे किसी मुसलमान को नुकसान का अन्देशा हो और यहाँ मुसलमान के ईमान जाने का अन्देशा है। ऐसे लोगों से मुसलमानों को होशयार करना बड़े सवाब का काम है।
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 04 🔰*
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*🌸👉🏻 अब्दुल्लाह :* शायद मैं बीच बीच में सवाल करके मौजू से हट जाता हूँ मैं जिस बात को लेकर परेशान हूँ उसका जवाब दें।
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब :* देखिए सहबज़ादे सबसे पहले तो यह बात दिमाग में बैठा लीजिए कि ईमान से बढ़ कर कोई चीज़ नहीं, ईमान गया तो समझिए कि सब कुछ लुट गया बरबाद हो गया हमेशा के लिए जहन्नमी हो गया आग में जलेगा थूहड़, खून व पीप और खौलता पानी उसकी खुराक।
*📖 तुम्हारा रब फरमाता है :* बेशक जिन्होंने कुफ़्र किया और अल्लाह की राह से रोका फिर काफ़िर ही मर गए तो अल्लाह हर्गिज़ उन्हें न बख्शेगा।
📕 *(सूरए मुहम्मद)*
🌹 अल्लाह और उसके हबीब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रहम - ओ - करम से जिसे ईमान की दौलत नसीब हुई वह दुनिया के उन खुश नसीबों में से है जिसे अशरफुल मखलूकात यानी अल्लाह तआला की मखलूक में सबसे अफजल कहा गया है और यह सदक़ा है, मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का।
ईमान शर्त है नेक आमाल के कबूल होने की, ईमान शर्त है नमाज़ों के कबूल होने की, रोज़े के मकबूल होने की हज व ज़कात कबूल होने की। जिनके पास ईमान नहीं उनके नेक अमल बेकार हैं वह सारी ज़िन्दगी भी सजदे में रहें तो उनके कुछ काम न आएगा। ईमान वाला गुनाहगार भी सय्यदे आलम (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) की शफ़ाअत और करम से और उनके सदके में एक न एक दिन जन्नत में ज़रूर जाएगा। ईमान वालों के लिए ही हमेशगी है जन्नत में। ईमान वालों के लिए कुरआन है ईमान वालों को *अल्लाह पाक ने कुरआन में जगह - जगह "ऐ ईमान वालो"* कहकर नेक अमल करने के लिये इर्शाद फरमाया है। ईमान वालों ही के लिये जन्नत की खुशखबरी है दोज़ख़ से नजात है बिना ईमान के नेक अमल मकबूल नहीं हैं। ईमान वाला अशरफुल्मखलूकात है तो बेईमान सबसे बदतरीन मखलूक है, बेईमान जानवरों से भी बदतर है। बेईमान हमेशा जहन्नम में रहेंगे ख्याह कैसे भी नेक अमल किये हो। ईमान जन्नत में जाने की पहली और जरूरी सीढ़ी है। बईमान जन्नत की खुशबू भी न पा सकेगा। ईमान वालों के लिये सबसे बड़ी नेमत अपने प्यारे रब का दीदार है। यहाँ एक बात बहुत ज्यादा ध्यान देने की है कि अगर इन्सान से एक बात भी कुफ्र की हो जाती है तो उसके हाथ से ईमान निकल जाता है ऐसी हालत में फौरन उस बात से तौबा करके कलिमा - ए - तय्यबा "लाइलाहा इल्लल्लाहु मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह" कहकर फिर ईमान में दाखिल हो जाना चाहिये।
🌟 आम मुसलमान यह जानता है, नहीं जानता तो जान ले कि अल्लाह तआला ने इन्सान को अपनी इबादत के लिये पैदा फ़रमाया है और वह उसका इम्तहान भी लेगा और इम्तहान में बड़े से बड़े गुनाह को अगर चाहेगा तो माफ फरमा देगा मगर कुफ्र व शिर्क को न बख़्शेगा और काफ़िर हमेशा जहन्नम में रहेगें। लिहाज़ा ईमान पर रहना उसे बचाये रखना सारी जरूरतों में सबसे अहम है। इबादतें ईमान वालों ही की कुबूल हैं ना कि बेईमान की।
🌎 याद रखिये दुनिया में दो किस्म के लोग हैं मुसलमान (यानी ईमान वाले) और काफ़िर, बीच वाले कोई नहीं सिर्फ एक कुफ्र इन्सान को काफिर बना देता है कोई शख्स हज़ारों काम नेकी के करता है और किसी एक कुफ्र पर कायम रहता है और यूहीं बिना तौबा के मर जाता है तो वह कयामत में काफिर उठेगा और हमेशा हमेशा के लिये दोज़ख़ में रहेगा।
🌿 यहाँ कहना यह है कि सब कुछ चला जाय मगर किसी भी कीमत पर ईमान हर्गिज़ - हर्गिज़ न जाय, कोई भी बात ऐसी न हो कि आदमी इसलाम के दायरे से बाहर हो जाए, अगर कोई भी बात ऐसी मुँह से निकल जाए या हो जाय तो फौरन जल्द से जल्द तौबा करके कलिमा पढ़कर फिर से दायरए इसलाम में दाखिल हो जाना चाहिए।
*🌸👉🏻 अब्दुल्लाह :* आपने बहुत ही अच्छी तरह समझा दिया कि ईमान नहीं तो कुछ नहीं हमे अपने अमल से ज़्यादा ईमान की फिक्र रखना चाहिए। अब तो मेरी फ़िक्र और ज्यादा बढ़ गई कि कहीं ऐसी बातें करके मेरा ईमान तो नहीं चला गया।
*🌟👉🏻 मुफ्ती साहब :* नहीं, यह फ़िक्र आपके ईमान की दलील है अब आप पर यह सब जानना और ज़्यादा ज़रूरी हो गया।
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 05 🔰*
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*🌸👉🏻 अब्दुल्लाह :* राफ़ज़ी कादयानी तो नहीं हाँ वहाबी फिरके के बारे में बताइये।
*🌟👉🏻 मुफ्ती साहब :* बहुत सी हदीसों में इस फ़िरके के बारे में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लमल ने पहले ही बता दिया था और यह भी बताया था कि मेरी उम्मत 73 फ़िरकों में बट जाएगी जिसमें एक फ़िरका हक़ पर होगा ।
🌸👉🏻 *अब्दुल्लाह :* क्या यह हदीस में है कि 73 फ़िरके हो जायेंगे।
*🌟👉🏻 मुफ्ती साहब :* इस हदीस को सभी फिरके मानते हैं।
*🌸👉🏻 अब्दुल्लाह :* अच्छा अब यह बताइये कि इस वहाबी फ़िरके की शुरूआत कहाँ से है।
*🌟👉🏻 मुफ्ती साहब :* इस बेदीन वहाबी फिरके की इब्तिदा इबलीस लईन से है कि अल्लाह तआला ने सय्येदिना आदम अलैहिस्सलाम की ताज़ीम का हुक्म दिया और मलऊन ने न माना और जमानए इसलाम में इसका हादी जुलखवेसरा तमीमी हुआ जिसने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शान में तौहीनी कलमा कहा और उसके बाद पूरा गिरोह ख़वारिज़ का उस तरीके पर चला जिनको अमीरुल मोमनीन मौला अली ने कत्ल फ़रमाया। लोगों ने कहा हम्द अल्लाह को जिसने उन की नजासतों से जमीन को पाक किया। अमीरुल मोमनीन ने फरमाया यह मुनकता नहीं हुए अभी उनमें के माओं के पेटों में हैं, बापों की पीठों में हैं जब इनमें की एक संगत काट दी जाएगी दूसरी सर उठाएगी, यहाँ तक कि इनका पिछला गिरोह दज्जाल के साथ निकलेगा। बारहवीं सदी के आखिर में इब्ने अब्दुल वहाब नजदी इस गिरोह का सरगना हुआ।
🌿 यह फ़ितना बारह सौ नौ हिजरी (1209) में शुरु हुआ इस मज़हब का गुरु घंटाल अब्दुल वहाब नजदी का बेटा मोहम्मद था। उसने तमाम अरब और ख़ास कर हरमैन शरीफ़न में बहुत ज्यादा फितने फैलाए। आलिमों को कत्ल किया। सहाबा, इमामों, आलिमों और शहीदों की कब्रें खोद डाली। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रौज़े का नाम सनमे अकबर (बड़ा बुत) रखा था। अल्लामा शामी रहमतुल्लाहि तआला अलैह ने उसे खारजी बताया।
*🌿 उस अब्दुल वहाब के बेटे ने एक किताब लिखी जिसका नाम "किताबुत्तौहीद" रखा उसका तर्जमा हिन्दुस्तान, में मौ. इसमाईल देहलवी ने किया जिसका नाम “तकवीयतुल ईमान" रखा और हिन्दुस्तान में वहाबियत इसी ने फैलाई।*
👉🏻 इन वहाबीयों का एक बहुत बड़ा अकीदा यह है कि जो उनके मज़हब पर न हो वह काफ़िर है, मुशरिक है। यही वजह है कि बात -2 पर बिला वजह मुसलमानों पर कुफ़्र और शिर्क का हुक्म लगाते और तमाम दुनिया को मुशरिक बताते हैं। आजकल तरह तरह के नाम से वहाबियों की शाखें पैदा हो चुकी हैं जैसे तबलीगी जमात, मौदूदी जमात (जमाते इसलामी), अहले हदीस और देवबन्दी वगैरह।
*🌸👉🏻 अब्दुल्लाह :* क्या वाकई इन्होने कुफ्री बातें लिखी हैं।
*🌟👉🏻 मुफ्ती साहब :* नामालूम इन लोगों ने क्या क्या लिखा है मैं इनकी चन्द इबारतें आपको दिखाता हूँ और चैलेन्ज के साथ कहता हूँ कि यह किताबें देवबन्द से आज भी छपती हैं आप यहाँ पर सिर्फ देख लीजिए और देवबन्द जाकर या डाक से मंगा कर इसकी तसदीक कीजिए हालांकि सुनने में आया है कि इनमें से कुछ इबारतें अब नए एडीशन में निकाल दी गई हैं मगर इनके अकाइद वही हैं। बात बात पर शिर्क लगाना, वसीले का इन्कार करना, हुजूर सल्लल्लाहु . तआला अलैहि वसल्लम के इल्मे गैब को न मानना, अल्लाह ने उन्हें जो इख्तेयार दिए उनका इन्कार करना, हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शफाअत का इन्कार करना, हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को माज़ल्लाह मुर्दा जानना, उनसे मदद मांगने को शिर्क बताना वगैरह वगैरह आज भी इनके मदरसों में पढ़ाया जाता है।
📮 इन्शा अल्लाहुर्रहमान पोस्ट ज़ारी रहेंगा!
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 06 🔰*
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*☘️👉🏻 अब्दुल्लाह :* हमने तो सुना है कि सुन्नी वहाबी झगड़ा न्याज़ नज़र, फातिहा, तीजा, चालीसवाँ, उर्स, मज़ारात पर जाना, ताजियादारी वगैरह का है आप तो कुछ और ही बता रहे हैं।
*🌸👉🏻 मुफ्ती साहब :* हाँ इन फुरूई मसाइल में हमारा उनसे इख्तेलाफ है मगर हमारा अस्ल झगड़ा इसी बात का है कि यह अपनी किताबों में अल्लाह व रसूल की तौहीन करके काफ़िर व मुरतद है इसका सबुत मैं आपको दिखा चुका।
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* सुबूत तो है मगर जब उनकी बातें सुनों तो लगता है कि हम सुन्नी गलत है और कहीं कहीं शिर्क में मुबतला हैं और शिर्क कभी न बख्शा जाएगा।
🌸👉🏻 *मुफ्ती साहब :* बेशक कुफ्र व शिर्क कभी न बख्शा जाएगा। काफ़िर व मुशरिक हमेशा जहन्नम में रहेंगे... वो हमें ज़बरदस्ती मुशरिक बनाने पर उतारू हैं जो बातें वह शिर्क बताते हैं उनमें से सभी शिर्क नहीं और जो वाकई शिर्क हैं वह हम कभी नहीं करते न करेंगे हमारे ऊपर झूटा इलज़ाम है।
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* नज़र तो यही आता है जैसे हम शिर्क कर रहे हैं। कुछ लोग यह कहते हैं कि यह मौलवियों की लड़ाई है इन चक्करों में नहीं पड़ना चाहिए ?
🌸👉🏻 *मुफ्ती साहब :* हाँ कुछ लोग आपको ऐसे मिलेंगे जो कहेगें कि मियाँ क्यूँ इन झगड़ों में पड़ते हो यह सब तो मौलवियों की लड़ाई है। बाज़ कहेंगे चार इमामों के इख्तलाफ़ात हैं। याद रखिए ऐसा हरगिज़ हरगिज़ नहीं है चारों इमाम (हज़रत इमामे आज़म इमाम अबू हनीफ़ा, हजरत इमाम शाफ़ई, हज़रत इमाम हम्बल और हज़रत इमाम मालिक रहमतुल्लाहि तआला अलैहिम) हक पर हैं और इनके आपसी इख्तिलाफ़ अकाइद पर हरगिज़ नहीं इन चारों की नज़र में अल्लाह रसूल की तौहीन करने वाला काफ़िर व मुरतद है यह लोग बेवजह किसी पर कुफ़्र और शिर्क नहीं लगाते। इन्होंने हमेशा हक फरमाया। यह चारों अहले सुन्नत व जमात के इमाम हैं। कुछ लोग यह कहते हैं कि मियाँ अपनी दुकानें चमकाने को मौलवियों ने यह झगड़े पैदा कर दिए हैं इनमें मत पड़ा करो। कुछ लोग आपको इस तरह बहकायेंगे कि देखो मज़ारात पर चन्दा शीरीनी वगैरा या नियाज़ के हलवे मांडे का झगड़ा है या यह कहेंगे कि मौलवियों ने आपस में लड़वाने को ये तरह तरह की बातें पैदा कर दी हैं।
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 07 🔰*
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☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* आखिर झगड़ा है किस बात का ?
*🌸👉🏻 मुफ्ती साहब :* याद रखिए अस्ल इख्तेलाफ है मुसलमान और मुरतद में फर्क का। अहले सुन्नत वल जमाअत ही सही रास्ते पर यानी अल्लाह व रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रास्ते पर है। हम कहते हैं कि वहाबी देवबन्दीयों ने अल्लाह और उसके रसूल की शान में गुस्ताखियाँ की और कर रहे हैं जिसका सुबूत उनकी किताबें हैं। वह शख्स मुसलमान है जो अल्लाह और रसूल की. शान में गुस्ताखी को कुफ़्र और गुस्ताखी करने वाले को काफिर जानता है। बहुत से लोग ऐसे मिलेंगे जो कहेगें कि हम ऐसा नहीं करते और हमारे ऊपर इलज़ाम है तो उनको आप इनकी किताबें या हवालों की फोटोस्टेट कापी दिखा सकते हैं और फिर उनसे पूछिए कि अब क्या कहते हो। अब अगर वह हीले बहाने बनाए तो समझ लीजिए कि उसके दिल में ख़लिश है और फिर भी वह इन इबारतों को कुफ्र न बताए या ऐसा लिखने वाले को काफिर न जाने तो वह मुरतद है और वही है जिसके बारे में सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पहले ही फ़रमा चुके हैं।
☘️ यहाँ एक बात मैं और कहना चाहूँगा उन लोगों से जो यह कहते हैं कि यह सब झूठ है और ऐसा कुछ भी नहीं लिखा गया, वह बात यह है कि दो बातें हो सकती है या तो यह सच है या झूट है यानी या तो ऐसा लिखा गया या नहीं। अगर सच है तो इन बातों से तौबा करो कि यह हुजूर की शान में खुली तौहीन हैं और अफ़सोस तो यह कि आज भी ये किताबें छप रहीं हैं और बिक रही हैं और बिल फ़र्ज़ ऐसा है भी तो सुन्नी मुसलमान कहाँ रहे ऐसा करने से तो फिर देवबन्दी वहाबी लोग हम सुन्नियों के पीछे नमाज़ क्यूँ पढ़ते हैं उनसे निकाह वगैरा क्यूँ करते हैं। मैं आपको वह किताबें दिखाता हूँ जहाँ इन्होंने बकवास की है। मैं आपको सुबूत के लिए सिर्फ चन्द ही किताबें दिखाऊँगा अगर आपको शक लगे तो खुद बाज़ार से ख़रीद कर देखिएगा कि मैं झूट तो नहीं कह रहा।
1️⃣ देखिए यह इनकी किताब 'यक रोज़ा' जो मौ इस्माईल देहलवी की है इसमे अल्लाह तआला के झूट बोलने को मुमकिन कहा जा रहा है।
2️⃣ दूसरी किताब 'बराहीने कातेआ' है जिसमें शैतान के इल्म को तो नस्स से माना जा रहा है और हुजूर के इल्म को शिर्क कहा गया है।
3️⃣ तीसरी किताब सिराते मुस्तकीम है जो उर्दू और फारसी में अलग अलग है जिसमें यह कहा गया है कि नमाज़ में हुजुर का ख्याल आ जाए तो नमाज़ न होगी भले ही गधे घोड़े और बीवी से हमबिस्तरी का ख्याल हो जाए तो नमाज़ हो जाएगी।
4️⃣ चौथी किताब हिफजुल ईमान है जिसमें हुजूर के इल्म को पागलो बच्चों और मजनूनों का सा बताया गया है।
*5️⃣ पांचवी किताब तहज़ीरुन्नास है इसमें हुजूर के आखरी नबी होने का इन्कार है.*
*6️⃣ छठी किताब तक़वीयतुल ईमान है इसमें नीचे लिखी बातें हैं :*
1. हर मखलूक अल्लाह के आगे चमार से ज्यादा जलील।
2. जिसका नाम मुहम्मद या अली हो वह किसी चीज़ का मुख़्तार नहीं।
3. हुजूर गंवार की बात सुनकर मारे दहशत के बदहवास हो गए।
4. बुजुर्गों की ताज़ीम ऐसी करो जैसे बड़े भाई की।
5. हुजूर के लिए मर कर मिट्टी में मिलना लिखा गया है।
7️⃣ सातवीं किताब फतावा रशीदिया में है कि होली दिवाली की पूरियाँ खाना और हिन्दू के प्याऊ से पानी पीना जाइज़ और नियाज़ नज़र का खाना हराम और सबील का पानी और दूध पीना हराम। और यह भी लिखा है कि इस उर्स तक में जाना हराम है जिसमें कुरआनख्वानी हो और मिठाई बटे।
8️⃣ किताबें तो बहुत हैं मगर और यह आठवीं और आखरी देख लें जिसमें मो अश्रफ अली थानवी अपने एक मुरीद से अपने लिए कलिमा पढ्वा रहे हैं। अस्ल लड़ाई हमारी यह है।
⚠️ *नोट :* इन कुफ्री इबारतों की फ़ोटोकापी कोई देखना चाहे तो एडमिन को मैसेज करें।
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 08 🔰*
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*☘️👉🏻 अब्दुल्लाह:* कियामत के करीब जो निशानियाँ जाहिर होंगी उसके बारे में बताये और क्या हुजूर ने हमें इन फिरकों की भी कुछ निशानदेही की है ?
🌸👉🏻 *मुफ्ती साहब :* हाँ ! बुख़ारी शरीफ़, मुस्लिम शरीफ़ और मिशकात शरीफ़ की कुछ हदीसों का खुलासा इस तरह है कि कुर्बे कियामत तीस दज्जाल पैदा होगें जो नुबुव्वत का दावा करेंगे... दीन में फितने बरपा होगें... मेरी उम्मत तेहत्तर (73) फ़िरकों में बट जाएगी... कुरआन व हदीस की मनमानी तफ़सीरें होंगी... लोग अच्छों को बुरा कहेंगे... पिछलों पर लानत करेंगे... सुन्नत को बिदअत समझा जाएगा... हलाल को हराम कहा जाएगा... अच्छे बुरे की हलाल व हराम की तमीज़ ख़त्म हो जाएगी... लोग सुबह इसलाम पर करेंगे और कुफ्र पर शाम... चटाई के तिनके और तस्बीह के दोनों की तरह पै दर पै फितनों की बारिश होगी... कोई इसमें नहाएगा कोई भीगेगा किसी को सीलन पहुँचेगी ग़र्ज़ कोई भी इन फ़ितनों से न बचेगा... लोग नमाज़ को जाए करने लग जायेंगे... नफ़सानी ख्वाहिशात गालिब होंगी... मालदारों की ताज़ीम उनके माल की वजह से की जाएगी... झूटे को सच्चा और सच्चे को झूटा समझा जाएगा... ख़ाएन अमीन मशहूर होंगे अमीन को ख़ाएन समझा जाएगा... जिनको बोलने का सलीका न होगा वह वाज़ कहेंगे... इस्लाम नाम का रह जाएगा... कुआन के सिर्फ हरूफ रह जायेंगे कुआन को सुनहरी जुज़दान में सजाया जाएगा हालांकि वह अमल करने के लिए आया है न कि सजाने के लिए... मिम्बरों पर कम उम्र के लड़के ख़ुतबा देंगे... मस्जिदें खूबसूरत बनाई जायेंगी और गिरजों की तरह सजाई जायेंगी उनके मीनार बलन्द किए जायेंगे नमाज़ियों की सफें ज़्यादा होंगी लेकिन उनके दिल और ज़बाने अलग अलग होंगी... मोमिन उस वक़्त लौंडियों की तरह समझे जायेंगे मोमिन बुराईयाँ और नाफरमानियाँ देख कर कुढ़ेगा क्यूँकि वह लोगों की इस्लाह पर कादिर न होगा... मर्द मर्द के साथ औरत औरत के साथ मशगूल होंगे... फ़ासिक इमाम बन बैठेंगे... हुकमराँ के वज़ीर बदकिरदार होंगे... नमाज़ दुनिया के धंधों में फंस कर बरबाद की जाएगी... ऐसा वक्त आएगा कि लोग मशरिक व मग़रिब से तुम्हें गुमराह करने के लिए तुम्हारे पास आयेंगे उनकी शक्लें इन्सानों की सी होंगी मगर दिल में शैतानीयत भरी होगी... हज तो उस वक्त भी होगा मगर बादशाहों का हज सैर व तफरीह के लिए होगा... कुछ लोग तिजारत के लिए हज करेंगे... मिस्कीन सवाल करने के लिए हज को जायेंगे... आलिमों का हज रियाकारी और दिखावे के लिए होगा... झूट दुनिया पर छा जाएगा... दुमदार सितारा नज़र आयेगा... औरतें मर्दो के साथ तिजारत और मुलाज़मत में शरीक होंगी... बाज़ार बहुत होंगे और करीब करीब होंगे... ऐसी आंधी चलेगी जिसमें सांप होगें वह सांप उस वक़्त सरदार उल्मा को चिमट जायेगे जिन्होंने बुराईया देखीं और उनसे मना न किया।
*☘️ अब कुछ ख़ास इन नजदियों के बारे में हदीस व पेशगोई सुने।*
📝 *हदीस :* हज़रत अबदुल्लाह इब्ने उमर रदियल्लाहु तआला अन्हुमा से हज़रत इमाम बुखारी ने यह हदीस नकल की है कि एक दिन हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने शाम और यमन के लिए दुआ फ़रमाई *जिसके अलफ़ाज़ यह हैं :*
"खुदावन्दा हमारे शाम और यमन में बरकत नाजिल फरमा (दुआ करते वक्त नज्द के कुछ लोग बैठे हुये थे) उन्होने अर्ज़ किया और हमारे नज्द में या रसूलल्लाह!
👉🏻 इस पर हुजूर ने इर्शाद फ़रमाया "खूदावन्दा हमारे शाम और यमन में बरकत नाज़िल फ़रमा" फिर दुबारा नज्द के लोगों ने अर्ज़ किया और हमारे नज्द में या रसूलल्लाह! रावी (रिवायत बयान करने वाला) का बयान है कि तीसरी मरतबा में हुजूर ने फ़रमाया वह ज़लज़लों और फितनों की जगह है और वहाँ से शैतान की सींध निकलेगी।"
📕 *(बुख़ारी शरीफ़*)
📝 *हदीस :* अल्लामा दहलान रहमतुल्लाहि तआला अलैह अपनी किताब अदुररुस्सुन्नीय्या में फ़रमाते हैं कि हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्ल्म ने इरशाद फरमाया :
"कुछ लोग मशरिक की सम्त से जाहिर होंगे जो कुरआन पढ़ेंगे, लेकिन कुरआन उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा। जब उनका एक गिरोह ख़त्म हो जाएगा तो वहीं से दूसरा जन्म लेगा यहाँ तक कि उनका आखरी दस्ता दज्जाल के साथ उठेगा।"
*📝 हदीस : मिशकात शरीफ़ में* हज़रते अबू सईद ख़ुदरी रदियल्लाहु तआला अन्हु से मनकूल है वह कहते कि हम लोग हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर थे और हुजूर माले गनीमत तकसीम फरमा रहे थे कि • “जुल्खवेसिरा" नाम का एक शख्स जो कबीला बनी तमीम का रहने वाला था आया और कहा ऐ अल्लाह के रसूल इन्साफ़ से काम लो। हुजूर ने फ़रमाया “अफ़सोस तेरी जसारत (जुर्रत, हिम्मत) पर मैं ही इन्साफ नहीं करूँगा तो और कौन इन्साफ़ करने वाला है। अगर मैं इन्साफ़ नहीं करता तो तू ख़ाएब व ख़ासिर (तहस - नहस) हो चुका होता।" हज़रते उमर से जब नहीं रहा गया तो उन्होंने अर्ज़ किया कि हुजूर मुझे इजाजत दीजिए मैं इसकी गर्दन मार दूं। हुजूर ने फरमाया इसे छोड़ दो यह अकेला नहीं है इसके बहुत से साथी हैं जिनकी नमाजों और रोज़ों को देखकर तुम अपनी नमाज़ों और रोज़ों को हकीर समझोगे, वह .कुरआन पढ़ेंगें लेकिन कुरआन उनके हलक से नीचे नहीं उतरेगा। यानी इन सारी ज़ाहिरी खूबियों के बावजूद वह दीन से ऐसे निकल जाएगें जैसे तीर से शिकार निकल जाता है।
📕 *(मिशकात शरीफ़ व बुख़ारी शरीफ)*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 08 का दूसरा भाग 🔰*
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📕 *(मिशकात शरीफ़ व बुख़ारी शरीफ)*
📝 *हदीस :* हज़रत अबू सईद खुदरी और हज़रत अनस इब्ने मालिक रदियल्लाहु तआला अन्हुमा से मिशकात शरीफ में यह हदीस नकल है हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि मेरी उम्मत में इख्तेलाफ़ व तफरीक का वाकेए होना मुकदर हो चुका है पस इस सिलसिले में एक गिरोह निकलेगा जिसकी बातें बज़ाहिर दिलफरेब ख़ुशनुमा होगी लेकिन किरदार गुमराहकुन और खराब होगा वह कुरआन पढ़ेंगे लेकिन कुरआन उनके हलक से नीचे नहीं उतरेगा वह दीन से ऐसे निकल जाएगें जैसे तीर शिकार से निकल जाता है फिर दीन की तरफ लौटना उन्हें नसीब न होगा यहाँ तक कि तीर अपने कमान की तरफ़ लौट आए।
👉🏻 हदीस की मुराद यह है कि उनका दीन की तरफ लौटना मुहाल है जैसे तीर का लौटना मुहाल है वह अपनी तबीयत व सरिश्त के लिहाज़ से बदतरीन मखलूक होगें। वह लोगों को .कुरआन और दीन की तरफ़ बुलाएगें हांलाकि दीन से उनका कोई तअल्लुक न होगा जो उनसे जंग करेगा वह ख़ुदा का मुकर्रबतरीन बन्दा होगा। सहाबा ने फ़रमाया उनकी ख़ास पहचान क्या होगी या रसूलल्लाह ! फ़रमाया सर मुंडाना।
*📝 हदीस :* 'इस हदीस की ख़ुसूसियत यह है कि अस्ल हदीस बयान करने से पहले हदीस के रावी हज़रते अली रदियल्लाहु तआला अन्हु ने फ़रमाया कि कसम ख़ुदा की आसमान से ज़मीन पर गिर पड़ना मेरे लिए आसान हैं लेकिन हुजूर की तरफ़ कोई झूठी बात मनसूब करना बहुत मुश्किल है। इसके बाद अस्ल हदीस का सिलसिला यूँ शुरु होता है फ़रमाते
👉🏻 "मैंने हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को यह फ़रमाते सुना कि आख़िर ज़माने में नौ उम्र और कम समझ लोगों की एक जमाअत निकलेगी, बातें वह बज़ाहिर अच्छी करेगें लेकिन ईमान उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा वह दीन से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर से शिकार निकल जाता है।
"इस हदीस में उम्मत से उम्मते दावत मुराद है यानी वो लोग मुराद हैं जिनको ईमान और अहकामे इस्लाम की दावत देने के लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को भेजा गया। इस मअना में काफ़िर भी दाखिल हैं।
👉🏻 दूसरा मअना उम्मते इजाबत यानी जो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर ईमान लाए और उनकी बात दिल से कबूल की इसमें गैर मुस्लिम दाखिल नहीं।
📝 *हदीस :* हज़रत अबू नुऐम ने हिलया में अबू उमामा बाहली रदियल्लाहु तआला अन्हु से नक़ल किया है कि हुजुर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया :
"आख़िर ज़माने में कीड़े - मकोड़े की तरह हर तरफ, 'मुल्लाने फूट पड़ेगें। बस तुममें से जो शख्स वह जमाना पाए वह उनसे ख़ुदा की पनाह मागें।
🌹 गैब की खबरें देने वाले हमारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की इन मुबारक हदीसों से साफ तौर पर यह ख़बरें पहले ही दे दी गई कि इस उम्मत का 73 फ़िरका बंटना मुकद्दर हो चुका है। (जिसमें सिर्फ एक फ़िरका हक पर होगा)
🌹 सुन्नत को बिदअत कहा जाएगा... हलाल को हराम कहा जाएगा... लोग सुबह इसलाम पर कुफ्र पर शाम करेंगे... बे - पनाह फ़ितने बरसेंगे कोई फ़ितनों से बच न पाएगा... नज्द से फ़ितना उठेगा... ऐसे लोग जाहिर होगें जो बज़ाहिर नमाजी, रोज़ा रखने वाले, कुरआन पढ़ने वाले दीन की तरफ बुलाने वाले होगें मगर उनके पास ईमान न होगा और यह भी कि ऐसे लोगों की इबादत के आगे तुम अपनी इबादत को हकीर जानोगे... आख़िर ज़माने में मुल्लानं कीड़े - मकोड़े की तरह निकलेंगे और इनका आख़री दस्त दज्जाल के साथ निकलेगा।
🌹 खूब गौर करके देखो इन हदीसों की रोशनी में कि वह जन्नती फिरका कौन सा है, जिस पर हमें और आपको कायम रहना है और वह 72 फ़िरके कौन हैं जिनसे दूर रहना है चुंकि ईमान की सलामती के लिये यह जुरूरी और बहुत ज्यादा जरूरी क्योंकि अगर तुम किसी ऐसे के बहकावे में आ गए जो बातिलों में से है तो तुम्हारा नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात और तमाम नेक अमाल बेकार हो जाएगें चूंकि आमाल को मकबूलियत ईमान पर मुनहसिर है। होशयार इन दिखावे की इबादत वालों के बहकावे में न आना यह ईमान के दुश्मन तुम्हारा ईमान लेने की फिक्र में हैं एक यही वह दौलत है जिस पर तुम जितना नाज़ करो कम है, तुम्हारा यह ख़ज़ाना ये फिरके बहरूपये बन कर छिनने आयें हैं। यह तुम्हे अपना दोस्त जाहिर करके नेकी की तरफ़ बुलायेंगे, इसलिए इनको पहचानना बहुत ज़रूरी है क्यूँकि तुम इनके बहकावे में आ सकते हो क्यूंकि भोले मुसलमान को हमेशा धोके और मक्कारी से हराया गया
🌹 जैसा कि सय्यदे आलम गैब की खबर देने वाले नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया था कि उसके मुताबिक़ होता गया और होता रहा है और सब आगे होगा क्यूँकि हमारा नबी सच्चा उसका फरमान सच्चा। इन बातिल फिरकों में कुछ हिन्दुस्तान से बाहर पैदा हुए और वहीं खत्म हो गए, कुछ हिन्दुस्तान और उसके बाहर पाए जाते हैं जैसे : राफजी, वहाबी, गैर मुकल्लदीन (जो अपने आपको अहले हदीस कहते हैं) नैचरी, चिकड़ालवी, जमाअते इसलामी मौदूदी जमात वाले), कादयानी वगैरह वगैरह।
🍁 और इन सब में सबसे ज़्यादा/ख़तरनाक, ख़बीस, मक्कार और फरेबी फ़िरका फितना - ए - वहाबीयत है और ज्यादातर फिरकों की शाखें इसी से जाकर मिलती है और इनकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि ये अपनी किताबों में अल्लाह और उसके हबीब की शान में गालियाँ बकते हैं तौहीन करते हैं और पेश की गई हदीसों के मुताबिक एकदम फिट बैठते हैं। इस छोटी सी किताब के ज़रिए मैं आपको इसी फ़िरके से होशियार करना चाहता हूँ।......
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 09 🔰*
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☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* मेरा तो दिमाग़ ख़राब हो रहा हैं..
🌸👉🏻 *मुफ्ती साहब :* बेहतर यह होगा आप इन सारे टाॅपिक पर सवाल करते जायें और मैं जवाब देता जाऊँ ताकि हमारी बात साफ़ हो जाए।
*☘️👉🏻 अब्दुल्लाह :* मैं भी यही चाहता हूँ। यह तो आप बता ही चुके कि वहाबी फ़िरका कहाँ से शुरू हुआ और हदीसों में भी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने पहले ही हमें बता दिया था कि ऐसे लोग ज़ाहिर होंगे और इनकी यह कुफ्री इबारतों को देखकर तो एक देहाती भी यह बता देगा कि ऐसा बकने वाला मुसलमान नहीं... अब मैं आपसे बुनियादी अकाइद पर एक एक करके सवाल पूछूगा और फिर फुरूई मसाइल पर पूछूगाँ मेहरबानी करके एक एक करके जवाब देते जायें। बताइये सबसे पहले कौन सा टाॅपिक लें।
🌸👉🏻 *मुफ्ती साहब :* सबसे पहले इल्मे गैब पर बात करते हैं।
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* जी बेहतर सबसे पहले हमें यह बताइये कि अहले सुन्नत का इस बारे में क्या अक़ीदा है। आसान जबान में समझायें।
🌸👉🏻 *मुफ़्ती साहब :* गैब वह छुपी हुई चीज़ है जिसको इन्सान न तो आँख नाक कान वगैरह महसूस कर सके और न बिला दलील बदाहतन (बगैर गौर व फ़िक्र के) अक्ल में आ सके।
*मसलन : -* मलाइका, जन्नत, दोज़ख, कियामत का इल्म गैब का इल्म है इन्सान कब मरेगा, औरत के पेट में क्या है और वह नेक है या बद गैब का इल्म है रंग पहचाना ज़बान व कान के लिए गैब है, बू आँख के लिए गैब है अगर कोई बू व मज़े को आँख से शक्लों में देख ले तो गैब है।
*☘️👉🏻 अब्दुल्लाह :* यह तो इल्मे गैब की तारीफ हुई। हमें यह बताइये कि हमारे आका के इल्मे गैब के बारे में या नबियों के इल्मे गैब के बारे में अहले सुन्नत का अकीदा क्या है।
*🌸👉🏻 मुफ्ती साहब :* अहले सुन्नत का मसलक यह है कि अल्लाह तआला ने नबियों को अपने गैबों पर इत्तिला दी। यहाँ तक कि ज़मीन और आसमान का हर ज़र्रा हर नबी के सामने है। और हमारे आका हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तमाम नबियों में सबसे अफजल व सबके सरदार हैं लिहाज़ा सबसे ज़्यादा इल्म या इल्मे गैब आप ही को है।
*🌹अहले सुन्नत का यह अक़ीदा है* कि सारी कायनात का इल्म अल्लाह तआला के किसी भी नबी के इल्म के सामने ऐसा है जैसे समन्दर के सामने कतरा होता है और तमाम नबियों का इल्म मिल कर हुजूर अलैहिस्सलाम के इल्म के सामने ऐसा ही जैसे समन्दर के सामने कतरा हो और हुजूर अलैहिस्सलाम का इल्म ख़ुदा के इल्म के सामने ऐसा भी नहीं जैसे करोड़ों समन्दरो के सामने कतरे के करोड़वें हिस्से का। वह इसलिए कि अल्लाह के इल्म की हद् ही नहीं और हुजूर या किसी भी नबी या मखलूक के इल्म की कोई न कोई हद ज़रूर है क्या है कितनी है अल्लाह ही जाने।
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 10 🔰*
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*☘️👉🏻 अब्दुल्लाह :* कुरआन में जो आया कि गैब का इल्म सिर्फ अल्लाह ही को है तो इसका क्या मतलब है। कुरआन पहले है हदीस बाद में।
🌸👉🏻 *मुफ्ती साहब :* बेशक कुरआन पहले हैं और कुरआन में ही है कि अल्लाह जिसे चाहता है गैब का इल्म अता फरमाता है। और जो यह आया कि गैब का इल्म सिर्फ अल्लाह ही को हैं तो इससे मुराद जाती इल्म है जो सिर्फ अल्लाह के लिए है जो कोई जाती इल्म किसी और के लिए माने वह काफिर है।
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* ज़रा और साफ़ साफ़ बतायें।
🌸👉🏻 *मुफ्ती साहब :* इल्मे गैब दो तरह का है एक इल्मे गैब जाती और दूसरा इल्मे गैब अताई। इल्मे गैब जाती सिर्फ अल्लाह ही को है और इल्मे गैब अताई नबियों और वलियों को अल्लाह तआला के देने से हासिल होता। मखलूक का इल्म हर हाल में अताई चाहे आम इल्म हो या इल्म गैब।
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* ज़ाहिर है अल्लाह का इल्म अताई तो हो ही नहीं सकता और ऐसा मानना तो कुफ्र हुआ। अच्छा जिस इल्म को अल्लाह ने सिर्फ अपने लिए बताया वह जाती है और जो अपने ख़ास बन्दों के लिए बताया वह अल्लाह की अता से है... वहाबियों का अकीदा भी बयान करें ताकि फ़र्क मालूम हो।
🌸👉🏻 *मुफ्ती साहब :* बेहतर तो यही होता कि उनका अकीदा उन्हीं से पूछते फिर भी मैं बताता -वैसे इनके यहाँ नबियों के लिए इल्मे गैब मानना शिर्क है इनका तो वहः हिसाब है कि कुरआन में आया कि कुरआन की कुछ बातें मानते हैं कुछ का इन्कार करते हैं। अगर आप इनसे पूछे कि तो यही कहेंगे कि कुरआन में आया कि अल्लाह अपने गैब पर किसी को इत्तेला नहीं देता और इस आयत को नहीं सुनायेंगे अल्लाहू तआला अपने मुकर्रब बन्दों से जिसे चाहता है चुन लेता है और गैब का इल्म अता फरमाता है। जबकि दोनों बातें हक़ हैं जहाँ इल्म को अल्लाह ने सिर्फ अपने लिए कहा वहाँ अपने जाती इल्म के लिए कहा और जहाँ इल्मे गैब के देने के लिए बात की वह अताई इल्म के लिए कही।
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* क्या वहाबी अताई इल्म को नहीं मानते।
🌸👉🏻 *मुफ्ती साहब :* इन्होंने अपनी किताबों में नबी के लिए अताई इल्म को शिर्क लिखा है हवाला मैं आपको दिखा चुका। बल्कि मैंने आपको मौ. अश्रफ़ अली थानवी की वह कुफ्री इबारत दिखाई जिसमें नबी के इल्म को पागल और मजनून जैसा दूसरी इबारत वह भी दिखाई कि इन्होंने शैतान के इल्म के सुबूत को तो कुरआन व हदीस से माना और हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इल्म का सुबूत मांगा जबकि कुरआन में भी आया और कितनी ही हदीसों से साबित कि हुजूर को इल्मे गैब अता हुआ बल्कि तमाम मखलूक से ज़्यादा अता हुआ। जब आप हर खूबी में सबसे अफ़ज़ल हैं तो इल्म या इल्मे गैब में क्यूँ न अफ़ज़ल होंगे बहुत मोटी सी बात है।
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☘️👉🏽 *अब्दुल्लाह :* कुछ लोग कहते हैं कि अल्लाह व रसूल दोनों के लिए इल्मे गैब मानने से हमने दोनों को बराबर माना और अल्लाह कि बराबर तो कोई हो नहीं सकता न जात में न सिफ़ात में न इल्म में। ज़रा अल्लाह व रसूल के इल्म के फ़र्क को समझाइये।
🌸👉🏽 *मुफ्ती साहब :* अल्लाह तआला के इल्म से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इल्म की तुलना मोटे तौर पर इस तरह की जा सकती है।
*👉🏽 1.* अल्लाह तआला का इल्म जाती है हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इल्म अल्लाह की अता से है।
*👉🏽 2.* अल्लाह तआला का इल्म कदीम है हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इल्म हादिस यानी अल्लाह का पैदा किया हुआ।
*👉🏽 3.* अल्लाह तआला का इल्म लामुतनाही (जिसकी हद न हो), हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इल्म मुतनाही (जिसकी कोई हद ज़रूर हो) है।
*👉🏽 4.* अल्लाह तआला के लिए अताई इल्म मानना कुफ़्र व शिर्क है हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिए अताई इल्म मानना ऐन ईमान है।
*👉🏽 5.* अल्लाह तआला के इल्म की मखलूक के इल्म से वह निसबत भी नहीं जो करोड़ों समन्दरों को पानी की एक बूंद के कराडवें हिस्से से है।
*यह हैं अहले सुन्नत के अकाइद।*
☘️👉🏽 *अब्दुल्लाह :* कुछ लोग यह कहते हैं कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को वही इल्म होता था जो जिब्रील अलैहिस्सलाम बताते थे यानी अल्लाह पाक जिब्रील अलैहिस्सलाम से कहलवाता।
🌸👉🏽 *मुफ्ती साहब :* देखिए एक तो इसी बात से वसीला साबित हो रहा है और हम आपको बता चुके कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अल्लाह ने सबसे ज्यादा इल्म अता किया। देखिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इल्म जिब्रील अलैहिस्सलाम, लौहे महफूज़ (वह तख़्ती जिस पर सब की तक़दीरें लिखी हैं), अर्श आज़म और तमाम नबियों से ज़्यादा है। अल्लाह पाक कैसा है यह सिर्फ़ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही को पता है। सारे गैबों से बड़ा गैब तो अल्लाह तआला ही और जब सबसे बड़ा गैब अल्लाह पाक ने अपने सबसे ख़ास महबूब बन्दे से न छुपाया तो आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से और क्या छुपा होगा।
☘️👉🏽 *अब्दुल्लाह :* वाह वाह सुब्हानल्लाह क्या बात कह दी जब अल्लाह पाक ने अपने आप को आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से न छुपाया तो और क्या छुपा होगा।
🌸👉🏽 *मुफ्ती साहब :* हमारा आपका अक़ीदा है कि कुरआन पाक में हर चीज़ का बयान है और कुरआन को सबसे ज्यादा कौन समझता है जिब्रील अलैहिस्सलाम या हमारे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम।
☘️👉🏽 *अब्दुल्लाह :* बेशक हमारे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से ज़्यादा कुरआन को कौन जाने इसमें क्या शुबा।
🌸👉🏽 *मुफ्ती साहब :* सूरह रहमान की पहली आयत का तर्जमा है कि रहमान ने अपने महबूब को कुरआन सिखाया यह सिखाना हम जैसों सा तो नहीं होगा कि कभी कुछ तिलावत पढ़ सीख ली कभी कुछ तर्जमा व तफ़सीर अरे सिखाने वाले और सीखने वाले पर नजर रखो सब समझ आ जाएगा अब और बेकार की अड़ लगा लो कि वह हम जैसे ही बशर थे तो क्या ईमान बचा पाओगे अभी वक्त है उनके इल्म का इन्कार करके उनकी तौहीन न करो।
*☘️👉🏽 अब्दुल्लाह :* हज़रत बोलते रहिए ईमान ताज़ा हो रहा है।
🌸👉🏽 *मुफ्ती साहब :* डाक्टर से दवा लो फायदा भी हो और उससे कहो कि तुम्हें इल्म नहीं है यह कहाँ की शराफ़त है। जरा एक मामूली पुलिस वाले से कहो कि तुम्हारा इल्म जाती तो हो नहीं सकता अताई है और ऐसा अताई इल्म तो पागलों और बच्चों को भी होता है तो शायद ज़बान से नहीं अपने बेंत से समझाएगा।
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☘️👉🏽 *अब्दुल्लाह :* और हदीसों से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का कितना इल्म साबित है।
🌸👉🏽 *मुफ्ती साहब :* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को तमाम अव्वलीन व आख़रीन का इल्म अता फरमाया गया मशरिक से मग़रिब तक, अर्श से फर्श तक सब उन्हें दिखाया, आसमानों व ज़मीन का गवाह बनाया रोज़े अव्वल से रोजे आखिर तक सब माकान व मायाकून (जो कुछ हो चुका और जो होने वाला है) सब उन्हें बताया।
☘️👉🏽 *अब्दुल्लाह :* कुछ मरदूद कहते हैं कि उन्हें दीवार पीछे का इल्म नहीं।
🌸👉🏽 *मुफ्ती साहब :* ऐसा मानने वाले वाक़ई मरदूद व काफ़िर व मुरतद है।
☘️👉🏽 *अब्दुल्लाह :* इल्मे गैब के बारे में बहुत कुछ मालूम हो गया अब किसी दूसरे टापिक पर आते हैं लेकिन एक बात और बतायें यह जो कुरआन में आया कि पानी कब बरसेगा, माँ के पेट में क्या है, कल क्या होगा, कौन कब मरेगा, कियामत कब आएगी इसका इल्म सिर्फ अल्लाह ही को है।
🌸👉🏽 *मुफ्ती साहब :* वही जवाब है कि जब अल्लाह पाक ऐसा फ़रमाए तो समझो कि यह जाती इल्म की बात है।
☘️👉🏽 *अब्दुल्लाह ::* मौसम विभाग तो पहले ही बता देता है कि पानी कब बरसेगा तूफ़ान कब आएगा, माँ के पेट में लड़का है या लड़की यह अल्ट्रासाउन्ड से पता चल जाता है क्या यह शिर्क होगा।
🌸👉🏽 *मुफ्ती साहब ::* हांलाकि मौसम विभाग का अनुमान गलत भी हो सकता है मगर मौसम विभाग जो पेशीनगोई करता है वह किसी उपकरण के वसीले होता है और यह अताई इल्म से है और अल्लाह ही की अता है जो इसे अल्लाह की अता न मान कर सिर्फ साइंसी ईजाद माने वह अपने लिए खुद ही समझ ले कि क्या हुक्म है। अरे जिनको मुबारक उंगलियों से पानी
के चश्मे जारी हो जायें जिनकी दुआ से लगातार हफ्ते भर पानी बरसे उनसे पानी बरसने जैसा इल्म छुपाया जाएगा हाँ छुपाने का हुक्म दिया जा सकता है और ऐसा ही। बिल्कुल यही बात अल्ट्रासाउन्डा से माँ के पेट या पेट के दूसरे हाल बताना सब अल्लाह की अता से है।
🌟👉🏻 *अब्दुल्लाह :* क्या कभी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने पेट का हाल बताया।
☘️👉🏻 *मुफ़्ती साहब :* हाँ बल्कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ख़ास यार हज़रते अबूबक्र सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु ने अपनी बेटी हज़रते आइशा सिद्दीका रदियल्लाहु तआला अन्हा से फ़रमाया ऐ बेटी जो बाग तेरे पास है उसमें तेरी बहनों का भी हिस्सा है जबकि वह बहन अभी माँ के पेट में थीं। यहाँ तो कोई अल्ट्रासाउन्ड भी नहीं अल्लाह के अता किए हुए इल्म से ही था।
🌟👉🏻 *अब्दुल्लाह :* मरने के बारे में।
☘️👉🏻 *मुफ्ती साहब :* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जंगे बदर में एक दिन पहले ही बता दिया था कि कौन कहाँ मरेगा और वह वहीं मरा। इसके अलावा आप तो यह भी जानते हैं कि कौन जन्नत में जाएगा कौन जहन्नम में।
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☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* कियामत के इल्म के बारे में वज़ाहत करें।
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब :* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को कियामत का इल्म भी है मगर उसे छुपाने का हुक्म था।
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* मशहूर है कि कियामत तो अशरे को जुमा के दिन आयेगी।
🌟👉🏻 *मुफ़्ती साहब :* हाँ बेशक इसी बात से साबित कि हमारे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को कियामत का इल्म है तभी तो उन्होंने दिन व महीना व तारीख़ बता और सन् कर बात भी छुपा दी यानी अल्लाह ने उन्हें यही हुक्म दिया कि बस इतना ही बताना है। अब अगर हम उसी बात पर अड़े रहें कि तो ख़ुद ही फंस गए कि कहाँ जायें और जाती व अताई का फर्क समझा लें तो सब बात हल अक़ीदा दुरुस्त।
🌟👉🏻 *अब्दुल्लाह :* काश हम इतनी सी बात को साफ़ कर लें कि जाती व अताई का फ़र्क समझ ले।
☘️👉🏻 *मुफ्ती साहब :* अरे उन्हें तो यह भी मालूम है कि कियामत में क्या क्या होगा, कौन जन्नत में जाएगा और कौन जहन्नम में और कब किस किस को आप जहन्नम से निकाल कर लायेंगे। लोग किस किस के पास मदद को जायेंगे। अब जरा अक्ल से सोचो कि क्या अल्लाह ने उनसे सन् छुपाई या छुपाने का हुक्म दिया और बिलफर्ज यह मान भी लिया जाए कि उन्हें सन् नहीं मालूम तो हमने कब यह दावा किया कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इल्म अल्लाह के बराबर है या कुल इल्म आपको है कुल इल्म तो सिर्फ अल्लाह ही को है। मखलूक में जितना भी इल्म किसी को मिलता है तो क्या वह सबका सब दूसरों को बता देता कुछ बताता है कुछ भूलता है कुछ जानबूझ कर नहीं बताता। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम भूले नहीं जहाँ दिन तारीख़ महीना बताया वहाँ सन् भी बता सकते थे बल्कि छुपाने का हुक्म था।
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🌸👉🏻 *अब्दुल्लाह :* एक बात और यह बतायें कि जहाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खुद यह कहा कि मुझे नहीं मालूम यानी इससे ज़ाहिर हुआ कि हुजूर सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम को नहीं मालूम आपने किसी से पूछा कि यह क्या है या वह क्या है तो इससे भी यही मालूम होता है कि उन्हें मालूम नहीं या इल्म नहीं।
☘️👉🏻 *मुफ्ती साहब :* अब जो ऐब ही निकालना चाहे और उसके नफ़्स की शामत जब अबू जहल जैसे के हाथ में कंकरियों ने कलिमा पढ़ा और वह न माना। फिर भी इसका वही जवाब कि हमारा दावा कुल इल्म का नहीं दूसरे हुजूर के ऐसा फ़रमाने का मतलब अपने लिए जाती इल्म का इन्कार है रहा सवाल पूछने की बात तो पूछने से हर बार यह साबित नहीं होता कि इल्म नहीं। कुरआन में आया कि अल्लाह पाक ने हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम से पूछा कि ऐ मूसा तुम्हारे हाथ में क्या है तो आपने जवाब दिया कि मेरे हाथ में असा है मैं इससे टेक लगाता हूँ दरख्त से पत्ते तोड़ लेता हूँ जानवर को भगा देता हूँ। अब जरा सोचिए कि क्या अल्लाह तआला को नहीं मालूम कि हुज़रते मूसा अलैहिस्सलाम के हाथ में क्या है। हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम ने यह क्यूँ न कहा कि ऐ अल्लाह तू जानता है फिर क्यूँ पूछ रहा है बल्कि असा के काम गिना दिए जबकि अल्लाह तो सब जानता है। अल्लाह ने शैतान से पूछा कि तूने सजदा क्यूँ नहीं किया क्या अल्लाह को नहीं मालूम था। मतलब यह कि हर बार ऐसा नहीं है कि पूछने वाला अन्जान हो।
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* एक एतराज़ कुछ लोग करते हैं कि मुनाफ़क़ीन ने जब हज़रते आइशा सिद्दीका रदियल्लाहु तआला अन्हा पर तोहमत लगाई तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम क्यूँ कई दिन तक परेशान रहे अगर आपको इल्मे गैब होता तो क्यूँ अपनी बीवी के बारे में ख़ामोश रहते ?
🌸👉🏻 *मुफ़्ती साहब :* बुख़ारी शरीफ़ में है हज़रते आइशा सिद्दीका रदियल्लाहु तआला अन्हा के हक में आपकी पाकी की आयत के नाज़िल होने से पहले आपने इरशाद फ़रमाया कि ख़ुदा की कसम मैं अपनी बीवी के मुताल्लिक सिवाए अच्छाई और पाक दामनी के और कुछ नहीं जानता। परेशान होने की वजह यह घिनौना झूटा इल्जाम था और जब इल्जाम झूटा हो तो कौन न परेशान होगा। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खामोशी में राज़ यह भी था कि गवाही अल्लाह की आना थी और मुनाफेकीन का निफाक खुलना था। अगर आपको इल्म न होता तो आप कसम न खाते।
🌸👉🏻 *अब्दुल्लाह :* फ़िरिश्ते अल्लाह तआला का लश्कर हैं और अल्लाह तआला फ़रमाता है कि अल्लाह तआला के सिवा उनके लश्कर को कोई नहीं जानता।
☘️👉🏻 *मुफ्ती साहब :* तमाम फ़िरिश्ते नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर दुरूद भेजते हैं और नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सुनते हैं तो क्या उनको तादाद न मालूम होगी। और मशहूर हदीस है कि 70000 फ़िरिश्ते रोज़ अल्लाह तआला पैदा फरमाता है जो आपकी बारगाह में हाजरी देते और दुरूद पढ़ते हैं और दोबारा नहीं आते। काश जाती व अताई का फर्क समझ लेते तो यह न कहते।
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🌟👉🏻 *अब्दुल्लाह :* जंगे खैबर की फ़तह के बाद यहूदियों ने एक औरत को ज़हर आलूदा गोश्त लेकर नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास भेजा और आपने उसे खाया अगर आपको इल्मे गैब होता तो क्यूँ खाते ?
☘️👉🏻 *मुफ्ती साहब :* काश बुख़ारी शरीफ़ की पुरी हदीस पढ़ी होती कि इसमें यह भी है कि उन यहूदियों के बापों के नाम आपने सही बता दिए जो कि वो छुपा रहे थे। और आपने उस औरत को बता दिया कि इस गोश्त ने मुझे बताया है कि तूने ज़हर मिलाया है। वह औरत आपके नबी होने का इम्तहान लेने आई थी कि अगर आप नबी होंगे तो गोश्त नुकसान न करेगा। लिहाज़ा आपने खाया और नुकसान न हुआ और आप सच्चे साबित हुए। इस हदीस से तो आपका सच्चा होना और इल्मे गैब दोनों साबित होते हैं।
🌟👉🏻 *अब्दुल्लाह :* एक एतराज़ यह भी है कि मिश्कात शरीफ़ में है कि नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक मरतबा फ़रमाया कि कियामत के दिन कुछ लोग मेरे सहाबा में पकड़े जायेंगे और फ़िरिश्ते उनको पकड़ कर जहन्नम की तरफ़ ले जा रहे होंगे तो मैं कहूंगा कि ऐ मेरे रब ये तो मेरे सहाबी हैं तो अल्लाह तआला फरमाएगा कि ऐ मेरे महबूब आप नहीं जानते कि आपके बाद ये लोग क्या करते रहे ? इस हदीस से साबित हुआ कि हुजूर को मुनाफेकीन का इल्म नहीं था।
☘️👉🏻 *मुफ़्ती साहब :* काश ऐसे एतराज़ करने से पहले ज़रा गौर कर लेते कि यह होगा अभी हुआ नहीं और हुजूर ने पहले ही ख़बर दे दी तो यह गैब नहीं तो और क्या है।
*📕 तफसीर ख़ाज़िन जिल्द अव्वल में है कि* अल्लाह ने आपको मुनाफेकीन के मक्र व फरेब का भी इल्म दिया था। रहा बख्श्शि का सवाल तो यह सभी मानते हैं कि मुनाफेकीन और बेईमान न बख़्शे जायेंगे।
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* मेरे ख्याल से काफ़ी हो गया अब टापिकं चेंज करा जाए। बात साफ़ हो चुकी। और फिर जिस पर कुरआन उतरा उसे क्या क्या न अता होगा।
☘️👉🏻 *मुफ़्ती साहब :* जी बिल्कुल सही फ़रमाया। आख़िर में यह भी सुन लीजिए कि कुछ हदीसों का मफ़हूम है कि एक बार हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने कियामत तक जो होने वाला है, जन्नितयों के जन्नत में जाने और दोज़खियों के दोज़ख़ में जाने तक की बातें बताई जिसे जो याद रहा उसने याद रखा।
📕 *हवाले भी सुन लीजिए*
👉🏻 *1.* सहीहैन बुख़ारी व मुस्लिम में हज़रते हुजैफा रयिल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है।
*👉🏻 2.* अहमद 'ने मुसनद में, बुख़ारी ने तारीख़ में, तबरानी ने कबीर में हज़रते मुगीरा इब्ने शैबा रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत किया
*👉🏻 3.* सही बुख़ारी व मुस्लिम में हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत किया।
🌟 मेरे ख्याल से कुरआन हदीस अक्ली दलाइल से साबित हो गया हमारे आका हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अल्लाह ने इल्मे गैब तमाम मखलूक से ज़्यादा अता फरमाया। नबी के मअना ही गैब की ख़बर देने वाला है और फिर जिसके जरिए इतना बड़ा काम होना है तो क्यूँ न उसे इल्म ताक़त और इख़्तेयार दिया जाएगा।
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🌟 *हाज़िर ओ नाज़िर* 🌟
🌸👉🏻 *अब्दुल्लाह : हाज़िर ओ नाज़िर के शरई माअना क्या हैं ?*
☘️👉🏻 *मुफ्ती साहब :* आसान लफ़्ज़ों में हाज़िर को यूँ कहें कि हाजिर वह है जो एक जगह बैठे हुए ही उस जगह पहुँच सके या मौजूद हो और उस जगह पर तसर्राफ कर सके (यानी काम या मदद कर सके) जहाँ के लिए उसे हाज़िर कहा गया और नाज़िर वह जो अपनी आँख से उसे वह देख रहा हो जहाँ के लिए उसे नाज़िर कहा गया है।
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह : एक जगह से बैठे हुए देखे वह कैसे ?*
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब :* बल्कि एक जगह से बैठे हुए तमाम आलम को ऐसे देखे जैसे अपने हाथ की हथेली को देखता है।
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह : अच्छा! देखे भी और पहुँच भी जाए और कोई काम या मदद भी कर सके।*
🌟👉🏻 *मुफ़्ती साहब :* जी हाँ ! देखे ही नहीं बल्कि एक ही आन (चन्द सेकेण्ड) में तमाम आलम की सैर करे और मीलों दूर के हाजतमन्दों की हाजत पूरी करे और रफ़तार सिर्फ रूहानी हो या जिस्मे मिसाली के साथ हो या उसी जिस्म से जो कब्र में दफ़्न है या किसी जगह मौजूद हो।
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* क्या यह ऐसा बुनियादी अकीदा है कि इसका इन्कार करने वाला काफ़िर हो जाएगा ?
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब :* नहीं हाज़िर ओ नाज़िर के अक़ीदे का इन्कार करने वाले को काफ़िर नहीं कहा जएगा।
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह :* क्या कुआन से हाज़िर ओ नाज़िर के अकीदे का सुबूत मिलता है ?
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब :* हाज़िर ओ नाज़िर के सुबूत में कुछ आयते कुआनी का तर्जमा पेश है :
*👉🏽 1.* ऐ गैब की ख़बरें बताने वाले बेशक हमने तुमको भेजा हाज़िर नाज़िर और खुशखबरी देता और डर सुनाता और अल्लाह की तरफ़ उसके हुक्म से बुलाता और चमका देने वाला आफ़ताब।
*👉🏽 2.* और अगर ज़ब वह अपनी जानों पर जुल्म करें तो ऐ महबूब तुम्हारे हुजूर हाज़िर हों फिर अल्लाह से माफ़ी चाहें और रसूल उनकी शफाअत फ़रमा दें तो ज़रूर अल्लाह को बहुत तौबा कबूल करने वाला मेहरबान पायें।
*👉🏽 3.* और हमने तुमको न भेजा मगर रहमत सारे जहाँ के लिए और दूसरी जगह फ़रमाया मेरी रहमत हर चीज़ को घेरे
*👉🏽 4.* नबी मुसलमानों से उनकी जानों से ज़्यादा करीब हैं। इन आयात से साबित हुआ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम गैब की ख़बर देने वाले, हमें अल्लाह का डर सुनाने वाले अल्लाह की तरफ़ बुलाने वाले, शफाअत करने वाले, हमारी जान से ज़्यादा करीब, हमें हर आन देखने वाले, हमारी हर आन बातें सुनने वाले, हमारी मदद करने वाले जब चाहें, हमारे लिए ही नहीं तमाम आलम के लिए रहमत और हाज़िर ओ नाज़िर हैं।
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 17 🔰*
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🌟 *हाज़िर ओ नाज़िर, पार्ट(2)* 🌟
☘️👉🏻 *अब्दुल्लाह : कुछ हदीसें जिनसे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इल्मे गैब और हाज़िर ओ नाज़िर का सुबूत मिलता है सुनाईये*
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब : चन्द हदीसें हाज़िरे खिदमत हैं :*
👉🏽 *1.* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया मैं तमाम आलम को अपनी हथेली की तरह देख रहा हूँ। हम पर हमारी उम्मत अपनी सूरतों में पेश हुई और हम उनके नाम हुए है। उनके बाप दादाओं के नाम उनके घोड़ों के रंग जानते हैं वगैरह वगैरह।
*👉🏽 2.* कब्र में फ़िरिश्ते पूछते हैं कि तुम उनके बारे (मुहम्मदुरसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) में क्या कहते थे।
*👉🏽 3.* एक शब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम घबराए हुए बेदार हुए फरमाते थे कि सुब्हानल्लाह इस रात में किस कद्र खज़ाने और किस कद्र फ़ितने उतारे गए हैं।
*👉🏽 4.* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया तुम्हारी मुलाकात की जगह हौज़े कौसर है उसको इसी जगह से देख रहा हूँ।
*👉🏽 5.* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मदीने पाक की एक पहाड़ी पर खड़े हो कर सहाबए किराम से पूछा कि जो मैं देख रहा हूँ क्या तुम भी देखते हो ? अर्ज़ किया कि नहीं। फ़रमाया मैं तुम्हारे घरों में बारिश की तरह फ़ितने गिरते हुए देखता हूँ।
🌸👉🏻 *अब्दुल्लाह : वहाबी लोग इस बारे में क्या कहते हैं ?*
🌟👉🏻 *मुफ़्ती साहब :* उनके यहाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को हाज़िर ओ नाज़िर मानना कुफ्र व शिर्क है।
🌸👉🏻 *अब्दुल्लाह : हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को हाज़िर ओ नाज़िर कहने अल्लाह तआला से बराबरी नहीं हो रही है क्या ?*
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब :* नहीं ! वह इस लिए कि अल्लाह तआला को हाज़िर ओ नाज़िर कहना जाइज़ नहीं। वह इसलिए कि अल्लाह तआला जगह व मकान से पाक है और अल्लाह नाजिर है मगर अल्लाह आँख से नहीं देखता लिहाज़ा अल्लाह के लिए आँख से देखना नहीं। (अल्लाह की शान इससे कहीं ज़्यादा अरफ़ा व आला है यह हमारी समझ से बाहर है अल्लाह व रसूल ही जाने)
🌸👉🏻 *अब्दुल्लाह : कुछ लोग घर में जाते हैं तो नबी पर सलाम अर्ज करते हैं क्या इसी लिए कि आप हाज़िर ओ नाज़िर हैं ?*
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब :* शिफ़ा शरीफ़ में है जब घर में कोई न हो तो तुम कहो कि ऐ नबी तुम पर सलाम और अल्लाह की रहमतें और बरकतें हों।
🌸👉🏻 *अब्दुल्लाह : क्या हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जिन्दा हैं और हमें देख रहे हैं ?*
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब :* हर नबी जिन्दा हैं उन्हें सिर्फ एक आन के लिए मौत आती है। इमाम कुस्तंलानी माहिब में फ़रमाते हैं हमारे उल्मा ने फ़रमाया हुजूर अलैहिस्सलाम की जिन्दगी और वफ़ात में कोई फर्क नहीं अपनी उम्मत को देखते हैं और उनके हालात नियतों, इरादों और दिल की बातों को जानते हैं यह आपको बिल्कुल ज़ाहिर हैं इसमें पोशीदगी नहीं।
🌸👉🏻 *अब्दुल्लाह : क्या मस्जिद में जाने पर भी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को सलाम करना चाहिए और दुरूद भी पढ़ना चाहिए ?*
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब :* इमाम गजाली रयिल्लाहु तआला अन्हु फ़रमाते हैं कि जब तुम मस्जिदों में जाओ तो हुजूर अलैहिस्सलाम को सलाम अर्ज करो क्यूँकि आप मस्जिदों में मौजूद हैं।
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🌟 *हाज़िर ओ नाज़िर, पार्ट(3)* 🌟
🌸👉🏻 *अब्दुल्लाह : आपने बताया था कि नमाज़ में हुजूर के ख्याल आने को वहाबी बुरा जानते हैं। मैंने सुना है कि नमाज़ चूंकि अल्लाह ही के लिए ख़ास इबादत है इसलिए वहाबियों का कहना है कि किसी और का ख्याल लाना शिर्क होता है हमारे बुजुर्गों में भी इस बारे में कुछ लिखा है।*
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब :* नमाज़ में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ख्याल आने के कुछ कौल ये हैं जिनसे हुजूर के हाज़िर ओ नाज़िर होने का सुबूत भी मिलता है।
*👉🏽 1.* मदारिजुन्नुबुव्वत में है बाज़ आरफीन ने कहा है कि अत्तहिय्यात में यह खिताब इसलिए है कि हकीकते मुहम्मदिया मौजूदात के जर्रा ज़र्रा में और मुमकिनात के हर फ़र्द में सरायत किए हुए है बस हुजूर अलैहिस्सलाम नमाजियों की ज़ात में आगाह रहे और इस से गाफिल न रहे ताकि कुर्ब के नूर और मारिफ़त के भेदों से कामयाब हो जाए।
*👉🏽 2.* इहयाउल उलूम में इमाम गजाली फरमाते हैं नमाज़ के कादा में 'अत्तहियात' में जब नबी को सलाम करने का वक्त आए तो अपने दिल में नबी अलैहिस्सलम को और आपकी ज़ाते पाक को हाज़िर जानो और कहो "अस्सलामुअलैका अय्युहन्नबीय्यु व रहमतुल्लाहि व बराकातुह"
*👉🏽 3.* हजूर अलैहिस्सलाम को नमाज़ में खिताब किया गया गोया कि यह इस तरफ इशारा है कि अल्लाह तआला आपको उम्मत में नमाजियों का हाल आप पर जाहिर फरमा देता है हत्ताकि आप मिस्ल हाज़िर के होते हैं उसके आमाल हो समझने में और इसलिए कि आप की हाज़री का खुशूअ व खुजूअ की ज़्यादती का सबब हो जाए।
🌸👉🏻 *अब्दुल्लाह:* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के अलावा भी किसी और को हाजिर ओ नाज़िर कह सकते हैं ?
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब :* हाज़िर ओ नाजिर की परिभाषा के तहत अगर देखें तो मखलूक में कुछ और भी हस्तियों हाजिर ओ नाजिर है तीन मिसाल में पेश करता हूँ समझने के लिए काफ़ी हैं *जैसे : :*
*👉🏻 1.* मलिकुल मौत के लिए सारी ज़मीन तश्त की तरह कर दी गई है कि जहाँ से चाहें लें उन्हें रूहें कब्ज़ करने में कोई दुश्वारी नहीं अगरचे रूहें ज़्यादा हों और अलग अलग जगहों पर हों।
*👉🏻 2.* जब हम सोते हैं तो हमारी रूह जिस्म से निकल कर आलम में सैर करती है, अचानक जब कोई हिलाता है तो एक आन में रूह वापस आ जाती है।
*👉🏻 3.* हज़रते जिबील का एक आन में हाज़िर व नाज़िर होना।
🌟👉🏻 *अब्दुल्लाह :* इस तरह क्या शैतान को भी हाज़िर व नाज़िर कह सकते हैं ?
🌸👉🏻 *मुफ़्ती साहब :* शैतान मखलूक को बहकाने के लिए सबको देख रहा है और हर जगह पहुँच जाता है यहाँ तक कि दिलों में वसवसे डालता है और अल्लाह ने उसे बहुत ताक़त दी है मगर इसको हाज़िर व नाज़िर कहना मना है।
🌸👉🏻 *अब्दुल्लाह :* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और नबियों के ज़िन्दा होने के सुजूत में कोई ऐसा हवाला दें जिन्हें वहाबी भी मानतें हों ?
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब :* हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत पर शाह मुहदिस अब्दुल हक़ देहलवी की लिखी किताब मदारिजुन्नुबुव्वत के हिस्सा अब्बल के सफा 576 पर लिखा है *"अल्लाह के नबी दुनियावी ज़िन्दगी की हयात के साथ जिन्दा हैं"*
🌸👉🏻 *अब्दुल्लाह :* अगर कोई यह कहे कि जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जिन्दा हैं हाजिर ओ नाज़िर है तो दिखाई क्यूँ नहीं देते।
🌟👉🏻 *मुफ्ती साहब :* जिस तरह जिन्नं व फ़िरिश्ते और कुछ और अल्लाह की मखलूक जैसे हवा, ख़ुशबू, बदबू, मज़ा, सोचना, महसूस-करना, आवाज़, बिजली का करन्ट, तस्वीरों का आना जाना, इन्टरनेट वगैरह हमें दिखाई नहीं देते। इसी तरह अम्बिया व औलिया भी मरने के बाद जिन्दा हो जाते हैं और हमें दिखाई नहीं देते और अल्लाह की दी हुई ताकत व अपने मरतबे के मुताबिक हाज़िर वा नाज़िर हैं।
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🌟 *हाज़िर ओ नाज़िर, पार्ट(4) आखिरी* 🌟
🌟👉🏻 *अब्दुल्लाह : हाज़िर व नाज़िर के सुबूत में कुछ और अक्ली दलाइल पेश करें*
🌸👉🏻 *मुफ्ती साहब :* लिजिए बहुत से दलाइल सुनिये *👉🏽 1.* हदीस में है कि दुनिया काफ़िर के लिए जन्नत है और मोमिन के लिए कैदखाना। मरने के बाद मोमिन बे रोक टोक जहाँ तक अल्लाह चाहे जाता आता है सैर करता है यानी अपनी हदों में हाज़िर व नाज़िर है।
*👉🏽 2.* अल्लाह की राह में जो लोग शहीद होते हैं उनका मरने के बाद जिन्दा रहना कुरआन से साबित है।
*👉🏽 3.* अल्लाह की राह शहीद को मरने के बाद एक बहुत बड़ी जगह में हाजिर व नाजिर कहा जा सकता है।
*👉🏽 4.* हदीस में नफ्स से जिहाद करने को शहीदे अकबर बताया गया है क्या इस बड़े जिहाद में कामयाब होने वाले भी जिन्दा हैं मसलन औलिया अल्लाह।
*👉🏽 5.* जब शहीदे असगर व शरीदे अकबर जिन्दा हैं तो क्या अम्बिया भी जिन्दा और उनसे भी ज़्यादा दूर जाने आने वाले और सैर करने वाले है।
*👉🏽 6.* कसरत से दुरूद पढ़ने वाले को मिट्टी नहीं खाती यानी वह जिन्दा रहता है और उसकी रूह फिर जिस्म में लौट आती है और घूमता फिरता आता जाता सैर करता है जैसा अल्लाह चाहे लिहाजा वह अपनी हदों में हाज़िर वा नाज़िर है।
*👉🏽 7.* किसी ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ख्वाब में देखा और अपना कोई पेचीदा मसअला उनसे पूछा और उन्होंने उसे जवाब दिया ज़ाहिर है जवाब सही है और एक ही वक्त में हज़ारों लोगों के साथ ऐसा हुआ क्या इससे साबित होता है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हाज़िर व नाज़िर हैं।
*👉🏽 8.* मरने के बाद नई ज़िन्दगी आलमे बरज़ज़ में शुरू होती है जहाँ अज़ाब व सवाब होता है यह बात सभी के लिए कुरआन व हदीस से साबित है और हर ख़ास व आम के लिए है और अज़ाब व सवाब जिस्म व रूह दोनों पर होता है। मरने के बाद शहीद आम लोगों से अफ़ज़ल हैं और तमाम नबी शहीदों से अफ़ज़ल हैं।
*👉🏽 9.* शिफा शरीफ़ में है कि जब तुम किसी ख़ाली मकान में दाखिल हो नबी (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) पर सलाम अर्ज़ करो क्यूँकि नबी की मुबारक रूह मकान अन्दर तशरीफ़ फ़रमा है। क्या यह सही है।
*👉🏽 10.* जब मुसलमानों के घरों में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की रूह तशरीफ़ फ़रमा है तो क्या महफ़िले मीलाद में आप (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) की रूह नहीं आ सकती ? बेशक आ सकती है और मुसलमानों के करोड़ों घर है लिहाज़ा आप हाजिर व नाज़िर है।
*👉🏽 11.* हदीस में है कि जो मेरा जिक्र करता है मैं उसका हमनशीन होता हूँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हर जिक्र करने वाले के पास हाजिर वा नाज़िर हैं।
*👉🏽 12.* शबे मेराज तमाम नबियों ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की इमामत में नमाज़ पढ़ी। क्या इससे साबित होता है कि तमाम नबी अपने जिस्म के साथ जिन्दा हैं।
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🌸 *बशरियत पार्ट :(1)* 🌸
*🌟👉🏽 अब्दुल्लाह :* कुछ लोग कहते हैं कि हम भी इन्सान हैं हुजूर भी इन्सान लिहाजा वह हम जेसे बशर हुए। हालांकि मैं समझता हूँ कि यह बेअदबी है वह तो सरापा नूर हैं, सबसे आला बशर अल्लाह के नूर हैं। उनकी बेमिस्ल बशरियत पर जो बशर तो हैं मगर हम जैसे बशर नहीं ऐसी रोशनी डालें कि ईमान ताज़ा हो जाए।
*🌸👉🏽 मुफ्ती साहब :* हालांकि आपके सवाल में ही आपका जवाब है मगर आपका तकाज़ा कुछ और है। जिस तरह अल्लाह तबारक व तआला अपनी ज़ात में अकेला है उसका कोई शरीक और साझी नहीं एक ही उसने अपने महबूब को भी बेमिस्ल बनाया है। अल्लाह ने आपको अपने नूर से पैदा फ़रमाया और आपके नूर से तमाम मखलूक को पैदा फ़रमाया। मखलूक में अपकी मिस्ल आपकी तरह और आप के बराबर कोई न है न हुआ है और न होगा। आप सारे औसाफ़ में सबसे जुदा हैं आपकी शान निराली है आपकी जात अनोखी है आपकी हर अदा बेमिसाल है आपको अपने जैसा बशर कहना या समझना कुफ्र है क्यूँकि यह कुरआन हदीस की मुखलिफ़त है। अब मैं आपको सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की चन्द् खुसूसियात बताता हूँ जो कि कुरआन और हदीसों से साबित हैं जिसमे जवाब भी हो जाए और ईमान को ताज़गी भी मिले।
🌟 *अल्लाह तआला का फरमान है* कि ऐ महबूब अगर आपको पैदा न करना होता तो कुछ पैदा न करता यहाँ तक कि अपना रब व इलाह (माबूद, पूजा के काबिल) होना भी जाहिर न करता।
🌟 आप पैदाइश के एतबार से 'अव्वलुल अम्बिया' यानी सबसे पहले नबी हैं जैसा कि हदीस शरीफ़ में है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को उस वक्त नुबुव्वत मिल चुकी थी जबकि हज़रते आदम अलैहिस्सलाम जिस्म व रूह की मन्ज़िलों से गुजर रहे थे।
🌟 अल्लाह तआला ने सबसे पहले आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के नूर को पैदा फ़रमाया और आपके नूर से तमाम मखलूकात को पैदा फ़रमाया।
🌟 जिसको भी जो मिलता है हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वसीले से ही मिलता है। हर नबी व वली आप ही से फैज़ पाकर किसी मरतबे पर पहुँचता है।
🌟 आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं अल्लाह देने वाला है और मैं कासिम (बांटने वाला) हूँ।
🌟 अल्लाह तआला हर चीज़ का हक़ीक़ी मालिक है और हुजूर अल्लाह की अता से हर चीज़ के मालिक व मुख्तार हैं. बल्कि मुख्तारे कुल हैं। अल्लाह तआला ने अपनी शरीअत का आपको मुख़्तार बना दिया है। आप जिसके लिए जो चाहें हलाल फ़रमा दें और जिसके लिए जो चाहें हराम फरमा दें मसलन हज़रते सुराका रदियल्लाहु तआला अन्हु के लिए आपने सोने के कंगन पहनना हलाल कर दिए, एक आराबी के लिए तीन ही वक्त की नमाज़ फ़र्ज़ फ़रमा दी, मौला अली रदियल्लाहु तआला अन्हु के लिए हज़रते फ़ातिमा रदियल्लाहु तआला अन्हा के होते दूसरा निकाह हराम फ़रमा दिया।
🌟 आप बादे विसाल भी जिन्दा हैं, नबियों को वादए इलाही के मुताबिक़ एक आन को मौत आती है। आप मदद फ़रमाते हैं, बलाओं व वबाओं को दूर फ़रमाते हैं। हुजूर से डाइरेक्ट मांगना भी जाइज़ है। आप जिसे जो चाहें अल्लाह के हुकूम से अता फरमाते हैं। आप मुर्दों तक को जिंदा फरमाते हैं।
🌟 नबी के मअना ही हैं गैब की ख़बर देने वाला। तमाम नबियों को गैब का इल्म दिया जाता है जैसा कि अल्लाह का फ़रमान है कि अल्लाह किसी को गैब का इल्म नहीं अता करता मगर चुन लेता है जिसे चाहे और उन्हें गैब दिया जाता है। और बेशक चुनने में सबसे ज़्यादा हक़दार अम्बिया ही होते हैं और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तो तमाम नबियों के इमाम हैं। आपको तमाम मखलूक में सबसे ज्यादा इल्म और इल्मे गैब अता हुआ यहाँ तक कि खुद अल्लाह पाक ने अपने आपको भी आपसे नहीं छुपाया। आप क़ियामत तक की हर छुपी हुई बात जानते हैं बल्कि आपने कियामत, जन्नत व दोज़ख़ तक की बातें आने से पहले ही हमें बता दी। यह सब कुछ अल्लाह की अता ही से है।
🌟 हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हाजिर व नाज़िर है। इसका मतलब यह है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब चाहें अपने जिस्म के साथ हर जगह हाजिर हो सकते हैं और आप अपनी आंखों से सब कुछ देख रहे हैं यानी नाजिर है। अर्श से फर्श तक आप हर जगह हाज़िर व नाज़िर हैं। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शफाअत कुरआन व हदीस से पूरी तरह साबित है । शफाअत सिर्फ उनके लिए नहीं जो शफाअत का इन्कार करें।
🌟 आप आख़िरी नबी हैं।
🌟 आपका मुकद्दस नाम अर्श और जन्नत की पेशानियों पर तहरीर किया गया। तमाम आसमानी किताबों में आपकी बशारत दी गई।
🌟 आपकी विलादत के वक़्त तमाम बुत औंधे होकर गिर पड़े। आपका शक्के सदर हुआ यानी जिब्रीले अमीन ने आपका सीनए मुबारक चीर दिया और दिल निकाल कर उसको ज़मज़म शरीफ़ से धोकर फिर दुरुस्त कर दिया।
🌟 आपको मेराज का शरफ़ अता किया गया और आपकी सवारी के लिए बुराक पैदा किया गया।
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🌸 *बशरियत पार्ट :(2)* 🌸
🌟 आप पर नाजिल होने वाली किताब तब्दील व तहरीफ़ से महफूज़ कर दी गई यानी कुरआने पाक में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। क़ियामत तक कुरआन की बका व हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी अल्लाह तआला ने अपने ज़िम्मे करम पर ली।
🌟 अपको आयतुल कुर्सी अता की गई।
🌟 आपको तमाम ज़मीनी ख़ज़ानों की कुंजियाँ अता कर के अल्लाह तआला आपको मालिक बना दिया।
🌟 आपको जामेउल कलिम के मोजिज़े से सरफ़राज़ किया गया यानी आप छोटे जुमलों में वह बात कह देते जो कोई दूसरा नहीं कह सकता और अक्ल की समझ से यह बात बाहर होती कि ऐसी बात कैसे कह दी।
🌟 आपको रिसालते आम्मा के शरफ से मुमताज़ किया गया यानी आप नबियों, फ़िरिश्तों, इन्सानों और जिन्नों सभी के रसूल हैं।
🌟 आपकी सच्चाई को साबित करने के लिए, आपको चाँद के दो टुकड़े करने का मोजिज़ा अल्लाह तआला ने अता फ़रमाया।
🌟 आपके लिए माले गनीमत को अल्लाह तआला ने हलाल कर दिया।
🌟 आपके लिए अल्लाह तआला ने तमाम ज़मीन को मस्जिद बना दिया यानी हर पाक जगह पर आदमी नमाज़ पढ़ सकता है और उससे पाकी हासिल कर सकता है यानी तयम्मुम करना मिट्टी से जाइज़ किया गया।
🌟 आपके बाज़ मोजिज़ात मसलन कुरआन मजीद कियामत तक बाकी रहेंगे। अल्लाह पाक ने तमाम अम्बिया को उनका नाम लेकर पुकारा भगर आपको अच्छे -2 अल्काब से पुकारा।
🌟 अल्लाह तआला ने आपका सर 'हबीबुल्लाह' के लकब से बलन्दः फरमाया।
🌟 अल्लाह तआला ने कुरआन पाक में आपकी रिसालत, आपकी हयात, आपके शहर आपके ज़माने की कसम याद फ़रमाई।
🌟 आप तमाम औलाद आदम के सरदार हैं। आप अल्लाह पाक के दरबार में अकरमुल - ख़ल्क हैं यानी तमाम मखलूक में सबसे ज्यादा इज्जत वाले हैं।
🌟 कब में आपकी ज़ात के बारे में मुन्कर नकीर सवाल करेंगे।
🌟 आपके बाद आपकी बीवियों के साथ निकाह करना हराम ठहराया गया।
🌟 हर नमाज़ी पर वाजिब कर दिया गया कि नमाज़ की हालत में 'अस्सलामुअलैका या अय्युहन्नबिय्यु" कह कर आपको सलाम करे। अगर किसी नमाज़ी को नमाज़ की हालत में हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पुकारें तो वह नमाज़ छोड़ कर आपकी पुकार पर दौड़ पड़े। यह उस पर वाजिब है और ऐसा करने से उसकी नमाज़ टूटेगी भी नहीं यानी जब हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बात कर ले तो फिर वहीं से नमाज़ पढ़े जहाँ से छोड़ी थी।
🌟 आपके मिम्बर और क़ब्रे अनवर के दरमियान की ज़मीन जन्नत के बागों में से एक बाग़ है।
🌟 सूर फूंकने पर सबसे पहले आप अपनी कब्रे मुनव्वर से बाहर तशरीफ़ लायेंगे।
🌟 आपको मक़ामे महमूद अता किया गया।
🌟 आपको शफाअते कुबरा जैसी इज़्ज़त से नवाज़ा गया।
🌟 आपको कियामत के दिन लिवाउल हम्द अता किया गया। लिवाउल हम्द एक झंडा जो रोज़े कियामत आपको अता होगा।
🌟 आप सबसे पहले जन्नत में दाखिल होंगे।
🌟 आपको हौज़े कौसर अता किया गया।
🌟 क़ियामत के दिन हर शख्स का नसब व तअल्लुक मुन्कता हो जाएगा मगर आपका नसब व तअल्लुक़ मुन्कता न होगा।
🌟 आपके सिवा किसी नबी के पास हज़रते इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम नहीं उतरे।
🌟 आपके दरबार में बलन्द आवाज़ से बोलने वाले के नेक आमाल बरबाद कर दिए जाते हैं।
🌟 आपको हुजरों के बाहर से पुकराना हराम कर दिया गया।
🌟 आपकी अदना सी गुस्ताखी करने वाले की सज़ा क़त्ल हैं।
🌟 आपको तमाम अम्बिया अलैहिमुस्सलाम से ज़्यादा मोजिज़ात अता किए गए।
*👇🏻 आखिर में बस यही कहना है 👇🏻*
*जमीनो ज़माँ तुम्हारे लिये मकीनो मकाँ तुम्हारे लिए*
*चुनीनो चुनाँ तुम्हारे लिए बने दो जहाँ तुम्हारे लिए।*
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🌸 *बशरियत पार्ट :(3)* 🌸
🌸👉🏽 *अब्दुल्लाह :* आपके फज्ल व कमाल के बारे में अगर बात की जाए तो अपनी तरह बशर कहने वालों के मुँह में ताले लग जायेंगे। ज़रा कुछ बयान करें।
🌟👉🏽 *मुफ्ती साहब :* हज़रते शाह अब्दुल अज़ीज़ अलैहिर्रहमह ने अपनी किताब तफ़सीर फुतहुल अज़ीज़ में सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के फज्लो कमाल के बयान में 44 खुसूसियात इस तरह ज़िक्र की हैं
*1.* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपनी पुश्त मुबारक से भी वैसे ही देखते थे जैसा कि अपने सामने से देखते थे।
*2.* आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम रात को और अंधेरे में भी वैसा ही देखते थे जैसा दिन में देखते थे।
3. आपके मुँह मुबारक का लुआब कड़वे पानी को मीठा कर देता।
4. दूध पीते बच्चे के मुँह में आप अपने दहन मुबारक से एक क़तरा टपकाते वह बच्चे सारा दिन दूध न मांगते और उनका पेट भरा रहता जैसा कि आशूरा के दिन अहले बैत के बच्चों पर तजर्बा हुआ।
5. आपके बगल मुबारक निहायत सफ़ेद साफ़ शफ़्फ़ाफ़ थे उनमें बाल मुतलक न थे।
6. आपकी आवाज़ मुबारक इतनी दूर पहुँचती कि दूसरे लोगो की उससे सौवें हिस्से तक भी न पहुँचती इसी तरह आप इतनी दूरी से सुनते कि दूसरा कोई न सुन सकता।
7. आपकी आंखें मुबारक सो जाती लेकिन दिल बेदार रहता।
8. सारी उम्र आपको बलगम नहीं आया।
9. आपको कभी एहतिलाम न हुआ।
10. आपका पसीना मुबारक कस्तूरी से भी ज्यादा खुशबूदार था और वह भी इस हद तक कि अगर आप किसी गली में से गुज़र जाते तो लोग आपकी खुशबू से आप तक पहुँच जाते थे।
11. किसी ने आपका फुजला ज़मीन पर न देखा क्यूँकि ज़मीन उसे निगल लेती और वहाँ से कस्तुरी की तरह खुशबू आती। 12. आप खतना किए हुए पैदा हुए।
13. आप नाफ़ कटे हुए पैदा हुए निहायत साफ़ किसी किस्म की नजासत आपके जिस्म पर न थी।
14. विलादत के वक्त जब आप ज़मीन पर तशरीफ़ लाए उसी वक्त सजदा फरमाया और अपनी उंगली को आसमान की तरफ उठाया।
15. आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की विलादत के वक्त ऐसा नूर मुजल्ला हुआ कि अलैहि वसल्लम की वालिदा मुहतरमा ने उसकी रोशनी में शाम में शहर देखें।
16. आप सल्लल्लाह तआला के शहर देखे। आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का झूला फ़िरिश्ते झुलाते थे।
17. चांद आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से झूले में बातें करता था।
18. गर्मी के मौसम में आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर बादल साया करता।
19. आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम किसी दरख़्त के पास तशरीफ़ लाते तो दरख्त साये के लिए आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर झुक जाता।
20. आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का साया ज़मीन पर नहीं पड़ता।
21. आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को जूए कभी नहीं पड़ती।
22. आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के कपड़ों और जिस्मे अतहर पर कभी मक्खी नहीं बैठती थी।
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🌸 *बशरियत पार्ट :(3)* 🌸
23. अगर आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम किसी जानवर पर सवारी फ़रमाते तो वह जानवर सवारी की मुद्दत पेशाब पाखाना नहीं करता।
24. आलमे अरवाह में आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही सबसे पहले पैदा हुए।
25. अल्लाह तआला ने जब फ़रमाया अलस्तु बिरब्बिकुम (क्या मैं तुम्हारा रब नहीं) तो इसके जवाब में सबसे पहले आपने ही फ़रमाया ‘बला' यानी बेशक तू ही हमारा रब है
26. मेराज की सैर आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ ही मखसूस है।
27. बुराक आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही को सवारी है।
28. आसमानों पर जाना और काबा कौसैन तक पहुँचना और अल्लाह का दीदार करना सिर्फ आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ही लिए था।
29. आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ फ़िरिश्तों का जंग में शरीक होना आप सल्लल्लाहु तआला अलैहिं वसल्लम के लिए ख़ास था।
30. चांद के दो टुकड़े कर देना और दूसरे कई ऐसे मोजिज़ात आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिए ख़ास थे।
31. कियामत के दिन जो कुछ आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को दिया जाएगा और किसी को अता नहीं होगा।
32. सबसे पहले आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही कब्र से बाहर तशरीफ़ लायेंगे।
33. मैदाने हश्र में आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही बुराक सवार होंगे।
34. सत्तर हज़ार फ़िरिश्ते आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही के गिर्द परवानावार घूमते होंगे।
35. अर्श आज़म की दाई जानिब कुर्सी पर आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही को जगह दी जाएगी।
36. मकामे महमुद आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ही अता होगा।
37. लिवाउल हम्द (अल्लाह तआला की हम्द व सना का झंडा) आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम् ही के मुबारक हाथ में दिया जाएगा कि हज़रते आदम अलैहिस्सलाम और आपकी तमाम ईमानदार औलाद उसके नीचे होगी।
38. तमाम नबी अपनी उम्मत के साथ आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही के पीछे होंगे।
39. अल्लाह पाक का दीदार आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से ही शुरू होगा।
40. शफाअत का सेहरा आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि - वसल्लम ही के मुबारक सर पर होगा।
41. सबसे पहले पुल सिरात पर से आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही गुज़रेंगे और तमाम ख़लकत को हुक्म होगा कि अपनी निगाहें नीची कर लें ताकि आपकी साहबज़ादी हज़रते फ़ातिमा सदियल्लाहु तआला अन्हा पुलसिरात से गुज़रें।
42. आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही जन्नत का दरवाज़ा खोलेंगे।
43. कियामत के रोज़ आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को वसीले के मरतबे पर मुशर्रफ किया जाएगा जो एक मरतबा है निहायत बलन्द कि मखलूक में किसी और को मयस्सर नहीं।
44. और हकीकत उसकी यह है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम उस दिन ख़ुदा वन्द तआला के हुजूर में बमन्जिला वजीर के होंगे। आखिर में लिखा कि और भी बहुत सी खुसुसियात हैं जिनका गिनना बहुत मुश्किल अल्लाह ही जाने उनके मर्तबे को।
मेरे ख्याल से पिछले दो सवालों के जवाब में जो कुछ कहा गया तो अब शायद ही इसके सुनने के बाद आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को बशर तो कहे मगर अपने जैसा बशर न कहे। फिर भी अगर कोई सवाल या वसवसा बाकी हो तो बतायें।
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🌸 *बशरियत पार्ट :(4) आखिरी* 🌸
🌸👉🏽 *अब्दुल्लाह :* फिर अल्लाह तआला ने उन्हें बश-ररुम्मिस्लुकुम क्यूँ फ़रमाया ?
🌟👉🏽 *मुफ्ती साहब :* क्यूँकि हुस्ने यूसुफ़ को देख कर औरतों ने उनकी बशरयित का इन्कार कर दिया और तू तो यूसुफ़ का भी इमाम है और तेरा नाम सुन कर अरब के मर्द गर्दने कटायेंगे फिर कहीं तुझे कुछ और ही कहना न शुरू कर दें लिहाजा कह दे अना बश - रुम्मिस्लुकुम हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम ने मुर्दे जिन्दा किए तो ईसाइयों ने खुदा कहना शुरू कर दिया ऐ हबीब तू तो पत्थरों और दरख्तों में जान डाल देगा कहीं तेरे बारे में भी लोग ऐसा न कहना शुरू कर दें लिहाज़ा फ़रमा दिया बश - रुम्मिस्लुकुम। हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने नमरूद से मुनाज़रा किया तो फ़रमाया अगर तू ख़ुदा है तो सूरज मग़रिब से निकाल। लोगों के जहन में यह बात आई कि शायद जो सूरज मगरिब से निकाले उसे खुदा कहा जा सकता है तो फ़रमाया ऐ महबूब तू तो सूरज को पल्टा देगा चांद के टुकड़े कर देगा तो कहीं लोग शक में न पड़ जायें लिहाजा कहलवा दिया बश - रुम्मिस्लुकुम सहाबा ने आपसे आपको सजदा करने की इजाजत मांगी तो सरकार ने फ़रमा दिया बश - रुम्मिस्लुकुम।
🌸👉🏽 *अब्दुल्लाह :* वाह क्या नुकता बयान किया है वह न ख़ुदा हैं न खुदा से जुदा हैं ?
🌟👉🏽 *मुफ्ती साहब :* शैतान ने उन्हें बशर कहा और मरदूद हुआ। आज शैतान का कहना मानने वाले कुछ लोग उन्हें अपने जैसा बशर कह कर ईमान से हाथ धो बैठे हैं।
🌸👉🏽 *अब्दुल्लाह :* बशर ज़रूर हैं मगर उन जैसा बशर कोई नहीं है कि जिसके शहर कलाम और बका की कसम अल्लाह ने कलामे मजीद में खाई।
🌟👉🏽 *मुफ़्ती साहब :* सूरह बलद में है 'ऐ महबूब मैं इस शहरे मक्का की कसम सिर्फ तेरी वजह से फ़रमाता हूँ। काश हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सीरत को गौर से पढ़ा होता इसलिए तो में कहता है कि इल्मे दीन सीखो सब मसअला हल है।
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*👑 वसीला और गैरुल्लाह से मदद, (1) 👑*
🌟👉🏽 *अब्दुल्लाह :* वली अल्लाह गेरुल्लाह से मदद मांगना मेरा मतलब वसीले से नहीं मांगने से है ?
☘️👉🏽 *मुफ्ती साहब:* अगर किसी फैक्ट्री का मालिक अपने सुपरवाइज़र से हर महीने तनख्वाह बटवाता है तो हकीकत में तो यह मालिक ही का देना है सुपरवाइज़र तो बाटने वाला है हकीकी मालिक तो फैक्ट्री वाला ही है।
🌟👉🏽 *अब्दुल्लाह :* हाँ ठीक है, तो शिर्क किस सूरत में है ?
☘️👉🏽 *मुफ्ती साहब :* जब कोई यह समझे कि गैरुल्लाह से मांगने में अल्लाह से कोई मतलब नहीं यह अपने पास से देता है जैसे कुफ्फार करते हैं तो यह शिर्क होगा। और अगर यह अकीदा रखे कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम या दूसरे वली अल्लाह की अता से देते है या मदद फ़रमाते हैं तो हरगिज शिर्क नहीं।
🌟👉🏽 *अब्दुल्लाह :* इसका सुबूत कुरआन में भी है ?
☘️👉🏽 *मुफ्ती साहब :* सुरह माइदह में है नेकी और परहेज़गारी में एक दूसरे की मदद करो गुनाहों में मदद न करो। क्या अल्लाह तआला इस आयत बन्दों को एक नाजाइज़ काम का हुक्म और सुरह बकरह में है कि सब्र और नमाज़ से मदद चाहो। नमाज़ को तो कोई यह कह सकता है कि यह तो अल्लाह से मदद मांगना है और सब तो गैरुल्लाह ही है क्या अल्लाह बन्दों को नाजाइज़ बात का हुक्म देगा। हरगिज़ नहीं बल्कि यह नाजाइज़ है ही नहीं। सूरह ताहा में है कि मूसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह पाक ने फिरऔन की तरफ तबलीग को भेजा तो आपने अल्लाह तआला से अर्ज की मेरे लिए मेरे घर वालों में एक वज़ोर कर दे, वह कौन मेरा भाई हारून, उससे मेरी कमर मज़बूत कर दे। क्या मूसा अलैहिस्सलाम ने शिर्क कह दिया और अल्लाह पाक ने जवाब में यह नहीं कहा कि रे मूसा मेरे हाते तुम यह शिर्क की बात क्यूं कह रहे हो और अल्लाह पाक ने ऐसा कहने पर मूसा अलैहिस्सलाम पर कोई ग़ज़ब क्यूँ न फ़रमाया। मतलब यह है यह शिर्क था ही नहीं और न है।
🌟👉🏽 *अब्दुल्लाह :* थोड़ा और कुरआन ही से ?
*☘️👉🏽 मुफ्ती साहब :* सूरह मुहम्मद में है अगर तुम दीने ख़ुदा की मदद करोगे अल्लाह तुम्हारी मदद करेगा। क्या अल्लाह तआला तबलीगे दीने के लिए गैरुल्लाह की मदद का मुहताज है सूरह आले इमरान में कौन मेरे मददगार होते हैं अल्लाह की तरफ़। हवारियों ने कहा हम दीने ख़ुदा के मददगार हैं। क्या हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम पर मदद मांगने और हवारियों पर मदद करने पर शिर्क का फ़तवा लगेगा। सूरह अनफ़ाल में है वही है जिसने तुम्हें ज़ोर दिया अपनी मदद का और मुसलमानों का। क्या जिन मुसलमानों की मदद देना अल्लाह ने पसन्द फ़रमाया वो गैरुल्लाह नहीं इसी सूरह में अल्लाह ने फरमाया ऐ गैब की ख़बरें देने वाले नबी अल्लाह तुम्हें काफ़ी है और जितने मुसलमान तुम्हारे पैरू हुए क्या अल्लाह खुद काफ़ी नहीं था, अब क्या कुरआन पर फ़तवा कोई लगा सकता है और इस किस्म की बेजा बातें कुरआन के ख़िलाफ़ नहीं। सूरह आले इमरान में मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से परिन्द की सी मूरत बनाता हूँ फिर उसमें फूंक मारता हूँ तो वह फौरन परिन्द हो जाती है अल्लाह के हुक्म से और मैं शिफ़ा देता हूँ मादरज़ाद अंधे और सफेद दाग़ वाले को और मैं मुर्दे जिलाता हूँ अल्लाह के हुक्म से। अब अगर इस आयत की रोशनी में कोई मुसलमान यह अक़ीदा रखे कि नबियों के करम से शिफ़ा हासिल होती और मुर्दे ज़िन्दगी पाते हैं तो क्या यह शिर्क होगा। अगर हाँ (माज़ल्लाह) तो क्या अल्लाह ने एक शिर्क अकीदे की तरफ़ माइल किया। अगर नहीं तो फिर भोले मुसलमानों को बहकाना कैसा अल्लाह हमें ऐसी बातें करने से बाज़ रखे। सुलैमान अलैहिस्सलाम का बिलकीस के तख्त को अपने वजीर से मंगाना अल्लाह से दरखवास्तं न करना क्या शिर्क है और फिर वज़ीर का पल भर में तख्त का ने आना यानी मदद हो भी जाना क्या यह शिर्क है। सूरह मरयम में है बोला मैं तेरे रब का भेजा हुआ हूँ कि तुझे एक सुथरा बेटा हूँ।
बेटा देना अल्लाह का काम है या फ़िरिश्ते का हाँ हुक्म और अता हर जगह अल्लाह ही की है। इसी तरह अगर कोई यह कहे कि मेरे पीर ने या ख्वाजा ने या गौसे पाक ने बेटा दिया तो यह शिर्क न होगा हाँ अगर माजल्लाह कोई यह अकीदा रखे कि बगैर अल्लाह का अता से है तो जरूर शिर्क है मगर जाहिल से जाहिल देहाती गंवार भी यह अकिदा नहीं रखता। सूरह निसा में और अगर जब वह अपनी जानों पर जुल्म करें तो ऐ महबूब तुम्हारे हुजूर हाज़िर हों और फिर "अल्लाह से माफ़ी चाहें और रसूल उनकी शफाअत फरमाये तो ज़रूर अल्लाह को बहुत तौबा कबूल करने वाला मेहरबान पायें (और यह हुक्म कियामत तक के मुसलमानों के लिए है) क्या अल्लाह तआला ख़ुद गुनाह न बख़्श सकता है बल्कि वही बख़्शेगा फिर क्यूँ नबी की बारगाह में बुलाया जा रहा है उनसे मदद क्यूँ मंगवाई जारी है अल्लाह को यही पसन्द है।
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*👑 वसीला और गैरुल्लाह से मदद, (3) 👑*
🌟👉🏽 *अब्दुल्लाह :* मैं समझता हूँ कुरआन के बहुत हवाले हो गए अब कुछ हदीस से इरशाद फरमायें ?
*☘️👉🏽 मुफ्ती साहब :* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक बार हज़रते रबिआ इब्ने कअब रदियल्लाहु तआला अन्हुम से फ़रमाया आज कुछ मांग ले। उन्होंने अर्ज की मैं आपसे जन्नत में आपका पड़ोस मांगता हूँ। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया इसके अलावा कुछ और भी। अर्ज की बस यही। फ़रमाया तू अपनी ज़ात पर कसरते सुजूद से मेरी मदद कर। जंगे खन्दक के मौके पर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते जाबिर रदियल्लाहु तआला अन्हु को अपना हवारी (यानी मददगार) फरमाया। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बेशुमार मोजिजात हैं जिसमें सहाबाए किराम हुजूर सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम के पास मदद मांगने आए सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने कभी भी यह ने फ़रमाया कि अल्लाह से कहो मुझसे मदद मांगना शिर्क होगा। जैसे दम करके, लुआबे दहन लगा के, दुआ करके, अपना मुबारक हाथ लगा के आपने अल्लाह की अता से सहाबियों की मदद फरमाई। शायद ही कोई सहाबी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मदद लेने से बचा होगा बल्कि सबसे बड़ी दौलत हमें और तमाम मुसलमानों को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वसीले से उनकी मदद से ईमान मिला सब अल्लाह ही की अता से है। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया मैं ही हूँ जो जन्नत का दरवाज़ा खोलूंगा। हुजूर सलल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि मेरा नाम अहीद इस लिए हुआ हुजूर सल्लल्लाहु तआला कि मैं अपनी उम्मत से दोजख की आग को दूर फ़रमाता हूँ। ईमान मिलना, जन्नत में ले जाना, दोजख से आजाद कराना या सब आपकी मदद व वसीला नहीं तो और क्या है। बात वही है, अल्लाह ने अपने महबूब को इख्तेयार दिया और हुजूर सलल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और तमाम नबी तमाम औलिया सब अल्लाह की देन व अता से ही मदद फरमाते हैं।
*🌟👉🏽 अब्दुल्लाह :* मैंने सुना है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया ऐ फातिमा यह न समझना कि तुम मेरी बेटी हो तुमसे भी आमाल की पुरसिश होगी।
*☘️👉🏽 मुफ्ती साहब :* हज़रते फ़ातिमा रदियल्लाहु तआला अन्हा जन्नत की औरतों की सरदार हैं ऐसा भी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया और आपके फ़ज़ाइल में हदीसें भरी पड़ी हैं तमाम सहाबा के गुनाह हमारी नेकियों से अफज़ल हैं तो क्या इनसे सवाल होने का मतलब यह निकालना कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम किसी की मदद नहीं फरमायेंगे कि वह तो अपनी बेटी की भी मदद न फरमायेंगे। कुछ मरदूद बस ऐब ही ढूंढने की कोशिश करते हैं और वह हदीस भूल जाते हैं कि जब तमाम मखलूक रोज़े कियामत तमाम नबियों के पास जाने के बाद आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास आकर ही नजात पायेंगे। अब शायद आप यह पूछेगे कि तो फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने ऐसा क्यूँ फ़रमाया। हक़ीक़त में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ऐसा फरमाना उम्मत को समझाने के लिए है कि हुजूर सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम की शफ़ाअत का यह मतलब न निकाल लें कि अब गुनाह करने की छूट और नेकियाँ करने की कोई ज़रूरत ही नहीं। रही ।
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*👑 वसीला और गैरुल्लाह से मदद, (4) 👑*
*☘️👉🏽 अब्दुल्लाह :* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बात तो ठीक है अब ज़रा इस बात पर रौशनी डालें कि वफात के बाद भी आप मदद फ़रमाते हैं और ऐसा करना भी जाइज़ और अल्लाह के वली से मदद मांगना भी सही है और वह मदद करते हैं यह शिर्क नहीं है या कब यह शिर्क होगा।
*🌟👉🏽 मुफ्ती साहब :* औलियाए किराम (बहुत से वली) के बारे में बुख़ारी शरीफ़ की एक हदीस सुनिए हज़रते अबू हुरैरह रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि "रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का फरमाने आलीशान है कि अल्लाह तआला ने इरशाद फ़रमाया जो मेरे किसी वली से दुश्मनी रखे तो मैं उसके खिलाफ ऐलाने जंग करता हूँ और मेरा बन्दा मेरी फर्ज की हुई महबूब चीज़ों से ज्यादा किसी चीज़ से मेरा कुर्व हासिल नहीं करता और वह नवाफिल के जरिए मेरा कुर्ब हासिल करता है हत्ताकि मैं उसे अपना महबूब बना लेता हूँ और जब उसे अपना महबूब बना लेता हूँ उसकी समाअत (सुनना) बन जाता हूँ जिससे वह सुनता है तो उसकी वसारत बन जाता हूँ जिससे वह देखता है, उसका हाथ बन जाता हूँ जिससे वह पकड़ता है और उसका पैर बन जाता हूँ जिससे वह चलता है और वह मुझसे सवाल करे तो मैं उसे ज़रूर ज़रूर अता करता हूँ और अगर वह मेरी पनाह तलब करे तो मैं ज़रूर ज़रूर उसे अपनी पनाह अता करता हूँ।
*🌟👉🏽 अब्दुल्लाह :* समाअत, बसारत, हाथ और पांव बन जाना ज़रा वज़ाहत करें कुछ समझ नहीं आ रहा।
*☘️👉🏽 मुफ्ती साहब :* इस हदीस शरीफ़ में अल्लाह तआला के समाअत, बसारत, हाथ और पांव बन जाने से इसके ज़ाहिरी मअना मुराद नहीं हैं बल्कि इसकी शरह में बुजुगों ने फरमाया कि मतलब यह है कि अब उसके सारे काम बनते चले जाते हैं उसके ज़बान से निकली बात पूरी होती है वह अपनी आंखों से वह देखता है जो दूसरे इन्सान नहीं देखते वह अपने कानों से वह सुनता है जो दूसरे नहीं सुन सकते वह अपने पैरों से एक कदम में न जाने कहाँ कहाँ जाता है वगैरह वगैरह...
लिहाज़ा इस इस हदीस पाक में इन अलफ़ाज़ों की बड़ी अहमियत है कि मगर वह मुझसे सवाल करता है तो मैं उसे ज़रूर जरूर अता करता हूँ और अगर वह मेरी पनाह तलब करे तो मैं ज़रूर रूर उसे अपनी पनाह अता करता हूँ। हदीसे पाक से यह बात साफ़ हो गई कि अगर आम लोग इन अल्लाह के वलियों के पास हाजत को जायें तो जाइज़ और अगर वह दुआ कर दें या अल्लाह से सवाल करें तो अल्लाह तआला अता फरमाता है मतलब यह है कि अपने जाइज़ काम कराने का अल्लाह के वली बहुत ही बढ़िया वसीला हैं। बुजुर्गों की करामत का शायद हर फ़िरका काइल है और करामत इसी का नाम है कि वली अल्लाह की अता से कुछ सा कर दिखाए जो दूसरा आम इन्सान न कर सके। सुन्नी हो या वहाबी तकरीबन हर शख्स ने बुजुर्गों की हज़ारहा करामात सुनी होंगी। हाँ अगर इसमें भी शक है तो आप अहले सुन्नत और दूसरे फिरकों की किताबों में करामात पढ़ सकते है।
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*👑 वसीला और गैरुल्लाह से मदद, (5) 👑*
*🌟👉🏽 अब्दुल्लाह :* मेरी इस बात का जवाब अभी भी नहीं आया कि वली या नबी से दुनिया से तशरीफ ले जाने के बाद भी मांगना और उनका मदद फरमाना सही है या नहीं । कुछ लोग कहते हैं कि हज़ारों मन मिट्टी के नीचे दबे कोई हमारी क्या मदद कर सकता है ।
*🌸👉🏽 मुफ्ती साहब :* मैं इधर ही आ रहा हूँ । मैं समझता हूँ कि पहले यह समझाया जाए कि तमाम नबी और वली जिन्दा हैं और फिर यह समझाया जाए कि बादे वफात भी ये लोगों की मदद करने की ताकत अल्लाह से पाते हैं और मदद करते हैं । लिहाज़ा जब मदद करते हैं तो मदद मांगना जाइज़ है शिर्क नहीं।
🌟👉🏽 *अब्दुल्लाह :* नबी के बारे में तो आया है कि इनकी लाश मिट्टी नहीं खाती। फिर भी नबी व वली दोनों के बारे में बतायें।
🌸👉🏽 *मुफ्ती साहब :* रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया सारे नबी अपनी कब्रों में जिन्दा हैं नमाज़ अदा फरमाते हैं उन्हें रिज़्क दिया जाता है। मेराज की रात रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम को उनकी कब्र में नमाज़ पढ़ते देखा। अब ज़रा गौर फरमायें कि ज़िन्दा होने का यह मतलब नहीं कि अपने जिस्म व रूह के साथ सिर्फ वहीं लेटे रहें अल्लाह के हुक्म से जहाँ चाहते हैं आते जाते हैं बल्कि इन्सानों व जिन्नों से कहीं ज्यादा तेज़।
🌸👉🏽 *अब्दुल्लाह :* रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने ख़ुद अपने आपको जिन्दा फ़रमाया।
*🌟👉🏽 मुफ़्ती साहब :* जी हाँ तबरानी हज़रते मुजाहिद इब्ने उमर रदियल्लाहु तआला अन्हुमा से रिवायत करते हैं कि हुजूर अलैहिस्सलाम ने फरमाया जिसने हज किया और मेरी वफ़ात के बाद मेरी कब्र की ज़ियारत की वह ऐसा है जैसे उसने मेरी ज़िन्दगी में मेरी ज़ियारत की। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यह भी फ़रमाया जो कसदन मेरी ज़ियारत को अया वह कियामत के दिन मेरा पड़ोसी होगा।
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*👑 वसीला और गैरुल्लाह से मदद, (6) 👑*
*🌸👉🏽 अब्दुल्लाह :* औलियाए किराम के बारे में बतायें ?
*🌟👉🏽 मुफ्ती साहब :* इसे समझने से पहले एक उसूल को समझना बहुत ज़रूरी है वह यह कि “कुरआने पाक में जब कोई हुक्म बयान किया जाए तो जिस चीज़ के बारे में हुक्म फ़रमाया गया उसके बराबर और उससे आला चीजें उस हुक्म में बगैर जिक मिसाल के तौर ख़ुद - ब - ख़ुद दाखिल हो जाती हैं" पर अल्लाह तआला ने माँ बाप के बारे में इरशाद फरमाया तू उनसे 'हुंह न कहना और उन्हें न झिड़कना। अब इसका मतलब यह होगा कि माँ बाप हुँह से ऊपर जितनी बातें हैं वो सब नहीं करना हैं मतलब ज़बान चलाना, बुरा कहना, गाली देना, सताना, वगैरह सब की मुमानअत हो गई।
अब यह उसूल समझने के बाद समझइये कि कुरआन में शहीद जिन्दा हैं हमें उनका शऊर नहीं। अब वह लोग जो शहीद से अफजल हैं वह अपने आप ही जिन्दा साबित हुए और नबी तो बिला शक व शुबा शहीद से अफ़ज़ल और औलिया शहीद से अफ़ज़ल बल्कि बाज़ उल्मा भी शहीद से अफजल तो यह लोग जिन्दा हुए कि नहीं।
*🌸👉🏽 अब्दुल्लाह :* उलमा कैसे अफ़ज़ल हैं ?
🌟👉🏽 *मुफ्ती साहब :* हदीस में आया कि उल्मा के कलम की सियाही शहीदों के खून से अफ़ज़ल है तो उल्मा अफजल हुए कि नहीं ।
*🌟👉🏽 अब्दुल्लाह :* बाज़ आलिमों के हाल तो बड़े ख़राब है ?
🌸👉🏽 *मुफ्ती साहब :* हाँ उन आलिमों की बात नहीं हो रही जो नाम के आलिम कहलाते हैं और ईमान भी गवां बैठे हैं। उनकी सियाही की बात हो रही जो अल्लाह के नज़दीक आलिम हैं। उनकी बात नहीं हो रही जो इल्म सीख कर भी दोजख में जायेंगे जैसे कि हदीसों में वईदें आई हैं। और फिर हर वली आलिम होता है हर आलिम वली नहीं।
*🌸👉🏽 अब्दुल्लाह :* वह कैसे ?
*🌟👉🏽 मुफ्ती साहब :* चूंकि विलायत बेइल्म को नहीं मिलती अब चाहे वह इल्म उस वली ने ज़ाहिरी तौर पर हासिल किया हो या उस मरतबे पर पहुँचने से पहले अल्लाह तआला किसी और ज़रिए से उसे इल्म अता किया हो। और भी बहुत - सी हदीसें वलियों की शान में आई हैं।
*🌟👉🏽 अब्दुल्लाह :* बात तकरीबन पूरी हो कि ज़िन्दा तो सभी हैं कोई जन्नत में कोई दोजख में और नेक लोग आज़ाद है और मदद भी फरमा रहे हैं।
🌸👉🏽 *मुफ्ती साहब :* जी खुलासा यह है कि जब शहीद दुनिया से पर्दा फ़रमा जाने के बाद हैं तो उनसे अफ़ज़ल व आला यानी उल्मा व औलिया व तमाम नबी की जिन्दगी को तसलीम करना ही पड़ेगा।
*आलाहज़रत इमामे अहले सुन्नत फरमाते हैं* तमाम वली मरने के बाद जिन्दा हैं मगर नबियों की तरह उनकी हयात नहीं कि नबियों की हयात रूहानी जिस्मान व दुनियावी है
बिल्कुल इसी तरह जिन्दा हैं जिस तरह दुनिया में थे और वलीयों की हयात उनसे कम है और शहीदों से ज्यादा है और शहीदों के बारे में दो मरतबा कुरआन में आया है कि उन्हें मुर्दा मत कहो वो जिन्दा हैं ओर उन्हें गैब से रिज़्क़ अता किया जाता है|
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*👑 वसीला और गैरुल्लाह से मदद, (7) 👑*
*👉 अब्दुल्लाह :* जी बिल्कुल अल्लाह के वली जिन्दा हैं
*👉🏽 मुफ्ती साहब :* कुछ हवाले और नोट कर लें तफसील यह से देखें।
1. अशअतुल लमआत मुसन्निफ शैख़ अब्दुल हक मुहिम देहलवी रहमतुल्लाहि तआला अलैह.
*2.* मिरकात शरहे मिश्कात मुसन्निफः मुल्ला अली कारी रहमतुल्लाहि तआला अलैह।
3. रिसाला कुशैरिया मुसन्निफ़ आरिफबिल्लाह उस्तान अबुल कासिम कुशैरी रहमतुल्लाहि तआला अलैह।
4. शरहुस्सुदूर मुसन्निफ़ शैख़ अल्लामा जलालुद्दीन स्यूती रहमतुल्लाहि
इसके अलावा बहुत सी मुस्तनद किताबों में इस बात का सुबूत मिलता है अल्लाह के वली मदद फरमा रहे हैं मजे की बात तो यह है कि वहाबियों की किताबों में वहाबी झूटे वलियों की मरने के बाद की झूटी करामात भी आप देख सकते हैं। वाह साहब वाह झूटों की झूटी करामात तो मानों सच्चों की सच्ची भी न मानी। क्यूँ अल्लाह के वली से दुश्मनी लेकर अल्लाह से दुश्मनी करते हो अल्लाह तौफीक अता फरमाए।
कुछ पवाइन्ट और नोट कर लें कि काम आयेंगे चूंकि वहाबी इन्हीं बातों को ज्यादा छेड़ता है और हम अपनी कमइल्मी की वजह से जवाब नहीं दे पाते।
1. रूह इन्सानी मौत के बाद भी बाकी रहती है क्यूँकि मौत जिस्म पर तारी होती है रूह पर नहीं। दलील के लिए हदीस याद रखिए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया मोमिन की रूह एक परिन्द की तरह है जिसे जन्नत के दरख्तों में लटकाया जाता है यहाँ तक कि नरोज़े कियामत अल्लाह तआला उसे उसके जिस्म में लौटाएगा
*📕 (नसई)*
2. सुनना, देखना, जानना पहचानना वगैरह ये सब रूह की सिफ़ात हैं मौत के बाद इन तमाम सिफ़ात में इज़ाफ़ा हो जाता है क्यूँकि पहले रूह बदन की कैद में थी जब कि अब वह आज़ाद है यही वजह है जिन्दा इन्सान निगाह उठाए तो ज़्यादा से ज्यादा आसमान तक देख सकता है लेकिन जब यही शख्स मर कर कब्र में पहुँचता है तो उसकी निगाह सातों आसमानों के पार जन्नत तक पहुँच जाती है और दोजख भी उसे दिखाई जाती है यहाँ तक कि काफिर को भी दिखाई जाती है। यूंही दुनिया में आदमी थोड़ी दूर तक की आवाज़ सुन सकता है लेकिन जो शख्श मर कर कब्र में पहुँचता है तो मानों मिटटी के नीचे से बाहर की आवाज सुनता है। अजाब व सवाब को हर जगह महसूस भी करता है।
3. अब आप ही अक्ल से बताये कि पावर बढ़ जाने के बाद मदद करना ज्यादा आसान और अच्छा होगा या पावर कम होने पर।
4. साइंस के हिसाब से सुनने और देखने के बारे में एक नई अक्ली दलील भी सुन लाजिए देखिए आजकल कम्प्युटर व मोबाइल के जरिए आप लाखों मील दूर की चीज़ को देख व सुन सकते हैं बल्कि चाँद पर गए आदमी को देख व सुन सकते हैं उससे बात कर सकते हैं उसकी सुन सकते हैं और यह बेजानदार चीजे हैं कि सैटेलाइट के वसीले से आप की बातचीत करा रहे हैं तो फिर अल्लाह के वलियों जोकि जिन्दा हैं वो क्यूँ नही ये सब कर सकते। बस बात वही है कि कर वही सकता है जिसे अल्लाह ने ताकत दी यानी अल्लाह की अता ही से सब कुछ है जिस तरह बेजान मोबाइल में अल्लाह ही की अता है उसी तरह अल्लाह के जिन्दा वलियों में अल्लाह की अता है।
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*👑 वसीला और गैरुल्लाह से मदद, (8) 👑*
*🌟👉🏽 अब्दुल्लाह :* एक एतराज़ और किया गया था कि या गौस अथवा या रसूलल्लाह कह कर मदद मांगना कि यह तो हमसे हज़ारों मील दूर हैं फिर कैसे मदद करेंगे ?
*☘️👉 मुफ्ती साहब :* गालिबन यह एतराज़ आपसे किसी ने किया होगा और शायद अब तक की बातचीत में जवाब भी जान गए होंगे : यही सवाल जब आलाहज़रत इमाम अहमद रज़ा रहमतुल्लाहि तआला अलैह से किया गया तो आपने फ़रमाया “शाह अब्दुल अज़ीज़ साहब फरमाते हैं कि रूह के लिए जगह का दूर नज़दीक होना बराबर है"
🌟👉🏽 *अब्दुल्लाह :* यूँ तो हर वक्त हमारी हाजात फ़ौरन पूरी होना चाहिए ? और देखा यह गया है कि कई मरतबा औलिया अल्लाह को पुकारा गया मगर हाजात पूरी न हुई ?
☘️👉 *मुफ्ती साहब :* इसमें अल्लाह की हिकमत है। और आर एतराज़ औलिया पर हो तो ऐसा एतराज़ तो अल्लाह तआला पर भी कोई कर सकता है कि हमारी मदद या हमारा काम अल्लाह तआल से मांगने पर क्यूँ फौरन नहीं होता। दुआ की कबुलियत का यह मतलब हरगिज़ नहीं कि हमने मांगा और फौरन वैसे ही अता हो जाए बल्कि इसका मतलब यह होता है कि अल्लाह तआला उसकी दुआ को बेकार नहीं जाने देता चुनांचे कभी तो वही चीज़ जो मांगी है मिल जाती है और कभी उसके बदले में हमारी भलाई पर नज़र फ़रमाते हुए उससे भली चीज़ हमारी झोली में डाल दी जाती है। कभी दुआ के कबूल न होने की वजह हम खुद होते हैं और वह इस तरह कि हम अल्लाह तआला से ऐसी चीज़ों का सवाल करते हैं कि जिनका मिलना शरई लिहाज़ से जाइज़ नहीं होता और कभी यूं कि हमें बहुत जल्दी पड़ी होती है और हम इन्तजार न करक अल्लाह की बारगाह में शिकायत करने लगते हैं और अल्लाह का करम नहीं होता। इस हदीस को मद्देनज़र रखें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो बन्दा भी अपने रब से दुआ मांगता है इसकी दुआ कबूल होती है या तो उसी वक्त दुनिया में ही दे दी जाती है या आखिरत के लिए ज़ख़ीरा बना लिया जाता है या दुआ के मुताबिक उसके गुनाह मिटा दिए जाते हैं बशर्ते कि गुनाह या कैतए रहम की दुआ न हो और जल्दी न करे। अर्ज की गई या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) जल्दी कैसे करेगा। आप रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया यह कहना कि यह अल्लाह मैंने दुआ मांगी तूने कबूल ही न की।इस तरह नही कहना चाहिए
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*👑 वसीला और गैरुल्लाह से मदद, (9) 👑*
*☘️👉 अब्दुल्लाह:* अल्लाह तआला और मखलूक की सिफतों में जरा प्वाइन्ट वाइस फर्क और समझा दे।
*🌟👉 मुफ्ती साहब :* तीन फर्क जहन में रखें बात साफ हो जाएगी जो इल्मे गैब का फ़र्क करने में भी काम आती है :
1. अल्लाह पाक की तमाम सिफ़तें जाती हैं किसी की अता की हुई नहीं जबकि मखलूक की तमाम सिफतें अताई हैं यानी अल्लाह तआला ने अपने करम से अता फरमाई हैं।
2. अल्लाह तअला की सिफतों को कभी फना नहीं जबकि मखलूक की सिफ़तों को फना होना मुमकिन है। अल्लाह तआला की सिफतें लामहदद (जिनकी कोई हद नहीं) हैं जब के मखलूक की तमाम सिफ़तें महदूद हैं। अब अगर कोई गैरूल्लाह के लिए इन फर्को को मानते हुए मदद तलब करे तो उस पर शिर्क लगाना हराम व गुनाहे कबीरा होने में क्या शुबा हो सकता है
*☘️👉 अब्दुल्लाह:* वसीले के बारे में कुछ बतायें ? वहाबी कहते है वसीला कोई चीज नहीं ?
🌟👉 *मुफ्ती साहब !* कुरआन में है, अल्लाह तआला फरमाता है कि अल्लाह की तरफ वसीला ढुंढो।
☘️👉 *अब्दुल्लाह :* अक्ल यह खुब तसलीम करती है कि हर काम वसीले ही से हो रहा है
*🌟👉 मुफ्ती साहब :* जी हाँ और सबसे बड़ा वसीला तो खुद हुजूर सल्लल्लाह तआला अलैहि व सल्लम ही हैं।
*☘️👉 अब्दुल्लाह :* कुछ और कुरआन से ?
*🌟👉 मुफ्ती साहब :* गुनाहों की मगफिरत कराने के लिए हुज़ूर सल्लल्लाहु अलौहि वसल्लम को वसीला बनाने का हुक्म कुरआन ने दिया है कि तुम जब अपनी जानों पर जुल्म करो तो हुजूर सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में आओ और वह सिफारिश करें तो अल्लाह को बड़ा मेहरबान पायें और यह हुक्म कियामत तक के हर मुसलमान के लिए है।
*☘️👉 अब्दुल्लाह :* आप नबी-ए-करीम तमाम आलम के लिए रहमत हैं क्या इसमें भी वसीले की तरफ इशारा है ?
*🌟👉 मुफ्ती साहब :* जी हाँ। बेशक अल्लाह रहीम रहमान है फिर भी फरमाता है कि ऐ महबूब हमने आपको तमाम आलम के लिए रहमत बना कर भेजा इसका साफ मतलब यही है कि हर नेमत आपके ही वसीले से मिलती है क्यूकि आप तमाम आलम के लिए रहमत हैं और अल्लाह के सिवा हर चीज आलम में दाखिल है, हाँ यह अकीदा रखना ज़रूरी है कि अल्लाह तआला वसीले का मुहताज नहीं वह हर काम बगैर वसील भी कर सकता है मगर उसे पसन्द और मन्जूर इसी तरह है।
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*👑 वसीला और गैरुल्लाह से मदद, (10) 👑*
*🌟👉🏽 अब्दुल्लाह :* हदीस में भी वसीले के बारे में आया है ?
*☘️👉 मुफ्ती साहब :* हॉ हदीसों में है खूबसूरत चेहरे वालों से मदद चाहो, नर्म दिल वालों से मदद चाहो, नेक लोगों से मदद चाहो।
*🌟👉🏽 अब्दुल्लाह :* हालांकि वसीले के बारे में पीछे बहुत कुछ आया मगर चाहता हूँ इस बारे में कुछ और कुरआन व हदीस से बयान करें।
*☘️👉🏽 मुफ्ती साहब:* सुरह माएदा में है खुदा की तरफ वसीला तलाश करो अल्लाह पाक ने फरमाया कि मैं जमीन पर अपना नाएब बनाना चाहता हूँ यही नाएब का मतलब दुनियावी नाएब नहीं है और अल्लाह को किसी नाएब व वसीले की जरूरत नहीं। अल्लाह चाहे तो अपनी पहचान बिना वसीले और बिना नाइब के करा सकता है लेकिन उसे वसीला पसन्द है और उसे इसी तरह मन्जूर है कि मुझे मेरे नबी के वसीले से जानों। वसीला की जरूरत इन्सान को थी। तो नाएब बनाया ही इसी लिए गया कि जो बन्दे और इन्सान के बीच वसीला बनेगा और जब उससे इतना बड़ा काम लेना है यानी अल्लाह को अपनी पहचान कराने का काम लेना है तो उसे कुछ पावर व इख्तेयारात भी दिए जायेंगे और उसे इल्म या इल्म गैब (गैब का छुपा हुआ इल्म) भी दिया जाएगा। शैतान को यही तो बुरा लगा था कि मैं आग से पैदा किया गया हूँ मैं बड़ा हूँ और पावर और इल्म इन्सान को मिले। वसीला इन्सानों ही में से बने इसी लिए यह वसीले का इन्कार कराने की पूरी कोशिश में लगा रहता है और वहाबियों को बहका चुका अब सुन्नियों के पीछे पड़ा रहता। अरे अल्लाह को हमने नबियों के ज़रिए और वसीले से ही तो जाना है क्या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के अलावा किसी ने अल्लाह को देखा है।
🌟👉🏽 *अब्दुल्लाह :* बहुत बढ़िया बात बताई। मैं समझता हूँ और भी आयात होंगी मगर काफ़ी है अब कोई हदीस सुनायें।
*☘️👉🏽 मुफ्ती साहब :* 1. हज़रते उसमान इब्ने हुनैफ़ से मरवी है कि ऐ मुहम्मद ! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मैं आपके वसीले से अपने रब की तहफ मुतवज्जेह हुआ।
2. एक नाबीना (अंधे) सहाबी का हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में अपनी नाबीनाई (आंखों की रौशनी) का सवाल करना और आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का अपने वसीले से दुआ कराना *मशहूर हदीस है।*
3. हज़रते फ़ातिमा बिन्ते असद रदियल्लाहु तआला अन्हा की रिवायत में यह अल्फ़ाज़ आये हैं “ऐ रब यह दुआ कबूल फ़रमा अपने नबी और उनसे पहले नबियों के वसीले से"
4. हज़रते अबू सईद खुदरी रदियल्लाहु तआला अन्हु की हदीस यह अल्फ़ाज़ आये हैं "ऐ अल्लाह सवाल करने वालों का तेरे यहाँ जो हक है उसके वसीले से मैं तुझसे सवाल करता हूँ" इसमें सारे मुसलमानों का वसीला है इसमें जिन्दा भी आ गए और मुर्दा भी।
5. बारिश की दुआ के सिलसिले में हज़रते उमर रजीयल्लाहू तआला अन्हु के ये अल्फाज़ आये है “ऐ अल्लाह हम तेरे बारगाह में अपने नबी का वसीला लाते है
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 58,59)*
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*👑 वसीला और गैरुल्लाह से मदद, (11) आखिरी 👑*
*🌟👉🏽 अब्दुल्लाह :* क्या हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से पहले के लोग भी वसीला मानते थे ?
*☘️👉🏽 मुफ्ती साहब :* हाँ हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से नबी के वसीले से यहूदी व ईसाई हमारे आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वसीले से दुआयें मांगते और उनकी दुआयें कबूल होती और जंगे फ़तह होती थीं।तो हमारी क्यो नही हज़रते आदम अलैहिस्सलाम की दुआ हमारे आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का वास्ता व वसीला देने से ही हुई थी। दलाइल और वाकियात बहुत हैं समझदार के लिए इतने ही काफ़ी हैं जो न समझना चाहे उसके लिए वही मिसाल कि अबू जहल के हाथ में कंकरियों ने कलिमा पढ़ा लेकिन उसे न मानना था न माना।
👉🏽 खुलासा यूँ है कि जिस तरह परवरदिगारे आलम बादलों के वसीले से बारिश सूरज के वसीले से धूप और चांद के वसीले से चांदनी अता फरमाता है। बच्चों को माँ बाप के जरिए पैदा फ़रमाता है और उन्हीं के ज़रिए उन्हें पालता है और रोटी रोजी अता फरमाता है और इससे उसकी ज़ात में कोई नुक्स नहीं आता न उसकी शान में कोई फर्क आता है बस यूँ समझिए कि उसकी मर्जी है कि कायनात आलम के ख़ज़ाने ज़ाहिर और बातिनी नेमतें जिसको भी मिलें व बारगाहे हबीबे ख़ुदा मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वसीले से मिलें और उन्हीं के गुलामों और नेक बन्दों से बटें और यह अक़ीदा हरगिज़ तौहीद के खिलाफ नहीं है।
*🌟👉🏽 अब्दुल्लाह :* कुछ लोगों का ख्याल है कि नेक आमाल नमाज़ रोज़ा वसीला हैं ?
*☘️👉🏽 मुफ्ती साहब :* यह बताइये कि हमारा या आपका हर अमल कबूल हो जाता हैं
*🌟👉🏽 अब्दुल्लाह :* ज़रूरी नहीं है।
*☘️👉🏽 मुफ्ती साहब :* फिर जिसके मकबूल होने में शक है और जो मकबूल हो चुके अल्लाह के वली वलियों के सरदार अल्लाह के नबी नबियों के सरदार क्या वसीला नहीं होंगे बेशक उन्हें वसीला बनाना जाइज़ है शिर्क नहीं और डाइरेक्ट मांगना भी जाइज़ है मगर कबूलियत की उम्मीद वसीले के ज़रिए ज्यादा है इसी में फायदा है। बेकार में शिर्क शिर्क कहना अपने ईमान को ख़तरे में डालना है। एक आम आदमी जिसको चन्द दिन के लिए पावर मिली उसके पास आदमी सिफारिश और वसीले के साथ जाता और यह बेवसीला उसे पाने चले बिना उनकी गुलामी इख़्तेयार किए उन पर ईमान लाए ख़ुदा तक कैसे पहुंच जाएगा। अल्बत्ता डाइरेक्ट मांगना भी जाइज़। हाँ जो यह अक़ीदा रखे कि अल्लाह के सिवा दूसरा कोई अपनी जाती ताकत से मदद करता है तो वह मुश्रिक व काफिर जहन्नमी हमेशा के लिए है उसकी बख्शि नहीं।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 59,60)*
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*👉🏽 ताजीमे नबी, पार्ट: (1)* 👈🏽
👉🏽 *अब्दुल्लाह :* अगर हम सही तरीके पर यह समझ लें कि हमें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बारे में क्या क्या अकीदे रखना चाहिए तो शायद फिर हमारे बहकने की गुंजाइशा लगभग ख़त्म हो जाएगी।
*👉 मुफ्ती साहब :* बुनियादी अकाइद सीखें और ताज़ीमे रसूल सीखें। अपने अस्ल मक़सद की तरफ़ रहें कि अल्लाह ने हमें क्यूँ पैदा किया। अल्लाह पाक ने हमें इबादत के लिए पैदा किया है और यह भी ध्यान रहे कि अल्लाह ने यह भी फरमाया है कि ऐ महबूब तुझे पैदा करना मन्जूर न होता तो कुछ पैदा न करता यहाँ तक कि अपना रब होना भी जाहिर न फरमाता।
*👉🏽 अब्दुल्लाह :* रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ताजीम के बारे में कुछ कुरआन व हदीस से फ़रमायें और इस तरह फरमायें कि जिसमें जवाब कुछ इस तरह हो कि हमारे ऊपर लगाया यह इल्ज़ाम भी साफ हो जाए कि यह कहते हैं कि तुम अल्लाह तआला से भी ज्यादा हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ताज़ीम करते हो और कभी कभी इससे भी ज्यादा बढ़ा देते हो।
👉 *मुफ्ती साहब :* अल्लाह तआला की तारीफ की कोई हद नहीं हैं और हर मखलूक की तारीफ़ की कोई न कोई हद। अब अगर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की कोई इतनी तारीफ़ करे कि माज़ल्लाह उन्हें इबादत के काबिल मानने लगे तो वह काफ़िर हो जाएगा और ऐसा तो काफ़िर भी ताज़ीम नहीं करता फिर हम तो मुसलमान हैं। इबलीस ताज़ीम न करने ही की वजह से मरदूद हुआ उसे ताजीमी सजदे का तो हुक्म था खैर जो कुरआन पाक ने हमें किस तरह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ताज़ीम का हुक्म दिया वही अर्ज करता हूँ।
*👉🏽 अब्दुल्लाह :* जी बेहतर हवाला भी बताते जायें।
*👉 मुफ्ती साहब :* 1. बेशक हमने आपको भेजा हाज़िर ओ नाज़िर और खुशख़बरी सुनाने वाला और डराने वाला ताकि ऐ लोगों तुम अल्लाह और रसूल पर ईमान लाओ और रसूल की ताज़ीम व तकरीम करो और सुबह व शाम अल्लाह की पाकी बयान करो।
📕 *(पारा 26 रुकू 9)*
2. और जो अल्लाह तआला के शआइर (निशानियाँ) की ताजीम करे तो वह दिलों की परहेजगारी से है।
*📖 (पारा 17 रुकु 11)*
3. ऐ ईमान वालों अल्लाह व रसूल से आगे न बढ़ो और अल्लाह से डरो बेशक अल्लाह सुनता व जानता है।
4. ऐ ईमान वालों अपनी आवाजें नबी की आवाज पर उंची न करो और उनके हुजूर चिल्ला कर बात न करो जैसे कि आपस में एक दूसरे के सामने चिल्लाते हो कि कहीं तुम्हारे अमाल बर्बाद न हो जायें और तुम्हें खबर भी न हो।
*📕 (पारा 26 रुकू 13)*
5. रसुल के पुकारने को आपस में ऐसा न ठहरा लो जैसा कि तुम एक दूसरे को पुकारते हो।
*📕 (पारा 18 रुकू 15)*
📖 और भी कुरआन में जगह जगह साफ साफ़ ताजीम का हुक्म है। समझदार को एक आयत काफी है बाज ऐसे भी हैं कि जिनकी मादरी जबान अरबी है लोगों को अरबी पढ़ाते हैं और ताजिम न समझे।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 61,62)*
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*👉🏽 ताजीमे नबी, पार्ट: (2)* 👈🏽
*👉🏽 अब्दुल्लाह :* सहाबा किराम किस हद तक हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ताजीम करते थे बयान करें।
*👉🏽 जवाब :* हदीस शरीफ में है कि हज़रते उरवा इब्ने मसऊद रदियल्लाहु तआला अन्हु जब कि वह मुसलमान न हुए थे हुबैदिया के मकाम पर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सुलह की बातचीत करने के लिए आये। इस मौके या सहाबा को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ताजिम करते हुए जो देखा था बापसी के बाद मक्का शरीफ के काफिरों से इन लफ्जों में उन्होंने बयान किया "कसम खुदा की मैं बादशाहों के दरबारों में वफ़द लेकर गया हूँ केसर व किसरा य नजाशी के दरबारों में हाजिर हुआ हूँ लेकिन खुदा की कसम मेंने कोई बादशाह ऐसा नहीं देखा कि उसके साथी इस तरह ताजीम करते हों जैसे मुहम्मद (सल्लल्लाह सलल्लाहु अलैहि वसल्लम) के साथी उनकी ताजीम करते हैं। खुदा की कसम जब वह थूकते हैं तो उनका थूक किसी न किसी आदमी की हथेली पर ही गिरता. है जिसे वह अपने चेहरे और बाल पर मल लेता है और जब वह कोई हुक्म देते हैं तो फौरन उनके हुक्म की तामील होती है और जब वह वुजू फरमाते हैं तो ऐसा मालूम होता है कि लोग वुजू का मुसतामल मानो हासिल करने के लिए एक दूसरे के साथ लड़ने मरने के लिए आमादा हो जायेंगे और जब उनकी बारगाह में बात करते है तो अपने आवाजों को पस्त रखते हैं और ताजीमन उनकी तरफ आँख भर कर नहीं देखते। इसी एक हदीस से बहुत कुछ मालूम हो जाता है। इसके अलावा हजरत अबूबक्र सिद्दिक रदियल्लाहु तआला अन्हु का अपने आपको ताजीम ही की खातिर सांप से कटवा लेना।
👉🏽 मौला अली का ताजीम ही की वजह से अस्र की नमाज का कजा कर देना। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से निसबत रखने वाली चीजों को तबर्रुक बना कर ताज़ीम के साथ लोगों का रखना। इसके अलावा हज़ारों वाकियात ताजीम के मिलते हैं मिलते रहेंगे। और इन्शाअल्लाह रोज़े कियामत भी हर तरफ उन्हीं की ताज़ीम व चर्चा होगा यहाँ तक कि काफिर भी तालीम करेगा लेकिन रोजे कियामत काफ़िर और मुरतद की वह ताजीम काम न आएगी। इस मौजू पर तो पूरी पूरी किताबें हैं और मैं समझता हूँ कि यह ऐसा मौजू है कि इसमें ज्यादा बात क्या की जाए कि काफ़िर भी उनकी ताजीम करता है और मुरतद भी चाहे वह मरे दिल से ही करे कि दिल में सच्ची ताज़ीम होती तो उनकी खूबियों को तसलीम करता उनके चाहने वालों पर झूटे शिर्क के फतवे न लगाता।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 62,63)*
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*👉🏽 ताजीमे नबी, पार्ट: (3) आखिरी* 👈🏽
▶️ *अब्दुल्लाह :* मदीने की ताज़ीम ज्यादा है या मक्के की ?
➡️ *मुफ्ती साहब :* मक्का में एक नेकी एक लाख नेकी के बराबर है और एक गुनाह एक लाख गुनाह के बराबर है और मदीने पाक में एक नेकी पचार हज़ार के बराबर मगर एक गुनाह एक गुनाह ही लिखा जाता है। अब ख़ुद ही फैसला कर लें। आलाहज़रत फरमाते हैं तैबा न सही अफज़ल मक्का ही बड़ा ज़ाहिद हम इश्क के बन्दे हैं क्यूँ बात बढ़ाई है अलबत्ता वह ज़मीन जिसमें आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आराम फरमा रहे हैं वह जमीन व आसमान काबा व अर्श से भी अफज़ल है।
▶️ *अब्दुल्लाह :* सुन्नी लोग हर नमाज के बाद मदीने शरीफ की तरफ मुंह करके क्या पढ़ते हैं और यह बिदअत तो नहीं ? या यह भी ताजीम के लिए खड़े होते हैं ?
*➡️ मुफ्ती साहब :* यह एक मुस्तहब काम है करें तो अच्छा है ताजीम भी है न करें तो कोई गुनाह भी नहीं रोके तो ऐसा करना बुरा है और यह सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में मुख़्तसर सा सलाम अर्ज करते है। इसमें कोई हरज नहीं है। मीलाद शरीफ़ में विलादत के जिक्र के वक्त ताजीम के साथ खड़े होकर सलाम पढ़ना एक जमाने बिदअते हसना के रूप में होता चला आया और मुसलमानों की मेजोरिटी ने इसे पसन्द फ़रमाया ये अच्छी बिद्दत है और सवाब ह और मैंने तो बाज़ वहाबियों को भी सलाम के वक्त खड़े होते देखा अगर यह बिदअत है तो फिर वह ये अमल क्यूँ करते हैं।
*▶️ अब्दुल्लाह :* अगर कोई पैसा वाला या बड़े नॉकरी वाले या बादशाह वगेरह आए तो क्या कहीं किसी हदीस में खड़े होने को मना भी आया है ?
➡️ *मुफ्ती साहब :* हां आया है वह उसके लिए जो चाहता है कि उसके लिए लोग खड़े हो (क्यूकि इसमें गुरूर में तकब्बुर का इमकान है आया है कि जिसको पसन्द हो कि लोग उसके लिए खड़े हों वह अपनी जगह दोजख में ढुंढे) जब कोई बड़ा आता है तो तकरीबन हर सोसाइटी में खड़े होने को ताजीम समझा जाता है और इसे कोई बुरा नहीं कहता। और हुजुर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को खड़े हो कर सलाम अर्ज करने में क्या बिदअते सइया हो सकती है हरगिज नहीं। हमारे नज़दीक ताज़ीम है और अगर बिदअत भी तसलीम करें तो बिदअते हसना है।
*▶️ अब्दुल्लाह :* सलाम पढ़ते वक़्त और किसी मस्जिद में नमाजियों को नमाज़ में खलल आये यह तो मुनासिब नहीं मालूम होता ?
➡️ *मुक्ती साहब :* दुरूद सलाम पढ़ने में हरज नहीं कि हमें अल्लाह ने खूब दुरूद व सलाम पढ़ने का हुक्म दिया है हां नमाजियों को नमाज़ में खलल आये इससे बचना चाहिए।
*▶️ अब्दुल्लाह :* कुछ सिरफिरे कहते हैं तेज़ आवाज़ और लाउडस्पीकर से सलाम न पढ़ो कि कोई पाखाने में है तो ताज़ीम के लिए कैसे खड़ा होगा ?
*➡️ मुफ्ती साहब :* वह शायद लाउडस्पीकर पर अज़ान के भी खिलाफ़ होंगे कि ऐसा न करो कि पाखाने वाले को अजान का जवाब देना पड़ेगा। क्यो की हर वक़्त हर इंसान कही न कही ऐसे जगह हो तो जवाब देना नही चाहिए
इन वहाबियो को इन्हें तो सलाम से ही चिढ़ है जब कि सलाम कुरआन से साबित है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है बेशक अल्लाह और उसके फ़िरिश्ते नबी पर दुरूद और सलाम पढ़ते हैं ऐ ईमान वालो तुम भी खूब दुरूद व सलाम भेजो।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 63,64)*
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*👉🏽 इख्तेयाराते मुस्तफ़ा* 👈🏽
*▶️ अब्दुल्लाह :* हमारे आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अल्लाह तआला ने इख़्तेयार दिए हैं इसके बारे में कुछ रोशनी डालें ?
*▶️ मुफ्ती साहब :* कुरआन में बहुत सी आयात हैं जिनसे साबित कि अल्लाह तआला ने हमारे आका को इख्तियारात दिए हैं सुरह तौबा में है अगर वह राजी हो जाते इस पर जो अल्लाह और उसके रसूल ने उनको दिया इसी सूरत में दूसरी जगह है और न बुरा लगा उन्हें मगर यह कि अल्लाह और उसके रसूल ने उन्हें अपने फज्ल से गनी कर दिया सूरह अहजाब में हैं अल्लाह ने इस पर इनाम फ़रमाया और ऐ महबुब आपने इस इनाम फरमाया सूरह हश्र में है और जो तुम्हें रसूल दें वह ले लो और जिससे मना कर दें रुक जाओ.... और भी बहुत सी आयात हैं जिससे यह साबित कि हमारे आका सारे जहान को देते हैं और इन आयात में आपकी अता, आपका वसीला, आपकी मदद साबित होते हैं।
*▶️ अब्दुल्लाह : हदीस से कुछ फरमायें ?*
▶️ *मुफ्ती साहब :* हदीस में है हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते है मैं ही ख़ाज़िन हूँ रखता हूँ जहाँ हुक्म होता है (यानी जहाँ अल्लाह फरमाता है ख़र्च फरमाता हैं, और फरमाते हैं अल्लाह देने वाला है मैं बांटने वाला हूँ। इसके अलावा अल्लाह तआला ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ऐसे इख़्तेयार भी दिए कि जिसके लिए चाहें शरीअत में आसानी फरमा दें इसकी कुछ मिसाले सुने
1. हज के मौके पर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने दो दो नमाजें जमा फरमा दी यानी अराफात में जुहर व अस्र साथ पढ़ना है और मुजदलेफा में मगरिब व इशा साथ साथ।
2. हज़रते खुज़ैमा के लिए अकेले की गवाही को काफ़ी किया।
3. हज़रते सुराका के लिए सोना हलाल किया जबकि सोना मर्द को हराम है।
4. सब मर्दो के लिए रेशम हराम मगर दो सहाबियों के लिए हलाल की।
5. माहे रमज़ान में रोजे की हालत में बीवी में मुजामअत करने वाले को न सिर्फ कफ्फारा माफ़ फ़रमाया बल्कि टोकरा खजूरों का भी इनायत किया।
5. हज़रते अस्मा बिन्ते उमैस को उनके ख़ाविन्द की वफात पर सिर्फ तीन दिन सोग करके निकाह की इजाज़त अता कर दी।
7. हज़रते अबू हुरैरह रदियल्लाहु तआला अन्हु के लिए 6 माह का बकरी का बच्चा कुर्वानी के लिए जाइज़ फरमाया।
8. अपनी मस्जिद में मौला अली के लिए हालते जनाबत में आना जाइज़ फरमाया।
9. मौला अली को फातिमा के रहते दूसरा निकाह मना फरमाया।
10. एक शख्स ने कहा कि मैं दो वक्त की नमाज़ पढूंगा ईमान ले आऊंगा इजाजत अता फरमाई।
11. मुस्लिम व मिश्कात में है हज़रते इब्राहीम ख़लीलुल्लाह ने मक्का को हरम बनाया मैं मदीने को हरम बनाता हूँ।
▶️ इसके अलावा हजारों मोजिज़ात से यह जाहिर है कि आपको अल्लाह की अता से तमाम मखलूक में तसर्रूफ का इख़्तेयार है जैसे : - चांद के दो टुकड़े फ़रमा देना, सूरज को पलटा देना, बाग को जन्नत के बाग के बदले बेच देना, पत्थरों व जानवरों का कलाम करना, बकरी को जिंदा करना....
▶️ हजारों मोजिजात है बल्कि अल्लाह के तमाम वली जो भी करामत दिखायें मदद फरमायें तसर्रूफ करें यह सब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वसीले से ही होते हैं और जब उनके वसीले से होते हैं तो फिर उनके इख्तेयारात का क्या कहना। तमाम औलिया अल्लाह के सरदार सरकारे गासे आजम रदियाल्लाहु तआला अन्ह अल्लाह व रसूल की अता से अल्लाह के तमाम मुमालिक को इस तरह देखते हैं जिस तरह हथेली पर राई का दाना और तसर्रूफ़ भी फरमाते है।
*▶️ अब्दुल्लाह :* एतराज़ यह है कि अगर उन्हें इख्तेयार है तो फिर इख्तेयार न मानने वाले सऊदियो को हुकूमत क्यूँ दी गई है उनसे छिन क्यु नहीं ली जाती ?
▶️ *मुफ्ती साहब :* इन सब बातों में अल्लाह की हिकमत है और इस से जाहिर कि अल्लाह ने छूट दी है वर्ना क्या काबे में बुत रखे जा सकते थे अल्लाह के महबूब को काई परेशान का सकता था क्या नमरूद और फ़िरऔन ने हूकूमत नहीं की। क्या यहुदी बैतुल मकदस पर काबिज़ नहीं, क्या काफिरों के हुकमत मुसलमानों से ज्यादा दुनिया में नहीं है। क्या कोई अल्लाह पर एतराज़ कर सकता है।
*▶️ अब्दुल्लाह :* हाँ आप ठीक फरमा रहे हैं।
▶️ *मुफ्ती साहब :* दुनिया तो दुनिया आखिरत में हमारे आका हुजूर सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम के इख्तेयारात देखो कैसे हम मुजरिमों को बचा रहे होंगे पुलसिरात पार करा रहे होंगे दोजख से बचा रहे होंगे जन्नत में ले जा रहे होंगे यहां तक कि बाज उन लोगों को दोजख से निकाल कर लायेंगे जो दोजख में जा चुके होंगे।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 64,65,66)*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 38 🔰*
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*☝🏻 शफाअत, पार्ट (1)* ☝🏻
*▶️ अब्दुल्लाह :* कुछ लोग यह कहते हैं कि अपने आमाल से आदमी जन्नत में जाएगा माजल्लाह कोई सिफारिश नहीं करेगा
*▶️ मुफ्ती साहब :* शर्म नहीं आती ऐसे जलीलों को जरा सोचिए आपके हाथ में कलम दे दिया जाए और कहा जाए कि अपने बारे में खुद फैसला लिखो कि तुम जन्नत में जाओगे। जहन्नम में तो शायद आज का एक आम आदमी यही कहेगा कि कुछ दिन तो जहन्नम में ही रहना पड़ेगा इसके बावजूद उनके सदके में सबसे पहले जन्नत में जा रहे हो।
अल्लाह तआला फरमाता है ए महबूब जब तक आपकी उम्मत जन्नत में दाखिल न हो जाए दुसरे नब्बियों की उम्मत पर जन्नत हराम
जैसे गुनाहगार उन दुसरे उम्मत के वलियों तक के पहले जन्नत में जा रहे हैं जो हमसे कहीं ज्यादा नेकोकार हैं यह किसका सदका है। शफाअत कुरआन से साबित जैसा कि दूसरे सवालों के जवाबों में भी आया कि अल्लाह ने हमें बुलाया कि मेरे महबूब के दर पर आओ और वह अगर तुम्हारे लिए सिफारिश कर दें तो अल्लाह तुम्हें बख्श देगा।
*▶️ अब्दुल्लाह :* कुछ हदीसें इस बारे में सुनायें।
*▶️ मुफ्ती साहब :* शफाअते कुबरा की हदीसें जिनमें साफ़ सरीह इरशाद हुआ कि महशर का दिन बहुत तवील (लम्बा) दिन होगा कि काटे न कटेगा और सरों पर आफताब और दोजख नजदीक... उस दिन सूरज में दस बरस कामिल की गरमी जमा करेंगे और सरों से कुछ ही फासले पर लाकर रखेंगे..... प्यास की वह शिद्दत कि खुदा न दिखाए..... गरमी वह कयामत की कि अल्लाह बचाए... बांसों पसीना ज़मीन में जज्ब होकर ऊपर चढ़ेगा यहाँ तक कि गले गले बल्कि इससे भी ऊँचा होगा जहाज़ छोड़ें तो बहने लगें लोग उसमें गोते खायेंगे और उस दिन लोग इन अज़ीम आफ़तों में जान से तंग आकर शफ़ीअ (शफाअत या सिफारिश करने वाला) की तलाश में जा - ब - जा फिरेंगे.... आदम (यानी आदम अलैहिस्सलाम) व नूह व खलील (यानी हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम) व कलीम (यानी मूसा अलैहिस्सलाम) व मसीह (यानी हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम) के पास हाज़िर होकर जवाब साफ सुनेंगे। सब अम्बिया (नबी की जमा) फ़रमायेंगे हमारा यह मरतबा नहीं हम इस लाएक नहीं हमसे यह काम न निकलेगा... नफ़्सी नफ़्सी--- तुम और किसी के पास जाओ....
यहाँ तक कि सब के बाद हुजूर पुर नूर ख़ातमुन्नबिइयीन (जिन पर नुबुव्वत ख़त्म हुई) सय्येदुल अव्वलीन व आख़रीन (शुरू वाने और आखिर वाले सब ही के सरदार) शफीउल मुजनिबीन रहमतुल्लिल आलमीन (तमाम आलम के लिए रहमत) सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर होंगे...
हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अना लहा अना लहा फ़रमायेंगे यानी मैं हूँ शफाअत के लिए, मैं हूँ फिर अपने रब्बे करीम जल्ला जलालुह की बारगाह में हाज़िर होकर सजदा करेंगे उनका रब तबारक व तआला इरशाद फ़रमाएगा 'ऐ मुहम्मद अपना सर उठाओ और अर्ज करो तुम्हारी सुनी जाएगी और मांगो कि तुम्हें अता होगा और शफाअत करो कि तुम्हारी शफाअत कबूल होगी
यहीं मकामे महमूद होगा जहाँ तमाम अब्बलीन व आखरीन में हजार की तारीफ व हम्द व सना' का गुल पड़ेगा
और मुवाफिक व मुखालिफ सब पर खुल जाएगा बारगाहे इलाही में जो वजाइत (इज्जत, दबदबा) हमारे आका का है किसी का नहीं.... और मालिके अजीम जल्ला जलालुहू के यहाँ जो अजमत हमारे मौला के लिए है किसी के लिए नहीं..
वल हम्दु हलिल्लाहि रब्बिल आलमीन... इसी के लिए अल्लाह तआला अपनी हिकमते कामिला के मुताबिक लोगों के दिला में डालेगा कि पहले और अम्बियाए किराय अलैहिमुस्सलानु वस्सलाम के पास जायें और वहाँ से महरूम फिर कर उनकी खिदमत में हाजिर आयें ताकि सब जान लें कि मनसबे शफाअत इसी सरकार का खास्सा है यानी हुजूर के लिए ही खास है दूसरे की मजाल नहीं कि उसका दरवाज़ा खोले.. वल हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन...
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 67,68)*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 39 🔰*
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*☝🏻 शफाअत, पार्ट (2) आखिरी ☝🏻*
▶️ *अब्दुल्लाह :* कुछ और हदीसे सुनायें बड़ा मज़ा आ रहा है।
▶️ *मुफ्ती साहब :* जी हाँ और सुनिए हदीसें। ये हदीसे सही बुखारी मुसलिम तमाम किताबो में मजकूर और अहले इस्लाम में मारूफ व मशहूर हैं।
▶️ ये, हदीसे जाहिर करेंगी कि हमें खुदा व रसूल ने कान खोल कर शफीअ का नाम बता दिया और साफ फरमाया कि वह मुहम्मदुरसूलुल्लाह हैं... सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम... न यह बात गोल रखी हो जैसे एक बदबखत कहता है कि "उसी के इख्तेयार पर छोड़ दीजिए जिसको वह चाहे हमारा शफीअ कर दे।
▶️ उनके रब की कसम जिसने उन्हें शफीउल मुज़निबान किया उनकी शफाअत हम जैसे रूसियाहों, पुरगुनाहों (गुनाहों से भरे हुए), सियाहकारों (काले करतूत वाले), सितमगरों (जुल्म ओ सितम ढाने वाले) के लिए है जिनका बाल बाल गुनाह में बंधा है जिनके नाम से गुनाह को भी शर्म आती है। हदीसों के मफहूम पेशे ख़िदमत हैं हवाले फुरसत में देख लें।
१. अल्लाह तआला ने मुझे इख्तयार दिया कि या तो शफाअत लो या यह कि तुम्हारी आधी उम्मत जन्नत में जाए। मैंने शफाअत ली कि वह ज्यादा तमाम और ज्यादा काम आने वाली है क्या तुम यह समझ लिए हो कि मेरी शफाअत पाकीज़ा मुसलमानों के लिए है, नहीं बल्कि वह उन गुनाहगार के वास्ते है जो गुनाहों में आलूदा और सख़्तकार हैं।
2. मेरी शफआत मेरे उन उम्मतियों के लिए है जिन्हें गुनाह ने हलाक कर डाला।
3. मेरी शफाअत मेरी उम्मत में उनके लिए है जो कबीरा गुनाह वाले हैं।
4. मेरी शफअत मेरे गुनाहगार उम्मतियों के लिए है।
5. रू - ए - ज़मीन पर जितने पेड़ पत्थर ढेले हैं मैं कयामत में उन सबसे ज़्यादा आदमियों की शफ़अत फरआऊँगा।
6. मेरी शफ़अत हर कलिमागो के लिए है जो सच्चे दिल से कलिमा पढ़े कि ज़बान की तसदीक़ दिल करता है।
7. शफाअत में उम्मत के लिए ज्यादा वुसअत (गुन्जाइश) है कि वह हर शख्स के वास्ते है जिसका ख़तमा ईमान पर हो।
8. मैं जहन्नम का दरवाज़ा खुलवा कर तशरीफ़ ले जाऊँगा वहाँ ख़ुदा की तारीफें करूँगा ऐसी कि न मुझसे पहले किसी ने की न मेरे बाद कोई करेगा फिर दोज़ख से हर उस शख्स को निकाल लूंगा जिसने ख़ालिस दिल से "लाइलाहाइल्लल्लाह" कहा।
9. अम्बिया के लिए सोने के मिम्बर बिछाए जायेंगे वह उन पर बैठेंगे और मेरा मिम्बर बाकी रहेगा कि मैं उस पर जुलूस न फ़रमाऊँगा यानी बैठूंगा नहीं बल्कि अपने रब के हुजूर सर ओ कद यानी अदब से खड़ा रहूंगा इस डर से कि कहीं ऐसा न हो कि मुझे जन्नत में भेज दे और मेरी उम्मत मेरे बाद रह जाए फिर अर्ज करूँगा ऐ रब मेरे मेरी उम्मत मेरी उम्मत अल्लाह तआला फ़रमाएगा ऐ मुहम्मद तेरी क्या मर्जी है मैं तेरी उम्मत के साथ क्या करूँ ? अर्ज करूँगा ऐ रब मेरे उनका हिसाब जल्द फ़रमा दे, पस मैं शफाअत करता रहूंगा यहाँ तक कि मुझे उनकी रिहाई की चिट्ठियाँ मिलेंगी जिन्हें दोज़ख भेज चुके थे यहाँ तक कि मालिक दारोगए दोज़ख़ अर्ज़ करेगा ऐ मुहम्मद आपने अपनी उम्मत में रब का ग़ज़ब नाम को न छोड़ा। इन हदीसों में यह बयान हुआ है कि हुजूर शफीउल मुज़निबीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं मैं शफीअ मुकरर कर दिया गया और शफाअत ख़ास (शफाअते सिवा किसी नबी को यह कुबरा) मुझी को अता होगी मनसब न मिला।
10. अम्बिया अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम की अगरचे हज़ारों दुआयें कबूल होती हैं मगर एक दुआ उन्हें ख़ास जनाबे बारी तआला से मिलती है कि जो चाहो मांग लो बेशक दिया जाएगा तमाम अम्बिया आदम से ईसा तक (अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम) सब अपनी अपनी वह दुआ दुनिया में कर चुके और मैने आखिरत के लिए उठा रखी... वह मेरी शफाअत है... मेरी उम्मत के लिए, कयामत के दिन मैने उसे अपनी सारी उम्मत के लिए रखा है जो ईमान पर दुनिया से उठा।
▶️ ऐ ख़ुदा हमे उनके मकामो मनसब के तुफैल उनकी शफाअत अता फरमा अल्लाहु अकबर ! ऐ गुनाहगाराने उम्मत। क्या तुमने अपने मालिक व मौला सल्लल्लाहु तआला अलहि वसल्लम की यह कमाले राफ़त व रहमत अपने हाल पर न देखी ? कि बारगाहे इलाही अज्ज जलालुहू से तीन सवारन हुजूर को मिले कि जो चाहो मांग लो अता होगा। हुजूर ने उनमें कोई सवाल अपनी ज़ाते पाक के लिए न रखा, सब तुम्हारे ही काम सर्फ फ़रमा दिए। दो सवाल दुनिया में किए वह भी तुम्हारे ही वास्ते... तीसरा आख़रत को उठा रखा वह तुम्हारी उस अज़ीम हाजत के वास्ते जब उस मेहरबान मौला रऊफुर्रहीम आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के सिवा कोई काम आने वाला बिगड़ी बनाने वाला न होगा... सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम... हक फ़रमाया... अल्लाह तआला ने "जिन पर तुम्हारा मशक्क़त में पड़ना गिरां है तुम्हारी भलाई के निहायत चाहने वाले मुसलमानों पर कमाल मेहरबान मेहरबान" वल्लाहिल अजीम कसम उसकी जिसने उन्हें हम पर मेहरबान किया कि हरगिज़ हरगिज़ कोई माँ अपने अज़ीज़ प्यारे इकलौते बेटे पर इतनी मेहरबान नहीं जिस कद्र वह अपने एक उम्मती पर मेहरबान हैं (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम)
▶️ इलाही ! तू हमारा इज्ज (आजज़ी) व जुअफ़ (कमजोर होना) और उनके हुकूके अज़ीमया की अज़मत जानता है ऐ कादिर ! ऐ वाजिद ! ऐ माजिद ! हमारी तरफ़ से उन पर और उनकी आल पर वह बरकत वाली दुरूदें नाजिल फरमा जो उनके हुकूक को वाफ़ी हों और उनकी रहमतों को मुकाफी !
▶️ सुब्हानल्लाह ! उम्मतियों ने उनकी रहमतों का यह मुआवज़ा रखा कि कोई अफ़ज़लियत में तशीकिके निकालता है (यानी उनके सबसे अफ़ज़ल होने में शक करता है), कोई उनकी शफाअत में शुबा डालता है, कोई उनकी तारीफ अपनी सी जानता है , कोई उनकी ताजीम पर बिगड़ कर करांता है... अफआले महब्बत का बिदअत नाम अदब पर शिर्क के अहकाम। (यानी हमारे आका तो हम पर इतने मेहरबान कि हर वक्त हमें याद रखें और कुछ लोग हैं। कि उनके मरतबे में शक करते हैं बल्कि बाज़ तो अपने जैसा बशर जानते हैं) लाहौला बलाकुव्वता इल्लाबिल्ला हिल अलिबिल्न अजीम। इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन। (राते राते मुफ्ती साहब की हिचकियां बंध गई)
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 67,68)*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 40 🔰*
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*☝🏻 बिदअत का बयान* ☝🏻
*▶️ अब्दुल्लाह :* कुछ फुरूई मसाइल पर बात कीजिए ?
*▶️ मुफ्ती साहब -* अब फुरूई मसाइल की बात आप शुरू करना चाहते तो इससे पहले यह समझना जरूरी है कि हमारा इख्तलाफ़ फुरूई मसाइल का नहीं बल्कि अकाइद का है और हमें इनसे अकाइद पर ही बहस करना चाहिए। इसकी एक वजह यह भी है कि हम लोगों में बदआमालियों इतनी बढ़ चुकी हैं कि हमें अपना सही मजहब गलत नजर आने लगता है और यह हमारी बदआमालियों को दिखा कर हमें हराने की कोशिश करते हैं और हम जवाब नहीं दे पाते। इसके अलावा इनके यहाँ बिदअत का बहुत ख़र्चा है और बात बात पर बिदअत का फतवा लगाते हैं। लिहाज बिदअत के बारे में जानना बहुत जरूरी है। लुगत में नई चीज़ को बिदअत कहते हैं और शरा की बोली में बिदअत वह चीज़ है जो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ज़माने के बाद हुई। हज़रते मुल्ला अली कारी रहमतुल्लाहि तआला अलैह लिखते हैं कि इमाम नौवी रहमतुल्लाहि तआला अलैह ने फ़रमाया ऐसी चीज़ जिसकी मिसाल पहले ज़माने न हो (लुगत में) उसको बिदअत कहते है और शरा में बिदअत यह है कि किसी ऐसी चीज़ का ईजाद करना जो हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के जाहिरी ज़माने में थी।
*📚 (मिरकात जिल्द अब्बल)*
▶️ बिदअत हस्ना भी होती है और सइय्या भी होती है। हजरत शैख अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाहि तआला अलह अपनी किताब 'अशिअतुल्लमआत' जिल्द अव्वल में फरमाते हैं जो बिदअत कि हुजूर की सुन्नत के उसूल व कवाइद के मुताबिक़ है और उसी पर कियास की गई है उसको बिदअते हसना कहते हैं और जो बिदअत कि सुन्नत के मुखालिफ हो उसे बिदअते गुमराही या बिदअते सइया कहते हैं।
▶️ सरकारे अकदस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो शख्स इस्लाम में किसी अच्छे तरीके को राइज करेगा तो उसको अपने राइज करने का सवाब मिलेगा और उन लोगों के अमल करने का भी जो उसके बाद उस तरीके पर अमल करते रहेंगे और अमल करने वालों के सवाब में कोई कमी भी न होगी और जो इसलाम में किसी बुरे तरीके को राइज करेगा तो उस शख्स पर उसके राइज करने का भी गुनाह होगा और उन लोगों के अमल करने का भी गुनाह होगा जो इसके बाद उसके तरीके पर अमल करते रहेंगे और अमल करने वाले के गुनाह में कोई कमी न होगी
📚 *(मुस्लिम शरीफ व मिश्कात शरीफ)*
▶️ इस हदीस शरीफ़ से भी मालूम हुआ कि बिदअत हस्ना भी होती है और सइय्या भी। बिदअत हस्ना का इन्कार करना इस हदीस का इन्कार करना है। वैसे तो बिदअतों की कुल पांच किस्में हैं मगर यहाँ हम इन्हीं दो बिदअतों को समझा रहे हैं और इससे हमारी बात हल हो जाती है।
☝🏻 *बिदअतों का रिवाज* ☝🏻
▶️ अब बिदअते हस्ना और बिदअते मुबाह जो मुसलमानों में राइज है उनकी थोड़ी तफ़सील मुलाहिजा फरमायें
1. मुसलमान बच्चों को ईमाने मुजमल और ईमाने मुफस्सल याद कराया जाता है। ईमान की यह दो किस्में और उनके यह दोन नाम बिदअत हैं।
2. मुस्लिमों की तादाद उनकी तरतीब और उनके नाम सब बिदअत हैं।
3. कुरआन शरीफ़ का 30 पारे बनाना, उनमें रुकू काइम करना, उस पर ज़बर, जेर वगैरा लगाना और आयतों का नम्बर लगाना सब बिदअत हैं।
4. हदीस को किताबी शक्ल में जमा करना, हदीस की किस्में बनाना कि यह सहीह है, यह हसन है, यह ज़ईफ़ है वगैरा -2 और फिर उनके अहकाम मुकर्रर करना सब बिदअत हैं।
5. उसूले हदीस उसूले फिक्ह के सारे काइदे कानून बिदअत है।
6. फिक्ह और इल्मे कलाम जिन पर आजकल दीन का दारोमदार है यह भी शूरू से आखिर तक बिदअत हैं।
7. नमाज़ में ज़बान से नियत करना बिदअत और रमज़ान में बीस रकअत तरावीह को जमाअत पर हमेशगी करना बिदअत है जैसा कि ख़ुद हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु फ़रमाया कि यह बेहतरीन बिदअत है।
8. रोज़ा की व इफ्तार की नियत ज़बान से करना बिदअत है।
9. जकात में मौजूदा सिक्का अदा करना और रुपया पैसा से फितरा निकालना सब बिदअत है।
10. जहाजों, मोटरों वगैरह के जरिए हज करना और मोटरों में अराफ़ात जाना सब बिदअत हैं। 11. शरीअत के चार तरीके हनफी, शाफ़ई, मालिकी और हंबली। इसी तरह चार सिलसिले कादिरी, चिश्ती, नक्शबन्दी और सोहर्वदी सब बिदअत है और इनके वजीफे, मुराकबे, चिल्ले
वगैरा भी बिदअत हैं।
12. हवाई जहाज, रेल, मोटर, टेलीफ़ोन रेडियो, लाउडस्पीकर, कम्पयूटर, फोटो स्टेट, फैक्स और इन्टरनेट सब बिदअत हैं। इसी तरह हज़ारों बिदअत हम हर रोज़ सुबह शाम करते हैं और सब ही करते हैं न इन्हें कोई बुरा कहता है न अच्छा तो फिर मीलाद, फातिहा, सलात, खड़े होकर सलाम, नियाज व नज्र रबीउल अव्वल शरीफ पर चरागों और उर्स जैसी बिदअत हस्ना को ही यह देवबन्दी और वहाबी क्यूँ रोकते हैं क्या इससे यह साफ जाहिर नहीं होता कि इन बेदीन फिरकों को बिदअते हस्ना से चिढ़ है जिनमें सय्यदे आलम सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम, या बुजुर्गाने दीन की ताज़ीम व तारीफ़ हो।
*📕(परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 71,72)*
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🕌 *मज़ारात पर हाज़िरी, पार्ट (1)* 🕌
*▶️ अब्दुल्लाह :* मजारात पर हाजरी देना कैसा और किस तरह देना चाहिए और कब यह शिर्क होगा।
*▶️ मुफ्ती साहब :* मजार पर हाज़िरी देना जाइज़ और अगर किसी बुजुर्ग का मज़ार है तो फैज़ लेना जाइज़ इसमें कोई शरई गिरफ्त नहीं, वसीले और गैरुल्लाह से मदद वाले सवाल पर हम बहुत कुछ समझा चुके। देखा यह गया है कि मज़ार पर हाज़री देते वक्त अक्सर लोग हाज़री के आदाब का ख्याल नहीं रखते और अपने अकीदत के इज़हार में हद से तजावुज़ कर जाते हैं। कोई मज़ार के बिल्कुल करीब जाकर अपना सिर, आखें, माथा वगैरह रगड़ कर हद से ज़्यादा अकीदत का इज़हार करता है जबकि मज़ार शरीफ़ पर हाज़री देते वक़्त कम से कम चार हाथ दूर रहने का हुक्म है। हाँ हाथ लगाकर मज़ार शरीफ को बोसा देना बिला कराहत जाइज़ है और उनके वसीले से मांगना बेशक जाइज़ और कुरआन और हदीस से साबित है बल्कि जिसको जो मिला वसीले से ही मिला, किसी ज़रिए से हुआ मिला, बगैर वसीले से किसी को कुछ नहीं मिलता। हाँ हर चीज़ का देने वाला अल्लाह और सिर्फ अल्लाह ही है अगर कोई यह अक़ीदा रखे कि उसे अल्लाह के सिवा किसी और ने दिया तो यह शिर्क है। हाँ वसीला और जरिया भी अल्लाह ही का पैदा किया है और अल्लाह हर शख्स को वसीले से ही देता है। कुछ लोग मज़ार शरीफ़ पर हाज़री के वक़्त इतनी ज्यादा अकीदत दिखाते हैं कि मज़ार शरीफ़ के पास सजदे की सी हालत में हो जाते हैं हालांकि वह सजदा नहीं है, वहाँ सजदे की शराएत नहीं पाई जाती मगर अवाम पर उसका असर गलत होगा और ऐसा करने का हुक्म भी नहीं, और अगर वाकई कोई ताजीमी सजदा करता है तो वह हराम है और अगर वह सजदा इबादतन यानी इबादत की नियत से करता है तो वह अहले सुन्नत वल जमाअत की नजर में मुशरिक और काफिर है। मगर लाइलाहा इल्लल्लाहु मुहम्मदरसूलुल्लाह पढ़ने वाले से ऐसी उम्मीद नहीं कि वह गैरुल्लाह को इबादत की नियत से सजदा करे अगर करता है तो यह कलिमए अव्वल का इन्कार है और ऐसा शख्स इस्लाम से खारिज है।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 72,73)*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 42 🔰*
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🕌 *मज़ारात पर हाज़िरी, पार्ट (2)* 🕌
▶️ *अब्दुल्लाह :* औरतों का मज़ारात पर जाना कैसा है ?
▶️ *मुफ्ती साहब :* सिवाए हुज़रे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रौज़ए मुबारक के उसके अलावा और जगह औरतों की मजार पर बढ़ती तादाद बहुत बुरा अमल है। इसमें फ़ितने का बहुत ज्यादा अन्देशा है जब मस्जिद में औरतों के जाने का हुक्म नहीं तो मजार पर क्यूँ होगा और आज हम देख रहे हैं कि बाज़ जगह औरतें मर्दो से आगे हैं इस काम में जबकि औरतों का मज़ारात पर जाना सख्त मना है। हाँ औरत घर से बैठ कर ही नियाज़ फ़ातिहा कर सकती है मदद मांग सकती जैसा कि हुक्म है यानी शिर्क के दाइरे से बाहर रह कर मदद मांगे।
▶️ *अब्दुल्लाह :* मुजाविरों के हाल बड़े ख़राब हैं इसके बारे में आप क्या कहना चाहेंगे ?
*▶️ मुफ्ती साहब :* वाक़ई मज़ारात के मुजाविरों में देखा गया है कि आजकल ज़्यादातर इस ताक में रहते हैं कि कब कोई नज़राना देने वाला फंसे। मुजाविरों का ध्यान मज़ार की खिदमत करके साहिब - ए - मज़ार से फैज़ हासिल करने की तरफ कम लगकर लोगों की जेब और फातिहा की शीरीनी पर ज्यादा रहता है। अक्सर बाज़ जगह देखा गया है कि अगर मुजाविरों को नजराना न मिले तो वह तरह -तरह से डरा कर उससे रकम ऐटने की कोशिश करते हैं। बाज़ जगह नज़राना न देने पर कोसते हैं और काम न होने की धमकियाँ भी सुनना पड़ती हैं। यह सब बातें इस कद्र आम हो गई हैं कि लिखना शायद जरूरी भी है। बहुत सख्त गुनाहगार हैं वो लोग जो चन्दे का पैसा लेकर उस मद में नहीं लगाते जिस मद के लिए चन्दा किया गया उससे वह अपना बैंक बैलेंस बढ़ाते हैं यहाँ तक कि देखा जा रहा है कि जकात के नाम पर लेकर लोग उसे अपने जाती खर्च में लाते हैं यानी उस गरीब का हक मारते हैं जिसका हक अल्लाह तआला ने कुरआन में इरशाद फरमाया और इसे फर्ज फरमाया अल्लाह तआला मुसलमानों को इस बला से बचाए।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 74)*
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*मज़ारात पर हाज़िरी, पार्ट (3) आखिरी*
*▶️ अब्दुल्लाह :* रबीउल अव्वल शरीफ में रोशनी करना या कराना इसके लिए चंदा टकट्ठा करना लंगर करना लोगों को खिलाना कैसा है. और जुलूस निकालना कैसा है।
▶️ *मुफ्ती साहब:* बारह रबीउलअव्वल शफीफ मे रोशनी करना जुलूस निकालना बेशक, जाइज है. मगर याद रखिए यह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का जुल्लूस - ए - मुहम्मदी है इसका एहतराम बहुत जरूरी है कुछ लोग जुलूस के साथ -साथ घंटो चलते हैं डीजे पर नाचते ओर शोर शराबा और बहुत जोश दिखाते हैं मगर नमाज़ कज़ा कर देते हैं क्या यही तरीका रसूल का दामन, गौस का दामन थामें रहने का हैं लिबास पर लोग ध्यान नहीं देते क्या सिर्फ एक दिन के लिए हम अंग्रेज़ लिबास नहीं छोड़ सकते, सर पर टोपी नहीं रख सकते। बहुत लोगों को देखा गया है कि वह इस पाक जुलूस को आज की नापाक राजनीती से जोड़ देते हैं गर्ज़ यह है कि जुलूस का एहतराम करें गैर शरई बात न करें।
*रबीउल अव्वल शरीफ़ में रोशनी करना मीलाद पढ़ना, नियाज़ नज़र करना, हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर लाखों, अरबों बेगिनती सलाम व दुरूद पढ़ना, नात - ए - पाक पढ़ना यह सब वाइस - ए - बरकत व सवाब है। लंगर करना लोगों को जाइज़ खाने खिलाना बेशक जाइज़।*
*▶️ अब्दुल्लाह :* आजकल उर्स में जो हाल हो गया है उस पर आप क्या कहना चाहेंगे ?
*▶️ मुफ्ती साहब :* किसी बुजुर्ग के उर्स में शरीक होते वक़्त ख़ास ध्यान यह रहे कि गैर शरई बात से दूर रहें यही अकीदत है उन बुजुर्ग से और यही हुक्म है और तभी फैज़ हासिल होगा। उर्स में गैरशरई कव्वाली, नाच रंग, फोटो खिचाना, औरतों से खलत मलत सख्त हराम है बल्कि उर्स के अलावा भी हराम है।
*▶️ अब्दुल्लाह :* ताक के बारे में हुक्म बतायें ?
▶️ *मुफ्ती साहब :* ताक पर फूल चढ़ाना, मन्नत मानना यह सब बेअस्ल, वाहिइयात है और हराम है।
*▶️ अब्दुल्लाह :* नमाज छोड़ कर नियाज़ का क्या हुक्म है ?
*▶️ मुफ्ती साहब :* नमाज़, रोज़ा वगैरह फर्ज को तर्क करके मजारात पर घूमते रहना, नियाज़ वगैरह करते रहना मुखालफीन को यह कहने का मौका देना है कि यह अल्लाह से न मांगकर गैरुल्लाह से मांगते हैं। बेशक अल्लाह के वली अल्लाह के हुक्म और उसकी दी हुई ताकत से मदद फरमाते हैं और बिगड़े काम बनाते है मगर जब हम अपने बदआमालियों से अल्लाह और उसके रसूल को नाराज किए बैठे है तो क्यूं हम हकदार होंगे अल्लाह के वली से फैज हासिल करने के। याद रखिए जब तक फर्ज जिम्मे होता है नफ्ल मकबुल नहीं होता।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 75,76)*
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*📿 ईसाले सवाब सुन्नत है और सुबूते फातिहा, पार्ट :(2)*
▶️ *अब्दुल्लाह :* अहादीस से कुछ दलाइल सुनायें ?
▶️ *मुफ्ती साहब :* हदीसें तो बहुत आई हैं मगर चन्द सुनिये
🌹 *हदीस : मुस्लिम शरीफ में है* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक मेंढा मंगा कर मेंढे को जिबह करते वक्त फरमाया 'अल्लाह के नाम से ऐ अल्लाह ! मुहम्मद आले मुहम्मद और उम्मते मुहम्मद की तरफ़ से इसे कबूल फरमा फिर उसकी कुर्बानी की।
🌹 *हदीस : तबरानी औसत में है* हज़रते अब्दुल्लाह इब्ने उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी कि सरकारे मदीना सल्लल्ल तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि जब तुम से कोई शख्स कुछ नपल खैरात करें तो चाहिए कि उसे बाप की तरफ़ से करे क्यूकि उसका सवाब उन दोनों के मिलेगा और उस शख्स के सवाब में कुछ भी कम न किया
*🌹 हदीस : तिर्मिज़ी शरीफ़ में है कि* हजरते अली रदियल्लाह तआला अन्हु दो मेंडों को कुर्बानी किया करते थे एक रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैही वल्लम की तरफ से और एक अपनी तरफ से। आप से इसके मुतालिक पूछा गया तो फरमाया कि मुझे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इसका हुक्म फरमाया मैं इसे कभी न छोडूंगा।
*🌹हदीस : अबू दाऊद में मरवी है कि* आस इब्ने वाइल ने वसीयत की कि उसकी तरफ से सौ गुलाम आज़ाद किए जाएं तो उसके बेटे हश्शाम ने 50 गुलाम आज़ाद कर दिए। उसके बेटे हज़रते अम्र इब्ने आस रदियल्लाह तआला अन्हु ने बकिया 50 गुलाम आज़ाद करने का इरादा किया लेकिन उन्होंने सोचा कि पहले इस सिलसिले में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से दरयाफ्त किया जाए। चुनांचे वह आपकी खिदमत में हाज़िर हुए और बाकया गुलाम आजाद करने के बारे मैं दरयाफ्त किया। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलेहि वसल्लम ने फरमाया “अगर तेरा बाप इसलाम व इंसान के साथ दुनिया से रुखसत होता और फिर तू उसकी तरफ से गुलाम आज़ाद करता या सदका करता या हज करता तो उन आमाल का सवाब उसको पहुँच जाता।
*🌹 इन अहादीस से ये साबित हुआ*
1. इसाले सवाब जाइज और आका सल्लल्लाहु तआला अलैहे वसल्लम और सहाबा की सुन्नत है।
2. आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और सहाबा ने इसाले सवाब के लिए तरगीब व वसीयत की।
3. इबादत चाहे बदनी हो या माली सब का ईसाले सवाब किया जा सकता है और सवाब करने वाले के सवाब में कमी न होगी।
4. ईसाले सवाब दुनिया से जा चुके, मौजूदा और आने वाले सभी मुसलमानों का कर सकते हैं।
5. ईसाले सवाब सिर्फ मुसलमान के लिए है काफ़िर को नहीं और अगर कोई कर भी दे तो काफिर को कोई फायदा नहीं
6. ईसाले सवाब की बरकत से मरने वाले के गुनाह मिटा दिए जाते हैं और ईसाले सवाब मुदों के लिए नजात का सबब है।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 76,77)*
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*📿 ईसाले सवाब सुन्नत है और सुबूते फातिहा, पार्ट :(3)*
*○ अब्दुल्लाह :* ईसाले सवाब की बरकत से सवाब व नजात व गुनाहों का कफ्फारा के अलावा मुदों को और क्या फायदा हासिल होता है।
*● मुफ्ती साहब:* मोतबर किताबों में बहुत से वाकियात ऐसे को इसाले सवाब की बरकत देखी। मगर यहाँ वाकियात सुनकर एक हदीस सुनिए "हजरते अनस रदियल्लाहु तआला अनहु फरमाते हैं कि मैंने रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सुना कि जल कोई मय्यत को ईसाले सवाब करता है, तो जिब्रील अलैहिस्सलाम उस एक नुरानी तबाक में रख कर कब्र के कनारे खड़े हो जाते हैं, फिर इरशाद फरमाते हैं कि ए गहरी कब्र के साथी यह तोहफा तेरे घर वालों ने भेजा है इसे कबूल कर ले फिर जब यह सवाब उसकी कब्र में दाखिल होता है, तो वह मुर्दा उससे बेहद खुशी महसूस करता है, और उसके वह पड़ोसी गमगीन हो जाते है कि जिनकी तरफ कोई शय होदया नहीं की गई होती।
*📚 (तबरानी)*
○ *अब्दुल्लाह :* फर्ज व वाजिब व नफ्ल में से किस किस का सवाब पहुँचाया जा सकता है? जैसे किसी ने एक नेकी दस मुर्दा का ईसाल को तो क्या सब को एक एक नेकी मिलेगी या वह एक नेकी ही दम टुकड़े में तकसीम की जाएगी।
*● मुफ्ती साहब :* इसाले सवाल के लिए नफ्ल नमाज़ रोजा व सदका व खैरात ही जरूरी नहीं बल्कि हर फर्ज़ व वाजिब व सुन्नत व मुस्तहब का सवाल पहुंचाया जा सकता है। और हर एक को पूरी एक नेकी मिलेगी और ईसाल करने वाले के सवाब में भी कमी न होगी बल्कि उसे सब के बराबर सवाब मिलेगा यानी उसे सौ नेकी मिलेंगी। हवाले के लिए मशहूर किताब रद्दुल मुहतार का मसअल्ला देखें।
*○ अब्दुल्लाह :* ईसाले सबाव के लिए शरीअत की तरफ से कोई खाश वक्त मुकर्रर नहीं तो फिर आजकल तीजा चालीसावां ग्यारवीं बारहवीं कंडे के नाम से ईसाले सवाब के लिए दिन क्युं मखसुस हैं।
*● मुफ्ती साहब :* वक्त मुकर्रर करना दो तरह से हैं
1. शरई यानी जिस शरीअत ने मुकर्रर किया जैसे नमाज का वक्त
2. उरफी यानी जिसे लोग अपनी सुहूलत के लिए मुकर्रर कर ले जैसे जमाअत के लिए वक्त तय कर लेना, वाज के लिए, तबलीग के लिए.... तीजा चालीसवाँ वगैरह दूसरे वक्त यानी उरफी की मिसालें है। इसको बहुत सी मिसालें हुजूर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम व सहाबा से भी मिलेगी जिन्हें हम शरई मिसाल कर सकते हैं!
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 78)*
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*📿 ईसाले सवाब सुन्नत है और सुबूते फातिहा, पार्ट :(4)*
*● अब्दुल्लाह :* अगर कई सारे दलाइल जानने के बावजूद इसाले सवाब के लिए मखसूस खाने को हराम और ईसाल सवाब करने वाले को गुनाहगार बिदअती करार देना है तो शरई लिहाज से उसके लिए क्या हुक्म है?
*● मुफ्ती साहब:* यकीनन जो शख्स इस खाने को कि जिस पर अल्लाह तआला का पाक कलाम पढ़ा गया हराम और सुन्नत पर अमल पैरा होने वाले को गुनहगार बिदअती करार दे वह खुद बिदअती व गुनहगार है। जब अल्लाह व रसूल ने इसे मना नहीं किया तो यह कौन होते हैं मना करने वाले। ऐसे लोगों से रोजे कियामत में सवाल होगा।
*✍🏻 अल्लाह तआला सूरह माइदह की आयत न . 87 में इरशाद फरमाता है ऐ ईमान वालो !* हराम ठहराओ वह सुथरी चीजें कि जिसे अल्लाह ने तुम्हारे लिए हलाल की और हद से न बढ़ो बेशक हद से बढ़ने वाले अल्लाह को नापसन्द हैं।
*● अब्दुल्लाह :* इसाले सवाब (मुर्दो को सवाब पहुँचाना) किस किस फिरके के नजदीक जाइज़ है ?
*● मुफ्ती साहब :* सभी फिरकों में।
*● अब्दुल्लाह :* फिर झगड़ा क्यूँ ?
*● मुफ्ती साहब :* बख्शने के तरीके में इख्तेलाफ है। हम हुजूर सल्ललाहु तआला अलैहि वसल्लम के वसीले से बख्शते हैं यह डायरेक्ट। वसीले पर बात हम कर चुके हैं।
*● अब्दुल्लाह :* हाथ उठा कर दुआ करना हदिस से साबित है ?
*● मुफ्ती साहब:* इसाले सवाब (मुरदो को सवाब पहुँचाना) एक दुआ है लिहाज़ा इसाले सवाब हाथ उठा कर करना भी जाइज़ है ?
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 78,79)*
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*📿 ईसाले सवाब सुन्नत है और सुबूते फातिहा, पार्ट :(5)*
➡️ *अब्दुल्लाह :* इसाले सवाब जबकि खाना खिलाने का सवाब पहुंचाना साथ ही कुछ पढ़ना भी हो खाना कहाँ रखना चाहिए ?
*➡️ मुफ्ती साहब :* आप ही बतायें के खाना सामने रखें, दायें या बायें या ऊपर रखना चाहिए ?
➡️ *अब्दुल्लाह :* जाहिर है एक देहाती भी कहे देगा कि सामने ही रखना बेहतर है!
*➡️ मुफ्ती साहब:* अब सामने रखने को बहुत ही बुरी बिदअत माना जाए क्या अक्ल तसलीम करती है। एक हदीस बुख़ारी शरीफ की मुलाहिजा फरमायें हज़रते अनस इब्ने मालिक फरमाते है कि हजरते अबु तलहा रदियल्लाहु तआला अन्हु ने हजरते उम्मे सुलैम रदियल्लाहु तआला अन्हा से फरमाया कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की आवाज़ सुनी है मुझे यूँ महसूस होता है कि आपको भूक लगी हुई है क्या तुम्हारे पास कोई चीज़ है ? तो उन्होंने कहा हाँ। फिर उन्होंने जो की चन्द रोटियाँ निकाली और एक ओढ़नी के कोने में लपेट कर मुझे पकड़ाई और बाकी ओढनी मुझे उढ़ा कर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खिदमत अकदस में भेजा। जब मै आपकी खिदमते अकदस में हाजिर हुआ तो वहाँ काफी लोग मौजूद थे। मै दूसरे लोगों के साथ खड़ा हो गया। सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मुझसे फरमाया क्या तुझे अबू तल्हा ने भेजा है ? मैंने अर्ज किया जी हाँ। तो रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने पास हाज़िर लागों से फरमाया उठो। हजरते अनस फरमाते हैं कि वो सब चल पड़े तो मैं उनके आगे आगे चल कर अबू तल्हा के पास आकर उन्हें उस चीज़ की ख़बर दी तो अबू तल्हा ने उम्मे सुलैम रदियल्लाहु तआला अन्हा से कहा कि सरकारे मदीना सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ और लोग भी आ रहे हैं और हमारे पास कोई ऐसी चीज़ मौजूद नहीं जो उन सबको खिला सकें। हज़रते उम्मे सुलैम ने कहा अल्लाह और उसका रसूल ही बेहतर जानते हैं। हज़रते अनस फरमाते हैं हज़रते अबू तल्हा ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इस्तकबाल किया। रसुलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और अबू तल्हा दोनों घर में दाखिल हुए। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया ऐ उम्मे सुलैम तेरे पास जो कुछ है ले आओ तो वह वही रोटियाँ लेकर हाज़िर हुई। रहमते दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उन रोटियों को तोड़ने का हुल्म दिया। फिर उम्मे सुलैम ने उन रोटियों के टुकड़ों पर घी की कुप्पी औधा कर उनको रोगनी कर दिया। फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उन टुकड़ों पर जो चाहा पढ़ा, फिर इरशाद फरमाया दस शख़्सों को बुलाओ। वो आए और सैर होकर खा कर चले गए। फिर आपने इरशाद फरमाया और दस लोगों को बुलाओ। वो भी आए और सैर होकर खा कर चले गएं। फिर फ़रमाया दस और लोगों को बुलाओ। वो भी सैर होकर खा कर चले गए। ग़र्ज़ सब लोग सैर हो गए और 70 या 80 लोग थे। अब इस हदीस से सामने रख कर पढ़ना बरकत होना दोनों शामिल हैं कि नहीं।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 80)*
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*📿 ईसाले सवाब सुन्नत है और सुबूते फातिहा, पार्ट :(6)*
*➡️ अब्दुल्लाह : सवाल :* किसी ने सिर्फ गरीबों को खिलाने की नियत से खाना पकाया और फातिहा भी की उसे अमीर, को खाना कैसा ?
*➡️ मुफ्ती साहब :* नाजाइज़ है लेकिन बाज़ नियाज़ को बुरा भला कहने वालों को हमने खुद खाते देखा इसका तो मतलब यही हुआ कि मौका देख कर बढ़िया पका हो तो खा लो।
*➡️ अब्दुल्लाह :* किसी ने अमीरों और गरीबों सभी को खिलाने की नियत से खाना पकाया और फ़ातिहा भी की उसे अमीर को खाना कैसा ?
*➡️ मुफ्ती साहब :* अमीरों को इसका खाना बिला कराहत जाइज है।
*➡️ अब्दुल्लाह :* किसी ने जाइज़ चीज़ पर फातिहा की और कोई जात नियत न की फिर खुद भी खाई और अपने बच्चों को में खिलाई यह कैसा है ? कुछ लोग हर जुमेरात को फ़ातिहा दिलाते हैं, हर त्योहार के मौके पर नियाज़ फ़ातिहा बल्कि बाज़ लोग रोज़ फ़ातिहा करते हैं एक अमल को इतना ज्यादा करना कैसा है?
*➡️ मुफ्ती साहब :* यह काम सही है बल्कि इससे बरकत होती है। सारा दारोमदार नियत पर है जैसी नियत वैसा हुक्म वैसी बरकत।
*➡️ अब्दुल्लाह :* कुछ लोग नियाज़ को बड़ी धूम से करते हैं बाकायदा बुलावे दिए जाते हैं बड़े बड़े लोगों को बुलाया जाता है। देगों की गिनती आटे की मिकदार तरह तरह से अपनी कड़वाही लूटने की फ़िक्र होती है यह सब कैसा है ?
*➡️ मुफ्ती साहब :* सारा दारोमदार नियत पर है अल्लाह तआला को रिया व दिखावा पसन्द नहीं न ही कबूल है हाँ अगर नियत साफ़ हो तो बहुत सवाब पाएगा। गौसे पाक रदियल्लाहु तआला अन्हु ने भूको को खाना खिलाने का सवाब समझाने के लिए फरमाया कि मैंने जितनी इबादात व रियाजात की मगर जितना अज्र व सवाब भूकों को खाना खिलाने में पाया उतना दूसरे अमल में नहीं अगर मुझे मालूम होता कि इतना सवाब है तो मैं ज़िन्दगी भर भूकों को खाना खिलाता रहता।
*➡️ मुफ्ती साहब :* सुन्नीयों में बदअमली बढ़ती जा रही मगर अल्हम्दुलिल्लाह हम बदअकीदा नहीं।
➡️ *अब्दुल्लाह :* यह मेरी बात का जवाब न हुआ।
*➡️ मुफ्ती साहब :* नफ़्ल आमाल का सवाब तभी कबुल है जब फ़र्ज इबादात पूरी कर ले यानी नियाज़ तभी कबूल होगी जब नमाज़ रोज़ा पूरै कर ले।
➡️ *अब्दुल्लाह :* तो पहले हमें फर्ज पूरे करना चाहिए, आप लोगों को समझाते क्यूँ नहीं कि तुम्हारी नियाज़ बेकार है जब तक फर्ज पूरे न हों !
*➡️ मुफ़्ती साहब :* बात ठीक है मगर अगर कोई नेक अमल कर रहा है तो उसे रोका नहीं जाएगा।
*➡️ अब्दुल्लाह :* मैं समझा नहीं।
➡️ *मुफ्ती साहब :* इसको इस तरह समझिए कि एक शख्स ने नफ्ल नमाज की मन्नत मानी और उसका काम हो गया और अब वह नमाज़ पढ़ रहा है तो क्या उसे रोका जाएगा कि तुम्हारे ज़िम्मे दस या बीस साल की नमाजें बाकी हैं लिहाज़ा यह मन्नत के नफ्ल न पढ़ो।
*➡️ अब्दुल्लाह :* हाँ बात समझ आ गई कि अगर कोई नेक काम कर रहा है तो उसे रोका न जाए आहिस्ता आहिस्ता फ़र्ज़ भी पढ़ने लगेगा।
*➡️ मुफ्ती साहब :* जी हाँ।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 81,82)*
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*📿 ईसाले सवाब सुन्नत है और सुबूते फातिहा, पार्ट :(7)*
*➡️ अब्दुल्लाह :* क्या किसी वहाबी से फ़ातिहा दिलवा सकते हैं,
*➡️ मुफ़्ती साहब :* जिनके पास ईमान नहीं उनसे दिलवाने से क्या फायदा। हमारे एक मिलने वाले हैं बेचारे कुछ नहीं जानते बेपढ़े हैं उन्होंने एक मरतबा फ़ातिहा के लिए कुछ मंगावाया और एक मौलवी साहब को पकड़ लाए जो तबलीगी जमात के थे। खैर फ़ातिहा तो उन्होंने दे दी मगर जब उनसे ज़रा सा चखने के लिए कहा गया तो बोले यह हराम है। वह गरीब बोला मौलवी साहब मैं बेपढ़ा ज़रूर हूँ मगर यह बताइये कि यही खाना अगर मैं आपको फातिहा से पहले खिलाना चाहता तो आप बड़े शौक से खाते यह अल्लाह का कलाम पढ़ते ही हराम कैसे हो गया। खाना पाक कमाई पाक सफ़ाई से बनाया गया और फिर अल्लाह का कलाम पाक पडने पर हराम जैसे कैसे हो गया हमें समझा ज़रूर दें। मौलवी साहब अपना सा मुँह लेकर चले गए।
*➡️ अब्दुल्लाह :* मुझे तो हंसी आ रही हैं आपने ऐसी बात सुना दी। कुछ लोग कहते हैं कि फातिहा का तबर्रूक है पेट में जाएगा पाख़ना बनेगा हड्डी वगैरह पैरों के नीचे आएगी इस लिए अल्लाह का कलाम पढ़ना नही चाहिए ऐसे लोगो के लिए कोई जवाब दीजिए।
*➡️ मुफ्ती साहब :* बिल्कुल जायज है जिन्हें इन से चिढ़ ह वो कही न कही टांग अड़ाने में लगे रहते ह बेअदबी के डर से फातिहा न देना बेकार की बात है अरे अदब करना तो उस पर लाज़िम है जिसके पास तबर्रुक है क्या बच्चों के हाथ में कुरआन देना मना है हाँ उन्हें अदब सिखाना जरूरी है और फिर बच्चे का हुक्म अलग है ज़मज़म शरीफ़ को लोग पीते हैं कितना बड़ा तबर्रूक है अब क्या पेशाब नहीं करेंगे या ज़मज़म शरीफ़ नहीं पियेंगें। जमजम शरीफ इस्तेमाल करने पर कभी कभी गिर भी जाता है तो क्या ज़बान से चाटने का हुक्म है नही बल्कि मैंने बाज़ लोगों को जमजम शरीफ़ से वुजू भी करते देखा है। कुर्बानी का गोश्त और फिर हर ज़बीहे पर अल्लाह का नाम पढ़ना ज़रूरी है वर्ना वह हराम हो जाएगा अब बताईये क्या बगेर बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर कहकर जिबह किया जाए। यह सब बेकार की बातें है इन्हें तो बस अल्लाह के वलियों और उनकी नियाज और नियाज के तबर्रूक से चिढ़ है।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 82)*
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*📿 ईसाले सवाब सुन्नत है और सुबूते फातिहा, पार्ट :(8)*
*➡️ अब्दुल्लाह :* सवाब बख्शने का सही तरीका बतायें ?
*➡️ मुफ्ती साहब :* सबसे पहले हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फिर तमाम नबियों को फिर तमाम सहाबा को फिर तमाम बुजुर्गों और तमाम मुसलमानों (जो हैं, जो गुज़र गए और जो आने वाले हैं) को और जिसके लिए फ़ातिहा की है सबसे बाद में उसे नाम से बख़्शें।
*➡️ अब्दुल्लाह :* आने वाले मुसलमानों को भी। वह क्यू ?
*➡️ मुफ्ती साहब :* इसका जवाब हो चुका है इतना और समझ ले कि आने वाले ज़्यादा मुस्तहिक हैं कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से दौर जितना दूर होगा उसमें ज़्यादा गुनाह व गुनाहगार होंगे आने वाले वक्त में इसलिए वो ज़्यादा मुस्तहिक हुए।
*➡️ अब्दुल्लाह :* नियाज़ देते में किसी ने कुरआन पढ़ने में गलती की तो क्या हुक्म होगा ?
➡️ *मुफ़्ती साहब :* कोई सवाब नहीं मिलेगा और जब सबाब ही न मिलेगा तो बख्शेगा क्या और गुनहगार भी होगा। यहाँ बहुत इहतियात को ज़रूरत है अल्लाह माफ़ फ़रमाये।
*➡️ अब्दुल्लाह :* तीजा, चालीसवाँ, दसवाँ, बसीं करना कैसा है ?
➡️ *मुफ्ती साहब :* दावत न बनाकर ख़ालिस ईसाले सवाब के लिए करें तो बेहतरीन काम उसके हक में जो अब अमल नहीं कर सकता हमारे सवाब का मुहताज है। वह तरस रहा है इस बात के लिए कि कोई उसे पढ़ कर कुछ बख्श दे। कब्रस्तान के मुझे तमन्ना करते हैं कि हमें कम से कम इतनी जिन्दगी मिल जाए कि दो रकआत नमाज़ पढ़ लें और यह भी तमन्ना करते हैं कि कोई अल्लाह का बन्दा उन्हें चलते चलते ही बख्शता हुआ चला जाए तो क्या हमारे वह बुजुर्ग व रिश्तेदार जिनके हमारे ऊपर हजारों एहसानात हैं क्या हमें इसलिए याद नहीं कर रहे कि हम उन्हें कुछ पढ़ कर बख्श दें।
*➡️ अब्दुल्लाह :* हमारे माँ बाप और करीबी रिश्तेदार वाकई हमें इस नियत से तो बहुत याद करते होंगे कि हम उन्हें पढ़ कर बख्शें। वह तो हमसे कह नहीं सकते और हमें तो सिर्फ ज़बान हिलाना है।
*➡️ मुफ्ती साहब :* बल्कि ज़बान भी नहीं हिलाना है सिर्फ यह नियत दिल ही दिल में कर लें कि हमारे तमाम अमलों का सवाब हमारे माँ बाप और सब मुसलमानों को मिले।
*➡️ अब्दुल्लाह:* वाकई यह सिलसिला चलता रहे तो तमाम मुल्लमानों की बख्शिश का सामान ख़ुद ब खुद हो जाए।
*➡️ मुफ्ती साहब :* लेकिन इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं कि हम अमल छोड़ दें और यह सोचने लगे कि हमें कोई पढ़ कर बख्श देगा। बल्कि अपनी औलाद और हमसे महब्बत रखने वालों को वसीअत कर जायें कि वह हमारे जाने के बाद नेक अमल और सही अदाएगी के साथ कुरआन पढ़ कर बख्शें।
अब्दुल्लाह साहब आपसे यह गुज़ारिश है कि मेरे मरने के बाद मुझे जब भी मेरी याद आए तो ज़रूर कुछ ने कुछ पढ़ कर बख्शना और इस बात का ख्याल रखना जो पढ़ना वह सही पढ़ कर बख़्शना ग़लत पढ़ते हों तो हमें उसकी न ज़रूरत होगी न सवाब मिलेगा। हाँ अगर पढ़ने में गलती करते हों तो ख़ाली वक्त में आ जायें इन्शा अल्लाह आपका कुरआन सही करा दूंगा।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 83)*
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*📿 ईसाले सवाब सुन्नत है और सुबूते फातिहा, पार्ट :(9)*
*➡️ अब्दुल्लाह :* क्या औरतें फ़ातिहा दे सकती हैं ?
*➡️ मुफ़्ती साहब :* हाँ दे सकती है।
*➡️ अब्दुल्लाह :* वाक़ई माँ बाप का तो यह हक है कि उन्हें ज़रूर सही पढ़ कर बख़्शा जाए।
*➡️ मुफ़्ती साहब :* जब आपने माँ बाप का ज़िक्र छेड़ा है तो एक बात बहुत बढ़िया सुनें। वह यह कि नेक औलाद माँ बाप के लिए सदकए जारिया। सदक़ए जारिया का मतलब यह है कि वह अमल जो मरने के बाद भी जारी रहे। औलाद के नेक अमल माँ बाप देख कर खुश होते हैं और इसका सवाब उन्हें मिलता है। और औलाद को चाहिए कि अगर वह वालिदैन की ज़िन्दगी में नेक न थी तो अब ज्यादा से ज्यादा नेक अमल करके माँ बाप को फायदा पहुँचा सकता है। गौर कीजिए खुद नेक बनिए और अपनी औलाद को नेक राह पर डालिए। आलिम नहीं बना सकते तो कम से कम नेक मुसलमान तो बना सकते हैं। क्या ही प्यारी बात क्या ही प्यारा मजहबे इस्लाम।
*➡️ अब्दुल्लाह :* मैंने एक साहब को देखा कि वह वहाबी अकाइद 'रखते थे मगर अब उन्होंने तौबा कर ली और उनके वालिद उसी वहाबी अकीदे पर दुनिया से गए, यह बात वह अच्छी तरह जानते थे। लेकिन अपने वालिद के मरने के बाद उन्होंने तीजा चालीसवाँ सब किया। इस पर कुछ लोगों ने शिरकत न की। अब बायकाट करने वालों की इस हरकत से उन्हें तकलीफ़ पहुँची। अब देखिए कि ऐसा करना तो मुनासिब नहीं लगता कि अब तो यह सब सुन्नी हो गए हैं। लेकिन मारने वाला वहाबी था
*➡️ मुफ्ती साहब :* बायकाट करने वाले हक पर हैं वह इसलिए कि मसअला यह है कि जो शख्स वाकई कुफ्री वहाबी अकाइद पर दुनिया से गया। वहाबी ही नहीं कोई भी अगर कुफ्र पर दुनिया से गया तो उसके लिए इसाले सवाब है ही नहीं। इस मसअले मैं तो हर फिरका इसी पर है कि काफ़िर व मुरतट के लिए ईसाले सवाब है ही नहीं। बल्कि नुकसान यह है कि मरने वाला नबियो ओर सहाबा के गुस्ताख़ ईमान पर ही नही तो उसके लिए ये सवाब बख्शने वाले पर कुफ्र लाज़िम आएगा जबकी खूब जानता हो कि यह ईमान पर नहीं गया।
*➡️ अब्दुल्लाह :* अरे हमें यह मसअला तो मालूम ही न था हम तो हर जगह सुन्नी और सुन्नियों का अमल समझ कर चले जाते हैं। इसमें तो बड़ी एहतियात की ज़रूरत है।
*➡️ मुफ़्ती साहब :* जी हाँ।
*➡️ अब्दुल्लाह :* और जिनके बारे में पता ही न हो तो क्या करे ?
*➡️ मुफ्ती साहब :* वहाँ मोमिन के लिए नेक गुमान ही करना बेहतर है और फिर यह हुक्म उसी के लिए है जो बेईमान गया। इसकी तफ़सील लम्बी है फुरसत से समझ लें।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 84)*
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*📿 ईसाले सवाब सुन्नत है और सुबूते फातिहा, पार्ट :(10) आखिरी*
*➡️ अब्दुल्लाह :* फ़कीर को कर्ज लेकर तीजा चालसवाँ बर्सी वगैरह करना कैसा है ?
*➡️ मुफ्ती साहब :* कर्ज लेकर करना नाजाइज़ है।
*➡️ अब्दुल्लाह :* तीजा चालीसवाँ बर्सी वगैरह की अस्ल क्या है ?
*➡️ मुफ्ती साहब :* ईसाले सवाब ही इन सब की अस्ल है।
*➡️ अब्दुल्लाह :* एक रसम यह है कि मरने के दिन से ही रिश्ते की औरतें जमा हो जाती हैं और कई कई दिन तक कभी कभी चालीसवें तक शादियों जैसा खाना चलता रहता है यहाँ तक कि पान छालिया भी चलता है। यह सब कैसा है ?
*➡️ मुफ्ती साहब :* इस नापाक रसम में बहुत फ़ितने हैं यह गुनाह है, बुरी बिदअत है।
➡️ *अब्दुल्लाह :* मय्यत के घर वालों और ख़ास बाहर से आए मेहमानों के लिए, सिर्फ एक दिन का खाना पका कर भेजें तो कैसा है ?
*➡️ मुफ़्ती साहब :* जाइज़ है। हाँ अगर परदेसी मेहमानों के लिए भी पकवा कर भेज दिया तो जाइज़ है कि वो परदेसी (दूसरे शहर वाले) खाने के लिए कहाँ जाएंगे।
*➡️ अब्दुल्लाह :* तीजे के चने बताशे जब कि मात्तिक ने सबके बांटने की नियत से ख़रीदे हों खाना जाइज़ है ?
*➡️ मुफ़्ती साहब :* हाँ बिल्कुल जाइज है।
*➡️ अब्दुल्लाह :* देवबन्दी नियाज़ के खाने को खाना कैसा जानते है।
*➡️ मुफ्ती साहब :* देवबनदियों के मौलाना रशीद अहमद गंगोही ने फतावा रशीदया में है कि नियाज़ नज़र का खाना हराम और होली दीवाली की पूरियाँ खाना जाइज़ लिखा है।
*➡️ अब्दुल्लाह :* कुछ वहाबी देवबंदी लोग कहते हैं कि अमीर के लिए नियाज़ का खाना हराम है चाहे खिलाने वाले ने दोनों के खिलाने की नियत रखी हो।
*➡️ मुफ्ती साहब :* क्या आप बता सकते हैं कि वही हलाल चीज जो फातिहा से पहले हलाल थी अल्लाह का कलाम पढ़ते ही हराम कैसे हो गई।
➡️ *अब्दुल्लाह :* देवबन्दियों के मौ रशीद अहमद गंगोही ने लिखा कि कौआ खाना सवाब है क्या यह सही है ?
➡️ *मुफ्ती साहब :* हाँ देवबन्दियों ने कौआ खाना सवाब लिखा है। सुबूत के लिए देवबन्दी मौलवी मो रशीद अहमद गंगोही की फतावा रशीदया पेज 597 देखें।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 84)*
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*✍🏻 अरवाहे मोमिनीन*
➡️ *अब्दुल्लाह :* क्या मोमिनीन की रूहें मरने के बाद उनके घर पर आती हैं ?
*➡️ मुफ्ती साहब :* शैख़ुल इसलाम कश्फुल अज़ा में फ़रमाते हैं "गराइब और ख़ज़ाना में है कि मोमिनों की रूहें हर जुमा की रात को, ईद और आशूरा के दिन और शबे बराअत मैं अपने घर आती हैं और दरवाजे के बाहर खड़ी हो कर रंज व अफ़सोस के लहजे में बलन्द आवाज़ से पुकारती हैं कि ऐ मेरे घर वालो ऐ मेरे बच्चो ! और ऐ अज़ीज़ो ! मुझ पर सदके के ज़रिए मेहरबानी करो"
➡️ *अब्दुल्लाह :* क्या घर के अलावा भी कहीं आती जाती है।
*➡️ मुफ़्ती साहब :* हदीस में आया कि बेशक दुनिया काफ़िर के लिए जन्नत है और मुसलमान के लिए कैदखाना है। जब मुसलमान की जान निकलती है तो उसकी मिसाल ऐसी है जैसे कि कोई शख़्स पिंजरे में था अब आज़ाद कर दिया गया तो जमीन में गश्त करने लगा चलने फिरने लगा ?
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 85)*
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*🇨🇨 मीलाद 🇨🇨*
✍🏻 *अब्दुल्लाह :* मीलाद शरीफ़ के बारे में अहले सुन्नत का अकीदा बयान करें ?
✍🏻 *मुफ्ती साहब :* रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पैदाइश का ज़िक्र और इस पर खुशी मनाना यानी महफिले मीलाद शरीफ करना जबकि इसमें कोई खिलाफ शरा बात न पाई जाए यकीनन जाइज़ और इससे बड़ी खैर व बरकत होती है।
*✍🏻 अब्दुल्लाह :* कुछ लोग इसे नाजाइज़ हराम और बिदअत व गुमराहो कहते हैं तअजुब है ?
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* मीलाद शरीफ में अल्लाह की हम्द नबी ए करीम सल्लल्लाहु तआता अलैहि वसल्लम की नात व दुरूद और आपकी विलादत और उसके वक्त के वाकियात नज्म व नस्र में बयान किए जाते हैं बाद में खड़े होकर तालीम के साथ सलाम पढ़ा जाता है इसमें क्या बुरा है और यह सब बातें हदीस से साबित हैं।
*✍🏻 अब्दुल्लाह :* हदीस से सुबूत पेश करें ?
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* बुख़ारी शरीफ में है रसुलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मस्जिदे नबवी में हजरते हस्सान इब्ने साबित के लिए मिमबर रखवाया जिस पर खड़े होकर उन्होंने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शान व अजमत में नात शरीफ पढ़ी साथ ही उन्के दुश्मनों की बुराई भी अपनी नात में पढी। हदीस का यह मफहूम हदीस शरीफ की दूसरी किताबों में भी है
*✍🏻 अब्दुल्लाह :* दुनिया के हर कोने में महफ़िले मीलाद होती है चन्द सिरफिरों को छोड़ कर इसे बुरा कहना तो दूर लोग बड़े ही शौक़ व एहतिमाम के साथ नबीए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का मीलाद मनाते हैं। क्या कभी ख़ुद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपना मीलाद खुद किया ऐसी कोई हदीस है ?
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* तिरमिज़ी शरीफ़ की जिल्द 2 में है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मिम्बर पर जलवा अफ़रोज़ हुए और फरमाया मैं कौन हूँ। लोगों ने अर्ज किया आप अल्लाह के रसूल हैं। फरमाया मैं मुहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह इब्ने अब्दुल मुत्तलिब हूँ, अल्लाह ने मखलूक को पैदा फरमाया तो मुझको इनमें सबसे अच्छों में बनाया फिर इन अच्छों की दो जमाअतें की तो इनमें सबसे अच्छी जमाअत में मुझको बनाया फिर इन अच्छों के कबीले कि ता सबसे अच्छे कबीले में मुझको बनाया फिर इस अच्छे कबीले के घराने किए तो सबसे अच्छे घराने में मुझे पैदा फ़रमाया तो मैं अपनी जात के एतबार से भी सबसे अच्छा हूँ और ख़ानदान के एतबार से भी सबसे अच्छा हूँ।
✍🏻 इस हदीस से खूब जाहिर कि खुद सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपना मीलाद मिम्बर पर खड़े हो कर पढ़ा। क्या अब भी कोई कहेगा कि सय्यदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की विलादत का जिक्र करना गलत है। मैं समझता हूँ ऐसा वही कहेगा जिसके दिल में चोर व निफाक होगा।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 94,95)*
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✍🏻 *निदाए या रसूलल्लाह*
▶️ *अब्दुल्लाह :* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को “या रसूलल्लाह" कह कर पुकारना कैसा है ?
*▶️ मुफ्ती साहब :* जाइज़ है।
▶️ *अब्दुल्लाह :* कुरआन व हदीस से कुछ हवालाजात पेश करे ?
▶️ *मुफ्ती साहब :*
1. कुरआन में निदा इस तरह आई या अय्युहन्नबी, या अय्युहर्रसूल, या अय्युहल मुजम्मिल, या अय्युहल मुद्दस्सिर वगैरह
2. या मूसा, या ईसा, या यहया, या इब्राहीम, या अदम वगैरह
3. या अय्युहल्लज़ीना कह कर मुसलमानों को निदा की गई
*4. मिश्कात शरीफ में है* हज़रते जिब्रील व हज़रते मलिकुल मौत ने या मुहम्मद कह कर पुकारा
5. एक हदीस में एक नाबीना के दुआ के अल्फ़ाज़ में या मुहम्मद मैंने आपके ज़रिए से अपने रब की तरफ़ अपनी इस हाजत में तवज्जोह की ताकि हाजत पूरी हो
▶️ *अब्दुल्लाह :* कुछ किताबों के नाम बताइये जिनमें "या रसूलल्लाह" कहने का सुबूत मिलता है ?
▶️ *मुफ्ती साहब :* 1. शिफाउस्सेकाम- अल्लामा अबू हसन अली सुबकी।
2. मवाहिजे लदुन्निया- इमाम अहमद कुस्तलानी।
3. शरहे बुख़ारी व शरहे मवाहिब -अल्लामा ज़रकानी।
4. अश्अतुल लमआत शरहे मिश्कात, जज़बुल कुलूब, मदारिजुन्नुबुव्वत- तीनों शाह मुहद्दिद हक़ देहलवी
5. अफजलुल कुरअ शरहे इमामुलकुरअ- इमाम इब्ने हजर मक्की
*▶️ अब्दुल्लाह :* नमाज़ में अत्तहिय्यात में आता है "अस्सलामुअलैका अय्युहन्नबीय्यु व रहमतुल्लाहि व बराकातुह" क्या इसे निदाए या रसूलल्लाह कह सकते हैं ?
*▶️ मुफ्ती साहब :* हाँ यह निदाए या रसूलल्लाह है और ज़रूरी है कि नमाज़ न होगी और इससे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर सलाम का सुबूत भी है।
*▶️ अब्दुल्लाह :* कुछ मशहूर बुजुर्गों के नाम बतायें जिन्होंने निदा की हो ?
*▶️ मुफ़्ती साहब :* 1. कसीदा बुर्दाह शरीफ़ के एक शेर का तर्जमा है ऐ बेहतरीन मखलूक आपके सिवा मेरा कोई नहीं कि मुसीबत के वक्त जिसकी पनाह लूँ।
2. इमाम जैनुल आबेदीन रदियल्लाहु तआला अन्हु के कसीदे के एक शेर का तर्जमा है कि ऐ रहमतुल्लिल आलमीन जैनुल आबेदीन की मदद को पहुँचो वह इस अज़दहाम में ज़ालिमों के हाथों में कैद है।
3. मौलाना जामी अलैहिरहमह अपने एक शेर में फ़रमाते हैं जिसका तर्जमा है कि जुदाई से आलम, की जान निकल रही है या नबी रहम फ़रमाओ रहम फ़रमाओ क्या आप रहमतुल्लिल आलमीन नहीं हैं फिर हम मुजरिमों से फ़ारिश क्यू हो बैठे।
4. हज़रते इमाम अबू हनीफ़ा रदियल्लाहु तआला अन्हु के कुसीदे के एक शेर का तर्जमा है ऐ पेशवाओं के पेशवा मैं दिली इरादे से आपके पास आया हूँ आपकी रज़ा का उम्मीदवार हूँ और अपने को आपकी पनाह में देता हूँ
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 86,87)*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 57 🔰*
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✍🏻 *ताज़ीमी सजदा* ✍🏻
*▶️ अब्दुल्लाह :* सजदे दो किस्म के होते हैं सजदए इबादत और सजदए ताजीमी क्या यह सही है।
*▶️ मुफ्ती साहब :* हाँ।
*▶️ अब्दुल्लाह :* सजदए ताज़ीमी अल्लाह के सिवा किसी को करना कैसा है ?
▶️ *मुफ्ती साहब :* पहले की शरीअतों में जाइज़ था अब मज़हब इसलाम में हराम है लेकिन शिर्क व कुफ्र नहीं। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया अगर मैं किसी को सजदे का हुक्म देता तो औरत को देता कि अपने शौहर को सजदा करे। क्या यह सजदए इबादत होता या यह सजदए ताज़ीम होता।
*▶️ अब्दुल्लाह :* बेशक यह ताजीमी सजदा होता सजदए इबादत का हुक्म हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम दें यह तो हो ही नहीं सकता। और वजाहत फ़रमायें
*▶️ मुफ्ती साहब :* हदीस में है एक सहाबीए रसूल का ऊँट बिगड़ गया वह हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास पहुँचे। आप तशरीफ़ ले गए तो ऊँट ने आपको सजदा किया। उन सहाबी ने भी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सजदा करने की इजाजत मांगी। यह किस सजदे की इजाजत मांगी क्या सजदए इबादत की हरगिज़ नहीं बल्कि सजदए ताज़ीमी की चूंकि एक सहाबी से हरगिज़ यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह इबादत के सजदे की इजाजत मांगेगे चूंकि कलिमए लाइलाहा इल्लल्लाह न कभी बदला न कभी बदलेगा।
▶️ *अब्दुल्लाह :* ताजीमी सजदा किस जमाने तक जाइज़ था ?
▶️ *मुफ़्ती साहब :* हज़रते यूसुफ़ अलैहिस्सलाम तक।
*▶️ अब्दुल्लाह :* कुछ कुरआन से सुबूत दें ?
*▶️ मुफ़्ती साहब :* हज़रते आदम अलैहिस्सलाम को फ़िरिश्तों का सजदा करना और हजरते यूसुफ अलैहिस्सलाम को उनके वालिदैन और भाईयों का सजदा करना यह कौन सा सजदा था सजदए 'इबादत या सजदए ताजीमी। बिला शक ओ शुबाह यह ताजीमी सजदे थे।
*▶️ अब्दुल्लाह :* आज अगर कोई अपने पीर या हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ताज़ीमी सजदा करे तो काफिर हो जाएगा ?
*▶️ मुफ्ती साहब :* काफिर तो न होगा हाँ हराम है।
▶️ *अब्दुल्लाह :* क्या हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रौजए अकदस को जालियों से ढकने की एक खास वजह यह है कि ताजीम बरकरार रहे और लोग ताजीमी सजटा न करने लगे।
*▶️ मुफ़्ती साहब :* हाँ।
*▶️ अब्दुल्लाह :* कुछ और वजाहत करें ?
▶️ *मुफ्ती साहब :* नमाज़ में काबे वाले को सजदा है काबे को नही और यह नमाज़ की शर्त है मकामे इब्राहीम पर दो रकआत नमाज़ नफ्ल पढ़ने का हुक्म है उस पत्थर को सजदे का हुक्म नहीं असहाने सुफ्फा पर नमाज़ पढ़ना बिला कराहत जाइज़ बल्कि लोगों का हुजूम लगा रहता है कि यहाँ नमाज़ पढ़ लें जब यह वह जगह है कि काबा और नमाज़ी के बीच में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का मज़ारे मुबारक है अगर यह ताज़ीमी सजदे होते तो हराम होते और इजाज़त न होती और इबादत का सजदा तो अल्लाह के सिवा किसी भी दूसरे को करना शिर्क कुफ्र है इसमें किसी को इख़लाफ़ है ही नहीं।
*▶️ अब्दुल्लाह :* हमने ख़ुद देखा है कि लोग मज़ारों को सजदा करते हैं इन्हें रोका क्यूँ नहीं जाता ?
*▶️ मुफ्ती साहब :* रोका तो जाता है मगर थू है ऐसी जहालत पर कि अल्लाह भी नाराज़ रसूल भी नाराज़ और साहिबे मज़ार भी नाराज मगर यह साहब नहीं मानते सारी अकीदत इसी में हैं झूटे हैं मक्कार हैं ऐसे लोग अल्लाह अपनी अमान में रखे। चन्द सिक्कों के बदले लोगों से यह हराम करवाते हैं जो कुफ्र तो नहीं लेकिन कुफ्र के बहुत नज़दीक और हराम हराम हराम है। क्या बताया जाए यही वह बद आमालियाँ हैं कि वहाबियों को हमें बदनाम करने का मौका मिलता है यहाँ हम अपने आपको बड़ा बेबस महसूस करते हैं। मेरा बस चले तो ऐसे लोगों को बाकायदा डंडा ले कर समझाऊँ। अल्लाह हिदायत दे।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 90,91)*
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✍🏻 *अंगूठे चूमना* ✍🏻
▶️ *अब्दुल्लाह :* कुछ लोग कहते हैं हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के नाम पर अंगूठे चूमना बिदअत है अल्लाह के नाम पर चूमते नहीं हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के नाम पर चूमते हो।
▶️ *मुफ्ती साहब :* पहली बात तो यही कि हमारा झगड़ा इस बात का है ही नहीं और अगर कोई अंगूठे नहीं चूमेगा तो इस्लाम से बाहर नहीं हो जाएगा। हुजूर पुर नूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का नामे नामी आने अज़ान में सुनने के वक्त या नमाज़ व कुरआन की तिलावत के वक्त के अलावा किसी भी वक्त अंगूठे या शहादत की उंगली आंखों से लगाना यकीनन जाइज़ व मुस्तहब है और बहुत ही रहमत व बरकत का जरिया है। इसक जाइज़ होने पर बहुत दलीलें और जाइज़ न होने पर कोई दलील नहीं और शरीअत ने जिस चीज़ को रोका नहीं वह मुबाह व जाइज़ है। मैंने हुक्म बयान कर दिया हवाले की ज़रूरत जब कभी पड़े दिखा दूंगा और हवाले की ज़रूरत जब ही पड़ेगी जब आप किसी से भिड़ पड़ें। और मेरी राय यह है कि जब तक मालूमात न हो बहस करने से बचें। फिर भी कोई समझना चाहे और ख्वामखाँ मुँह जोरी न करना चाहे तो जब चाहें मेरे पास ले आयें।
*हवाले नोट करें :*
1. कुरआने पाक की मशहूर तफ़सीर रूहुल बयान अल्लामा फ़ाज़िलुल कामिल अल शैख़ इस्माईल मक्की रहमतुल्लाहि तआला अलैह।
2. शैख इमाम अबू तालिब मुहम्मद इब्ने मक्की रहमतुल्लाह तआला अलैह की किताब कुव्वतुल कुल्लूब
3. इमाम सखावी रहमतुल्लाहि तआला अलैह ने कई हवालों से नक़ल किया है
4. अल्लामा शामी रहमतुल्लाहि तआला अलैह रहुल मुड़तार शरहे दुर्रे मुख्तार में
5. रईसुल फिकहुल हनफिया अल्लाहमा तहतावी रहमतुल्लाहि तआला अलैह शरहे मराकियुल फलाह में
6. मौलाना रूम रहमतुल्लाहि तआला अलैह मस्नवी शरीफ में और मुल्ला अली कारी रहमतुल्लाहि तआला अलैह भी।
अल्लामा शफ़ी उकाड़वी रहमतुल्लाहि तआला अलैह की किताब अंगूठे चूमने का मसअला में यह सारे हवाले और इससे भी ज़्यादा एक जगह हैं हो सके तो वहाँ से देख लें।
▶️ *अब्दुल्लाह :* क्या तिलावते कुरआन और खुतबे की अज़ान में भी अंगूठे चूमें जायें ?
▶️ *मुफ्ती साहब :* तिलावते कुरआन और ख़ुतबे की अज़ान में अंगूठे चूमना जाइज़ नहीं।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 91,92)*
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*📢 अज़ाने कब्र* 📢
*▶️ अब्दुल्लाह :* कुछ लोग दफ़न के बाद अज़ान देते हैं और कुछ लोग मना करते हैं हमें क्या करना चाहिए ?
▶️ *मुफ्ती साहब :* अगर अजान न दी जाए तो कोई गुनाह नहीं मगर अज़ाने कब्र जाइज़ है बाज़ उल्मा ने इसे सुन्नत भी कहा है। अज़ान के बहुत से फ़ायदे हैं और यहाँ जो फायदे मुर्दे को मिलेंगे वो ये हैं
1. शैतान कब्र में भी जाता है और सवाल जवाब के वक्त परेशान करता है लेकिन अज़ान सुनकर शैतान भागता है।
2. अज़ान में तीनों सवालों के जवाब आ जाते हैं और तीनों जवाब अभी अभी सुनने की वजह से जवाब देने में आसानी होती है।
3. अजान अल्लाह का जिक्र भी है लिहाज़ा अजान कहने पर अल्लाह की रहमत होती है शैतान को तकलीफ होती है।
4. अज़ान के फौरन बाद मांगी दुआ कबूल होती है लिहाजा हमारे यहाँ यह रिवाज डाला गया कि अजान के बाद फौरन फातिहा और दुआ होती है जो मगफिरत के लिए है (कब्र वाला कितना मुहताज है इस वक़्त दुआओं का इसाले सवाब यह हमें अगर रौशन हो जाए तो शायद हम गुनाहों से बाज़ आ जायें।
5. अजान ज़िक्रे खुदा है और इससे मुर्दे का दिल बहलता है कब्र जैसी वहशत की जगह अज़ान या किसी भी जाइज़ तरीके पर अल्लाह का जिक्र किया जाए तो मय्यत के लिए आसानी ही होगी।
6. अजान से मय्यत का गम दूर होता है कि ग़म दूर करने के लिए कान में अज़ान के लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मौला अली रदियल्लाहु तआला अन्हु से कहा।
कब्र पर अज़ान के और भी फायदे हैं। हमने यहाँ कई फायदे गिनवाए अब विरोधी इसके नुकसान गिनवाए शायद न गिनवा सकेगा हाँ बिदअत का झूटा राग ज़रूर अलापेगा। अल्लाह पाक तौफीक अता फरमाए अरे देने तो अज़ान ही तो है फितना मत फैलाओ।
▶️ *अब्दुल्लाह :* अज़ान में पहले और तीसरे सवालों के जवाब तो साफ हैं दूसरे सवाल का जवाब किस तरह है कि तेरा दीन क्या है इसमें दीने इस्लाम तो कहीं नहीं आता है,
*▶️ मुफ्ती साहब :* अजान नमाज़ की तरफ बुला रही है और दीने इस्लाम में नमाज़ है लिहाजा उसे याद आ जाएगा कि मैं दीने इस्लाम पर हूँ।
*▶️ अब्दुल्लाह :* जब अजान देने के लिए हमें हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने नहीं कहा तो हम अपनी तरफ से यह कह कर एक नया काम नहीं कर रहे हैं और इसी को यह लोग बिदअत कहते हैं ?
▶️ *मुफ़्ती साहब :* हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मना भी नहीं फरमाया बस यही दलील काफी है कि जब मना नहीं फरमाया तो इसमें हरज भी नहीं और जहाँ तक बिदअत का सवाल है तो में आपको बता चुका है कि बिदअत कई किस्म की होती है और अगर यह बिदअत भी है तो अच्छी कर बिदअत है।
▶️ *अब्दुल्लाह:* नमाज के अलावा और कर कब अजान देने का हुक्म है या देने से क्या फायदा है?
*▶️ मुफ्ती साहब :* कई जगह हुक्म है
1. बच्चा पैदा हो तो उसके कान में अजान कहे।
2. कहीं आग लग जाए तो अजान कही जाए आग बुझ जाएगी
3. आसेबी खलल को दफा करने के लिए आमेलीन सात दिन तक बलन्द आवाज़ से अजान पढ़ने का अमल बताते हैं।
4. गम दूर करने के लिए कान में अजान के लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मौला अली रदियल्लाह तआला अन्हु से कहा।
5. वबा फैलने के वक्त अजान देने को बुजुगों ने मुस्तहब कहा
*▶️ अब्दुल्लाह :* बस आख़री एतराज़ का जवाब दे दें कि हर अज़ान की नमाज़ है इस अज़ान की नमाज़ कब है ?
▶️ *मुफ्ती साहब :* जुमे में दो अज़ानें होती हैं जुमा पहली के लिए है या दूसरी के लिए। बेकार के एतराज़ निकालना शैतान ही का काम है।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 93,94)*
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▶️ *सलात* ▶️
▶️ *अब्दुल्लाह :* अज़ान के बाद सलाम पढ़ने का रिवाज सिर्फ हमारे यहाँ है ऐसा क्यूँ ?
▶️ *मुफ़्ती साहब :* सलात को मना करने वाला बताए कि कहाँ लिखा है कि मना है या बुरा है बस यही दलील इस मसअले के लिए ही नहीं बहुत से मसाइल के लिए काफ़ी है कि हमें मना नहीं किया गया और इसमें ग़लत क्या पढ़ते हैं लिहाजा जाइज़ है और अगर बिदअत कहा जाए तो बिदअते हसना है बुरी बिदअत नहीं जैसे रमजान की तरावीह के बारे में आया कि यह अच्छी बिदअत है।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 95)*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 62 🔰*
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🇫🇲 *ग्यारहवीं शरीफ* 🇫🇲
*✍🏻 अब्दुल्लाह :* ग्यारहवी, शरीफ के बारे में कुछ बतायें,
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* हर किस्म की न्याज मसलन तीजा, दसवाँ, चालीसवाँ, बरसी या उर्स या किसी भी बुजुर्ग की फ़ातिहा की अस्ल इसाले सवाब यानी बुजुर्गाने दीन या दूसरे मरे हुए मुसलमानों की रूह को सवाब पहुँचाना है। हर किस्म की फातिहा या न्याज़ में कुछ कुआन शरीफ़ और दुरूद शरीफ़ वगैरह पढ़ कर तमाम मुसलमानों को बख्शा जाता है। फिर अगर वह न्याज़ का खाना वगैरह किसी अल्लाह के वली के लिए है तो उस न्याज़ का खाना अमीर गरीबों आलिम जाहिल औरत मर्द सभी को जाएज़ है और अगर किसी आम मुसलमान का है तो बेहरत यह है कि मालदार आदमी उसको न खाए बल्कि सिर्फ़ गरीब मुसलमान औरत मर्द खायें। और अगर नजे शरई की मिन्नत मानी तो उसको भी सिर्फ गरीब ही खा सकाते हैं किसी अमीर को इस नजे शरई को खाना हरगिज़ जाएज़ नहीं।
🖌️ इसाले सवाब करने में किसी को इख़्तिलाफ़ भी नहीं। बदमज़हबों को इख़्तिलाफ़ यह है कि खाना सामने रख कर फातिहा न दो। उनका यह एतराज़ बेकार है। और इसका जवाब यह है कि फ़ातिहा आगे रख कर न दी जाए तो क्या पीछे या दायें बायें रख कर दी जाए या सर पर रख कर दी जाए। तीजा चालीसवाँ वगैरह के खाने से अमीर को बचना चाहिए हाँ चखना जाएज है और अगर फ़ातिहा करने वाले ने इस नियत से सबके लिए पकाया है कि गरीब अमीर सब खायें तो सबको खाना बिला कराहत जाएज़ है। हाँ वह लोग जो तीजे चालीसवें या फातिहा के खानों की तलाश में रहते हैं उनके इस खाने से उनके दिल स्याह होने का अन्देशा है।
🖌️ फातिहा के सुबूत के लिए हम यहाँ पर हुजूर गौसे आज़म का एक अमल जिक्र करते हैं जिससे इन्साफ पसन्द आदमी यह कहने पर मजबूर हो जाएगा कि फातिहा बिल्कुल जाएज़ है और फ़ातिहा को नाजाएज़ बताने वाले या तो वहाबी देवबन्दी कुफ्फार व मुरतद्दीन हैं या कम इल्मी गुमराह सुनो हज़रते इमाम याफ़िई रहमतुल्लाहि तआला अलैह अपनी किताब .कुर्रतुल ' नाज़िर में लिखते हैं कि एक मरतबा सरकार गौसे आजम रदियल्लाह तआला अन्ह ने जनाबे रसूले करीम रऊफ़ व रहीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का 11 तारीख को फातिहा दिलाया। हुजूर गौसे आज़म को वह न्याज सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को बहुत पसन्द आई इसलिए सरकार गौसे आजम रदियल्लाहु तआला अन्हु ने हर 11 तारीख को यह फातिहा मुकरर कर दी यानी सरकार गौसे आजम रदियल्लाहु तआला अन्हु हर 11 तारीख का अपने जद्दे करीम नबीए अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के नाम से फातिहा करने लगे। सरकारे गौसे आजम रदियल्लाहु तआला का अमल आहिस्ता आहिस्ता मुसलमानो में आपकी तरफ मन्सूब हो गया जिसको मुसलमानाने अहले सुन्नत ग्यारहवीं शरीफ कहने लगे जिसका मतलब यह है कि वह ग्यारहवीं जो नूर गौसे पाक किया करते थे। आज भी यह न्याज सरकारे गौसे आजम रदियल्लाहु तआला अन्हु की नियाज़ के नाम से मशहूर व मारूफ है और मुसलमान इसे बड़ी धूम धाम से करते हैं। सरकारे गौसे आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु को सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से ऐसे ही कुरबत और नज़दीकी है जैसे ग्यारहवीं को बारहवीं के साथ है और बारहवीं शरीफ़ भी दुनिया के तमाम मुसलमानाने अहले सुन्नत में उसी तरह मनाई जाती है जैसे ग्यारहवीं शरीफ़ मनाई जाती है।
🖌️ सरकारे गौसे आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु ग़रीबों, मेहमानों और सब ही को खूब खिलाया करते और रोज़ ही आपके यहाँ कितने ही भूकों को खाना खिलाया जाता और लंगर जारी रहता। गौसे आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु का फरमान भी है कि मैंने इतने मुजाहदात और रियाजात किए मगर जितना अज्र भुकों को खिलाने में पाया उतना किसी और अमल से न पाया अगर मुझे पहले मालूम होता तो मैं सारी जिंदगी भूकों को खाना खिलाता रहता।
🖌️ आजकल यह भी देखा जाता है कि न्याज़ से पहले लोग गाना बजाना या गैर - शरई कव्वाली वगैरह कराते हैं और बाज जगह तो नाच या टेलीवीजन भी देखे जाते हैं। यह सब यू भी हराम है और ऐसे मुबारक वक्त तो और ज्यादा। अल्लाह की पनाह। यह भी देखा गया है कि न्याज़ के वक्त गरीब का ख्याल नहीं रखा जाता और उसे झिड़का जाता है जबकि ऐसे मौके पर गरीब का हक ज्यादा है और यहाँ वह मकसद फौत हो रहा यानी न्याज़ का अस्ल मकसद तो गरीब को अच्छा खाना खिला कर उन्हें खुश करना है क्यूकि वह गरीब बेचारे अच्छा खाना कम पाते हैं और रहे अमीर व मालदार तो उनको तो अच्छे अच्छे खाने मिलते ही रहते हैं। इस मौके पर वह हज़रात भी अगर दिल की खुशी के साथ गरीबों के खिलाने में लग जायें और खुद अपना थोड़े खाने पर कनाअत कर लें तो उन हज़रात को भी सवाब मिलेगा।
*🖌️ तम्बीह :* हमारे मुसलमान भाइयों को चाहिए कि न्याज व फातिहा जब भी करें तो हराम पैसे से न करें। चाहे थोड़ा ही करें मगर जाएज़ पैसे से करें। मैं समझता हूँ आपके सवाल के जवाब में कुछ और भी ऐसी बातें आ गई जो आप सवाल करते। अल्लाह अपने हबीब कि सदके में मुसलामानों को बदआमालियों से बचाए।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 96,97)*
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*▶️ अब्दुल्लाह :* शबेबरात में हलवे बनाना, आतिशबाज़ी जलाना और रात भर जाग कर इबादत न करके कब्रस्तान में घूमते रहना कैसा है ?
*▶️ मुफ्ती साहब :* हलवे वगैरह किसी चीज़ पर नियाज़ देना इसाले सवाब का एक रूप है जो जाइज़ है। आतिशबाज़ी जलाना इबादत न करना इसे तो सभी बुरा ही कहते हैं और दोनों विला शक ओ शुबा हराम हैं। कब्रों की ज़्यारत करना सुन्नत है इसके बहुत फायदे हैं काश हम रोज़ मौत को याद करके अपने ईमान की फ़िक्र करते बल्कि हर वक्त करते तो शायद इतना वबाल भी न होता। अल्लाह का ख़ौफ़ और ईमान की फिक्र ही तो ख़त्म हो गई। शबे बरात में रात भर जाग कर इबादत करना चाहिए। इस रात दो रकआत नमाज़ पढ़ने का 400 बरस की भी इबादत से ज़्यादा सवाब है. और दूसरे दिन रोज़ा रखने का भी बहुत बड़ा सवाब है।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 98)*
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*✍🏻 अब्दुल्लाह :* कुंडों की नियाज़ के बारे में बताये ?
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* हज़रते इमाम जाफ़र सादिक रदियल्लाहु तआला अन्हु के लिए ईसाले सवाब करना इसमे हरज ही क्या है और अगर न दिलाए तो कोई गुनाह नहीं न ही इस्लाम से बाहर हुआ जाता है।
हाँ नियाज़. तो दिलाए मगर नमाज़ न पढ़े कज़ करे यह बहुत बुरा है मगर फिर भी नियाज़ जैसे अमल से रोका नहीं जाएगा
और रोकना वहाबियों की पहचान बन चुका है।
27 रजब के रोजे का भी बहुत बड़ा सवाब है।
इस दिन रोजे भी रखना चाहिए
*✍🏻 अब्दुल्लाह :* कुछ लोग कहते हैं कि यह तो राफजियों की तरह है और उनसे मुशाबेहत है ?
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* हज़रते इमाम जाफ़र सादिक रदियल्लाहु तआला अन्हु हमारे हैं राफ़ज़ियों के नहीं। राफजी जो हरकतें करते हैं वह हज़रते इमाम जाफ़र सादिक रदियल्लाहु तआला अन्हु का रास्ता हरगिज़ नहीं। राफ़ज़ियों पर उनकी लानत है।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 98)*
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✍🏻 *अब्दुल्लाह :* आम कब्र पर चादर नहीं चढ़ाते और किसी बुजुर्ग की कब्र यानी मज़ार पर चढ़ाते हैं क्युं ?
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* ताकि बुजुर्गों की कब्र दूसरी आम को कब्रो से अलग मालूम हो और लोग मज़ार को पहचान कर उसका अदब एहतेराम करे और फातिहा पढ़ें और फैज़ हासिल करे।
*✍🏻 अब्दुल्लाह :* कुछ लोग चादर चढ़ाने के लिए बाकायदा ढोल बाजे के साथ जाते हैं और कब्र पर रख कर फातिहा देते हैं ?
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* ढोल बाजे यूँ ही हराम हैं कब्र पर रख कर फातिहा देना मना कब्र से हट कर देना चाहिए। चूंकि जाहिल भी बुजुर्ग की कब्र का एहतराम करते हैं एक आम कब्र का नहीं इसलिए बुजूर्गो की कब्र पर चादर जाइज़ है
कब्र पर को जाहिल मजार पर बैठ कर जुआ न खेलेंगे गालियाँ न बकेंगे वगैरह।
✍🏻 *अब्दुल्लाह :* मज़ार पर एक ही चादर चढ़ाना चाहिए जब तक पहली चादर ख़राब न हो जाए दूसरी नहीं चढ़ाना चाहिए क्या यह सही है ?
✍🏻 *मुफ्ती साहब :* हाँ सही है। लेकिन अगर चादर उतार कर गरीबों और मिस्कीनों में तकसीम कर दी जाती हो तो जल्दी नई चादर चढ़ाना जाइज़ है।
✍🏻 *अब्दुल्लाह :* अगर दौलतमन्द सज्जादानशीन के यहाँ चादर चली जाती हो या वही चादर फिर से दुकानदार के पास चली जाती हो तो यह सब जाइज़ है क्या ?
✍🏻 *मुफ्ती साहब :* नहीं। लेकिन अगर दो दौलतमन्द सज्जादानशीन उस चादर को गरीबों को दे देता हो तो ऐसा करना ठीक होगा। लेकिन बार बार उसी चादर को ला लाकर बेचने का धंधा बना लेना कतई ग़लत एक आम आदमी भी इसे ग़लत ही बताता है।
✍🏻 *अब्दुल्लाह :* लेकिन ऐसा होता है ?
✍🏻 *मुफ्ती साहब :* होता तो पता नहीं क्या क्या है जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। शरीअत का हुक्म सबके लिए एक सा हे हिसाब तो अल्लाह को देना है जरा जरा सी चीज़ का हिसाब देना होगा आजकल के खादिम मुजावेरीन को अल्लाह तौफीक अता फरमाये।
✍🏻 *अब्दुल्लाह :* मुसलमान की कब्र पर फूल डालना कैसा है ?
✍🏻 *मुफ्ती साहब :* हर मुसलमान चाहे वह गुनहगार हो उसकी कब्र पर फूल डालना जाइज़ है कि हदीस से साबित कि फूल या पत्ती या पेड़ की टहनी जब तक तर रहती है अल्लाह की तसबीह करती है और अल्लाह के जिक्र से रहमत नाज़िल होती है जो गुनहगार के लिए बड़ा फायदे की है।
✍🏻 *अब्दुल्लाह :* कब्र पर अगरबती चराग या खुशबू लगाना कैसा?
✍🏻 *मुफ्ती साहब :* खुशबू जाइज़ है अगरबत्ती या चराग कब्र पर जाइज़ नहीं हाँ थोड़ा दूर पर लगाना जाइज़ है। कब्र या मजार के करीब ना लगाए।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 99,100)*
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*● अब्दुल्लाह :* बाज़ लोग कहते हैं कि फुला दरख्त पर शहीद मर्द है और फिर वहाँ फातिहा वगरह दिलाते हैं हार लटकाते हैं लोभान सुलगाते हैं मुरादें मानते हैं ऐसे लोग हक पर है क्या?
*● मुफ्ती साहब :* यह सब वाहियात व खुराफात और जाहिलाना बेवकूफियों और झूट व बकवास है हमें ऐसे लोगों को इन कामों से मना करना चाहिए।
*● अब्दुल्लाह :* कुछ लोग कब्र के पास कुरआनख्वानी कराते हैं और पढ़ने वाले को उजरत भी दी जाती है क्या सवाब मिलेगा या इसे बख़्श सकते हैं ?
*● मुफ्ती साहब :* कुरआन पर [ उजरत ] क़ुरआन पढ़ने का पैसा 【मजदूरी】लेना नाजाइज़ और नाजाइज काम पर सवाब नहीं और जब सबाब मिला ही नहीं तो मय्यत को बख़्शना कैसा।
*● अब्दुल्लाह :* पुख्ता कब्र बनाना कैसा है ?
*● मुफ्ती साहब :* मय्यत के आस पास पुख्ता न हो *【यानी नींव इतनी गहरी न हो कि मय्यत के बिल्कुल नजदीक ना हो】* मय्यत से ऊपर का हिस्सा पुख्ता कर दें तो हर्ज नहीं।
*● अब्दुल्लाह :* वलियों को कब्र का बोसा देना तवाफ़ करना या सजदा करना कैसा है ?
*● मुफ़्ती साहब :* काबए मुअज्जमा के अलावा किसी का तवाफ जाइज़ नहीं। चूमना मना कि चार हाथ दूर खड़े होकर हाजिरी दे फातिहा पढे। सजदा हराम चाहे ताज़ीम के तौर पर हो इबादत को नियत से करेगा तो काफ़िर हो जाएगा। अल्लाह महफूज रखे लोग बाज़ नहीं आते कितना ही समझाओ सारी अकीदत इन्हीं कामो में है साहिबे मज़ार क्या इन बातों से खुश होंगे अरे उन्हें खुश करना है तो याद रखिए कि जितना आप शरीअत की पाबन्दी करेंगे उतना ही यह खुश होंगे, अल्लाह के वलियों ने सारा जिन्दगी शरीअत की तो पाबन्दी ही की है और इसी से इस मकाम पर पहुँचे हैं काश हम समझ पाते तो क्या ही अच्छा होता विरोधी को भी हमें कहने का मौका नहीं मिलता साहिबे मज़ार भी खुश अल्लाह रसूल भी खुश।
*● अब्दुल्लाह :* वालिदैन की कब्र को बोसा देना भी मना क्या ?
*● मुफ्ती साहब :* वालिदैन की कब्र को बोसा देना जाइज।
*● अब्दुल्लाह :* फर्जी कब्र बना कर उस पर उर्स फातिहा करना कैसा है ?
*● मुफ्ती साहब :* हराम सख्त हराम और यही वो बदआमालिया है जो हमें कमजोर करती और नीचा दिखाती हैं और इनसे वहाबियों को भोले मुसलमानों को बहकाने के लिए मसाला मिलता है अल्लाह महफूज़ रखे।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 100,101)*
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*● अब्दुल्लाह :* औरतों का मज़ार पर जाना कैसा ?
● *मुफ्ती साहब :* रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मज़ारे पाक के अलावा औरतों को मजार पर जाने की इजाज़त नहीं ख़ास तौर पर इस दौर में कि फ़ितनों का दौर है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया उन औरतों पर अल्लाह की लानत है जो कब्र पर जायें।
● *अब्दुल्लाह :* लानत होती है ?
*● मुफ्ती साहब :* हाँ साहिवे मज़ार की लानत फ़िरिश्तों की लानत भी।
*● अब्दुल्लाह :* कव्वाली का हुक्म बतायें ?
*● मुफ्ती साहब :* मुख़्तसर यह कि गैर शरई कव्वाली नाजाइज़ है और अगर महफिले सिमा के आदाब पायें जायें तो जाइज़ है मसलन जो म्यूज़िक मना हो उससे पाक हो, सुनाने वाला मर्द कामिल हो ओरत या बच्चा न हो, सुनने वाला यादे ख़ुदा से ग़ाफ़िल न हो, जो कलाम पढ़ा जाए फोहश बेजा बेहयाई मस्खरगी न हो बूजा अश्आर न हों।
*● अब्दुल्लाह :* फ़िल्मी गानों की तरज़ पर नातें पढ़ना कैसा है ?
*● मुफ़्ती साहब :* बिल्कुल मना है ऐसे लोगों को चाहिए कि ऐसे लोगों से हम्द व नातं वगैरह न सुने
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 101)*
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*👑 अब्दुल्लाह :* रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मज़ारे पाक की हाज़िरी के आदाब बतायें कि यह सबसे बड़ा मज़ारे पाक है और जब हज करने जाते हैं तो वह लोग भी जाते हैं जो मज़ारात पर जाने का इन्कार करते हैं ? और ज़रा तफसील से बयान करें कि हाजरी के वक़्त किस हद तक अदब करना चाहिए वगैरह वगैरह।
*👑 मुफ्ती साहब :* बहुत अच्छा सवाल है ज़रा तफ़सीली जवाब सुनें जब अल्लाह व रसूल का ख़ास करम हो और हाजिरी नसीब हो तो आदाब कुछ इस तरह हैं : पूरा यकीन जानो कि वह हमें देख रहे हैं और ऐसे ही जिन्दा हैं जैसे अपनी हयात में जिन्दा थे। नबियों को बस एक आन के लिए मौत आती है तमाम नबी जिन्दा हैं। वह हमारे दिलों के हाल से वाकिफ हैं। इन्तिहाई अदब में डूबे हुए गर्दन झुकाये, आँखें नीची किये, लरजते, काँपते, गुनाहों की नदामत (शर्मिन्दगी) से पसीना - पसीना होते हुजर पुरनूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के अफ्व व करम की उम्मीद रखते हुजूर की पाएंती शरीफ यानी पूरब की तरफ से मुवाजहए आलिया में हाज़िर हो कि हुज़ूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मजारे अकदस में किल्ला की तरफ चेहरा अन्नवर किये हुए जलवा फरमा हैं, उस सम्त से हाज़िर होता हुजूर अकदल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की निगाह बेकस पनाह तुम्हारी तरफ होगी और यह बात तुम्हारे लिए दोनों जहाँ में काफी है, अलहम्दुलिल्लाह। अब कमाले अदब व हैबत व खौफ व उम्मीद के साथ कम से कम चार हाथ के फास्सिले से किब्ला को पीठ और मज़ारे अनवर को मुंह करके नमाज़ की तरह हाथ बाँधे खड़े हो लुबाब व शरहे लुबाब व इख्तियार शरह मुख्तार व फतावा आलमगीरी वगैरा मोतबर किताबों में इस अदब के बारे में साफ - साफ लिखा है कि हुजूर के सामने ऐसा खड़ा हो जैसा नमाज में खड़ा होता है) यह इबारत आलमगिरी व इख़्तियार की है और लुबाब में फरमाया दस्तबस्ता दहना हाय बायें पर रख कर खड़ा हो। खबरदार ! जाली शरीफ को बोसा देने या हाथ लगाने से बचो कि अदब के खिलाफ है बल्कि चार हाथ फासिले से ज्यादा करीब न जाओ। यह उनकी रहमत क्या कम है कि तुम को अपने हुजूर बुलाया अपने मुवाजहए अकदस यानी मजार शरीफ़ के बिल्कुल सामने जगह बख्शी ! उनकी रहमत और निगाहे करीम अगर्चें हर जगह तुम्हारी तरफ थी अब खुसीसियत और इस दर्जा कुर्ब (नजदीकी) के साथ है, अल्हल्लिल्लाह ! अल्हम्दुलिल्लाह ! अब दिल की तरह तुम्हारा मुंह भी उस पाक जाली की तरफ हो गया जो अल्लाह तआला के महबूबे अजीमुश्शान सल्लल्लाह अनैहि वसल्लम की आरामगाह है, निहायत अदब व वकार के साथ, गमगीन व दर्द भरी हुई आवाज व निहायत शर्मिन्दा दिल और फटे हुए जिगर के साथ दरमियानी आवाज़ से, न इतनी बलन्द व सख्त हो क्यूकि उनके हुज़र आवाज़ बलन्द करने से अमल अकारत (बर्बाद हो जाते हैं, न बिल्कुल नर्म व पसात (हल्की) कि सुन्नत के खिलाफ है, अगर्चे वह तुम्हारे दिलों के खतरों तक से आगाह हैं जैसा कि अभी तसरीहाते अइम्मा गुजरा, मजरा व तस्लीम बजा लाओ यानी अदब के साथ दुरूद व सलाम अर्ज करो
जहाँ तक मुमकिन हो, और जबान साथ दे और सुस्ती न हो दुरूद व सलाम खूब पढ़ो। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से अपने और अपने माँ, बाप, पीर, उस्ताद, औलाद व अज़ीज़ों, दोस्तों और सब मुसलमानों के लिए शफाअत मांगो और बार - बार अर्ज करो :
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं.68 का दूसरा भाग 🔰*
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👑 *तर्जमा :* या रसूलल्लाह ! मैं हुजूर से शफ़ाअत मांगता हूँ। फिर अगर किसी ने सलाम अर्ज करने की वसीयत की तो बजा लाओ यानी उसकी तरफ से सलाम अर्ज करो कि शरअन इसका हुक्म है। फिर अपने दाहिने हाथ यानी पूरब की तरफ़ हाथ भर हट कर हज़रते सिद्दीके अकबर रदियल्लाहु तआला अन्हु के चेहरए नूरानी के सामने खड़े हो कर सलाम अर्ज करो। फिर उतना ही और हट कर हज़रते फारूके आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु के रूबरू (सामने) खड़े होकर सलाम अर्ज करो। ये सब हाज़रियाँ दुआएं कबूल होने की जगह हैं,. दुआ में कोशिश करो। दुआए जामे करो और दुरूंद पर कनाअत बेहतर है। फिर मिम्बरे अतहर के करीब दुआ फिर जन्नत की क्यारी में (यानी जो जगह मिम्बर व हुजरए मुनव्वरा के दरमियान है उसे हदीस में जन्नत की क्यारी फरमाया) आकर मकरूह वक़्त न हो तो दो रकअत नफ़्ल पढ़ कर दुआ करो। यूँही मस्जिद शरीफ़ के हर सुतून के पास नमाज़ पढ़ो दुआ मांगो कि महल्ले बरकात (बरकतें नाज़िल होने की जगह) हैं खुसूसन बाज़ सुतूनों में ख़ास खुसूसियतें हैं। जब तक मदीना तय्यिबा की हाजिरी नसीब हो एक साँस बेकार न जाने दो ज़रूरियात के सिवा अक्सर वक्त मस्जिद शरीफ़ में बा - तहारत और बा - वुजू हाज़िर रहो नमाज व तिलावत व दुरूद में वक़्त गुज़ारो दुनिया की बात किसी मस्जिद में न चाहिए न कि यहाँ। हमेशा हर मस्जिद में जाते वक्त एतिकाफ की नीयत कर लो (एतिकाफ़ के मअना हैं मस्जिद में बिलकस्द नीयत करके ठहरना इसलिए कि ज़िक्रे इलाही करूँगा) यहाँ तुम्हारी याददिहानी ही, को, दरवाजे से बढ़ते ही यह लिखा हुआ मिलेगा यहाँ हर नेकी एक की पचास हजार लिखी जाती है रौज़ए अनवर पर लिहाज़ा इबादत में ज्यादा कोशिश करो। नज़र करना भी इबादत है जैसे कअबए मुअज्जमा या कुरआन मजीद का देखना तो अदब के साथ उसकी कसरत करो और दुरूद व सलाम अर्ज करो। पंजगाना या कम से कम सुबह व शाम मुवाजहा शरीफ में सलाम अर्ज करने के लिए हाजिर हो।
शहर में या शहर से बाहर जहाँ कहीं गुम्बदे मुबारक पर नज़र पड़े फौरन दस्तबस्ता उधर मुँह करके सलात व सलाम अर्ज करो बे इसके हरगिज़ न गुज़रों कि अदब के ख़िलाफ़ है। जहाँ तक हो सके कोशिश करो कि मस्जिदे अव्वल यानी हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ज़मानए मुबारका में जितनी थी उस में नमाज़ पढ़ो और उसकी मिकदार सौ हाथ लम्बाई व सौ हाथ चौड़ाई है अगर्चे बाद में कुछ इज़ाफ़ा हुआ है उसमें नमाज़ पढ़ना भी मस्जिदे नबवी ही में कब्रे करीम को हरगिज़ पीठ न करो और जहाँ तक हो सके नमाज़ में भी ऐसी जगह न खड़े हो कि पीठ करनी पड़े। रौज़ए अनवर का न तवाफ़ करो न सज्दा न इतना झुकना कि रुकू के बराबर हो, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ताजीम उनकी इताअत में है। शायद तफ़सील ज़्यादा ही हो गई है बस उस बारगाह का बड़ा अदब है और वहाँ जाकर क्या कैफ़ियत होती है यह सबका मामला अलग है सारा दारोमदार महब्बत और इश्के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर है।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 102,103,104)*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 69 🔰*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम*
*✍🏻 अब्दुल्लाह :* जैसा कि आपने बताया कि वहाबी दीन से ख़ारिज और मुरतद हैं इनसे दूर रहना चाहिए। तो जरा इस बारे में थोड़ा तफ़सील से बतायें कि काफ़िरो की कितनी किस्में होती हैं और यह कौन से काफ़िर होते हैं ?
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* इन्सान दो तरह के होते हैं मुसलमान और काफ़िर फिर काफ़िर भी दो तरह के होते हैं काफ़िर असल्ली काफ़िर मुरतद। काफ़िर असली वह काफ़िर है जो शुरू से हो कलमए इस्लाम को न मानता हो जैसे दहरिया, मजूसी, मुशरिक और यहूद व नसारा वगैरह। काफ़िर मुरतद भी दो तरह के होते हैं। मुरतद् मुजाहिर और मुरतद मुनाफिक। मुरतद मुजाहिर वह काफ़िर है कि जो पहले मुसलमान था अब खुल्लम खुल्ला इस्लाम से फिर गया और कलमए लाइलाहाइल्लल्लाह का इन्कार कर के दहरिया, मुशरिक, मजूसी या किताबी वगैरह कुछ भी हो गया। मुरतद मुनाफिक वह काफ़िर है जो कलमए लाइलाहाइल्लल्लाह अब भी पढ़ता है अपने आप को मुसलमान ही कहता है मगर खुदा वन्दे कुद्दूस, हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम या किसी नबी की तौहीन करता है या दीगर जुरूरियाते दीन में से किसी बात का इन्कार करता है। काफ़िरों में सबसे बुरा यही मुरतद मुनाफ़िक है जो मुसलमान बन कर कुफ्र सिखाता है और अल्लाह व रसूल जल्ला जलालुह व सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को गालियों देता है... अल अयाजु बिल्लहि तआला... सही मुसलमान वह है जो जुरूरियाते दीन को मानने के साथ साथ तमाम जरूरियाते अहले सुन्नत को मानत हो और गुमराह मुसलमान वह बदमज़हब है जो जुरूरियाते अहले सुन्नत में से किसी बात का इन्कार करता हो मगर उसकी बदमज़हबी कुफ्र की हद तक न पहुँची हो। मुनाफ़िकों से मुताल्लिक कुरआन में बहुत आयात आई हैं और मुरतद का हुक्म भी कुरआन में है! और आजकल के वहाबी मुरतद हैं।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 104,105)*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 70 🔰*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (2)*
✍🏻 *अब्दुल्लाह :* इनके लिए हदीसों में क्या हुक्म आया है क्या इनको सारी इबादतें बेकार हैं यह तो बहुत नमाजे तबलीग वगैरह करते हैं क्या सब बेकार ? कुछ लोग कहते हैं सब से मिल कर रहना चाहिए वरना काफ़िर हम पर गालिब आ जायेंगे अखलाक भी कोई चीज होती है जरा हदीस की रोशनी में ऐसे लोगों के बारे में बतायें जो वाकई अल्लाह रसूल की तौहीन करके मुरतद हो गए ?
✍🏻 *मुफ़्ती साहब :* यहाँ चन्द हदीसें सुनाता हूँ ये हदीसें उन लोगों का मुँह बन्द कर देती हैं जो सुलहकुली की किस्म से हैं और जबरदस्ती इत्तेहाद काएम करना चाहते हैं। ये हदीसें साफ़ बता रहीं हैं कि मुरतद के साथ शरीअत ने कोई समझौता नहीं रखा
*हदीस न. 1 : -* हज़रते हुज़फ़ा रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि ख़ुदाए तआला किसी बदमजहब का न रोज़ा कबूल करता है न नमाज़ न जकात न हज न उमराह न जिहाद और न कोई नफ्ल न फ़र्ज। बदमजहब दीने इस्लाम से ऐसा निकल जाता है जैसे गुंधे आटे से बाल निकल जाता है।
*📚 (इब्ने माजा)*
*हदीस न. 2 : -* हुजूर नूरे मुजस्सम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि अगर कोई बदमज़हब मसलए तकदीर को झुटलाने वाला हज्रे असवद् और मकामे इब्राहीम के दरम्यान मज़लूम कत्ल किया जाए और अपने इस मारे जाने पर वह साबिर व तालिबे सवाबे खुदा रहे जब भी अल्लाह अज्जावजल्ला उसकी किसी बात पर नज़रे करम न फरमाए यहाँ तक कि उसे जहन्नम में डाले।
*हदीस न. 3: -* हज़रते इब्राहीम इब्ने मयसरह रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत हैं कि रसुले करीम अलैहिस्सलात वत्तसलीम ने फरमाया कि जिसने बदमज़हब की इज़्ज़त की उसने इस्लाम के ढाने पर मदद की।
*📚 (मिश्कात शरीफ़)*
*हदीस न. 4 :* हज़रते अबू हुरैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि खसल्ल्म ने हुक्म फरमाया कि बदमज़हब अगर बीमार पड़े तो उसे देखने न जाओ अगर मर जाए तो उसके जनाजे में शरीक न हो, उससे भेंट हो तो उससे सलाम न करो, उनके पास न बैठो, उनके साथ पानी न पियो, उनके साथ खाना न खाओ, उनके साथ शादी ब्याह न करो, उनके जनाज़े की नमाज़ नं पढ़ो। (यह हदीस मुस्लिम, अबू दाऊद, इब्ने माजा, उकैली और इब्ने हब्बान की रिवायतों का मजमूआ है)
*हदीस न. 5 : -* अबू दाऊद में है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि तमाम कामों में सबसे अफ़ज़ल अमल अल्लाह अज्जावजल्ला के वास्ते दोस्ती रखना और अल्लाह अज्जावजल्ला के वास्ते दुश्मनी रखना है।
*हदीस न. 6 :* तिर्मिज़ी शरीफ़ में हज़रते मआज इब्ने अनस रदियल्लाहु तआला अन्हु से रावी जनाब रिसालत मआब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि जिसने दिया अल्लाह के वास्ते और देने से इन्कार किया अल्लाह के वास्ते और ईमान वालों से अल्लाह के लिए दोस्ती की और बदमज़हबों और बद्दीनों से अल्लाह के वास्ते दुश्मनी रखी तो बेशक उसने अपने ईमान को कामिल कर लिया।
*हदीस न. 7* दार .कुतनी में हुजूर महबूबे मुहतरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि अनकरीब मेरे बाद एक जमाअत रूनुमा होगी उनके लिए एक बुरा लकब होगा उनको राफ़ज़ी कहा जाएगा तो ऐ अली तुम अगर उनको पाना उनसे जंग करना इसलिए कि वो हैं। हज़रते अली रदियल्लाहु तआला अन्हु ने फ़रमाया मैंने अर्ज की या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम उस कौम का नाम तो आपने बता दिया है उसकी पहचान भी बता दें। हुजरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया उनकी पहचान ये है कि तुम्हारी तारीफ़ ऐसी करेंगे जो तुममे नहीं हैं (जैसे नबी से अफ़जल होना या आपको ख़िलाफ़त का पहला हक़दार जानना) और अगलों यानी पहले तीन खलीफाओं पर तअन करेंगे।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 105,106)*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 71 🔰*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (3)*
✍🏻 *अब्दुल्लाह :* हदीसें तो बहुत सख्त हुक्म बता रही हैं ऐसे तो मिलना जुलना बड़ा मुश्किल हो जाएगा
✍🏻 *मुफ्ती साहब :* जो शख्स अभी इस हद तक नहीं पहुँचा कि अल्लाह व रसूल की तौहीन करके मुरतद हो गया उसे बहुत प्यार से दलाइल के साथ समझाना चाहिए इन्शा अल्लाह समझ जाएगा और जो सब कुछ जानने के बावजूद उन्हीं की हाँ में हा मिलाए उसके लिए कुरआन व हदीस में बहुत सख्त हुक्म और इन हदीसों का खुलासा यह है कि जब यह साबित हो ले कि कोई शख्स वाकई मुरतद है तो उसके साथ निम्न बर्ताव करने का शरीअत ने हुक्म फ़रमाया फिर याद रखिए जब सब तहकीक हो ले कि वह मुरतद् है तब निम्न हुक्म हैं जो .कुरआन और हदीसों से साबित हैं : उससे सलाम कलाम हराम, मेलजोल हराम, बीमार पड़े तो उसकी इयादत को जाना हराम, मर जाए तो उसके जनाजे में शिरकत हराम, उसे मुसलमानों के कब्रस्तान में दफ़नाना हराम, मुसलमानों की तरह उसकी कब्र बनाना हराम, उसे मिट्टी देना हराम, उस पर फातिहा हराम, उसे कोई सवाब पहुँचाना हराम बल्कि खुद कुफ्र व कातेए इसलाम, उससे निकाह हराम, उसके हाय का जबीहा हराम, गरज़ वह शख्स सख्त काबिले नफरत है।
✍🏻 *अब्दुल्लाह :* बड़े सख्त अहकाम बयान फ़रमा दिए आपने।
✍🏻 *मुफ्ती साहब :* अभी और सुनिए जो शख्स मुरतद हो जाए उसकी औरत हराम हो जाती है, फिर इसलाम लाए तो उससे दुबारा निकाह किया जाए इससे पहले उस कलमए कुफ्र के बाद की सोहबत से जो बच्चा होगा हरामी होगी, और यह रास अगर आदत के तौर पर कलमा पढ़ता रहे कुछ फायदा न देगा जब तक अपने इस कुफ्र से तौबा न करे कि आदत के तौर पर मुरतद के कलमा पढ़ने से उस का कुफ्र नहीं जाता। और जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम या किसी नबी की शान में गुस्ताखी करे दुनिया में बाद तौबा भी उसे सज़ा दी जाएगी यहाँ तक कि अगर नशे की बेहोशी में कलमा गुस्ताख़ी बका जब भी माफ़ी न देगें। और तमाम उलमाए उम्मत का इजमा है कि नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शान - ए - अकदस में गुस्ताख़ी करने वाला काफ़िर है और काफिर भी ऐसा कि जो उसकी कुफ्र में शक करे वह भी काफ़िर है। मुरतद की औरत को इख्तियार है कि इद्दत के बाद जिससे चाहे निकाह करे।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 107)*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 72 🔰*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (5)*
*📝 अब्दुल्लाह :* कुछ लोग कहते हैं बल्कि कुछ मुरतद मुसलमानों को इस तरह बहकाते हैं कि वह भी कुरआन पढ़ रहा है वह भी कुरआन पड़ रहा है लिहाज़ा नमाज़ हो जाएगी नमाज़ सब के पीछे पढ़ लेना चाहिए।
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* याद रखो ऐसा हरगिज़ नहीं। नमाज़ कोई हंसी खेल नहीं अल्लाह की सबसे बेहतर इबादत है। अब ज़रा अकल से सोचो मुसलमानों कि तुम ज़रा सा किसी में ऐब देखते हो तो उसके पीछे नमाज़ पढ़ना गवारा नहीं करते, क्या किसी दाढ़ी मुड़ें के पीछे नमाज़ पड़ते हो (जबकि दाढ़ी मुंडाना छोटा ऐब नहीं) या उस शख्स के पीछे तुम्हें नमाज़ पढ़ना गवारा होता है जो तरह तरह के गुनाहों में मुलब्बिस हो जबकि वह मुसलमान हो तो कैसे तुम्हें उसके पीछे नमाज गवारा है जो अल्लाह और उसके रसूल की तौहीन करता है। क्या को ईसाइ, यहूदी या हिन्दू नमाज़ याद करके नमाज़ पढ़ाने खड़ा हो जाए तो तुम नमाज़ उसके पीछे पढ़ोगे, हरगिज़ नहीं यूंही अगर तुम्हें मालूम किं फलां शख्स मुरतद है यानी सिर्फ़ ज़ाहिर का मुसलमान है तो क्या उसके पीछे नमाज़ पढ़ोगे हरगिज़ नहीं। याद रखो मुरतद के पीछे नमाज़ नहीं बल्कि उसे इमामत के काबिल जानना कुफ़ है जबकि उसकी बदमज़हबियत हदे कुफ़्र तक पहुँच गई हो। यहाँ एक और बात बड़ी हैरत की है कि सुन्नी तो अलल ऐलान वहाबी मुरतद के पीछे नमाज़ नहीं पढ़ता मगर वहाबी हमारे पीछे नमाज़ पढ़ने से परहेज़ नहीं करता जबकि वह हमें कब्र का पूजने वाला मुशरिक और बिदअती न जाने क्या क्या समझता है। अरे अगर हम मुशरिक और बिदअती हैं तो हमारे पीछे नमाज़ क्यूँ पढ़ते हो, हमसे अपने मुर्दे की नमाज़ क्यूँ पढ़ाना चाहते हो, तुम्हें यह कैसे गवारा है कि तुम्हारे मुर्दे के लिए दुआ एक मुशरिक और बिदअती करें यह सब सुन्नियों को धोके देने के नए - नए तरीके हैं। यह हमारे सामने यह जताना चाहते हैं कि हम तुम एक हैं और इस तरह ईमान को लुटना इनके लिए आसान होगा।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 108)*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (6)*
*📝 अब्दुल्लाह :* कुछ लोग कहते हैं कि हरम शरीफ़ के इमाम के पीछे नमाज न पढ़ो वह वहाबी हैं ?
*✍🏻 मुफ़्ती साहब :* हाँ वहाँ नजदियों वहाबियों की हुकूमत है इसलिए ऐसा कहते हैं। इसको यूँ समझइये कि अगर कोई बदमज़हब दुनिया के किसी कोने में भी इमाम बन कर खड़ा हो जाए तो क्या आप नमाज़ उसके पीछे पड़ेंगे और आसान मिसाल यह है कि क्या राफजी जो हज करने आते हैं उनके पीछे आप नमाज़ पढ़ना गवारा करते हैं हरगिज़ नहीं।
*📝 अब्दुल्लाह :* सुना है कि हदीस में है कि अरब में काफिर नहीं होंगे और वहाँ वहाबियों की हुकूमत है तो मालूम हुआ कि वह मुसलमान हैं लिहाज़ा अगर वहाबी काफ़िर है तो उनकी इस बात का जवाब क्या है ?
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* हदीस शरीफ में यह हर्गिज़ नहीं आया कि अरब में काफ़िर नहीं होंगे बल्कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने तो वह फरमाया कि शैतान इस बात से मायूस हो गया है कि मोमिन जज़ीरए अरब में उसकी इबादत करें यानी बुतपरस्ती में मुबतला रहें। अब बताइयें इसका साफ मतलब यह है कि जज़ीरए अरब में बुतपरस्ती न होगी या वह मतलब है कि वहाँ काफ़िर न जाएगा। अगर कोई यह कहे कि वहाँ कोई कैसे मुरतद हो सकता है तो उसका जवाब यह है कि यह तो पहले भी हुआ मुसलमान कज्जाब मुरतद हुआ, कुछ लोग ज़कात का इन्कार करके मुरतद हुए, अबू ताहिर करमती हिजरी 320 में मुरतद हुआ और हिजरी 654 में मदीने शरीफ़ पर राफ़ज़ियों का कब्जा हुआ। तो साबित यह हुआ कि काफ़िर या मुरतद तो हो सकेंगे मगर वहाँ बुतों की पूजा कभी न होगी।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 109)*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (7)*
*● अब्दुल्लाह :* मुरतद अगर मर जाए तो उसकी नमाज़ जनाज़ा न पढ़नी चाहिए ?
*● मुफ्ती साहब :* हरगिज़ नहीं। ईमान जाने का पूरा ख़तरा है।
● *अब्दुल्लाह :* क्या वहाबी मुरतद देवबन्दी की नमाजे जनाजा पढ़ने से नए सिरे से कलिमा पढ़ना और निकाह जरूरी हो जाता है ?
*● मुफ्ती साहब :* जो शख्स किसी के दबाव, लिहाज़ या चापलूसी मैं देवबन्दी के जनाज़े की सफ में खड़ा हो जाता है लेकिन नमाज़ की नियत न करे तो उसका तौबा करना ज़रूरी है और जो मुसलमान समझ कर उसकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ उस पर नए सिरे से कलिमा पढ़ना और निकाह जरूरी हो जाता है।
● *अब्दुल्लाह :* मुरतद अगर जानवर ज़िबाह करे तो उसके खाने का क्या हुक्म है ?
● *मुफ्ती साहब :* मिस्ल मुर्दार के है खाना हराम है।
● *अब्दुल्लाह :* बकरीद में जगह जगह से गोश्त आता है क्या किया जाए ?
● *मुफ़्ती साहब :* अव्वलन तो मुरतद के घर का लेना ही नहीं चाहिए अगर किसी दबाव या लिहाज़ में ले भी लिया तो उसे हलाल गोश्त में हरगिज़ न मिलाए कि सब हराम हो जाएगा। इसी तरह मुरतद के यहाँ अक़ीके में जाने में भी हराम खाने का ख़तरा है।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 109,110)*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (8)*
*● अब्दुल्लाह :* मुरतद से निकाह का हुक्म ज़रा तफ़सीली बयान करें ?
● *मुफ़्ती साहब :* मुरतद का निकाह किसी से नहीं हो सकता यहाँ तक कि मुरतद्दा से भी नहीं। आजकल शादी के वक्त लोग अक्सर अकाएद नहीं देखते और हजारों निकाह बातिल हो जाते हैं और इसका गुनाह उन पर होता है जो जानते हुए भी ऐसे निकाह को करते हैं और शरीक होते हैं। आज इस मसअले की बेख़बरी की वजह से बहुत से लोग हज़ारों रुपए खर्च करके अपनी बहन, बेटी को ज़िना के लिए पेश कर देते हैं और जब निकाह कायम न हुआ तो सोहबत कब जाइज़ वह तो ज़िना हो गई। अल्लाह महफूज़ रखे।
*● अब्दुल्लाह :* ये लोग तो हमारे यहाँ निकाह करने में कुछ भी बुरा नहीं समझते और हुक्म तो हमारे लिए बड़ा सख्त और इससे यह लोग हममें घुस जाते हैं और वहाबियत फैलती जाती है हमें क्या करना चाहिए ?
*● मुफ्ती साहब :* आजकल देखा यह गया है कि मुरतद लोग सुन्नीयों में शादी करना चाहते हैं ताकि सुन्नियों के ईमान पर डाका डाल सकें और इस तरह रिशता हो जाने के बाद अपने रिशतेदारों को बेदीन बनाना आसान हो जाए और सिर्फ नाम का सुन्नी अल्लाह व रसूल और बुजुर्गाने दीन की झूटी महब्बत का दावेदार उनके दुश्मनों के यहाँ रिशता कर लेता है हालांकि उनके यहाँ शादी करना ज़िना का दरवाज़ा खोलना है इसलिए कि मुरतद के साथ निकाह जाइज़ ही नहीं होता।
● *अब्दुल्लाह :* किसी मशहूर किताब का हवाला दें कि मुरतद से निकाह है ही नहीं ?
● *मुफ्ती साहब :* फतावा आलमगीरी जिल्द अव्वल मिसरी सफहा 263 में है " मुरतद का निकाह मुरतद्दा (मुरतद औरत), मुस्लिमा (मुसलमान औरत) और काफ़िरा असलिया (वह औरत जो असली काफ़िर हो) किसी से जाइज़ नहीं ऐसे ही मुरतदा का निकाह किसी से नहीं हो सकता। "इसी तरह इमाम मुहम्मद अलैहिर्रहमत व रिज़वान की किताब मबसूत में है।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 110)*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (9)*
*○ अब्दुल्लाह :* बड़ा सख़्त मामला है सब कबाड़ा हुआ जाता है ?
*○ मुफ्ती साहब :* हैरत है कि सुन्नी अपने बाप दादा के दुश्मनों से रिश्ता नहीं करता मगर अल्लाह व रसूल और बुजुर्गाने दीन के दुश्मनों के यहाँ शादी बियाह करने में कोई रुकावट नहीं महसूस करता और जब उनके यहाँ रिश्ता करने से मना किया जाता है तो कहता है कि अब वह जमाना नहीं रहा कि उनके यहाँ शादी करने से रोका जाए। ऐसे लोग जब और थोड़ी तरक्की कर लेंगे तो उन्हें शायद गैर कौमों में भी रिश्ता करने से ऐतराज़ न होगा जैसा कि आज कुछ नाम निहाद मुसलमान गैर मुस्लिमों के यहाँ शादी करने लगे हैं।
*○ अब्दुल्लाह :* कुछ लोग कहते है कि लड़की लाने में कोई हर्ज नहीं अलबत्ता उनका लड़की देना गलत है ?
*○ मुफ़्ती साहब :* लड़की या लड़का किसी का रिश्ता करना उनसे जाइज़ नहीं *जैसा कि फतावा अलमगीरी के हवाले से अभी गुजरा।* लड़की देने में तो एक लड़की को मुरतद के हवाले करना है और मुरतद की लड़की लाने में अपने लड़के और उसकी औलाद को मुरतद होने के रास्ते पर खड़ा करना है इसलिए कि अकसर यही होता है कि जिस सुन्नी लड़के की बिवी मुरतद के यहाँ से लाई गई कुछ दिनों के बाद वह बहकी बहकी बातें करने लगता है और औलाद नाना नानी का असर कबूल करती है। मुरतद का जबह किया हुआ मुर्दारी खाती है, उन्हीं का तौर तरीका इख़्तयार करती है यहाँ तक कि कुछ दिनों बाद यह होता है कि पूरा घर बेदीन हो जाता है।
*खुलासा यह है कि मुरतद के घर लड़की देना या लेना दोनों ही से वेदीनी का दरवाजा खुलता है बल्कि लड़की लाने में नुकसान ज्यादा है।*
अल्लाह महफूज़ रखे।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 110,111)*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (10)*
○ *अब्दुल्लाह :* ये लोग तो हमसे निकाह में परहेज़ नहीं करते जबकि यह हमें शिर्क करने वाला जानते हैं।
○ *मुफ्ती साहब :* बड़ी हैरत की बात है कि देवबन्दीयों वहाबियों के नज़दीक हम कब्र के पूजने वाले हैं तो फिर वह हमसे निकाह करने में परहेज़ क्यूँ नहीं करते। यह सब इनकी मक्कारी है सुन्नीयों के करीब आने और उनके ईमान को छीनने के लिए। उससे ज्यादा हैरत की बात यह है कि सुन्नी या किसी शख्स की बहन बेटी पर कोई ग़लत निगाह डाले तो वह उसकी आखें निकालने को तैयार हो जाता है मगर यहाँ यह नहीं देखता कि जब निकाह ही नहीं हुआ तो कैसे अपनी बहन और बेटी को उस मुरतद के सामने जिना के लिए पेश करता है और उसके साथ साथ पूरी महफिल यह तमाशा देखने को तैयार जाता है। अल्लाह मुसलमानों को महफूज़ रखे।
*○ अब्दुल्लाह :* अगर कोई शादी के लालच में दिखावे की तौबा कर ले तो सुन्नी फंस जाए तो?
*○ मुफ्ती साहब :* यह भी देखा गया है कि कुछ मुरतद दिखावे को तौबा कर लेते हैं और कुछ दुनियादार मौलवी बादे तौबा फौरन निकाह पढ़ा देते हैं और अपना नज़राना सीधा करके चलते बनते हैं। यहाँ पर शरीअत का हुक्म यह है कि तौबा के बाद फौरन उसके साथ निकाह नहीं किया जाएगा बल्कि कुछ दिनों उसे देखा जाएगा कि अपने तौबा पर वह काइभ है या नहीं जैसा कि फ़ासिक मोलिन तौबा कर ले तो फौरन उसे इमाम नहीं बना दिया जाएगा।
*📚 फतावा रज़विया जिल्द 3, फतावा काजी खाँ और फतावा आलमगीरी में है कि* "फासिक तौबा कर ले तब भी उसकी गवाही नहीं कबूल की जाएगी जब तक कि इतना वक्त न गुज़र जाए कि उस पर तौबा का असर ज़ाहिर हो।"
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 111,112)*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (11)*
*○ अब्दुल्लाह :* इतनी नफ़रत मुरतद से रखना क्या ठीक लगता है?
*○ मुफ्ती साहब :* शरीअत के हुक्म से साफ जाहिर है कि शरीअत ने मुरतद से किस हद तक नफ़रत दिलाई और इस हुक्म के जरिए मुरतद् का सोशल बायकाट (यानी निरादरी से अलग या हुक्का पानी बन्द करना) करने का हुक्म दिया है क्यूँ। और मुरतद का यह हुक्म सब फ़िरकों में एक सा है और सब ही फ्रिके यही हुक्म लगाते हैं। इसलिए कि यह आस्तीन का सांप है और कौम और मज़हब की जड़ें खोखली करता है। नेकी की आड़ में वह गुनाह कराता जिसकी कोई माफ़ी नहीं, ईमान का ऐसा दुश्मन कि कब ईमान छीन ले जाए पता नहीं। शायद कुछ लोगों को इस बात पर ऐतराज़ हो कि इतनी सख्ती क्यूं तो अव्वल तो मैं उनसे यह कहना चाहूँगा कि यह हुक्म उनके लिए है तो वाकई अल्लाह व रसूल का दुश्मन है और दूसरे मैं उनसे पूछना चाहूंगा कि अगर उनके माँ बाप, उस्ताद, पीर या दीगर अहबाब की कोई तौहीन करे तो क्या वह बर्दाश्त कर सकेगें तो कैसे उनकी तौहीन बर्दाश्त होगी जो हमारे सब कुछ हैं जिनके लिए हम दुनिया में आए हैं जिनके लिए अल्लाह पाक ने सारे जहाँ बनाए। वह जो माँ बाप से ज्यादा हमे प्यार करते हैं, वह जिनसे वास्ता पड़ना है कब्र में, हश्र में, वह जो मीजान पर और पुलसिरात पर मदद फरमायेंगे. हौजे कौसर पर सैरान करायेंगे वह जो जन्नत में ले जायेंगे वह जो दोजख से बचायेंगे, वह जिनके बगैर न जन्नत मिले न दोजख से नजात। रोज़े महशर सब उन्हीं के आगे हाध फैलाऐ होंगे। उस रोज़ किस मुँह से उनका सामना करोगे। क्या वह इस बात से नाराज न होंगे, क्या अल्लाह तआला इस बात नाराज़ न होगा कि दुनिया में तुम अल्लाह रसूल के दुश्मन के साथ थे। अल्लाह के वास्ते सोचो वह वक्त जब कोई काम न आयेगा तो कौन काम आयेगा और जो काम आएगा उसी की नाराज़गी ले ली तो क्या पार पा सकोगे। अब भी वक्त है दूर हो जाओ अल्लाह के दुश्मन से दूर और बहुत दूर रहो। गर्ज उनके बदगो से हमें दूर रहना है और अगर उनका बदगो हमारे बीच पल रहा है तो उसे दूध की मक्खी की तरह निकाल बाहर फेंकना है, उसका पर्दा फ़ाश करना हमारे और हमारी कोम के लिए बेहद जुरूरी है। उम्मीद है आप बात की नजाकत को समझ गए होगें।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 112,113)*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (12)*
*📝 अब्दुल्लाह :* आपका बहुत बहुत शुक्रिया कि आप आपने ज़हन को बिल्कुल साफ़ कर दिया मेरी परेशानी को दूर कर दिया अल्लाह पाक आपको अपने हबीब के सदके में इसका बड़ा अज्र अता फरमाये अब मुझे इजाजत दें।
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* आज की तवील गुफ्तगू में मैंने आपको सबसे पहले ईमान की अहमियत बताई और यह बताया कि ईमान सलामत तो सब बेहतर ईमान गया तो सब दरबाद और अल्लाह के अज़ाब से बेईमान को कहीं छुटकारा नहीं फिर उन हदीस से साबित उन भविष्यवाणियों को बताया गया जो बदमज़हब फ़िरकों के बारे में हैं और फिर संक्षेप में उन फिरकों का इतिहास बताया गया फिर इस बात का सुबूत पेश किया गया कि देवबन्दी वहाबी फिरके बदमज़हब और मुरतद हैं और सुबूत में उनकी लिखी कि किताबें भी दिखाई। यह भी बताया कि यह मौलवियों की जाती लड़ाई न होकर इस बात को लड़ाई है कि बदमज़हब फ़िरके अल्लाह व रसूल की तोहीन करने की वजह से काफ़िर व मुरतद हैं और यह भी समझा दिया गया कि यह इख़्तलाफ़ात (मतभेट) नियाज़ - नज्र, फातिहा या मज़ारात पर हाज़री के नहीं बल्कि इस बात के हैं कि ये लोग अल्लाह रसूल के बद - गो और रसूल की तौहीन करने वाले हैं लिहाज़ा इस्लाम से ख़ारिज और मुरतद है। यह भी बताया कि वो गलत बातें यानी सुन्नियों की बदआमालियाँ जो बहुतेरे सुन्नी बराबर कर रहे है वह सुन्नियों को नहीं करना चाहिए कि वो बातें सुन्नी आलिमों ने खुद ही मना की हैं। और इखलाफी मसाइल पर आपके सारे सवालों के इत्मिनान बलश जवाब दिए और कुछ ऐसी किताबों के बारे में भी बताया कि आप खुद हवाले देखें। इन सब बातों के बताने के बाद यह ईमान अफरोज़ राय दे रहा हूँ कि वह लोग जो वाकई में बद्मजहब, गुमराह, अल्लाह रसूल की तौहीन करने वाले हैं चाहे वह कितने भी नेक नजर आयें उनसे बचना कितना जरूरी है। यह बात आज कोई नई नहीं बरसों से हमारे उल्मा बताते आ रहे हैं मगर देखा यह गया है कि सब कुछ जानने के बाद भी कुछ लोग उनसे वचते नहीं और दुनिया के लालच में उनसे मिलतं जन्नत है और तरह तरह के बहाने अनाका दसरों से भी बहरस कम्त हैं और कहते हैं कि किसी से मिलने जुलने से रोकना नहीं चाहिए और कहते हैं कि यह सुन्नियों को हर वक्त बस यही पड़ी रहती है इसके अलावा कोई बात नहीं करते। अरे सोचो ज़रा वह आलिम जो तुम्हें इन बेदीनों से होशयार कर रहा है तुम्हारा दोस्त है या दुशमन, उसे तुमसे क्या लालच है जो ऐसा कर रहा है। लोग इल्जाम लगाते है कि मुन्नी अमल की बात नहीं बताते बस यही कहते रहते हैं कि वहाबी ऐसे वहाबी वैसे। पहली बात तो यह गलत है कि सुन्नी आलिम अमल करने के लिए नहीं कहते हाँ यह जरूर है कि सुन्नी आलिम सबसे ज़्यादा अहमियत इसी बात को देते है कि इनसे दूर रहो यह अल्लाह रसुल की तौहीन करने वाले हैं मुरतद है इनसे दूर रहो नहीं तो तुम्हारे ईमान यह छीन लेंगे और तुम्हें पता भी न चलेगा और जब ईमान ही न रहेगा तो फिर नमाज़ रोज़ा और दूसरी इबादतें कहाँ कबूल होगी लिहाज़ा ईमान की अहमियत बताना बहुत ज्यादा जरूरी हैं।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 113,114)*
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*🔰 परेशान मुसलमान, पोस्ट नं. ➪ 80 🔰*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (13)*
*📝 अब्दुल्लाह :* कुछ लोग कहते हैं कि हम जब काफिरों से मिलते हैं और यह भी काफिर हैं तो इनसे मिलने में हर्ज क्या है।
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* इसका जवाब यह है कि इनसे मिलने जुलने को रोकना किसी ने अपनी तरफ से नहीं निकाला बल्कि अल्लाह व उसके रसुल ने इन लोगों से मिलने को मना फरमाया। दूसरे यह कि जाहिरी या खालिस काफ़िर से मिलने में दीन का वह नुकसान नहीं जो इन लोगों से है चूंकि काफिर से आप उसे काफिर समझ कर मिलते हैं और बदमज़हब को मुसलमान समझने लगते हैं उसकी झूटी नमाज और दुसरी झूटी इबादत से बहक जाते हैं। खुला काफिर आपको जल्दी दीन का नुकसान नहीं पहुंचा सकता हाँ दुनयवी नुकसान पहुंचा सकता है। दुनयवी नुकसान तो यहीं रह जाता है मगर दीन में अगर नुक्सान आ गया या दीन चला गया तो वह हमेशा का नुकसान यानी हमेशा के लिए दोजख में पहुंचाने वाला है। काफिर से मिलने जुलने को ऐसा मना न किया गया जैसा कि बदमजहब से मिलने को किया गया बल्कि काफ़िर से मिलने का बाज़ वक्त हुक्म है, अगर उससे न मिलोगे तो उसे इस्लाम को दावत कैसे दोगे और यू जरूरत और अखलाकी तौर पर मिलने का हुक्म भी है, और इससे परहेज़ मुहाल।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 114)*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (14)*
*✍🏻 अब्दुल्लाह:* हमारे आका ने तो अच्छे अखलाक का हुक्म दिया क्या इनसे अखलाक के साथ पेश नहीं आया जा सकता कि यह राहे रास्त पर आ जायें
*✍🏻 मुफ्ती साहब:* बदमजहब से मिलना अखलाक नहीं बल्कि बदअखलाकी है। बदमजहब से न मिलना अखलाक और मिलना बदअखलाकी। इस बात को इस तरह समझइये कि अगर आपके बाप दादा या आपके किसी चहीते को कोई ख़्वामख्वाह गाली दे और और आप उसके आगे झुके चले जायें, वह आपके माँ बाप को गालियाँ लिखकर लिखकर छापे और आप उससे अख़लाक़ से पेश आते रहें तो दुनिया आप से यही कहेगी कि तेरी गैरत को क्या हो गया है यह कैसा अख़लाक़ है यह तो अच्छा अख़लाक़ नहीं बल्कि अच्छा अख़लाक़ तो यह है कि अपने माँ बाप की इज्जत का ख्याल करते हुए तू हमेशा के लिए उसे दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दे जो तेरे माँ बाप को बुरा कहे या उसे किसी दुनयवी गर्ज से अपने दोस्तों में शुमार करता रहेगा। हाँ अगर किसी मजबूरी की वजह से मिलना भी पड़ जाए तो दिल में नफ़रत रखते हुए बस जुरूरत के तहत काम से काम रखते हुए मिलो मिसाल के तौर पर अगर तुम्हारे पास कोई बदमज़हब माल ख़रीदने आता है तो बस उससे ख़रीद फरोख्त तक ही तअल्लुक रखो। जहाँ तक हो सके उससे माल खरीदने से बचो। या मसलन तुम नौकरी में हो और तुम्हारे साथ कोई बदमज़हब काम करता है तो बस काम की हद तक काम रखो उससे ज़ाती तअल्लुक की ज़रूरत नहीं। जाती तअल्लुकात बढ़ाने में यह नुकसान साफ़ है कि जब तअल्लुकात बढ़ेंगे तो जाना आना बढ़ेगा और उसके घर दावत और मौत में भी जाना पड़ सकता है और यआज़ अल्लाह कहीं किसी.बदमज़हब की नमाज़े जनाज़ा न पढ़ना पड़ जाए जब कि काफ़िर के साथ ऐसा नहीं। इसी तरह से समझो अज़ीज़ों क्या यह अखलाक होगा कि जो तुम्हारे सब कुछ जिनका मरतबा माँ बाप और हर अज़ीज़ से ज्यादा है, क्या उनको गालियाँ लिख लिखकर छापने वाले से मिलना अख़लाक होगा जब तक मालूम न था कोई इतनी सख्त बात न थी आज जब मालूम हो गया कि ये वही लोग हैं जिनके बारे में अल्लाह के हबीब ने पहले ही फरमा दिया था कि इनसे दूर रहना तो अब तुम्हारी गैरत क्या कहती है।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 115)*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (15)*
*📝 अब्दुल्लाह :* सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से महब्बत का तकाज़ा तो यही है कि इनसे नफ़रत सख्ती से रखी जाए ?
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* जो तुमसे इतनी महब्बत करते हैं जितनी तुम अपने आप से भी नहीं करते तुम्हें उनकी तौहीन करने वालों मिलना अच्छा लगता है। तुम गुनाह पर गुनाह करते रहते हो वह (हुज़ूर सल्ल्ल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) तुम्हें हर दम बाद करें तुम्हारी माफी के लिए रब तबारक व तआला से बराबर अर्ज करें ऐ अल्लाह इन्हें माफ फरमा दे, जो रातों को तुम्हारे लिए रोते थे, जो तुम्हें दोज़ख से बचाएंगे जन्नत में ले जायेंगे क्या उनके बगैर कोई जन्नत में जा सकेगा ज़रा अपने आमाल तो देखो क्या तुम्हारे आमाल इस काबिल हैं। क्या यह इस बात से खुश हो सकते हैं क्या अल्लाह इस बात से खुश होगा कि तुम अल्लाह और अल्लाह के हबीब की शान घटाने वाले से अखलाक से पेश आते रहो हरगिज़ नहीं बल्कि जितना तुम बदमज़हब से महब्बत करोगे तो अल्लाह का ग़ज़ब तुम पर हो सकता है अल्लाह के अज़ाब और गज़ब से कहीं छुटकारा नहीं। अल्लाह हमें और आपको माफ़ फ़रमाए।
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (16)*
*📝 अब्दुल्लाह :* कुछ लोग कहते हैं कि आपस में इत्तेहाद (एकता) कायम करो क्यूँकि दूसरे काफ़िरों की नज़र में सब मुसलमान हैं और तुम्हारे इस तिफरके का वह फायदा उठायेंगे।
*✍🏻 मुफ्ती साहब :* बात समझ में आती है लेकिन याद रखो इसाई, यहूदी और मुशरिक भी खूब अच्छी तरह जानते हैं तुम्हारे इस तिफरकों को और इन फिरके कराने में इसाईयों और यहूदियों का भी हाथ है। इन बदमजहब फ़िरकों में बाज़ लोग इसाईयों और यहूदियों के ऐजेन्ट हैं। क्या इन ऐजेन्टों और बागियों से इत्तेहाद हो सकता है ? क्या दुश्मन के जासूस को पहचान लेने के बाद उसे फ़ौज में रखा जाता या उस गद्दार को मौत के घाट उतार दिया जाता है ? देखो जो शख्स तुम्हारी दौलत या माल हथियाने की ख़ातिर तुमसे दोस्ती करता या मसलन डाकूओं का कोई साथी तुम्हारे घर में इस लिए आता जाता है कि तुम्हारे भेद पा ले और मौका पाते ही तुम्हें लूट ले तो क्या तुम उसे घर में आने दोगे और अख़लाक से पेश आओगे, क्या तुम्हारी बहन बेटी पर बुरी नज़र रखने वाले को घर में आता रहने दोगे क्या ऐसों से भी इत्तेहाद करोगे। शायद ऐसे से इत्तेहाद से तुम्हें वह नुकसान न पहुँचे जो दीन के डाकू से पहुँचने वाला है कि वह तुम्हें कभी न कभी यह ज़रूर कहेगा कि यह नाजाइज़ वह नाजाइज बल्कि कुरआन व हदीस से झूटी तावीलें भी देगा गर्ज यह कि वह कभी भी तुम पर हमला करके तुम्हारे ईमान को ख़तरे में डाल देगा और शायद छीन ही लेगा। सोचो जरा क्या इस इत्तेहाद से फायदा पहुंचेगा या नुकसान। तो ऐसे इत्तेहाद से क्या फायदा जिसमें नुकसान नुकसान है फायदा नहीं पहुँचने वाला बल्कि अगर सार बदमज़हबों को अलग कर दिया जाए और तुम्हारी जमाअत छोटी भी रह जाए तो वह छोटी जमाअत भी काफी है और सही इत्तेहाद वही है, हो इत्तेहाद जुरूरी वहाँ है और बहुत जरूरी है जहाँ दुन्यबी इख्तेलाफात हो या ऐसे इखलाफात हो दीन से ताल्लुक नहीं हां एक सूरत है इत्तहाद की वह यह कि ये बदमज़हब फिरके इस बात से बाज़ आ जायें जो लड़ाई की अस्ल जड़ है यानी अल्लाह रसूल की तौहीन करना कोड़ दें सच्चे दिल से तौबा करें और उन किताबों को छापना बन्द कर दें जिनमें तौहीन की गई बल्कि सिर्फ उन इबारतों और उन नाजाइज़ बातों को अपनी किताबों से निकाल दें और सच्चे दिल से तौबा करें तो इत्तेहाद हो सकता है और इत्तेहाद की सिर्फ यही सूरत है।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 116,17)*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (17)*
📝 *अब्दुल्लाह :* कुछ लोगों को जानकारी नहीं होती और बाद में जानकारी होती है और मुहल्ले, रिश्तेदारी, पुरानी दोस्ती या किसी और बिना पर कुरबत होने की वजह से मेल जोल के दौरान उन पर उस बदमज़हब दोस्त के ऐहसान होते हैं और वह इस बिना पर उससे तअल्लुकात नहीं ख़त्म कर पाते कि फलों ने हमारे साथ यह यह ऐहसान किया या हमारे गिरे वक्त में साथ दिया या पैसे या माल से हमारी मदद की या हमारा कोई काम करवाया या अब भी कभी कभी मदद करता है। गर्ज बाज़ वक़्त उसके ऐहसानों में दबे हुए होते है और उससे तअल्लुकात ख़त्म नहीं कर पाते और कहते यह हैं कि किसी के ऐहसान को भूलना नहीं चाहिए अल्लाह ने भी ऐहसान का बदला देने का हुक्म दिया है। ऐसे में क्या करा जाए ?
✍🏻 *मुफ्ती साहब :* बात सही मालूम होती है मगर ज़रा सोचो अगर तुम्हें उस ऐहसान करने वाले से इतनी ही महब्बत है कि तुम भी उसकी हर मदद करने को तैयार हो और उसे कोई नुकसान पहुँचाना चाहता है तो तुम उसकी हर मदद करने को तैयार हो तो क्या तुमको यह गवारा है कि वह अल्लाह व रसूल की तौहीन करके दोज़ख़ में जाए यह तो एहसान का बदला या महब्बत का तकाज़ा नहीं हुआ। उसे महब्बत से समझाओ कि तुम ग़लत राह पर हो सही माअनी में यही ऐहसान का बदला हुआ। वह अगर तुम्हारे समझाने पर न माने और अपनी ही बातों पर अड़ा रहे तो अब ज़रा याद करो अल्लाह के ऐहसानों को क्या उसके ऐहसान ज़्यादा है या अल्लाह व रसूल के। गौर करो एक वक्त था तुम्हारा वजूद भी न था अल्लाह ने अपने फज्ल से तुम्हें पैदा फरमाया तुम्हें अशरफुल मखलूकात यानी इन्सान पैदा किया तुम्हें सर से पा तक हजारों बल्कि बेगिनती नेअमतों से नवाजा जरा थोड़ी देर को सोचों इन नअमतों में से वह एक दो नेअमतें वापस ले तो और गौर करो तुम्हें खाना पानी, कपड़ा, हवा, धूप, रोशनी अंधेरा , इल्म अक्ल ये सारी नेअमतें और रहमतें कौन दे रहा और किसके सदके में मिल रहीं हैं। बिन मांगे तुम्हें हज़ारो नअमतें मिल रही हैं क्या तुम सुबह उठ कर हर नेअमतें मांगते हो ? अब ज़रा सोचो किसका ऐहसान चुकाना ज्यादा जरूरी है और किस तरह चुका सकोगे क्या अल्लाह और उसके हबीब का ऐहसान चुका सकोगे ? क्या सच्चे ऐहसान करने वाले के मुकाबले तुम उस झूटे और फानी ऐहसान करने वाले को तरजीह दोगे ? अल्लाह और रसूल का ऐहसान सच्चा और बिना किसी लालच के है और उसके ऐहसान में उसका वही लालच कि तुम्हारा ईमान छीन ले जाए। अगर न भी ईमान छीन सका फिर भी वह तुम्हारे ऊपर इस लिए ऐहसान करता है कि कल तुम भी उसके साथ कुछ करोगे और अल्लाह व रसूल तुम पर ऐहसान किसी वजह से नहीं करते। दुनिया जानती है और मुसलमान का तो अक़ीदा है कि अल्लाह बेनियाज़ और बेपरवाह है उसे किसी चीज़ की हाजत नहीं, वह जो करता है तुम्हारे भले के लिए ही करता है। बदमज़ब के ऐहसान अगर हैं भी तो वह फ़ानी और ख़त्म होने वाले और झूटे हैं और अल्लाह का ऐहसान हमेशा से हुआ और बदतर से बदतर गुनाह करने पर भी जारी है और हमेशा होता ही रहेगा कभी खत्म न होगा तो क्या उस झूटे और ख़त्म होने वाले ऐहसान का लिहाज़ करोगे या जो होता रहा है और हमेशा होता रहेगा उसका लिहाज़ करोगे बेशक अल्लाह का ऐहसान सबसे बड़ा है। देखो तुम अल्लाह के ऐहसान का बदला चुका नहीं पाते न चुका सकोगे फिर भी उसके ऐहसानात जारी रहेंगे मगर ज़रा बदमज़हब के उन झूटे ऐहसानो से मुँह फेर कर तो देखो वह कैसा नाराज़ होता है या अगर नाराज़ न भी हो तो दिल ही दिल में क्या सोचेगा क्यूँकि यह इन्सान की फ़ितरत है कि जो उसके साथ बेरुखी करता है तो वह उससे दिल ही दिल में बुरा जानने लगता है। इस पर भी अगर वह तुमसे मुंह फेरे तो समझ लो कि वह अब किसी नई तरकीब से तुम्हारे साथ और ऐहसान करके तुम्हारे ईमान की फ़िक्र में और ज्यादा लग जाएगा।
लोग तअल्लुकात इस लिए बढ़ाते हैं कि वह तअल्लुकात काम आयेंगे और होता भी ऐसा हैं कि तअल्लुकात दुनयवी काम भी आते हैं और यह अच्छी बात है लेकिन क्या तअल्लुकात हर पैरे गैरे से बढ़ाए जाते हैं, क्या तअल्लुकात इस लिए बढ़ाए जाते हैं कि हमारा दो पैसे बच जायेंगे चाहे उससे बड़ा नुकसान हो जाए।
अगर कोई किसी बुरे आदमी तअल्लुकात बढ़ाना चाहता है तो लोग उसे यही समझाते हैं कि देखो इससे दूर रहो, इस वक्त तो यह तुम्हारे काम आ रहा मगर आने वाले वक्त में यह तुम्हें नुकसान पहुंचा सकता है और होता भी यही है बल्कि फितरत भी यही है कि तअल्लुकात के पीछे हर शख्य का कोई न कोई मतलब होता है और यहाँ तअल्लुकात बढ़ाने में उसका मकसद तुम्हारा ईमान छीनना और तुम्हारा मकसद दुनिया का कोई फानी काम। तो दुनिया के फ़ानी काम की खातिर अपनी आकबत और अपने ईमान को खतरे में न डालो। तअल्लुकात बढ़ाओ बेशक बढ़ाओ मगर उससे जिससे तुम्हारा दुनयठी काम भी निकले और दीन का नुकसान भी न हो और अल्लाह व रसूल भी राजी हो। अल्लाह व रसूल को नाराज करके तुमने तअल्लुकात बढ़ाए और मान लो तुम्हारे दुनयवी काम भी हो गए क्या तुम्हें इससे फायदा हुआ कि तुमने ज़रा से फायदे की खातिर अल्लाह और उसके रसूल से नाराज़गी मोल ले ली। यही तो इम्तहान है कि अल्लाह तआला देखना चाहता है कि तुम हमारो खातिर हमारे दुश्मन को, जो आज तुम्हें ज्यादा अज़ीज़ हो गया है छोड़ते हो या नहीं।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 117,118,119)*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (18)*
*📝 अब्दुल्लाह :* बाज़ पीरों के यहाँ तो इतनी सख्ती नहीं है जितनी आपने बता दी उनके बारे में आप क्या कहना चाहेंगे ?
✍🏻 *मुफ्ती साहब :* आज कुछ पीर लोग भी ऐसे हैं जो अपनी पीरी मुरीदी चमकाने के लिए यह कहते हैं कि मियाँ इन चक्करों से दूर रहो यह आलिमों मौलवियों की बातें हैं फ़क़ीर के पास तो सब तरह के लोग आते हैं फ़कीर से इन बातों का क्या लेना देना। याद रखो अल्लाह व रसूल के दुश्मन को दोस्त समझने वाला पीर झूटा पीर है हाँ अगर वह पीर उसे समझा सकता है या अपनी बातनी ताकत से उसे राह पर ला सकता है तो ऐसा करना बेहतर है मगर अवाम से यह कहना कि सब से मिलो यह सही नहीं। कुछ पीर या कुछ लोग यह कहते हैं कि इनसे दूर मत रहो बल्कि इन्हें समझाओ इनसे मिल जुल कर इन्हें पास बुला कर समझाओ, उनको महब्बत से अपनाओ। बात सहीं मालूम होतो है मगर वह समझाना उनके लिए है जो वाकई समझना चाहते हैं या थोड़े बहुत बहके हुए है यानी सुन्नियों की बदआमालियां को देखकर उनसे बदज़न हो गए है आम सुन्नियों की हरकतें मसलन मुहर्रमदारी या लूट खसोट को देखकर गलत अकीदा कायम कर बैठे है कि सुन्नी बुरे है ऐसे लोगों को पास बुलाकर महब्बत से समझाना चाहिए बल्कि ऐसा करना ज़रूरी है। आख़िर में वही बात फिर कहना है कि गुनाहों के अज़ाब से कभी न कभी छुटकारा मिल जाएगा लेकिन अगर ईमान छिन गया तो कभी छुटकारा न मिलेगा। अल्लाह तआला। तमाम सुन्नियों को अपने महबूब सल्लल्लाहु तआला अलेहि वसल्लम के सदके बदमहज़हबों की सोहबत से बचाए और दुनिया से साथ ईमान के उठाए। आमीन।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 119)*
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*✍🏻 मुरतद और मुरतद के अहकाम (19) आखिरी*
*📝 अब्दुल्लाह :* कुछ ऐसी किताबों के नाम बताइये कि हम उन किताबों को पढ़ कर अकाइद और फुरूई मसाइल को समझ सकें और फिर कोई सवाल उभरे तो आपके कीमती वक़्त से कुछ वक्त लिया जाए।
*✍🏻 मुफ़्ती साहब :* इन मसाइल को समझने के लिए इस फ़क़ीर का दर हर वक्त खुला है फिर भी कुछ किताबों के नाम नोट कर लें : ओर इस पोस्ट को सेव करके रखले ।
1. इल्मे गैब के सुबूत में आलाहज़रत की यह किताबें देखें : अद्दौलतुल मक्किया (अरबी व उर्दू), इल्मे गैबे रसूल (हिन्दी में भी), इम्बाउल मुस्तफ़ा।
2. वसीले के सुबूत और बुजुर्गों से मदद के सुबूत के बारे में जानने के लिए यह किताबें देखें : --
3. इस्लाहे फ़िक्र ओ ऐतकाद (अरबी में अल्लामा सय्यद अलवी मालकी) और यही किताब उर्दू में अल्लामा यासीन अख्तर मिस्बाही साहब की।
4. वसीला दलाइल की रोशनी में (अरबी में मौलाना हकीम शरफ़ कादरी)
5. अल इन्तेबा (शाह वली उल्लाह अलैहिर्रहमा)
6. इस्लामी अकाइद (अल्लामा सय्यद यूसुफ़ हाशिम रिफ़ाई)
7. अल इस्तिमदाद (आला हज़रत)
8. निदाए या रसूलल्लाह (आला हज़रत)
9. मज़ारात पर हाज़री के सुबूत में आलाहज़रत की फ़तावा रजविया (चौथी जिल् ) और कुबूरे मुसलमान की ताज़ीम -ओ- तौकीर देखें।
10. न्याज़ नज़्र व फातिहा के सुबूत के लिए फ़ातिहा का सुबूत देखें। मौलाना शाह सलामतुल्लाह रामपुरी की किताब 'ग्यारहवीं शरीफ़' देखें।
11. तीजे और चालीसवें वगैरह में राइज हो गई ग़लत रस्मों के सुबूत में आला हजरत की किताब 'दावते मय्यत देखें जो कि हिन्दी में भी छप चुकी है।
12. मज़ारात पर सजदा व तवाफ़ के रद्द में आलाहज़रत की किताब “हुरमते सजदए ताज़ीमी अहादीस की रोशनी में" देखें (हिन्दी में भी है) और फतावा रजविया की चौथी जिल्द देखें।
13. मीलाद शरीफ़ और खड़े होकर सलाम पढ़ने के सुबूत आलाहज़रत के वालिदे माजिद मौलाना नकी अली खाँ अलैहिर्रहमा की किताब "इस्बातुल मौलिदे वल कयाम" और आलाहज़रत की किताब "इक़ामतुल कयामा" देखें।
14 बुजुर्गों के मजार पर उर्स के सुबूत में फतावा रज़विया और जाअल हक का मुताला करें।
15 आलाहज़रत ने अपनी किताब "रूहों की दुनिया" और फतावा रजविया की चौथी जिन्द में कुरआन और हदीस से यह सावित किया कि मुर्दे देखते हैं, सुनते हैं और बोलते भी हैं मगर हम उनका सुनना देखना और बोलना देख नहीं पाते। इस किताब में इस बात का सुबूत भी है कि रूहें घरों पर आती है।
16. हुज़रे अकदस सल्लल्लाहु तआला बालहि वसल्लम पर नुबुव्यत् ख़त्म हो चुकी यानी अब कोई नबी नहीं आएगा। इस मसअले के सुबूत में आना हज़रत की किताब "ख़त्मे नुबुवत' फतावा रजविया की छटी जिल्द में देखें।
17. हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के हाज़िर -ओ- नाजिर होने के सुबूत में मौलाना मुहम्मद फैज़ अहमद उवैसी की किताब “हाजिर -ओ- नाज़िर" देखें।
18. कब्र पर अज़ान के सुबूत में आलाहज़रत की किताब "अज़ाने कब" देखें। हिन्दी में भी छप चुकी है।
19. अजान के वक्त अंगूठे चूमने के सुबूत में आलाहज़रत की किताब "अंगूठे चूमिए" देखें। हिन्दी में भी छप चुकी है।
20. रबी उल अव्वल शरीफ़ के मौके पर चरागा करने के सुबूत में आलाहज़रत का रिसाला “बरीकुल मनार" फतावा रज़विया में देखें।
21. मुहर्रम के दिनों में तख्त ताज़िया मातम वगैरह के रद्द में आलाहज़रत की किताब रिसाला “ताजियादारी" देखें। जो हिन्दी में भी शाए हो चुका है।
22. बदमजहब से निकाह हराम है और इसके अलावा बदमज़हबों के साथ दूसरे अहकामात जानने के लिए फ़ताबा रजविया की छठी जिल्द देखें और मुफ्ती जलाल उद्दीन साहब की किताब 'बदमजहबों से रिश्ते' उर्दू व हिन्दी में देखें।
22. बदमजहब से निकाह हराम है और इसके अलावा बदमज़हबों के साथ दूसरे अहकामात जानने के लिए फ़ताबा रजविया की छठी जिल्द देखें और मुफ्ती जलाल उद्दीन साहब की किताब 'बदमजहबों से रिश्ते' उर्दू व हिन्दी में देखें।
23. मुफ्ती जलालउद्दीन साहब की एक किताब "बुजुर्गों के अकीदे" का मुताला करने के बाद आपको यह पता चलेगा कि हमारे बुजुर्गों के निम्न मसाइल के बारे में क्या अकोदे हैं :
1. तसर्रुफ व इख्तेयार
2. इल्मे गैब
3. हाज़िर ओ नाजिर कब्रों की जिन्दगी
5. ताज़ीम
6. वसीला
7. ज्यारते कुबूर और उनसे मदद मांगना
8. हुजूर के जिस्म मुबारक का साया न था
यानी इस किताब के जरिए आपको यह बात अच्छी तरह मालूम हो जाएगी कि हमारे बुजुर्ग सालहा साल से बल्कि शुरू से क्यूँकि इस किताब में नबियों के अकीदे भी दिए गए इस इख़्तलाफी मसाइल के बारे में क्या अकीदा रखते आये हैं और यह साफ जाहिर हो जाएगा कि बुजुर्गों के यही अकाद रहे हैं जो आज अहले सुन्नत वल जमाअत के हैं।
24. अल्लामा अर्शदुल कादरी साहब की एक किताब “जलजला" है जिसमें देवबन्दियों की किताबों के हवाले से यह सुबत पेश किया गया है कि जिन अकीदों को यह लोग हराम शिकव नाजाएज मानते हैं उनमें से बहुत से अकीदे अपने बुजुगों के लिए सही जानते हैं साथ ही इस किताब में चैलेंज दिया गया है कि जो शख्स इस किताब में दिए गए हवालों को झूठ साबित कर देउसे इनाम दिया जाएगा। जलजला हिन्दी और इंगलिश में भी छप चुकी है और इन्हीं की लिखी एक किताब "जेर..ओ... जबर" भी पढ़ने से तअल्लुक रखती है
25. हज़रत मौलाना मुश्ताक अहमद रिजामी रहमतुल्लाहि तआला अलैह की किताब "खून के आंसू” में वहानियों के मक्र -ओ- फरेब की ऐसी दास्तान है जो वाकई खून के आंसू रुला दे यानी इससे साफ जाहिर है कि इन बदमजहबों ने दीन के ढाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। (हिन्दी में भी छप चुकी है)
26. अल्लामा अर्शदुल कादरी की किताब “जमाअत इस्लामी" मौदूदी जमाअत के रद्द में है जिसमें मौदूदी जमाअत के बेहूदा अकीदों को हवाले के साथ बताया गया है और इसमें साफ़ तौर पर यह साबित किया गया है कि जमाअते इस्लामी एक गुमराह और बद्दीन फ़िरक़ा है।
27. अल्लामा अर्शदुल कादरी ही किताबें “तबलीगी जमाअत" "तबलीगी जमाअत का फरेब" "तबलीगी जमाअत अहादीस की रौशनी में" पढ़ने से तअल्लुक रखती हैं। इन किताबों से साफ जाहिर है कि तबलीगी जमाअत तबलीग की आड़ में क्या खेल खेल रही है यानी नमाज के बहाने बुलाती है और जब आदमी इन पर भरोसा करने लगता है तब धीरे धीरे अपने बातिल अकीदों का जाल फैला कर गुमराह करके ईमान पर डाका डालती है। इनमें की दो किताबें हिन्दी में भी छप चुकी हैं।
*28* हुजूर के इख़्तेयारात के सुबूत में आलाहज़रत की किताब अलअम्नो वल. उला देखें।
29. जनाब मौलाना मुहम्मद अहमद मिस्बाही साहब की लिखी किताब “इमाम अहमद रज़ा रद्दे बिदआत व मुनकिरात" में आप आजकल फैल रही बदआमालियाँ और बिदआत को देख सकते है। इस किताब में निम्न बातों का रद्द किया गया है : मज़ार का तवाफ़, मज़ार को बोसा देना (उल्मा को इसमें इख़्तिलाफ़ है), मजारात पर ऊँचा कुब्बा बनाना, औरतों की मजारात पर जाना, उर्स में रक्स त गैर शरई कन्वाली, मसनूई (झूटी बनाई हुई) कब, ताक् बनाना, ताजियादारी, दावते मय्यत, तीजा फ़ातिहा व नियाज़ औलिया के गनी के खाने का हुक्म वगैरह बहुत सी बुरी रस्में और बिदआत के बारे में आलाहज़रत के हवाले से इस किताब में यह बताया गया है कि आलाहज़रत ने इन बातों से मुसलमानों को रोका है जबकि आज वह इल्जाम दिया जाता है कि सुन्नी आलिम इन बातों को रोकते नहीं बल्कि करवाते है।
30. मुफ्ती अहमद यार खाँ अलैहिरहमा की किताब "जाअल हक" जरूर जरूर देखें। जाअल हक हिन्दी और इंगलिश में भी छपी है। इस किताब में आपको तकरीबन सारे सवालों के जवाब सुबूत के साथ मिल जायेंगे।
31. और एक किताब सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सीरत पर ज़रूर पढ़े चूंकि जब हुजूर के बारे में बुनियादी अकाइद साफ़ होंगे तो सारे मसाइल खुद ही सुधर जायेंगे। हिन्दी में अल्लामा गुलाम मुस्तफ़ा आजुनी रहमतुल्लाहि तआला अलैह की “सीरते मुस्तफा" ज़रूर पढ़ें।
32. हमने यहाँ बहुत किताबों के नाम आपको गिनाए मगर समझदार के लिए सिर्फ जनान मुहम्मद अहमद साहब की एक किताब "दावते फिक्र" जो कि हिन्दी में और यही किताब उर्दू में "दावते गौर ओ फिक्र" के नाम से है। इसमें वहाबियों की चन्द कुफ्री इबारतों की फोटो कापी भी लगाई गई जो सुबूत के लिए अटम बम से कम नहीं। इसमे साफ़ तौर यह जाहिर हुआ कि अहले सुन्नत के अलावा तमाम फ़िरके बद्मजहब हैं और इनसे बचना बहुत .जुरूरी है। अब जो समझना ही न चाहे या सब कुछ समझ कर नादान बने उसका कोई इलाज नहीं ! सुन्नियों की तकरीबन हर किताब में उनके अकीदे साफ़ तौर पर लिखे होते हैं, हाँ अवाम की बदआमालियों से लोग गलत अकीदा काएम कर लेते हैं, अल्लाह तआला हमें आपको और सभी को इन बदआमालियों से बचाए रखे ताकि दुश्मन को मौका न मिले गुमराही फैलाने का।
*📕 (परेशान मुसलमान, सफ्हा नं. 120 से 124)*
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*इस पोस्ट का दूसरा ओर लास्ट पार्ट इन्शा अल्लाह कल मुकम्मल होगा*
*~📗 (परेशान मुसलमान सफह नं. 120 से 122)~*

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